मंगलवार, 21 मई 2013

स्पॉट फ़िक्सिंग : चंद हाईप्रोफ़ाइल ब्लॉगर और लेखक भी शामिल .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , कांग्रेस ने आज इस बात को खारिज कर दिया कि घपले और घोटाले कल चार साल पूरा करने जा रही संप्रग-दो की कमियां रही हैं। संप्रग कल सत्ता में लगातार नौ साल भी पूरा करेगी। जब पत्रकारों ने यह सवाल किया कि क्या पार्टी मानती है कि घोटाले संप्रग-दो की कमी है, इस पर पार्टी प्रवक्ता राज बब्बर ने कहा, ‘‘नहीं मैं ऐसा नहीं मानता। क्या नौ साल पहले भ्रष्टाचार नहीं होता था?’’ बब्बर ने कहा कि कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने जनता को सूचना का अधिकार जैसा औजार दिया है जिससे कोई भी किसी ताकतवर शख्स की ओर से किए गए गलत काम को उजागर कर सकता है। अब चलते हैं आज की वार्ता पर .....

शिमला कालका रेल यात्रा इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें। 27 अप्रैल 2013 सुबह सराहन में साढे पांच बजे उठा और अविलम्ब बैग उठाकर बस अड्डे की ओर चल दिया। तीन बसें खडी थीं, लेकिन चलने के लिये तैयार कोई नहीं दिखी। एक से पूछा कि कितने बजे बस जायेगी, उसने बताया कि अभी पांच मिनट पहले चण्डीगढ की बस गई है। अगली बस साढे छह बजे रामपुर वाली जायेगी। चाय की एक दुकान खुल गई थी, चाय पी और साढे छह बजे वाली बस की प्रतीक्षा करने लगा। बिना किसी खास बात के आठ बजे तक रामपुर पहुंच गया। यहां से शिमला की बसों की भला क्या कमी? कुछ ऐसी पुस्तके जो बदल देगी आपकी आने वाली जिन्दगी को मेरी पिछली पोस्ट में आपने शेयर मार्किट से जुडी पुस्तक देखी थी आज की पोस्ट में आप लोगो के बीच ऐसी पुस्तके ला रहा हु जिन्हें पढ़कर आपकी जिन्दगी में जरुर बदलाव आयेंगे इन पुस्तको को पढ़कर आप अपनी आने वाली जिन्दगी को बहुत ही मस्त रूप से जी सकते हो तो चलिए आपको लेकर चलता हु उन पुस्तको की दुनिया में जो आपकी जिन्दगी में बदलाव लाएगी। मुँबई से बैंगलोर तक भाषा का सफ़र एवं अनुभव.. करीबन ढ़ाई वर्ष पहल मुँबई से बैंगलोर आये थे तो हम सभी को भाषा की समस्या का सामना करना पड़ा, हालांकि यहाँ अधिकतर लोग हिन्दी समझ भी लेते हैं और बोल भी लेते हैं, परंतु कुछ लोग ऐसे हैं जो हिन्दी समझते हुए जानते हुए भी हिन्दी में संवाद स्थापित नहीं करते हैं, वे लोग हमेशा कन्नड़ का ही उपयोग करते हैं, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हिन्दीभाषी जरूर हैं परंतु दिन रात इंपोर्टेड अंग्रेजी भाषा का उपयोग करते हैं, इसी में संवाद करते हैं। जब मुँबई गया था तब लगता था कि सारे लोग अंग्रेजी ही बोलते हैं, परंतु बैंगलोर में आकर अपना भ्रम टूट गया ।

पराजय-बोध से ग्रस्त भाजपा कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद पिछले हफ्ते लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा कि यह हार न होती तो मुझे आश्चर्य होता। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा के प्रति उनकी कुढ़न का पता इस बात से लगता है कि उन्होंने उनका पूरा नाम लिखने के बजाय सिर्फ येद्दी लिखा है। वे इतना क्यों नाराज़ हैं? उनके विश्वस्त अनंत कुमार ने घोषणा की है कि येद्दियुरप्पा की वापसी पार्टी में संभव नहीं है। स्पॉट फ़िक्सिंग : चंद हाईप्रोफ़ाइल ब्लॉगर और लेखक भी शामिल! स्पॉट फ़िक्सिंग क्या क्रिकेटरों और बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ की ही बपौती है? कतई नहीं. पता चला है कि चंद हाईप्रोफ़ाइल ब्लॉगर और लेखक भी अब स्पॉट फ़िक्सिंग में शामिल हो गए हैं. सीबीआई जो वाकई में तोता नहीं हो, उससे जाँच करवाई जाए तो और राज निकल सकते हैं. बहरहाल हाल ही में एक फ़ोन टेपिंग में यह खुलासा हुआ है. टेलिफ़ोन टेपिंग की आधी-अधूरी ट्रांसस्क्रिप्ट जो हासिल होते होते रह गई है, वो कुछ इस तरह है - - भाई, अब तो पंगा हो गया हे ना. क्रिकेट में तो मामला जमेगा नहीं. आत्ममुग्धता का संसार *-गणेश पाण्डेय* सोचा है नत हो बार-बार - ‘‘ यह हिंदी का स्नेहोपहार है नहीं हार मेरी, भास्वर यह रत्नहार लोकोत्तर वर’’ - अन्यथा, जहाँ है भाव शुद्ध साहित्य कला-कौशल प्रबुद्ध हैं दिये हुए मेरे प्रमाण कुछ नहीं, प्राप्ति को समाधान पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त गद्य में पद्य में समाभ्यस्त। ‘सरोज-स्मृति’ का यह अंश पता नहीं क्यों मेरे भीतर उमड़-घुमड़ रहा है। निराला क्यों कहते हैं कि मेरे समय के दिग्गजों का काम मेरे काम से मिला कर देख लो।

जैसे उडी जहाज को पंछी . कुछ देर वो लोग उस आलीशान होटल के कमरे में अंगरेजी में बातें करते रहे और बातें करते हुए ही कमरे से जुड़े शानदार छज्जे में जा खड़े हुए |मै अपने चारों और विस्फरित नेत्रों से देख रहा था ‘’क्या ये कमरा भी इसी प्रथ्वी का कोई हिस्सा होगा ?’’मैंने अपने अनदेखे सपनों की तरफ एक प्रश्न उछाला (जो लौटकर फिर मेरे जेहन में आ गिरा )|अद्भुत अभूतपूर्व द्रश्य क्रमशः प्रकट हो रहे थे उसी क्रम में अब एक होटल कर्मचारी जिसकी सफ़ेद चमचमाती वर्दी मेरे मैले कुचैले कपड़ों से कई गुना व्यवस्थित और साफ़ सुथरी थी मेरे सामने कुछ इस्त्री किये तहशुदा कपडे लेकर खड़ा था बिना कुछ बोले बुत की तरह |शिकायतों की चिट्ठी भी .... हप्रेम ने कब भाषा का लिबास पहना हैं, इसने तो बस मन का गहना पहना है । कभी तकरार कहाँ हुई इसकी बोलियों से, कहता है कह लो जिसको जो भी कहना है । लाख दूरियाँ वक्‍त ले आये परवाह नहीं, हमको तो एक दूसरे के दिल में रहना है । दिखावट का आईना नहीं होता प्रेम कभी, हकीकत की धरा पर इसको तो बहना है । शिकायतों की चिट्ठी भी हँस के बाँचता, प्रेम विश्‍वास का *सदा *अनुपम गहना है ।किताबों की दुनिया - 82 कहती है ज़िन्दगी कि मुझे अम्न चाहिए ओ' वक्त कह रहा है मुझे इन्कलाब दो इस युग में दोस्ती की, मुहब्बत की आरज़ू जैसे कोई बबूल से मांगे गुलाब दो जो मानते हैं आज की ग़ज़लों को बेअसर पढने के वास्ते उन्हें मेरी किताब दो आज हमारी किताबों की दुनिया श्रृंखला में हम उसी किताब "*ख़याल के फूल* " की बात करेंगे जिसका जिक्र उसके शायर जनाब "*मेयार सनेही* " साहब ने अपनी ऊपर दी गयी ग़ज़ल के शेर में किया है. मेयार सनेही साहब 7 मार्च 1936 को बाराबंकी (उ प्र ) में पैदा हुए. साहित्यरत्न तक शिक्षा प्राप्त करने बाद उन्होंने ग़ज़ल लेखन का एक अटूट सिलसिला कायम किया।

