ललित शर्मा का नमस्कार ... आश्विन शुक्लपक्ष प्रथमा को कलश की स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्यौहार शारदीय नवरात्र आरम्भ हो चुका है, आज द्वितीया है. माँ दुर्गा अपने सुन्दर स्वरुप में विराजमान हो चुकी हैं।
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
ब्लॉग जगत की नव देवियों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज मिलते हैं, बहुत ही कम शब्दों में सब कुछ कहने का हुनर अर्थात गागर में सागर भरने वाली एक और शख्सियत संगीता स्वरुप जी से ....
ये मार्च 2007 से ब्लॉग जगत में हैं. संगीताजी अपने बारे बताते हुए में कहती हैं : "कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ...
मन के भावों को
कैसे सब तक पहुँचाऊँ
कुछ लिखूं या
फिर कुछ गाऊँ
।
चिंतन हो
जब किसी बात पर
और मन में
मंथन चलता हो
उन भावों को
लिख कर मैं
शब्दों में
तिरोहित कर जाऊं ।
सोच - विचारों की शक्ति
जब कुछ
उथल -पुथल सा
करती हो
उन भावों को
गढ़ कर मैं
अपनी बात
सुना जाऊँ
जो दिखता है
आस - पास
मन उससे
उद्वेलित होता है
उन भावों को
साक्ष्य रूप दे
मैं कविता सी
कह जाऊं." इनके प्रमुख ब्लॉग हैं
इनकी प्रथम पोस्ट:
प्रदुषण
>> Thursday, August 14, 2008
जीवन के आधार वृक्ष हैं ,
जीवन के ये अमृत हैं
फिर भी मानव ने देखो,
इसमें विष बोया है.
स्वार्थ मनुष्य का हर पल
उसके आगे आया है
अपने हाथों ही उसने
अपना गला दबाया है
काट काट कर वृक्षों को
उसने अपना लाभ कमाया है
पर अपनी ही संतानों के
सुख को स्वयं खाया है
आज जिधर देखो
प्रदुषण फ़ैल रहा है
वृक्षों के अंधाधुंध कटाव से
ये दुःख उपजा है
क्यों नहीं समय रहते
इन्सान जागा है
सच्चाई के डर से
आज मानव भागा है.
बिना वृक्षों के क्या
मानव जीवन संभव होगा
इस प्रदुषण में क्या
सांसों का लेना संभव होगा
आज अग्रसित हो रहा
मानव विनाश की ओर
इस धरती पर क्या मानव का
जीवित रहना संभव होगा?
कुछ करना है गर
काम तो ये कर डालो
पोधों को रोपो और
वृक्षों को दुलारों
आज समय रहते यदि
तुम चेत जओगे
तो आगे आने वाली नसलों को
तुम कुछ दे पाओगे
.हे मनुज!
अंत में प्रार्थना है मेरी तुमसे
वृक्षों को तुम निज संताने जानो
वृक्ष तुम्हारी सम्पत्ति,
तुम्हारी धरोहर हैं
इस सच को अब तो पहचानो.
जीवन के ये अमृत हैं
फिर भी मानव ने देखो,
इसमें विष बोया है.
स्वार्थ मनुष्य का हर पल
उसके आगे आया है
अपने हाथों ही उसने
अपना गला दबाया है
काट काट कर वृक्षों को
उसने अपना लाभ कमाया है
पर अपनी ही संतानों के
सुख को स्वयं खाया है
आज जिधर देखो
प्रदुषण फ़ैल रहा है
वृक्षों के अंधाधुंध कटाव से
ये दुःख उपजा है
क्यों नहीं समय रहते
इन्सान जागा है
सच्चाई के डर से
आज मानव भागा है.
बिना वृक्षों के क्या
मानव जीवन संभव होगा
इस प्रदुषण में क्या
सांसों का लेना संभव होगा
आज अग्रसित हो रहा
मानव विनाश की ओर
इस धरती पर क्या मानव का
जीवित रहना संभव होगा?
कुछ करना है गर
काम तो ये कर डालो
पोधों को रोपो और
वृक्षों को दुलारों
आज समय रहते यदि
तुम चेत जओगे
तो आगे आने वाली नसलों को
तुम कुछ दे पाओगे
.हे मनुज!
अंत में प्रार्थना है मेरी तुमसे
वृक्षों को तुम निज संताने जानो
वृक्ष तुम्हारी सम्पत्ति,
तुम्हारी धरोहर हैं
इस सच को अब तो पहचानो.
अद्यतन पोस्ट:
अधूरा उपवन
मन के आँगन में
तुमने अपनी ही
परिभाषाओं के
खींच दिये हैं
कंटीले तार
और फिर
करते हो इंतज़ार
कि ,
भर जाये आँगन
फूलों से .
हाँ , होती है
हरियाली
पनपती है
वल्लरी
पत्ते भी सघन
होते हैं
पर फूल
नहीं खिलते हैं ।
क्या तुमको
ऐसा नहीं लगता कि
मन का उपवन
अधूरा रह जाता है
और खुशियों का आकाश
हाथ नहीं आता है ।












