बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ- नवमी...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार .........नौ दिन तक चलने वाले नवरात्र का आज आखिरी दिन  है. नवमी के दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है. मां दुर्गा अपने नौवें स्वरूप में सिद्धिदात्रीके नाम से जानी जाती हैं. आदि शक्ति भगवती का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिनकी चार भुजाएं हैं. उनका आसन कमल है. दाहिनी ओर नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाई ओर से नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है. मां सिद्धिदात्री सुर और असुर दोनों के लिए पूजनीय हैं. जैसा कि मां के नाम से ही प्रतीत होता है मां सभी इच्छाओं और मांगों को पूरा करती हैं. ऐसा माना जाता है कि देवी का यह रूप यदि भक्तों पर प्रसन्न हो जाता है, तो उसे 26 वरदान मिलते हैं. हिमालय के नंदा पर्वत पर सिद्धिदात्री का पवित्र तीर्थस्थान है. 


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥




आज मिलिए  शैल मंजुषा "अदा"  जी से, ये मई 2009 से ब्लॉग जगत में हैं। अपने छोटे से परिचय में कहती हैं " बस मैं और मेरे ख्यालों का मौसम..."  संगीत सुनना, karaoke पर गाना, चुटकुले सुनाना, नक़ल करना, कविता लिखना और पढ़ना, बातें करना, बच्चों के साथ बैठ कर फिल्में देखना, जब भी अवसर मिले माँ और पिताजी को दर्शनीय स्थलों पर घुमाने ले जाना इन्हें पसंद है  काव्य मंजूषा इनका ब्लॉग है .


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इनकी प्रथम पोस्ट 

समय...

याद है मुझे,
जब मैं छोटी बच्ची थी,
झूठी दुनिया की
भीड़ में, भोली-भाली
सच्ची थी,
तब भी सुबह होती थी
शाम होती थी,
तब भी उम्र यूँ ही
तमाम होती थी,
लगता था पल बीत रहे हैं
दिन नहीं बीता है
मैं जीतती जा रही हूँ,
वक्त नहीं जीता है,
पर,अब बाज़ी उलटी है पड़ी,
वक्त भाग रहा है,और मैं हूँ खड़ी
वक्त की रफ़्तार का
नही दे पा रही हूँ साथ,
इस दौड़ में न जाने कितने
छूटते जा रहे हैं हाथ
अब समय मुझे दीखाने लगा अंगूठा
कहता है, तू झूठी,
तेरा अस्तित्व भी झूठा
जब तक तुम सच्चे हो
तुम्हारा साथ दूंगा
जब कहोगे,जैसा कहोगे,
वैसा ही करूँगा
अच्छाई की मूरत बनोगे तो
समय से जीत पाओगे
वर्ना दुनिया की भीड़ में
बेनाम खो जाओगे
आज भी समय जा रहा है भागे
सदियों पुरानी सच्चाई की मूरत
अब भी हैं आगे
ये वो हैं जिन्होंने
ता-उम्र बचपन नहीं छोडा है
वक्त ने इन्हें नहीं,
इन्होने वक्त को मोड़ा है
सोचती हूँ
कैसे लोग बच्चे रह जाते हैं
झूठ की कोठरी में रह कर भी
सच्चे रह जाते हैं,
अभी तो मुझे
असत्य की नींद से जागना है
फिर समय के
पीछे-पीछे दूर तक
भागना है ....

नवीनतम पोस्ट 

मेरे कदम...


न वो चिनार के बुत,
न शाम के साए,
एक सहज सा रस्ता,
न पिआउ, न टेक |
बस तन्हाई से लिपटे,
मेरे कदम,
चलते ही जाते हैं
न जाने कहाँ ।
मिले थे चंद निशाँ,
कुछ क़दमों के,
पहचान हुई,
चल कर कुछ कदम,
अपनी राह चले गए,
फिर मैं और
तन्हाई से लिपटे
मेरे कदम
चल रही हूँ न...
मैं अकेली.. !!
इसके साथ ही नवदेवियों  की यह खास श्रंखला समाप्त होती है, अगली नवरात्री में इस क्रम को और आगे बढ़ाएंगे। मिलते हैं अगली वार्ता में तक के लिए राम - राम ...............

11 टिप्पणियाँ:

अदा जी के परिचय के लिए ललित जे का आभार |विजय दशमी पर हार्दिक शुभ कामनाएं |
आशा

शैल मंजुषा "अदा" जी के साथ ही नवदेवियों की सुन्दर प्रस्तुति के लिए आपका आभार
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

sarvapratham vijyadashmi ki haardik shubhkaamnaayen
blog-jagat me maata aadi shakti ke ek avtaar ka avtarit hona
dikhai padta hai "shoonyamcha shoonyam ch" jaisa ki yah naacheez
kai post daal chuka kintu "tippani" ki to bat chhodiye
dekhne laayak nahi samjha jaata....Bhai branded jo nahi hain.....

'विद्या समस्तास् तब देवि भेदः स्त्रियः समस्ता सकल जगत्सु,,त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्...'
इस शृंखला मैं नवदेवियों के रूप में इन नव-रूपों और उनकी कला के प्रस्तुतीकरण से ऐसा लगा कि उपरोक्त कथ्य सम्मुख उपस्थित हो गया हो !
इनका का ब्लाग-मंच पर स्वागत और प्रस्तुतकर्ता को बधाई !

विजयदशमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं
बढिया वार्ता
बढिया, बहुत सुंदर

नवदेवियों की श्रंखला बहुत ही सुन्दर रही...

ललित जी,
आपको एवं आपके समस्त परिवार को विजयादशमी की ढेर सारी शुभकामनायें ...
आपकी इस पोस्ट ने मुझे बहुत डरा दिया, मुझे आप धर्मभीरु समझ सकते हैं।
नवदुर्गा के बारे में आपने जो जानकारियाँ दी हैं, वो सभी की सभी अतुलनीय हैं परन्तु नव दुर्गा के रूप के साथ स्वयं को देखना मुझे भयाक्रान्त कर गया ....कृपया आप मेरी बातों को अन्यथा मत लीजियेगा। बस असमंजस की स्थिति में ये टिप्पणी कर रही हूँ, इसलिए शायद कुछ भूल भी हो जाए मुझसे।
अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ।

बढ़िया.....
काश ९ की जगह ९० देवियाँ होती तो मज़ा आता.......

आभार..
अनु

अन्य ब्लॉग देवियों एवं देवताओं के ब्लॉग वार्ता पर शुभागमन की प्रतीक्षा है... बढ़िया वार्ता के लिए आभार ललित जी

झूठी दुनिया की
भीड़ में, भोली-भाली
सच्ची थी,

दुनियां अपनी राह पर सदा जैसी थी वैसी ही है बदला है हमने उसे अपने चलन से . अपनी खुदगर्जी से.
आपकी सभी रचनाओं में एक खास बात नज़र आती है विचारणीय ......

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