गर्मी की छुट्टियाँ वाह, गर्मी की छुट्टियाँ। कितने बेसब्री से इंतजार रहता है इसका। 11 मई से हमारे स्कूल बन्द और अब धमाल और मस्ती। सोच रही हूँ कि इन हालिड़ेज़ में पूरा इलाहाबाद घूमूं। यहाँ पर कई हिस्टोरिकल प्लेसेज़ हैं, मुझे उनके बारे में जानना है। पर गर्मी इतनी ज्यादा है की दिन में घर से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। सारा दिन घर में बीतता है और शाम को पार्क, मॉल, मार्केटिंग और मूवी। इन हालिड़ेज़ में हमने दो मूवी देखी - 'छोटा भीम एंड थार्न आफ दि बाली' और 'गिप्पी'. छोटा भीम तो मेरा फेवरेट सीरियल भी है, इसका कोई पार्ट नहीं छोड़ती, फिर मूवी कैसे छोड़ देती। पत्ते, आँगन, तुलसी माँ ...चौंका, बर्तन, पूजा, मंदिर, पत्ते, आँगन, तुलसी माँ, सब्जी, रोटी, मिर्च, मसाला, मीठे में फिर बरफी माँ, बिस्तर, दातुन, खाना, पीना, एक टांग पे खड़ी हुई, वर्दी, टाई, बस्ता, जूते, रिब्बन, चोटी, कसती माँ, दादा दादी, बापू, चाचा, भईया, दीदी, पिंकी, मैं, बहु सुनो तो, अजी सुनो तो, उसकी मेरी सुनती माँ, धूप, हवा, बरसात, अंधेरा, सुख, दुख, छाया, जीवन में, नीव, दिवारें, सोफा, कुर्सी, छत, दरवाजे, खिड़की माँ, मन की आशा, मीठे सपने, हवन समिग्री जीवन की, चिंतन, मंथन, लक्ष्य निरंतर, दीप-शिखा सी जलती माँ, कितना कुछ देखा जीवन में, घर की देहरी के भीतर, इन सब से अंजान कहीं कितना नीरस होता एक हथोड़ा व एक बांसुरी एक साथ रहते जीवन कितना गुजर गया यह तक नहीं सोचते | था हथोड़ा कर्मयोगी महनतकश पर हट योगी सदा भाव शून्य रहता खुद को बहुत समझता | थी बांसुरी स्वप्न सुन्दरी कौमलांगिनी भावों से भरी मदिर मुस्कान बिखेरती स्वप्नों में खोई रहती | जब भी ठकठक सुनती तंद्रा उसकी भंग होती आघात मन पर होता तभी वह विचार करती | क्या कोइ स्थान नहीं उसका उस कर्मठ के जीवन में पर शायद वह सही न थी भावनाएं सब कुछ न थीं जीवन ऐसे नहीं चलता ना ही केवल कर्मठता से |

प्रेम ही है ईश्वर सितम्बर २००४ *इस* सृष्टि का आधार प्रेम ही है, प्रभु की कृपा से जब किसी के पुण्य जग जाते हैं, तो इस प्रेम की प्राप्ति होती है, यह एक ऐसा धन है जिसे पाकर संसार के सभी धन फीके लगते हैं, जो घटता नहीं सदा बढ़ता रहता है. जन्मों-जन्मों से संसार को चाहता मन उसके चरणों में टिकना चाहता है, अब उसे अपना घर मिल गया है. जगत तो क्रीड़ास्थली है जहाँ कुछ देर अपना कर्तव्य निभाना है, और फिर भीतर लौट आना है. जगत में उसका व्यवहार अब प्रेम से संचालित होता है न कि लोभ अथवा स्वार्थ से. परमात्मा ही इस प्रेम का स्रोत है. हम जो इसकी झलक पाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं, 'समर' के इस समर में 'समर' के इस समर में संभल संभल के चलना है सर पे टोपी या अंगोछा साथ मे पानी पीते रहना है यह मौसम है लू का तपती धूप का मेरे लिये घर की ठंडक में दुबक कर हर दुपहर को सोना है बस आज निकला जो घर से बाहर तो हर 'अक्सर' की तरह देखा मजदूर के बच्चों को तो अंगारों पे ही रहना है मेरे पैरों मे पड जाते हैं चलते चलते छाले पैरों में 'कुशन' की चप्पल पहन कर के ही निकलना है 'समर' के इस समर में संभल संभल के चलना है कहीं तर बतर गले हैं कहीं सूखते हलक को जीना है।सही मायनों में जी भरके कहते हैं सब रहिमन की पंक्तियाँ - "रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय। सुनि इठिलैहें लोग सब, बाटि न लैहैं कोय।।" तो व्यथा की चीख मन में रख हो जाओ बीमार डॉक्टर के खर्चे उठाओ नींद की दवा लेकर सुस्त हो जाओ !!!!!!!!!!!!!!! रहीम का मन इठलानेवाला नहीं था न व्यथित रहा होगा मन तो एहसासों को लिखा होगा .... जो सच में व्यथित है - वह कैसे इठलायेगा तो ........ कहीं तो होगा ऐसा कोई रहीम जिससे मैं जी भर बातें कर सकूँ सूखी आँखें उसकी भी उफन पड़े मैं भी रो लूँ जी भर के

ब्राह्मणों का अनादरइस पोस्ट का आशय सिर्फ कुछ अतिवादियों को आइना दिखाना है न की जातिवाद को बढ़ावा देना .. गीता के चौथे अध्याय में कर्म से ब्राम्हण होने को कहा गया है देखते हैं कुछ कर्मयोगी ब्राम्हणों की गाथा ... आजकल ब्राह्मणों का अनादर करना हमारे हिन्दू धर्म में फैसन बन गया है । जबकि भारत के क्रान्तिकारियो मे 90% क्रान्तिकारी ब्राह्मण थे जरा देखो कुछ मशहूर ब्राह्मण क्रान्तिकारियो के नाम ब्राह्मण स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी (१) चंद्रशेखर आजाद (२) सुखदेव (३) विनायक दामोदर सावरकर( वीर सावरकर ) (४) बाल गंगाधर तिलक (५) लाल बहाद्दुर शास्त्री (६) रानी लक्षमी बाई (७) डा. राजेन्द्र प्रसाद क्या है ताऊ का अस्तित्व और हकीकत श्री ज्ञानदत्त जी पांडे जो कि ब्लागजगत के सम्माननिय और प्रथम पीढी के ब्लागरों में से एक हैं, और जो अपनी नियमित और सारगर्भित पोस्ट्स के लिये जाने जाते हैं, ने शायद सबसे पहले 3 dec. 2008 को अपनी पोस्ट यह ताऊ कौन है के द्वारा जिज्ञासा प्रकट की. इसके पश्चात सभी ब्लागर्स में ताऊ शब्द एक पहेली बना रहा. मेरे ही शहर के सम्माननीय ब्लागर श्री दिलीप कवठेकर तो एक कदम और आगे जाते हुये हमारे शहर की उस पान की दूकान तक भी पहुंच गये जहां "कृपया यहां ज्ञान ना बांटे, यहां सभी ज्ञानी हैं" की तख्ती लगी है. चटाईयां पेड़ पर नहीं उगती ................कल एक बुढिया को चटाई बुनते देखा तब लगा चटाईयां बुनी जाती हैं पेड़ पर नहीं उगती पैसों के जोर पर वो खुशियाँ खरीदने निकल जाता है उसे ज्ञान नहीं खुशियाँ बाज़ार में नहीं मिलती सतह पर टिकने के लिए कुछ प्रयास सतही हो सकते हैं पर ग्रुत्वाकर्षण के सिद्धांत के बगैर कोई चीज सतह पर नहीं टिकती जन्म से मृत्यु तक सुख और दुःख के काल खंड पलटते रहतें हैं पूरा जीवन सुख या सिर्फ दुःख में नहीं गुजरती मै बुढिया से मूल्य कम करा लेता हूँ चटाई की वो मेरे चले जाने से डरती है और किसी नुकसान से नहीं डरती

जमाव रिश्तों का ...एक ज्योतिषी ने एक बार कहा था उसे वह मिलेगा सब जो भी वह चाहेगी दिल से उसने मांगा पिता की सेहत, पति की तरक्की, बेटे की नौकरी, बेटी का ब्याह, एक अदद छत. अब उसी छत पर अकेली खड़ी सोचती है वो क्या मिला उसे ? ये पंडित भी कितना झूठ बोलते हैं. ************************ चाहते हैं हम कि बन जाएँ रिश्ते जरा से प्रयास से थोड़ी सी गर्मी से और थोड़े से प्यार से पर रिश्ते दही तो नहीं जो जम जाए बस दूध में ज़रा सा जामन मिलाने से .बरगद हो जाना कोई आसान बात नहीं है श्रीगंगानगर-गजसिंहपुर के एक बड़ के पेड़ की धुंधली सी छाया है स्मृतियों मेँ। चारों तरफ फैला हुआ...खूब मोटा तना....भरा भरा...पता नहीं कितना पुराना था। उसके नीचे सब्जी वाला होता, राहगीर भी। बच्चे भी उसकी छाया मेँ गर्मी काटते। टहनियों पर अनेक प्रकार के परिंदों की आवा जाही। क्या मालूम उसे ऐसा बनने मेँ किता समय लगा। अपने आप को कितने दशकों तक धूप,गर्मी,आँधी,सर्दी,गहरी रात मेँ अपने आप को अचल रखा होगा तभी तो शान से खड़ा था वह बड़/बरगद का पेड़। रहबर नहीं है-
क्या कहा है आज तुमने ये तुम्हारा स्वर नहीं है- सोच लो बैठे जहाँ हो वो तुम्हारा घर नहीं है- खा रहे हो कसमें जिनकी वो कोई ईश्वर नहीं है - चल दिए हो हाथ पकडे, वो तेरा रहबर नहीं है- तुम तो डरते हो जिंदगी से उसे क़यामत से डर नहीं है- -- उदय वीर सिंह

आज के लिए बस इतना ही .. मिलते हैं एक ब्रेक के बाद .....

