सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

रिश्‍तों का संसार .. झारखंड में हो रहे 34 वें नेशनल गेम्‍स .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी


सभी पाठकों को संगीता पुरी का नमस्‍कार ,पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका में चल रहे जनविद्रोह की लपटें अब चीन की महान दीवार को लांघ कर बीजिंग एवं शंघाई तक जा पंहुची हैं। यहां भी अनेक लोगों ने रविवार को सरकार विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।  शनिवार को चीन के 13 शहरों में इंटरनेट पर भेजे गए एक संदेश में लोगों से सरकार विरोधी प्रदर्शन में जुटने का आह्वान किया गया था। बीजिंग और शंघाई में लोगों ने रविवार को इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। बीजिंग के वांगफंुजि बाजार में 100 प्रदर्शनकारी इसमें शामिल हुए। प्रदर्शनकारी चीन के एक दलीय शासन का विरोध करने के लिए यहां जुटे थे। उन्होनें देश में मानवाधिकारों की खराब स्थिति को सुधारने एवं अभिव्यक्ति के अधिकार में और ढील दिए जाने की मांग की। इन प्रदर्शनों के संभावित स्थलों पर पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद कर दी गई है।  अब  इस महीने आनेवाले कुछ नए चिट्ठों की झलकियों के साथ आज की ब्‍लॉग4वार्ता पर लिए चलती हूं...... 

श्री कृष्ण शरणम ममः ॥ जय श्री कृष्णा ॥

मानव के दोष मात्र का कारण उसका अहंकार तथा अभिमान है। इस अहंकार का उदय न हो तथा दीनताभाव सदैव सुदृढ रहे इसके लिये “श्री कृष्ण शरणम ममः” अर्थात मेरे लिये श्री कृष्ण ही शरण हैं, रक्षक हैं, आश्रय हैं – वही मेरे लिये सर्वस्व हैं। मैं दास हूं, प्रभु मेरे स्वामी हैं और मैं आपकी शरण में हूँ। इस भावना से दीनता बनी रहती है, तथा अहंकार का उदय नही होता ।


रिश्‍तों का संसार ....
हिंदू परंपरा में भले ही विवाह संबंध शाश्वत हों, लेकिन समय और जरूरतों के हिसाब से इनमें बदलाव आते रहते हैं। ये बदलाव आने भी जरूरी हैं तभी तो इनकी सफलता सुनिश्चित होगी। इस मामले में लकीर का फकीर न बनें। 

रिश्तों को निभाने के लिए तय किए गए ऐसे अनेक नियम हं जो हकीकत के धरातल पर आते ही न जाने कब कहां धाराशाई हो जाते हैं। ऐसा इसलिए कि पति-पत्नी की आशाएं और अपेक्षाएं अलग होती हैं। 


राष्ट्रीय खेल के उद्घाटन समारोह का हिस्सा बनने के लिए खेलप्रेमियों में गजब का उत्साह देखा जा रहा है। उद्घाटन समारोह के लिए टिकटों की बिक्री मंगलवार से शुरू हो गयी है। बिक्री की जिम्मेवारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को दी गई है। एसबीआई के सेल्स प्लानर चेतनाथ झा के अनुसार पहले दिन कुल 17 लाख 45 हजार रुपए की टिकटें बिकीं। सभी श्रेणियों के कुल 3126 टिकट बिके। बैंक को 68 सौ टिकटें दी गईं थीं, जिसे राजधानी की 12 शाखाओं में भेजा गया था। प्रीमियम (1250 रुपए) टिकट खरीदने के लिए लोगों में आपाधापी मची रही। प्रीमियम की 600 टिकटों में से 466 टिकटें बिक गईं। वहीं 250 रुपए की 1250, 500 रुपए की 830, 750 रुपए की 580 टिकटों की बिक्री हुई है।


भूख की तड़पन भी थी और रोटियां भी थी
पतन की खाईयां भी थी विजय की चोटियां भी थी।
जिसे था हौसला, चुनने का साहस था चुनी उसने
घने जंगल में संकरे रासते पगडंडियां भी थी।
इतिहास कहता है यहां कितने उगे और कितने ही डूबे
वक्त के आकाश में दिन रात की पाबंदियां भी थी।


कटोरा लेकर भीख भी मांग ली होती,
अगर सरकार ने इसकी मंजूरी दे दी होती.
अपनी जीवन लीला खत्म कर ली होती,
अगर कानून ने इसकी मंजूरी दे दी होती. 
मैंने शराब कब की चख ली होती,
अगर संस्कारों ने इसकी मंजूरी दे दी होती.


