सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

कौन ब्लॉगर बनना चाहेगा? -------- राम राम ब्लॉग4वार्ता ......... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, प्रस्तुत हैं ब्लॉग वार्ता में कुछ फटाफट लिंक्स ............

राजपूत नारियों की साहित्य साधना : प्रेम कुंवरी यह सर्वथा अज्ञात और साहित्यिक क्षेत्र में अचर्चित राजपूत कवयित्री है| महाराजा जयसिंह आमेर की महारानी चन्द्रावती द्वारा अपनी आत्मा के कल्याणार्थ संकलित करवाई गयी पद्य कृति में इनके २८ छंद संकलित है| यह पद्य महाराव मनोहरदास शेखावत के ब्रजभाषा में रचित पद्यों के संकलन के पश्चात् लिखित है| ग्रंथ में लिखा है- प्रेमकुंवर बाई कृत पद्य| यद्धपि यह तो अन्य साहित्यिक स्त्रोतों से स्पष्ट नहीं होता कि प्रेमकुंवरी का जन्म, माता-पिता, विवाह आदि किस कुल में किस संवत में हुआ, परन्तु महाराव मनोहरदास की रचना की समाप्ति के बाद हि इनकी रचना लिपिबद्ध होने और बाई संबोधन से यह प्रत्यय होता है कि वह शेखाव... more »

आशा आशा तिमिरपान कर लेती हूँ जब, चिमनी सा जी जाती हूँ आँखों में भर जाए समंदर तो, मछली सा पी आती हूँ सर सर सर सर चले पवन जब खुशियाँ मैं उड़ाती हूँ शब्दों के तोरण से कानों में घंटे घड़ियाल बजाती हूँ अंतस की सोई अगन को मध्धम मध्धम जलाती हूँ मूक श्लोक अंजुरी में भर कर नया संकल्प दोहराती हूँ तिमिरपान कर लेती हूँ जब, चिमनी सा जी जाती हूँ आँखों में भर जाए समंदर तो, मछली सा पी आती हूँ जीवन के इस हवन कुण्ड में अपने अरमान चढ़ाती हूँ क्षत विक्षत आहत सी सांसें कहीं कैद कर आती हूँ भूली बिसरी बातों पर फिर नत मस्तक हो जाती हूँ आशा की पंगत में बैठे जो उनका दोना भर आती हूँ तिमिरपान कर लेत... more »

लहुरी काशी रतनपुर बाबू रेवाराम से गौरवान्वित लहुरी काशी रतनपुर के काशीराम साहू (लहुरे) के माध्यम से यहां की पूरी सांस्कृतिक परम्परा सम्मानित हुई, जब इसी माह 9 तारीख को छत्तीसगढ़ के लोक नाट्‌य के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार-2011 मिला। आठ सौ साल तक दक्षिण कोसल यानि प्राचीन छत्तीसगढ़ की राजधानी का गौरव रतनपुर के नाम रहा। इस दौरान राजवंशों की वंशावली के साथ यहां कला-स्थापत्य के नमूनों ने आकार लिया। अब यह कस्बा महामाया सिद्ध शक्तिपीठ के लिए जाना जाता है। कभी इसकी प्रतिष्ठा लहुरी काशी की थी। तासु मध्य छत्तिसगढ़ पावन। पुण्य भूमि सुर मुनि मन भावन॥ रत्नपुरी तिनमें है नायक। कांसी सम सब विधि सुखदायक॥... more » अन्नपूर्णा गहरे सांवले रंग पर गुलाबी सिंदूर ,गोल बड़ी बिंदी ...... कहीं से घिसी ,कहीं से सिली हुई साड़ी पहने अपनी बेटी के साथ , खड़ी कुछ कह रही थी मेरी नयी काम वाली .. कि मेरी नज़र उस के चेहरे ,गले और बाहं पर मार की ताज़ा -ताज़ा चोट पर पड़ी ....और दूर तक भरी गहरी मांग पर भी ..... और पूछ बैठी , कितने बच्चे है तुम्हारे .. सकुचा कर बोली जाने दो बीबी .....!!!!! क्यूँ ..!!!. .तुम्हारे ही है ..... या चुराए हुए ...और तुम्हारा नाम क्या है ,बेटी का भी.... वो बोली नहीं -नहीं बीबी .... चुराऊँगी क्यूँ भला .. पूरे आठ बच्चे है ....ये बड़ी है सबसे छोटा गोद में है ..... पता नहीं मुझे क्यूँ हंसी आ गयी ........ इसलिए ... more »