रविवार, 19 मई 2013

झंपिंग ज़पांग..झंपिंग ज़पांग....ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार....18 , 19 और 20 मई 2013 के दिन ग्रहों की स्थिति सामान्‍य तौर पर शुभ फल दायी होंगी , मौसम और वातावरण कुछ बढिया रहेगा , शेयर बाजार में कुछ जोड तोड की स्थिति ही रहेगी , तीनो ही दिन का समय मकर राशि वालों के लिए अशुभ तथा मीन राशि वालों के लिए शुभ रहेगा , तीनों ही दिन सामान्‍य तौर पर 12 बजे से 2 बजे दिन तक का समय किसी कार्य के संपादन के लिए शुभ तथा रात्रि के 11 बजे से 1 बजे तक का समय अशुभ होगा। बाकी अपने अपने लग्‍न से देखिए अपना अपना राशि फल , अपने लग्‍न को जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें ...लीजिये प्रस्तुत है, आज की वार्ता ........

रिहाई - * ** **उसने दे दी अपनी हर साँस से रिहाई मुझको * *कुछ इस तरह उसने अपना हक अदा कर दिया !!* संग चांद आवारा बादल ....... - स्‍मृति के वातायन से नि‍काल लाओ उन फूलों को जि‍न्‍हें बि‍खरने के डर से पीली जि‍ल्‍द पड़ी कि‍ताब के सीने में छुपाया था कभी * * * * * अभी थी महफ़ि‍ल अभी...मेरे घर आई नन्‍ही परी - कि‍शोर दि‍वसे मेरे घर आई नन्‍ही परी  .." कहानी .......एक जोड़े की " एक प्यारा सा जोड़ा था , दोनों ने तिल तिल , आपस में प्यार था जोड़ा , इस जोड़े हुए प्यार से , हयाते-राह खुशगवार हुई , यह जोड़ा खुद को दुनिया से, जोड़ने की ख्वाहिश में , रिश्ते तमाम जोड़ता गया...

मैच फिक्सिंग: सरकार इस्तिफा दे! - इतना बड़ा खुलासा. लाखों करोड़ों रुपयों का लेन देन और साथ में सेक्स स्कैंडल. [image: protests] श्री शांत के साथ साथ दो और खिलाड़ी. खिलाड़ियों समेत कई अन्यों .IPL बोले तो इंडियन पाप लीग ! - वैसे तो मेरा हमेशा से मानना है कि इंडियन प्रीमियर लीग यानि आईपीएल की बुनियाद ही चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, अश्लीलता पर टिकी हुई है, लेकिन इससे भला हमें य... .. बात शुरू हुई तो अफसाना बन गई खंबा कांग्रेस - श्रीगंगानगर-कांग्रेस के सबसे छोटे पदाधिकारी द्वारा बहुत बड़े पदाधिकारी के सामने शिकायत के लिहाज से कही गई जरा सी बात बहुत बड़ा अफसाना बन गई। ...

Karanparyag-Nandprayag-Chamoli-Gopeshwar कर्णप्रयाग-नन्दप्रयाग-चमोली-गोपेश्वर- ROOPKUND-TUNGNATH 08 SANDEEP PANWAR रात के लगभग 8 बजे के आसपास हमने कर्णप्रयाग ... भूमंडलीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण बनाम सांस्क़ृतिक संघर्ष - वैश्वीकरण शब्द को विश्व की संस्कृतियो अर्थव्यवस्थाओं तथा राज व्यवस्थाओं का एक दूसरे के ऊपर पड़ने वाले प्रभावों जिसमें सात्मीकरण एवं अलगाव दोनों सम्मिलित... नदी का सागर से मिलन - सागर से मिलने भागी आती नदी पहली बार देख रहा था, एक नदी का सागर से मिलना। स्थान कारवार, नदी काली और अरब सागर। दोपहर के समय ऊपर से पड़ने वाली सूरज की किरणे...

मेरी आवाज़ ही मेरी पहचान है, ग़र याद रहे... - कभी-कभी ज़िन्दगी में कुछ बुरा होना ब्लेसिंग इन डिसगाईज हो जाता है.. अब देखिये न पिछले दो महीने से लैपटॉप ख़राब पड़ा है इन दिनों कुछ भी नहीं लिख सका,..  फाख्ता का पलता-बढ़ता घर-परिवार - कभी जब घर आँगन, खेतिहर जमीनों में, धूल भरी राहों में, जंगल की पगडंडियों में भोली-भाली शांत दिखने वाली फाख्ता (पंडुकी) भोजन की जुगत में कहीं नजर आती तो उस ... हैंडल विथ केयर - मैंने पहुंचाया था प्रेम तुम तक, सम्हाल कर , एहतियात से पैक करके.. सभी आवश्यक निर्देशों के साथ कि - ये हिस्सा ऊपर (दिस साइड अप) हैंडल विथ केयर ब्रेकेबल डु नॉट... 

अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन के छठे सत्र में पुस्तक विमोचन एवम बाबाश्री दर्शन - अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन पर प्रथम पोस्ट, अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन पर द्वितीय पोस्ट *अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन पर तृतीय पोस्ट* *..इंसान को ही खोजना होगा - कल का काम आज ही, हो कैसे सफल। इंसान को ही खोजना, होगा इसका हल।। धूल भरी आँधियाँ, प्रकृति का गुस्‍सा है। सूरज का भी क़हर, पतझड़ पर बरसा है। दिन पे दिन...वटवृक्ष - चित्र गूगल से साभार सूक्ष्म हूँ जैसेक्षुद्र बालू कण ,होना है बड़ा , बनना है विशालसोचता हूँ हर क्षण।मैं छोटा, बहुत ही छोटा जीव हूँकिन्तु एक विन्दु में.. 

ओ री चिड़िया - ओ री चिड़िया सुन ले मेरे मन की बात चुग्गा तुझे खिलाऊँगी ले चल अपने साथ धरती पर बैठी बैठी हो गई मै तो तंग नील गगन की सैर करा दे ले चल अपने संग इतना सा अहसान...bhavnayen- किताब तू है एक किताब तुझ मे रहती दुनिया की जानकारियाँ बेहिसाब कभी तू हंसा जाती कभी रुला जाती कभी बिखरे पलों को भी समेटे गमों की परछाईयाँ कभी तुझ मे दिखाई पड...गुहार: पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से लापता एक बच्चे के बारे में छपी खबर पर !! - अखबार वाली फोटो की हुबहू नक़ल ताकि सही से पढ़ी जा सके !!यह फोटो अखबार की कतरन की फोटो है !! असम के दैनिक समाचार पत्र में ११ मई को छापी गयी एक खबर ... 

 रिश्वत न धराओ ... - मुझे किसी ऊँचे मंच पर यूँ ही खड़ा न कराओ खड़ा कराओ भी तो चुप रहने के लिए राजस्व से ही रिश्वत न धराओ .... बड़ी मुश्किल में हूँ मैं जबसे चींटियाँ लगातार मेरी ...जलाओ दिल मितरां कि.... - * ****जलाओ दिल मितरां कि चिराग जले * *अँधेरा ही अँधेरा है बहुत दूर तक -* * **लगता है गर्दिशों में माहताब भी है* *बादलों का बसेरा है बहुत दूर ... नैसर्गिक कला - प्यारे प्यारे कुछ पखेरू चहकते फिरते वन में पीले हरे से अलग दीखते पेड़ों के झुरमुट में एक विशेषता देखी उनमें कभी न दीखते शहरों में | वर्षा ऋतु आने के पह... 

अंधेरे की वजह - घाटशिला की यात्रा यूँ तो मैने बिटिया के समर इन्टर्नशिप के चक्कर में मजबूरी में की थी लेकिन इस यात्रा ने मुझे अग्निमित्र से मिला दिया। देश की भलाई सोचने .."झंपिंग ज़पांग..झंपिंग ज़पांग.के बाद . गीली गीली......!!" - चम्पक बन में बैठ सखी संग ... .... - चम्पक बन में बैठ सखी संग ... वृहग वृन्द का कलरव सुनना .... ढलते दिवस के अवरोह पर .. राग दरबारी के .... खरज से ... कुछ गंभीर प्रकृति के स्वर लेना .. लहरें - प्रवीण पाण्डेय जी का नाम खुद अपने आप में परिचय है उनका --- और उसी तरह उनके ब्लॉग का नाम-* न दैन्यं न पलायनम* भी .... प्रस्तुत है उनकी एक रचना* लहरें *....
 

 

दीजिये इज़ाजत नमस्कार .....

बुधवार, 15 मई 2013

मदारी कुछ भी नहीं बिना जम्हूरे के...ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार....हमें भी स्वयं के अवदान को कम अंकित कर दूसरों से तुलना नहीं करनी चाहिए, प्रायः हम अपने गुणों को कम और दूसरों के गुणों को अधिक आंकते हैं, यदि औरों में भी विशेष गुणवत्ता है तो हमारे अन्दर भी कई गुण मौजूद हैं।अपना अपना महत्त्व  ... लीजिये प्रस्तुत है, आज की वार्ता ........
लो मै आ गया... - विभिन्न भाव भंगिमाओं में आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय" प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय डॉ रमन सिंह के साथ आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय" ...प्रि‍यतम का गुंजलक.... - बरसती चांदनी की पंखुरि‍यों में प्रि‍यतम का गुंजलक मोगरे की खुश्‍बू से मन का उपवन महका जाता है । सांसों की गरमाई से सि‍क्‍त रखो मेरी सांसे गेसुओं से उलझकर..ग़ज़ल - * * *जालिम लगी दुनिया हमें हर शक्श बेगाना लगा * *हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से* * * *नफरत से की गयी चोट से हर जखम...