सीवीसी पर इतना शोरलेकिन हवाला मामले में चुप्पी क्यों  ?
जब से सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की हैतब से यह पद लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मामला काफी पेचीदा है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस का कहना है कि केरल की दो सरकारों ने आपसी राजनीति के कारण पाम ऑयल घोटाले की जांच प्रक्रिया को न तो आगे चलने दिया और न ही खत्म किया। इस तरह दो दलों की राजनीति का वह नाहक शिकार बने। वह खुद को इस कांड में दोषी नहीं मानते। केरल कैडर के आईएएस अधिकारियों के संगठन ने भी थॉमस को बेदाग बताते हुए उनके प्रति खुला समर्थन व्यक्त किया है।

होने और लगने में है अंतर इतना
घोड़े और गदहे में है अंतर जितना
घोड़ा, घोड़ा होता है, जबकि गधा घोडा लगता है
भगवन सारे गुण एक को छांट के देते नहीं
ईमानदारी का चर्चा कार आड़ में घूस लेते नहीं
वो बनाते नहीं किसी को सर्व-गुण-संपन्न
किसी को देते हैं गुण और
किसी और को कर देते हैं संपन्न
गुण हमको दे दिया बांचने के लिए
संपन्न उनको कर दिया गुण का प्रसाद चाटने के लिए
चाटते-चाटते उन्होंने चर डाला


एक कॉलेज का दृश्य। कुछ लड़कियाँ, एक लड़की को घेरकर खड़ी हैं और उसे कोस रही थीं-
एक बोली- ''तेरा जीवन बेकार हो गया रे मुन्नी। एक वो मुन्नी है जो अपने डार्लिंग के लिये बदनाम हुई मगर उसका कितना नाम हो गया और एक तू है, जिसके पास एक भी डार्लिंग नहीं है.''
दूसरी चढ़ बैठी - '' तुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी।''
तीसरी ने ताना दिया - '' काहे तू इतना पढ़-लिख ली। गँवार ही रहना था तुझको। छि:।''
चौथी लपकी- '' देख हम लोगों को। खानदान कानाम रौशन कर रही हैं : हर एक के पास कितना स्टाक है. एक-एक के पास तीन-तीन, चार-चार ब्वाय फ्रेंड है, लवर हैं.और तू? तेरे पास एक भी नहीं। इसका पहरावा तो देखो। सलवार-कुरता, उस पर चुन्नी। छि:-छि:। चलो सहेलियो, इसके पास खड़े रहना भी पाप है, नहीं-नहीं  महापाप है।''




१९४७ को जब आजादी मिली, तो शायद सरदार को इस बात का अनुमान हो गे था कि उनके पास बहुत वक़्त नहीं बचा है। गृह मंत्री के रूप में उनके सर के ऊपर समस्याओ का अम्बार लगा था। अंग्रेजो ने ऐसे-ऐसे खेल रचे थे कि भारत के गृह मंत्री को एक मिनट कि फुर्सत न मिले, लेकिन सरदार के मस्तिष्क में अपने लक्ष्य को हासिल करने कि पक्की कार्ययोजना थी और अपने सहयोगी वि0 पि0 मेनन के साथ मिलकर वे उसे पूरा कर रहे थे । आजादी के बाद देश में ऐसे कई रजवाड़े थे, जो अपने को भारत से अलग रखना चाहते थे। इन राजाओ को अंग्रेजो का नैतिक सम्रथन भी हासिल था।