जसपाल भट्टी वन मैन आर्मी अगेंस्ट करप्शन जसपाल भट्टी को कॉमेडी किंग भी कहा जाता रहा है और वे भारतीय टेलीविजन और सिने जगत का एक जाना-पहचाना नाम रहे हैं। भट्टी को आम-आदमी को दिन-प्रतिदिन होने वाली परेशानियों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करने के लिए जाना जाता रहेगा। उनका जन्म 3 मार्च 1955 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उनकी पत्नी, सविता भट्टी हमेशा उनके कार्यों में उनका सहयोग करती थी। दूरदर्शन पर प्रसारित उनके सबसे लोकप्रिय शो – फ्लॉप शो में उनकी पत्नी सविता भट्टी ने अभिनय करने के साथ ही उसका प्रोडक्शन भी किया। भट्टी ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री ली लेकिन उनका मन इंजीनियिंग में नहीं ... more » 

इसे पढ़कर कौन ब्लॉगर बनना चाहेगा...मठाधीश! वाल्मीकि जयंति पर विशेष.... वाल्मीकीय रामायण के उत्तर कांड में एक बहुत ही रोचक प्रसंग है..... नित्य की भांति श्रीराम आज भी राजकार्य को निपटाने के लिए पुरोहित वशिष्ठ तथा कश्यप आदि मुनियों और ब्राह्मणों के साथ राज्यसभा में आ गये। इधर कार्य को निपटाने के उपरान्त श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- लक्ष्मण! * * *निर्गच्छ त्वं महाबाहो सुमित्रानन्दवर्धन।* *कार्यार्थिनश्च सौमित्रे व्याहर्तुं त्वमुपाक्रम।।* * * तुम स्वयं जाकर देखो। यदि कोई कार्यार्थी द्वार पर उपश्थित है, तो उसे भीतर आने के लिए कहो। श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण ने बाहर आकर उच्च स्वर में कहा-क्या किसी को श्रीरामजी से मिलना है? किसी ने भ... more » 

मुखौटों की बस्ती.... संध्या शर्मा

इतनी बडी बस्ती में मुझे एक भी इंसान नहीं दिखता चेहरे ही चेहरे हैं बस किस चेहरे को सच्चा समझूँ किसे झूठा मानूं और उस पर इन सबने अपनी जमीन पर बाँध रखी है धर्म की ऊंची - ऊंची इमारतें इन्ही में रहते हैं ये मुखौटे क्षण प्रतिक्षण बदल लेते हैं नाम, जाति, रंग‍,रूप बसा रखा है सबने मिलकर मुखौटों का एक नया शहर जिन्हें चाहिए यहाँ सिर्फ मुखौटे जिनमे मन, ह्रदय, भावना कुछ नहीं बस फायदे नुकसान के सबंध इंसान जिए या मरे कोई फर्क नहीं पड़ता इन मुखौटों को लगे हैं कारोबार में श्मशान विस्तारीकरण के ये नहीं जानते मृत्यु केवल अंत ... more »
 
वार्ता को देते हैं विराम, मिलते हैं, ब्रेक के बाद ..........

14 टिप्पणियाँ:

दादा वाह क्या बात है

बढ़िया.....
फटाफट वार्ता अच्छी लगी..

सादर
अनु

कोई चाहे न चाहे हम तो ब्‍लॉगर बने हुए हैं ..
अच्‍छे लिंकों से सजी बहुत सुंदर वार्ता के लिए आभार !!



दो ही रचनाओं का अवलोकन हो पाया ...

प्रतिभाएं बहुत हैं, रचनाएं बहुत ही सुन्दर

अंतर्मन को छू लेने वाली हैं ... पढ़कर

और आपके द्वारा प्रस्तुतीकरण का कहना ही क्या ....

बधाई

अच्छी लिंक्स |
आशा

बहुत सुन्दर। कैसे हो ललित जी? शुभकामनायें।

सुंदर वार्ता... स्थान देने के लिए आभार...

बढिया रचना और जानकारी

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