 नशे के कारोबार मे राज्य की भूमिका - ड्रग्स का उपयोग लगभग उतना ही पुराना है जितनी पुरानी मानव सभ्यता। लेकिन अधिक नशे की लत और खतरनाक सिंथेटिक दवाएं पश्चिमी देशों के द्वारा शुरू किए गए थे,. किस पिंज़रे में फ़स गया - एक बार तेरे शहर में आकर जो बस गया, ता-उम्र फड़फडाता, किस पिंज़रे में फ़स गया. नज़रें नहीं मिलाता, कोई यहाँ किसी से, एक अज़नबी हूँ भीड़ में, यह दर्द...अहसासों के पंख...एक ब्लॉग नया सा ... - एक परिचय शरद कुमार जी और उनके ब्लॉग से -- कुछ शेर बेटी के नाम एक मासूम सा ख्वाब और माँ ये रचनाएं हैं शरद कुमार जी के ब्लॉग *अहसासों के पंख* से .. 

 संदीप रावत की कविताएं - मेरे प्रिय छात्र अनिल कार्की की वजह से मेरा ध्‍यान फेसबुक पर संदीप रावत की कविताओं की ओर गया। मैं उनके पिछले कुछ स्‍टेटस को बहुत ध्‍यान से देख रहा था, ...मैं और शब्द - सृष्टि के अनछुए पहलू उनमें झांकने की जानने की ललक बारम्बार आकृष्ट करती नजदीकिया उससे बढ़तीं वहीं का हो रह जाता आँचल में उसके छिपा रहना चाहता भोर का ..चल दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर - मुसलसल बेकली दिल को रही है मगर जीने की सूरत तो रही है मैं क्यूँ फिरता हूँ तन्हा मारा-मारा ये बस्ती चैन से क्यों सो रही है चल दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर ये न... 

वर्षा - वर्षा   अमृत छलका दानी नभ से सिहरा रोम-रोम धरती का जागे वृक्ष, दूब अंकुराई शीतलता आंचल में भर पवन लहराई. भीगा तन पाखी का उड़ा फड़फड़ा डैन... मदारी ..... - * ** **मदारी कुछ भी नहीं...* *बिना जम्हूरे के...!* *ये अलग बात है...* *दिखाई यही देता है कि...* *सारा खेल मदारी के हाथ है......!* *लेकिन जब ज्यादा होशिय....तल्ख स्मृतियाँ ( हाइकु ) - कड़वी यादें चीर देती हैं सीना मैं लहूलुहान । ************ पीड़ित यादें झटक ही तो दीं थीं पीले पत्ते सी । ***************...

कोई भी छोटा बड़ा नही है सभी समान हैं !! - एक गाँव में एक पण्डित जी अपनी पंडिताईन के साथ रहते थे ! पण्डित जी गाँव में पूजा और अन्य धार्मिक कार्य करवाते थे ! उन पण्डित जी के मन में जातिवाद और उंच ..विचलित मन ! - *हर घर से होकर गुजरती नियति की गली है, * *न हीं मुकद्दर के आगे,वहाँ किसी की चली है, * *नीरस लम्हों के सफ़र में,किंतु सकूं के दो पल, * *जो हंसकर गुजार दे ... ताऊ का खूंटा "रेडियो प्लेबैक इंडिया" पर.....! - ताऊ के खूंटे से एक खूंटा जो 2 जनवरी 2009 को ताऊ के सैम और बीनू फ़िरंगी की पोस्ट के अंत में "* इब खूंटे पै पढो"** * के अंतर्गत * *प्रकाशित हुआ था उसे आज ..

 इंटरनेट युग में विज्ञापन का कारोबार - समाज के साथ ही हर दौर में विज्ञापनों का रुझान भी बदल जाता है। लेकिन अब जो बदलाव आ रहा है, वह समाज की वजह से कम और तकनीक की वजह से ज्यादा है। ...शब्दों का साथ खोजते विचार - कह पाना जितना सरल है भावों और विचारों को शब्दों के रूप ने लिख पाना उतना ही कठिन । जाने कितनी ही बार यह आभास हुआ है कि विचारों का आवागमन जारी रहता है पर ... “गुलाब भरा आँगन” - “गुलाब भरा आँगन” सहजता सिमटता हवा का झोंका सहज होनें का करता था भरपूर प्रयास. बांवरा सा हवा का वह झोंका गुलाबों भरे आँगन से चुरा लेता था बहुत सी गंध और उसे...

 मेरा आईना - मुझको मेरा आईना दिखाकर तुमने अच्छा काम किया भूल गई थी जिसको मैं उसको फिर पहचान लिया ....वह तस्वीर......बहुत वक़्त से देखता रहता था मैं दीवार पर टंगी उस तस्वीर को न जाने कब से टंगी थी घर के कोने के उस अंधेरे कमरे में गर्द की एक मोटी परत रुई धुनी रज़ाई की तरह लिपटी हुई थी उस तस्वीर से पर आज .....बादल तेरे आ जाने से ...* *** बादल तेरे आ जाने से जाने क्यूँ मन भर आता है, मुझको जैसे कोई अपना, कुछ कहने को मिल जाता है ! पहरों कमरे की खिड़की से तुझको ही देखा करती हूँ , तेरे रंग से तेरे दुःख का अनुमान लगाया करती हूँ ! यूँ उमड़ घुमड़ तेरा छाना तेरी पीड़ा दरशाता है , बादल तेरे आ जाने से ...थकता नहीं है आदमी - भीड़ ही भीड़ है चारों तरफ है आदमी। चलता ही जा रहा है बस थकता नहीं है आदमी। वाहनों की दौड़-भाग से नहीं इसे परहेज न है इसे प्रतिद्वंदिता न द्वेष .....

 

दीजिये इज़ाजत नमस्कार .....

मंगलवार, 14 मई 2013

अहसासों के पंख...एक ब्लॉग नया सा ...ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , कल बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 430.65 अंक की भारी गिरावट के साथ 19,691.67 अंक पर आ गया। यह 27 फरवरी, 2012 के बाद सेंसेक्स की सबसे बड़ी गिरावट है। बंबई शेयर बाजार में चले भारी बिकवाली के दौर से निवेशकों की कुल पूंजी एक लाख करोड़ रुपये घट गई। प्रत्येक तीन में से दो शेयर नुकसान के साथ बंद हुए। सेंसेक्स की सभी 30 शेयर नुकसान दर्शाते बंद हुए। आईटीसी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। कंपनी के शेयर में 5 फीसद से अधिक की गिरावट आई। बिकवाली के दौर के बीच निवेशकों की बाजार हैसियत एक लाख करोड़ रुपये घटकर 67,03,388.59 करोड़ रुपये रह गई। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की इस खास खबर के बाद चलते हैं आज की वार्ता पर .....

विचलित मन !*हर घर से होकर गुजरती नियति की गली है, * *न हीं मुकद्दर के आगे,वहाँ किसी की चली है, * *नीरस लम्हों के सफ़र में,किंतु सकूं के दो पल, * *जो हंसकर गुजार दे , वही जिन्दगी भली है। * * **पिछले तकरीबन एक माह से जिन्दगी की रेल, बस यूं समझिये कि पटरी से उतरी हुई है। पहले कम उम्र में एक परिजन की असामयिक मृत्यु से अस्त-व्यस्त था , और अब अपना प्रिय श्वान जोकि पिछले १3 वर्षों से घर में घर के एक सदस्य की भांति था, पिछले ४-५ दिनों से अन्न-जल त्यागकर इस बेदर्द जहां से प्रस्थान की तैयारी में है। खैर, यही दुनिया का दस्तूर है सोचकर विचलित मन ने बहलने की कोशिश में कुछ टूटा-फूटा काव्य समेटा है, प्रस्त... अधिक »

बेल बर्फी ** आइए बनाए बेल की स्वादिष्ट बर्फी । * सामाग्री :-* - एक किलो बेल का पल्प - आधा किलो चीनी - 150 ग्राम देशी घी - इलायची पावडर एक छोटा चम्मच - मेवे इच्छानुसार - 100 ग्राम खोया (यदि मिलाना चाहें) - 50 ग्राम काजू के टुकड़े सजाने के लिए * कैसे बनाए *:- बेल को तोड़ कर पल्प निकाल लें और बीजे साफ कर दें । अब भारी पेंदे की कड़ाही आग पर चढ़ा दें इसमे खोया डाल कर भून लें हल्का सुनहरा होने पर उतार कर ठंडा होने के लिए रख दें अब घी डाल कर गरम करें , बेल डालें थोड़ा भून लें जब घी और बेल अच्छी तरह से एकसार हो जाए भुनने की महक आने लगे तब चीनी और ... अधिक »

Vaan village (Laatu Devta) वाण गाँव की सम्पूर्ण सैर (लाटू देवता मन्दिर सहित) ROOPKUND-TUNGNATH 07 SANDEEP PANWAR अंधेरा होते-होते हम वाण पहुँच चुके थे। मनु भाई का पोर्टर कम गाईड़ कुवर सिंह काफ़ी पहले ही आगे भेज दिया गया था। उसे सामान बचा हुआ सामान वापिस करने के लिये कह दिया था। जैसे ही हम पोस्ट मास्टर गोपाल बिष्ट जी के यहाँ पहुँचे तो देखा कि कुवर सिंह सारे सामान सहित वही जमा हुआ है। मनु भाई गोपाल जी के यहाँ एक रात रुककर रुपकुन्ड़ के लिये गये थे। गोपाल जी यहाँ के ड़ाकिया Postman भी है। इसके साथ वह एक दुकान स्वयं चलाते है जो वाण स्टेशन के कच्चे सड़क मार्ग के एकदम आखिरी में ही आती है। म... अधिक »