समाज की पहलेवाली सभी अवस्थाओं में उत्पादन मूलभूत रूप से सामूहिक था और इसलिये उसे उपभोग के लिये, छोटे या बड़े आदिम सामुदायिक कुदुम्बों में, सीघे-सीघे बांट लिया जाता था। यह साझे का उत्पादन अत्यन्त संकुचित सीमाओं के भीतर होता था, परन्तु साथ ही उसमें उत्पादकगण अपनी उत्पादन प्रक्रिया के और अपने उत्पाद के खुद मालिक रहते थे। वे जानते थे कि उनकी पैदावार का क्या होता है- वे उसका उपभोग करते थे, वह उनके हाथ में ही रहती थी। जब तक उत्पादन इस आघार पर चलता रहा, तब तक वह उत्पादकों के नियंत्रण से बाहर नहीं निकल पाया और उनके मुकाबले वैसी अजीब, प्रेत शक्तियों को नहीं खड़ा कर सका, जैसी कि सभ्यता के युग में नियमित और अवश्यम्भावी रूप से खड़ी होती रहती हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र जिससे आप सभी वाकिफ होंगे कुछ समय पहले मुझे भी यहाँ  आने का मौका मिला ऐसे तो मै बहुत सी जगह जा चुका हूँ पर ये पहला मौका रहा जब मै किसी आदिवासी गाँव ( बिगाई, ललितपुर से ४५ किमी दूर )  में गया जो बाहरी दुनिया से काफी कटा हुआ है" यहाँ मै आया एक प्रशिक्षण शिविर के दौरान यहाँ आने से पहले मै, जिसे ये नहीं पता था कि आखिर इस प्रशिक्षण का क्या मकसद है और एक बात मेरे जेहन में हमेशा बनी रही वो ये कि मै यहाँ क्यूँ हूँ या मेरी मौजूदगी का यहाँ मतलब क्या है पर आज शायद मै यह कह सकता हूँ कि ना मैंने इस प्रशिक्षण के दौरान बहुत कुछ सिखा बल्कि एक ऐसे अनुभव को भी अपने साथ लेकर आया जो कहीं ना कहीं  मेरी ज़िन्दगी में कुछ रोशनी देगा.

राजस्थान के प्रमुख किले एवं उनके निर्माणकर्ता

1. बयाना का किला या बिजयगढ़ या विजयगढ़-
जादौन राजा बिजयसिंह
2. जोधपुर का किला या मेहरानगढ़ -
राव जोधा [ 1459 में ]
3. अचलगढ़ का किला माउंट आबू-
राणा कुंभा
4. भरतपुर का किला लोहागढ़ - 
जाट राजा सूरजमल
[ 1733 में ]
5. कुंभलगढ़ का किला-
राणा कुंभा
6. मांडलगढ़ का किला-
चौहान शासक
7. नाहरगढ़ या सुदर्शनगढ़ [ जयपुर ] का किला-
सवाई जयसिंह
8. जैसलमेर का किला या सोनार का किला-
महारावल जैसलदेव
9. चित्तौड़गढ़ का किला-
चित्रांगद मौर्य
10. सिवाना का किला जिला बाड़मेर-
पँवार राजा वीर नारायण प्रथम

अब इजाजत दीजिए .. मिलती हूं अगले सप्‍ताह कुछ नए चिट्ठों के साथ ...

12 टिप्पणियाँ:

अरे वाह
ताई बहु ज़ल्दी
स्वागत है
उम्दा लिंक्स

अच्छी लिंक्स और जानकारी |बधाई
आशा

काफ़ी सारे लिंक हैं,
सुंदर वार्ता के लिए आभार संगीता जी।

ाच्छे लिन्क मिले संगीता जी। आपको देख कर ही चली आयी। धन्यवाद।

अच्‍छे लिंक दिए आपने। काफी सारे पोस्‍ट एक साथ पढने को मिल गए।
मेरी एक पोस्‍ट जो मेरी बिटिया से संबंधित है, को शामिल करने के लिए आपका आभार।

अच्‍छे लिंक दिए आपने,सुंदर वार्ता के लिए आभार संगीता जी।

बेहद उम्दा वार्ता ... नए चिट्ठो की चर्चा शायद केवल आप ही कर रही है आजकल ... साधुवाद इस प्रयास के लिए !

बहुत बढ़िया लिंक्स दिए. एक अच्छी वार्ता के लिए आभार संगीता जी!

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