क्षणिकाएं ! (१) *सुख और दुःख* ऐसा वक्त कब आएगा जब हम खुशी में बचे रहेंगे सरल और दर्द में अविकल न खुशी में चहकेंगे और न ही दुःख में होंगे विह्वल क्या हमारे जीते जी ऐसा वक्त आएगा जब हम चीजों को एक नज़र से देखने लगेंगे ? * ** * * (२ ) कवि बनना स्थगित कर दिया है* दर्द को कितना बताएँ हर तरफ मौजूद है. समय नहीं मेरे पास कि इस पर महाकाव्य लिखूं ! तुम मेरे खुशी के गीतों में ही दर्द बांच लेना, अपने दर्द को मेरी खुशी में तिरोहित कर देना, ऐसे ही जब तुम खुशी के नगमे गाओगे, मैं तुम्हारा दर्द जान जाऊँगा ! फ़िलहाल,मैंने कवि बनना स्थगि... अधिक »

स्वर्ण रेखा नदी तेरा असली नाम क्या है, स्वर्ण रेखा नदी? तू उस देश में बहती है जिस देश को कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहते थे, उस राज्य में बहती है जिसे ‘झारखंड’ कहते हैं, उस जिले में बहती है जिसे ‘घाटशिला’ कहते हैं। क्या महज इसलिए ‘स्वर्ण रेखा’ कहलाई कि पहाड़ियों के पीछे अस्त होने से पहले सूर्य की सुनहरी किरणें कुछ पल के लिए खींच देती है तेरे आर-पार एक स्वर्णिम रेखा! या इसलिए कि तू अपने साथ बहाकर लाई थी कभी ताँबे और सोने के भंडार? जाऊँगा बनारस तो नहीं बता पाउँगा ‘माँ गंगा’ से तेरा हाल! तेरी इतनी बुरी हालत सुनकर दुखी होगी और डर जायेगी बेचारी। बहेलिए जैसे कतरते रहते हैं हाथ आई सुनहरी चिड़िया के पंख, लोभी जैस...अधिक »

कामवाली बाई शादी के मौसम में व्यस्त सभी बाई रहतीं सहन उन्हें करना पड़ता बिना उनके रहना पड़ता उफ यह नखरा बाई का आये दिन होते नागों का चाहे जब धर बैठ जातीं नित नए बहाने बनातीं यदि वेतन की हो कटौती टाटा कर चली जातीं लगता है जैसे हम गरजू हैं उनके आश्रय में पल रहे हैं पर कुछ कर नहीं पाते मन मसोस कर रह जाते | आशा

जज्बात वही आशिकी नया 1990 में आयी महेश भट्ट निर्देशित रोमांटिक फिल्म ‘आशिकी’ अपने समय की सफल फिल्मों में से एक है. लगभग 23 साल बाद भट्ट कैंप एक बार फिर प्यार के उसी जज्बात को नये अंदाज में ‘आशिकी टू’ से परदे पर परिभाषित करने जा रहा है. आदित्य रॉय कपूर और र्शद्धा कपूर इस फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं. इन सितारों का कहना है कि ‘आशिकी टू’ पुरानी ‘आशिकी’ से काफी अलग है. जैसे पीढ.ी में बदलाव आया है वैसे ही फिल्म की कहानी में भी कई परिवर्तन आये हैं. दोनों में कोई समानता है तो वह है खास प्रेम कहानी. आदित्य रॉय कपूर और र्शद्धा कपूर से इस फिल्म और उनके कैरियर पर हुई बातचीत के प्रमुख अंश राहुल रॉय औ... अधिक »

मामा भाँजा की रेल्वे कमाल : सुपर व्यंग “ कल्लू झाड़ूवाला पप्पू के कहने पर नौकरी के लिए रेल मंत्रालय पहुँचकर रेल्वे मंत्री से मिलने के लिए गया मगर वहाँ देखा तो बिलकुल रेल्वे के डिब्बो के माफिक ही लंबी लाइन लगी हुई थी जैसे देशभर से नौकरी के डिब्बे लेने कतार लगी हो सब के हाथ मे बक्से थे ओर इंतज़ार था .... मामा भाँजे की सुपर हीट जोड़ी से मिलने का ...मगर अंदर कुछ ओर चल रहा था ..... | “ ** सेमसंग फोनवालो पर कानूनी केस करो* “ भाँजे ,ये सेमसंग पर मस्त केस ठोक देते है “ बंसल जी ने कहा तो भाँजा बोला “ मगर क्यू ,उससे हमे क्या फायदा ? “ .... भाँजे ,ये सेमसंगवाले आजकल बहुत ही पैसा कमा रहे है वो भी हमारे ही ... अधिक »

.भृंगराज भृंगराज का नाम आप लोगों के लिए नया नहीं है। तमाम हेयर आयल के विज्ञापन रोज प्रकाशित होते हैं,उनमें भृंगराज की चर्चा बड़े जोर-शोर से की गयी होती है।केशों के लिए यह महत्वपूर्ण तो है ही लेकिन इसके अन्य औषधीय गुण शायद और ज्यादा महत्वपूर्ण लगते हैं मुझे। अकेले भृंगराज कायाकल्प करने में सक्षम है। अगर उसे सही तरीके से प्रयोग किया जाये तो।यहाँ तक कि कैंसर से आप इसके सहारे लड़ सकते हैं और जीत भी सकते हैं। भृंगराज के पौधे वर्षा के मौसम में खेतों के किनारे ,रेल लाइन के किनारे, खाली पड़ी जमीन पर ,बाग़ बगीचों में खुद ही उग जाते हैं। ये हमेशा हरे रहते हैं।इनके फूल पत्ते तने जड़ सब उ... अधिक »


अभिव्यक्तिमै नहीं जानती ये कविता कैसे बन कैसे बन गई ?एक क्षण कुछ महसूस किया और अगले एक मिनिट में यह रचना बन गई | घर में रखे पुराने सामान की तरह चमकाए जाते है, कभी कभी वो आज निर्जीव ही सही कभी जीवन्तता थी उनमे महकता था उनकी सांसो से घर चहकता था उनके बोलों से घर गूंजते थे अमृत वाणी से मंत्र सौंधी खुशबू से महकती थी रसोई भरे जाते थे कटोरदान ,पड़ोसियों के लिए किससे कहे ?कैसे कहे ? निर्जीव क्या बोलते है ? उनकी सारी खूबियों पर है प्रश्न चिन्ह ? बिताते है इस उक्ति के सहारे वो जीवन की शाम "कर लिया सो काम ,भज लिया सो राम "|

अहसासों के पंख...एक ब्लॉग नया सा ...एक परिचय शरद कुमार जी और उनके ब्लॉग से -- कुछ शेर बेटी के नाम एक मासूम सा ख्वाब और माँ ये रचनाएं हैं शरद कुमार जी के ब्लॉग *अहसासों के पंख* से ..

रविवार, 12 मई 2013

माँ.. प्यारी माँ... : ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार..... 
तुम्हारे बिना सिर्फ अन्धकार दिखता है
और उसे, सिर्फ तुम्हारा दमकता चेहरा
ही हटा सकता है
न करना मेरे जीवन में
कभी ऐसा अंधकार
न जाना कभी छोड़कर मुझे मेरी माँ।
माना कि सबको जाना है एक दिन
सब जीते भी हैं सभी के बिन
पर नहीं जीना मुझे एक पल भी
तेरे साए के बिना
न जाना कभी छोड़कर मुझे मेरी माँ।
तुम हो सब अच्छा है
सुन्दर है इस जहाँ में
हर जंग लड़ लेती हूँ ये सोचकर
हारूँ या जीतूँ , तुम हो !
तुम रहना क्योंकि मुझे है,नहीं टूटना
न जाना कभी छोड़कर मुझे मेरी माँ 
लीजिये प्रस्तुत है, आज की वार्ता ........


माँ - बावरी हुई है मातु प्रेम प्रेम बोलि रही तीन लोक डोलि डोलि खुद को थकायो है गायो नाचि नाचि कै हिये की पीर बार बार प्रेम पंथ मुझ से कपूत को दिखायो है भसम रमाये..

“बचपने से भरा बचपन”. बचपन के उनपलो को हमकभी शायद दोहरातो नही सकतेलेकिन उन बितायेपलो को कभीभूलना मुमकिन नहीहै/ ऐसे हीपलो को समेटनेपेश है मेरीकुछ पंक्तियाँ: वह तस्वीर आज इतनासता रहीं है, बचपन के पलोकी जो यादआ रहींहै, बहन के साथखेलना मस्ती भरीहोली, और माँ कीयाद मुझको रुलारही है/ वह तस्वीर आज इतनासता रही है, बचपन के पलोकी जो यादआ रहीं है/ मंजिलो कि खातिरदूर लगता थाजाना, लेकिन अब तोयह मंजिले भीतड़पा रहीं है, दिल के दरवाजेअब जिस मोडपर खुलते, वह गलिया मेरे माँ-पा केचरणो मे समारहीं है/....

मात्र दिवस विशेष - माँ तुझे सलाम...!

.उसको नहीं देखा हमने कभी पर इसकी जरुरत क्या होगी ? ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी ? माँ ही मन्दिर, माँ ही मूरत, माँ पूजा की थाली, बिन माँ के जीवन ऐसा, जैसे बगिया बिन माली । माँ ने कभी हमें खुली छत के नीचे नहीं सुलाया और कुछ नहीं मिला तो छाँह के लिये अपनी ममता का आँचल ही हम पर ओढा दिया । माँ ब्रह्मा है, माँ विष्णु है और महादेव भी माँ ही है । ब्रह्मा जन्म देते हैं, विष्णु पालन करते हैं और महादेव उद्धार करते हैं । जो तीनों देवों का कार्य अकेली पूरा करती है, धरती पर वही माँ कहलाती है । दुनिया में माँ की कीमत क्या होती है ये उससे बेहतर कौन बता सकता..

मेरी माँ , प्यारी माँ , मम्मा ..

माँ की ममता को कौन नहीं जानता और कोई परिभाषित भी नहीं कर पाया है। सभी को माँ प्यारी लगती है और हर माँ को अपना बच्चा प्रिय होता है। मेरी माँ भी हम चारों बहनों को एक सामान प्यार करती है। कोई भी यह नहीं कहती कि माँ को कौनसी बहन ज्यादा प्यारी लगती है, ऐसा लगता है जैसे उसे ही ज्यादा प्यार करती है। लेकिन मुझे लगता है मैंने मेरी माँ को बहुत सताया है क्यूंकि मैं बचपन में बहुत अधिक शरारती थी। मेरा जन्म हुआ तो मैं सामान्य बच्चों की तरह नहीं थी। मेरा एक पैर घुटने से भीतर की और मुड़ा हुआ था।नानी परेशान थी पर माँ ...! 

अम्मा कभी नहीं हुई बीमार---------

 अम्मा -------------- सुबह सुबह फटा-फट नहाकर अधकुचियाई साड़ी लपेटकर तुलसी चौरे पर सूरज को प्रतिदिन बुलाती आकांक्षाओं का दीपक जलाती फिर भरतीं चौड़ी,छोटी सी मांग गोल बड़ी आंखें दर्पण को देखकर अपने से ही बात करतीं सिंदूर की बिंदी माथे पर लगाते-लगाते सोते हुये पापा को जगाती सिर पर पल्ला रखते हुऐ कमरे से बाहर निकलते ही चूल्हे-चौके में खप जातीं------

माँ

अक्सर चाहता हूँ मैं माँ! फिर से करूँ तुमसे बातें तमाम.. बेहिचक नादानी भरी, मन की जजबातें जैसे करता था बचपन मे..अठखेली क्यों रोक लेता है मेरा मन , क्यों रुठ जाते हैं बोल, कपकंपा जातें हैं होंठ, मन करता है बार-बार सवाल, आखिर क्यों...? वजह... मेरा बढ़ाता कद है या झूठे अभिमान की चादर, या फिर... तुम्हारे पुराने ख्यालात...!! उलझ जाता हूँ मैं , करूं क्या उपाय, पूछता हूँ खुद से रोज-ब-रोज...!! शायद मैं ! अब बड़ा हो गया हूँ.. उम्र से, कद से, या फिर अहम से या फिर... संकोच के बादल से घिर गए है मन मे...!! यही सच है...हाँ, यही सच है शब्द ऐसे ही गूंजते हैं मन मे.. हाँ ,यही सच हैं..?

  मेरी माँ

जैसे सत्य है रवि, रवि की दीप्त किरणें भी जैसे सत्य है बादलों की श्यामली माया सत्य है उसकी बरखा भी सत्य है व्यवधान अंतर जैसे सत्य तम भी उजाला भी वैसे ही सत्य माँ और उसकी ममता भी अटल सत्य है तेरा और मेरे साथ तुम मेरी सखी-सहेली भी और खुद में पूर्ण और सम्पूर्ण भी मेरी माँ...............|| बहुत खुशनसीब हूँ की शादी की २५ वीं सालगिरह पर माँ हमारे साथ थी अपने आशीर्वाद के साथ मैं और मेरे बच्चे ......(मैं भी अब माँ की भूमिका में .....कल, आज और कल )

 माँ... 

हम नाराज होते वो मुस्कुराती थी
वही डॉक्टर के आगे गिड़गिड़ाती
तीन साल असहनीय पीड़ा झेलती
जीती रही हमारी खातिर
जब कभी दर्द से थक हार जाती .....

विराम सृजन का

शनेशने बढ़ते जीवन में कई बिम्ब उभरे बिखरे बीती घटनाएं ,नवीन भाव लुका छिपी खेलते मन में बहुत छूटा कुछ ही रहा जिज्ञासा को विराम न मिला अनवरत पढ़ना लिखना चल रहा था चलता रहा कुछ से प्रशंसा मिली कई निशब्द ही रहे अनजाने में मन उचटा व्यवधान भी आता रहा मानसिक थकान भी जब तब सताती जाने कितना कुछ है विचारों के समुन्दर में कैसे उसे समेटूं पन्नों पर सजाऊँ बड़ा विचित्र यह विधान विधि का असीमित घटना क्रम नित्य नए प्रयोग यहाँ वहां बिखरे बिखरे सहेजना उनको लगता असंभव सा तभी दिया विराम लेखन को  

माँ ..........

माँ शब्द में --- मात्र एक वर्ण और एक मात्रा जिससे शुरू होती है सबकी जीवन यात्रा माँ ब्रह्मा की तरह सृष्टि रचती है धरा की तरह हर बोझ सहती है धरणि बन हर पुष्प पल्लवित करती है सरस्वति बन संस्कार गढ़ती है भले ही खुद हो अनपढ़ पर ज़िंदगी की किताब को खुद रचती है माँ हर बच्चे के लिए लक्ष्मी रूपा है खुद अभाव सहती है लेकिन बच्चे के लिए सर्वस्व देवा है , माँ बस जानती है देना उसे मान अपमान से कुछ नहीं लेना माँ के उपकारों का न आदि है न अंत जो माँ को पूजे वही है सच्चा संत ।  

लाल स्कार्फ वाली लड़की

वो देखता रहता उस पनीली आँखों वाली लडकी को,रेत के घरौंदे बनाते और बिगाड़ते.....उसे मोहब्बत हो चली थी थी इस अनजान,अजीब सी लडकी से...जो अक्सर लाल स्कार्फ बांधे रहती.....कभी कभी काला भी... बरसों से समंदर किनारे रहते रहते इस मछुआरे को पहले कभी न इश्क हुआ था न कभी ऐसी कोई लडकी दिखी थी.जाने कहाँ से आयी थी वो लडकी इस वीरान से टापू में....देखने में भली लगती थी मगर कुछ विक्षिप्त सी,खुद से बेपरवाह सी...(जाने लहरें उसे बहा कर लाई हैं या किसी मछली के पेट से निकली राजकुमारी है वो...मछुआरा अपनी सोच के साथ बहा चला जाता था..)  

 कार्टून :- घंटी तो कृष्ण ने भी कंस की बजा दी थी

  

 

दीजिये इज़ाजत नमस्कार .....

शनिवार, 11 मई 2013

मामा-मामा भूख लगी......ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार.....खो गए सारे शब्‍द देता नहीं कोई एक आवाज भी अब जबकि जानता है वो वही थी एक आवाज मेरे जीने का संबल वो जा बैठा है दूर...इतनी दूर जहां मेरा रूदन वो सुनकर भी नहीं सुनता ना ही पलटकर देखता है कभी एक बार रेत के समंदर में रोज उठता है एक तूफान मेरे वजूद को ढक लेती है रेत भरी आंधि‍यां.... आस भरी आंखों में अब है रेत....केवल रेत मिर्च सी भरी है आंखों में....अब रोउं भी तो कैसे....देखो जानां....एक तेरे न होने से क्‍या-क्‍या बदल जाता है......लीजिये प्रस्तुत है, आज की वार्ता .......

तुम खुद को छलते हो - धरा पर गर्जन करते समंदर का निर्माण तुमने किया है, गंगा,यमुना,सरस्वती को रास्ता तुमने दिया है, सृष्टि को जीवंत करने वाले दिन को जरूर तुमने ही बनाया होगा...तोता है सीबीआई हमारी - सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को तोता बतलाते हुए सरकार की जो पोल खोली है, वह देश के श्‍वान समुदाय के मुंह पर ऐसा जोरदार तमाचा है कि उनका मुंह काला हो गया है। सर..मामा - मामा भूख लगी.......... - डिस्क्लेमर ........इसका रेल, बस या हवाईजाहज .... किसी भी घोटाले से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है । जैसा राजा वैसी प्रजा । जैसे छात्र वैसे प्रश्न ।...  

बातों के शेर - > चार दिन पहले बीस- पच्चीस साल पूर्व लिखी एक कविता पोस्ट की...जो उस वक़्त > के हालात बयान करती थी. पर आज भी कुछ नहीं बदला ...हालात वैसे के वैसे ही हैं. >...अम्बर भी है बातें करता - अम्बर भी है बातें करता एक सहज उल्लास जगायें भीतर इक विश्वास उगायें, प्रेम लहर अंतर को धोए कैसे वह प्रियतम छिप पाए ! यहीं कहीं है देख न ... हो जाता है रिश्तों का रासायनिकरण - जब रिश्ते पारदर्शी होकर भी, कफ़स में कैद से लगते हैं, तब दो लोगों के बीच की डोर , छूटने लगती है , टूटने के लिए | या फिर गिरह पड़ जाते हैं उस डोर में ...  

कर्नाटक की जनता हैरान है ------- कि हमने तो कांग्रेस को वोट ही नही दिया फिर भी कांग्रेस जीत कैसे गयी ? - [image: सभी एडमिन भाई इस फोटो को अपने पेज पर जरुर पोस्ट कर्नाटक की जनता हैरान है ------- कि हमने तो कांग्रेस को वोट ही नही दिया फिर भी कांग्रेस जीत कैसे . कर्नाटक का चुनाव और उसका संदेश - *हरेश कुमार* * * * * कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम ने एक बार फिर से राजनीतिक दलों को अपने गिरेबां में झांकने का अवसर दिया है। चुनाव का परिणाम ... .एक हसींना के इश्क में गिरफ़्तार ताऊ - ताऊ को एक हसीं परी जैसी सख्शियत से इश्क हो गया. वो अपनी दो चार सहेलियों के साथ रोज सुबह व दोपहर आने लगी. दोनों का इशक परवान चढने लगा. अपनी मधुर स्वर लहर... 

कौन ले जाता है ? - कोई तो बता दे मुझे कौन ले जाता है ? मेरी नींद सेंध कुछ ऐसी लगती है मानो कोई अशर्फियों से भरी संदूकड़ी को मेरे सिरहाने ही लगा जाता है और समुचित संरक्षण ...प्रेम की डोर सखी घट बांधे... - मधु ,मकरंद निश्छल सरिता मद अभिशप्त हुआ करता धोती सरिता अपशिष्ट मैल मद ,जीवन कांति क्षरा करता - कुछ पल भ्रम, व्यतिक्रम के जीवन आचार ...असमाप्य बिछोह के रुदन का आलाप - हवा के जादुई स्पर्श के बीच असमाप्य बिछोह के रुदन का पहला लंबा आलाप कानों में पड़ता है। मैं डर कर चौकता हुआ जाग जाता हूँ। मैं अपने घर की सीढ़ियाँ उतर ... 

कितने कर्ज़ उतारूँ माँ..... ? ओ माँ... मैं तेरे कितने कर्ज़ उतारूँ ? तूने जीने के जो लिये साँसें दीं उसका कर्ज़ उतारूँ या फिर तूने जो जीने का सलीका सिखाया उसका क़र्ज़ उतारूँ ! तूने ताउम्र मेरे तन पर ना जाने कितने परिधान सजाये कभी रंग कर, कभी सिल कर उसका क़र्ज़ उतारूँ     ...तुम्‍हारे बारे में !!!!!! मां सोचती हूँ कई बार तुम्‍हारा प्‍यार और तुम्‍हारे बारे में जब भी तो बस यही ख्‍याल आता है क्‍या कभी शब्‍दों में व्‍यक्‍त हो सकता है तुम्‍हारा प्‍यार तुम्‍हारा समर्पण, तुम्‍हारी ममता तुम्‍हारा निस्‍वार्थ भाव से किया गया हर बच्‍चे से समानता का स्‍नेह ...प्रेम की डोर सखी घट बांधे...मधु ,मकरंद निश्छल सरिता मद अभिशप्त हुआ करता धोती सरिता अपशिष्ट मैल मद ,जीवन कांति क्षरा करता - कुछ पल भ्रम, व्यतिक्रम के जीवन आचार नहीं होते जब स्नेह पयोधि हृदय में होवे कई जन्म यहाँ जीया करता...

budh religion in rewalsar ,रिवालसर में बौध धर्म ये दीपक एक जगह जल रहे थे क्यों ? मुझे पता नही कोई पूजा का तरीका होगा बौध धर्म के मानने वालो और तिब्बतियो के लिये रिवालसर का बहुत अधिक महत्व है । गुरू पदमसंभव का प्राचीन मंदिर यहां पर है यहां रिवालसर में गोम्पा है । .....ये 'बितनुआ' क्या है और क्या यह जहरीला है? अक्सर अखबारों में यह समाचार छपता है कि जहरीले जंतु के काटने से मौत. और जानकारी मिलती है कि किसी 'बितनुआ' नाम के जंतु के काटने से मौत हुयी है. ऐसे में पाठकों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यह बितनुआ क्या है ? ..मेरी अभिलाषा तुम करो श्रृंगार मैं दर्पण बन जाऊं तेरे अधरों की लाली (अधर : होंठ) नैन अंजन बन जाऊं. (अंजन: काजल) तुम करो श्रृंगार मैं दर्पण बन जाऊं सजूँ सुमन बन बेनी में, (बेनी : स्त्री का जूडा ) मुक्ता हार बन जाऊं (मुक्ता : मोती) तेरा रूप अपरूप बड़ा (अपरूप : बहुत सुन्दर)....

कार्टून :- गुप्तदान को कमाई जताने वाली जमात

 


दीजिये इजाज़त नमस्कार.......

बुधवार, 8 मई 2013

आजकल खबरें आपको परेशान नहीं करतीं..कोई जरूरत नहीं इस्तीफे की .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , दस करोड़ रूपए की रिश्वतखोरी के मामले में केंद्रीय रेल मंत्री पी के बंसल के भांजे विजय सिंगला के करीबी और कथित बिचौलिया अजय गर्ग को दिल्ली की एक अदालत में आज आत्मसमर्पण करने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया । अदालत ने उसे 9 मई तक के लिए सीबीआई हिरासत में भेज दिया। विशेष सीबीआई न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने गर्ग से हिरासत में पूछताछ की अनुमति दे दी। जब पच्‍चीस पच्‍चास साल पुराने घोटालों की असलियत अबतक नहीं खुल सकी है तो इस घोटाले का भी कुछ नहीं होना , आने वाले दिनों में भी जनता को नए नए घोटालों का तोहफा मिलता रहेगा , हम ब्‍लॉगर्स भी क्‍या करें , हम सिर्फ देख सकते हैं , सुन सकते हैं , लिख सकते हैं ।

इस मध्‍य ब्‍लॉग जगत की भी एक महत्‍वपूर्ण खबर है , फख्र की बात है हिन्दी के सर्प संसार ने दुनियां की दर्जन भर भाषाओं में से सबसे रचनात्मक और सृजनात्मक कटेगरी का बाब्स यूजर पुरस्कार जीत लिया है

 इस खास खबर के बाद देखिए ब्‍लॉग जगत के कुछ महत्‍वपूर्ण लिंक  ......

' जन गन मन ' के रचयिता , भारत माता के लाल , गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर को उनकी १५२ वीं जंयती पर शत शत नमन |


आजकल खबरें आपको परेशान नहीं करतीं... वे अपनी शॉक-वैल्यू खो चुकी हैं... यह एक ऐसा दौर है जिसमें हमारे पतन की कोई सीमा नहीं है... कहीं भी, किसी के द्वारा भी, कैसा भी और कुछ भी संभव है... लगभग हर चीज बिकाऊ है और बिकाऊ दिख भी रही है...पवन बंसल जी यूपीए की सरकार में एक साफ और बेदाग छवि के भरोसेमंद और काबिल नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं... उनका भांजा रेल मंत्रालय से होने वाली नियुक्ति और प्रमोशन के बदले लंबी चौड़ी घूस लेते सीबीआई के हाथों पकड़ा गया है... पवन बंसल कसूरवार हो भी सकते हैं और यह भी हो सकता है कि जाँच के बाद यह पता चले कि पवन बंसल इस मामले में शामिल नहीं थे और उनके रिश्तेदारों ने केवल उनकी सदाशयता का अनुचित लाभ उठाया है...

हमारे जीवन में अध्यात्म का आना एक नियत समय पर होता है. इस ज्ञान को जिस क्षण हमने अपने हृदय में स्थापित कर लिया, उसी दिन से हमारे उद्धार की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. ज्ञान का आश्रय लेकर हम अपने इर्द-गिर्द बने झूठे आश्रयों से किनारा करते चलते हैं. हम जिस जगत का सहारा लेकर खड़े थे, वह तो स्वयं ही डगमगा रहा है, तो हमें क्या संभालेगा.

केन्‍द्र सरकार जिस तरह से अपने भ्रष्ट मंत्रियों का बचाव करने में लगी है वह देश के लिए चिंता का विषय है. विद्रूपता ये है कि न केवल मंत्री बल्कि तमाम मंत्रालयों, विभागों में बैठे शीर्षस्थ पदाधिकारी भी मनमाने ढंग से अपने मंत्रियों की, अपनी कारगुजारियों को छिपाने का काम कर रहे हैं. बंसल के भांजे के रिश्वत काण्ड के साथ-साथ कोयला घोटाले की अनियमितता के सामने आने ने भविष्य की स्थिति की भयावहता को ही प्रकट किया है.

हमारे देश में सदियों से राजतन्त्र प्रणाली शासन प्रणाली चलती रही धीरे धीरे इस प्रणाली में संघ राज्य की शक्तियाँ क्षीण होती गयी और नतीजा छोटे छोटे स्वतंत्र राज्यों ने जन्म ले लिया, कई सारे स्वतंत्र राज्य होने, उन पर कई वंशानुगत अयोग्य शासकों के आसीन होने के चलते हमारी शासन प्रणाली में कई तरह के विकार उत्पन्न हो गए जो बाहरी आक्रान्ताओं खासकर मुगलों के आने बाद बढ़ते ही गये| मुगलों के आने से पहले हमारे यहाँ के शासक आम जनता से किसी तरह की दुरी नहीं रखते थे पर मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद उनका अनुसरण करते हुए वे भी शानो-शौकत से रहने लगे, यहाँ के कई राजा मुगलों के सामंत बन गए तो अपना राज्य सुचारू रूप से चलाने को उन्होंने भी अपने अपने राज्यों में सामंतों की एक बड़ी श्रंखला पैदा कर दी| 
पेश है! फ्रेश है!
इस साल जनवरी के पहले सप्ताह में मैंने मुंडन करवाया था (क्यों?_वो छोडिये!)। मैं नए उगने वाले बालों के बारे में तरह-तरह के विचारों से जूझ रहा था। घर से बाहर निकलने में लाज आती थी! '...ऊंहूं..बेई, कोई देखतई तो का बोलतई ..!' गनीमत यह थी की सीजन जाड़े का था, जिसमें टोपी के इस्तेमाल से लाज-लगाने वाली बात को छिपाया जा सकता था। फ़ौरन उनी टोपी ने मेरे कंटीले चाँद पर अपना मुकाम बना लिया, और शक्ल को एक समझौता के लायक फ्रेम प्रदान किया! बाबूजी हमेशा कहा करते थे कि :'..बबुआ के ललाट बड़ी ऊँच बा!' अभी देखते तो यही कहते कि '...अंतहीन बा!!' ...अबकी बार लम्बे बाल रखने का खूब मन है। सच्ची!! अनुपम सिन्हा सर के जैसा!

ताऊ पहले लूटमार, चोरी उठाईगिरी करके अपना काम चलाता था. फ़िर कुछ समय बाद डकैतियां डालने लगा. फ़िर एक ऐसा दौर आया कि उसको डाकूगिरी से सरेंडर करना पडा क्योंकि एक अच्छी डील मिल गयी थी.सरेंडर के बाद खुली जेल में रहा जहां कुछ ब्लागरों से दोस्ती हो गई. जेल में रहने के दौरान ही वो ब्लागिंग के गुर सीख चुका था. सजा काटने के बाद उसने धमाकेदार ब्लागरी शुरू कर दी. जैसे कोई नशे का आदी हो जाता है उसी तरह ताऊ भी ब्लागरी का आदी हो गया.

जो होता है वह नजर आ ही जाता है ---------------------------------------- सूरज अपने प्रकाश का विज्ञापन नहीं देता चन्द्रमा के पास भी चांदनी का प्रमाणपत्र नहीं होता! बादल कुछ पल, कुछ घंटे , कुछ दिन ही ढक सकते हैं ,रोक सकते हैं प्रकाश को , चांदनी को ... बादल के छंटते ही नजर आ जाते हैं अपनी पूर्ण आभा के साथ पूर्ववत!

अभी दिन ही कितने हुए हैं। सवा साल ही तो। किसी इलाके में इतनी थोड़ी अवधि में किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद कैसे की जा सकती है। लेकिन उम्मीदों से परे भी घटित हुआ है कोंडागांव में। यदि इसे चमत्कार कह दें तो यह शब्द भी छोटा पड़ जाएगा। चमत्कार कहना उस वैज्ञानिक सोंच और दूरदृष्टि को नजरअंदाज कर देना भी होगा, जिसकी वजह से नक्सलवादियों से पीड़ित इस इलाके के लोग अब खुद को मुक्ति-पथ पर पा रहे हैं।

वह संगीतज्ञ कब से हमारे घर में घुसा बैठा था मुझे पता ही नहीं चला . वो तो रात में पहली झपकी के दौरान ही एक ऐसे तेज संगीत से नीद उचट गयी जिसके आगे जाज और बीटल्स सब फेल थे ....नींद टूटने के बाद अपने को संयत करते हुए ध्यान संगीत के स्रोत की और फोकस किया ...ऐसा लगा कि कर्कश संगीत लहरियां मेरे स्टडी रूम से आ रही हैं। भारी मन से उठा और ताकि देख सकूं यह बिन बुलाया मेहमान कब से चुपके से आ गया था मेरे स्टडी कक्ष में -जयशंकर प्रसाद की एक कविता भी अनायास याद आयी -

एक दिन गुबरैला गोबर से निकल कर घूमते घूमते काली चींटियों की बस्ती में जा पहुंचा . चींटियाँ उसके भारी भरकम शरीर को देखकर आश्चर्य चकित हो गई . कुछ ही दिन में गुबरैला चींटियों का राजा बन बैठा और वह बहुत ही अभिमानी हो गया .सारे चींटे उसके हर आदेश का पालन करते थे और अपने गुबरैला राजा को तरह तरह की खाने पीने की चींजे उपलब्ध कराते रहते थे .

मैं हांफता-कांपता गोंडा जाने के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचा, तो वहां पहले से मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सुखहरण जी ने बताया कि हम दोनों में से किसी का भी टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया है। मैं गुस्से से चीख पड़ा, ‘आपने तो कहा था, पीएमओ से हो जाएगा, रेलमंत्री कार्यालय से हो जाएगा। ये मंत्री करा देंगे, वे विधायक करा देंगे...अब क्या हुआ?’ सुखहरण जी ने झुंझलाते हुए कहा, ‘एक बात समझो, नहीं हो पाया...तो नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री जी कनाडा गए हैं गिल्ली डंडा मैच का उद्घाटन करने, रेल मंत्री जी चार्ट तैयार होने तक छुट्टी पर थे। मंत्री-विधायक सभी टूर पर गए हुए हैं।’

बिना आँच के भट्टी सा सुलगता दर्द रूह पर फ़फ़ोले छोड गया आओ सहेजें इन फ़फ़ोलों में ठहरे पानी को रिसने से ………… कम से कम निशानियों की पहरेदारी में ही उम्र फ़ना हो जाये तो तुझ संग जीने की तलब शायद मिट जाये क्योंकि ……… साथ के लिये जरूरी नहीं चांद तारों का आसमान की धरती पर साथ साथ टहलना यूँ भी फ़ना होने के हर शहर के अपने रिवाज़ होते हैं …………

श्रीगंगानगर-कुछ ऐसी चीजें होती हैं जो दूर से ही सुहानी लगती है। ठीक ऐसे, जैसे अन्ना हज़ारे टीवी पर ही सजते हैं। ऊंचे मंच पर तिरंगा फहराते अन्ना हर किसी को मोहित,सम्मोहित करते हैं।  चेहरे पर आक्रोश ला जब वे वंदे मातरम का नारा लगाते हैं तो जन जन की उम्मीद दिखते हैं। वे अपने लगते हैं...जो इस उम्र में लाखों लोगों की आँखों  में एक नए भारत की तस्वीर दिखाते हैं। अनशन के दौरान मंच पर निढाल लेटे अन्ना युवाओं के दिलों में चिंता पैदा करते हैं....हर ओर एक ही बात अन्ना का क्या हुआ?

8 , 9 और 10 मई 2013 को सामान्‍य तौर पर ग्रहों की स्थिति शुभ फलदायक है , इसका असर शेयर बाजार और मौसम पर अनुकूल दिखेगा , वृश्चिक राशि वालों के लिए शुभ तथा कन्‍या रावालों के लिए अशुभ रहेगा .. तीनो ही दिन 2 बजे से 4 बजे दिन का समय कुछ अशुभ तथा 7 बजे से 9 बजे रात्रि का समय शुभ फलदायी रहेगा। विस्‍तार में अपने अपने लग्‍न से देखिए अपना अपना राशि फल , इस राशि फल में आपके लिए शुरूआती पंक्ति अधिक महत्‍वपूर्ण होगी , बाद की पंक्तियां कम महत्‍वपूर्ण होती जाएंगी ......

फ़िलहाल ये मेरी आखरी पोस्ट है। लौट कर आऊँगी लेकिन कब आऊँगी मालूम नहीं। आज ही निकल रही हूँ होलैंड और उसके बाद भारत के लिए। शायद आ पाऊं ब्लॉग पर या शायद न भी आ पाऊं। जो भी है आप सभी को हैपी-हैपी ब्लॉग्गिंग। कोई टंकी-वंकी पर नहीं चढ़ रही हूँ, बस एक बार फिर बीजी होने वाली हूँ। तो मिलते हैं एक छोटे/लम्बे ब्रेक के बाद :):)
जब भी लौट कर आऊँगी यहीं आऊँगी :)
मिला जब वो प्यार से, तो गुलाब जैसा है
आँखों में जब उतर गया, शराब जैसा है
खामोशियाँ उसकी मगर, हसीन लग गईं
कहने पे जब वो आया तो, अज़ाब जैसा है

"नासिर" क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है
दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है
कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जायेगा
रूखी-सूखी जो मिल जाये शुक्र करो तो बेहतर है 

प्रभु  ने  हम  दोनों  की , किस्मत  एक  बनाई ! 


दुनिया  में  हम  दोनों  को , ज़िंदा  मारा  जाता ,
 मुझे  गर्भ  के भीतर ,तुमको बाहर  काटा जाता  !

हर ख़ुशी है लोगों के दामन में ,
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं .
दिन रात दौड़ती दुनिया में ,
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं .
माँ की लोरी का एहसास तो है ,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं .
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके ,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं .


मेरी फैली हुयी बाहें....
ये मेरी –
फैली हुयी बाहें दो –
शाख़ पेड़ की हो,
कब से मुंतज़िर हैं तेरी.....
पतझड़ है तो क्या हुआ –




आज के लिए बस इतना ही ... मिलते हैं एक ब्रेक के बाद .....

एक चटका इधर भी हो जाए

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