गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

पुरानी सी पोस्‍ट का संगीतमय रूपांतरण रूमाल की कहानी ..ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी


आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , मेरे ब्‍लॉग में पढिए क्‍या करें क्‍या न करें 5 , 6 और 7 दिसंबर 2012 को ?? ब्‍लॉग जगत का मशहूर परिकल्पना ब्लागोत्सव (तृतीय) चल रहा है ,आज भी वर्ष के कुछ महत्‍वपूर्ण पोस्‍ट को शामिल किया गया है , जिसमें आज डॉ मीनाक्षी स्‍वामी जी की यात्रा और इनकी कहानी -टिक..टिक..टिक.. , सतबीर वर्मा जी की नारी और आधुनिकता , प्रताप सहगल जी से लालित्‍य ललित जी की बातचीत और भी बहुत कुछ । मित्रों यहां रांची में नेशनल बुक फेयर चल रहा है. कल वहां कवयित्री सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें मैने भी कविता पाठ किया. प्रस्तुत है हिंदी दैनिक प्रभात खबर, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण में छपी खबरें.

राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्यमार्ग पर मात्र 6 किमी पर एक विशालकाय दो टुकड़ो में खंडित पत्थर जिस पर वीर लोरिक पत्थर लिखा है यात्रियों -पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर सहज ही आकर्षित करता है। मुझे भी इसके बारे में जिज्ञासा हुयी . जो कुछ जानकारी मिली आपसे अति संक्षेप में साझा कर रहा हूँ क्योकि इस पत्थर से जुड़ा आख्यान वस्तुतः हजारो पक्तियों की गाथा लोरिकी है जिसे यहाँ के लोक साहित्यकार डॉ अर्जुन दास केसरी ने अपनी पुरस्कृत कृति लोरिकायन में संग्रहीत किया है . गाँव से बहुत दूर एक पुराने किले में एक दुष्ट जादूगरनी रहती थी जो कि छोटे बच्चों को पकड़ कर खा जाती थी...लेकिन आप जानते हो कि ये कहानी झूठी है कि गाँव के छोर पर एक गरीब की झोंपड़ी थी जिसमें एक सुनहले बालों वाली राजकुमारी रहती थी...उसके बाल खुलते थे तो सूरज की किरनें धान के खेतों पर गिरतीं थीं और गाँव वालों की खेती निर्बाध रूप से चलती थी.

सन 1970 में मैं पिताजी के साथ पहली बार दिल्ली गया था. तब मैं 18 वर्ष का था और दिल्ली-दर्शन के उत्साह से भरा हुआ था. हम चाँदनी चौक के कटरानील में प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ पं. रामधन शर्माजी के यहाँ ठहरे थे. वह पिताजी के परम मित्र और बड़े भाई-जैसे थे. पिताजी प्रतिदिन अपने मित्रों से मिलने चले जाते और मैं दिल्ली-दर्शन के लिए निकल पड़ता; लेकिन जिस दिन पिताजी बच्चनजी से मिलने जाने लगे, मैं भी उनके साथ गया था. 13 विलिंगटन क्रिसेंट संख्यक एक बंगले में उनका निवास था. जीवन एक किताब अधूरी सी ..........आने वाला हर दिन एक कोरा पन्ना हर दिन लिखती हूँ भावों की इबारतें कभी भरती हूँ आशाओं की सरिता प्रवाहों के बीच पड़े बड़े-बड़े पत्थर उनपर जमी वक़्त की काई साथ चलते दो किनारे पेड़ों की घनी कतारें डालियों पर गूंजता पंछियों का कलरव

मेरी यह तीर्थ यात्रा ऐसी रही है जिसमें मैं न तो किसी मन्दिर में गया और न ही किसी देव प्रतिमा के दर्शन किए। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग में यह एक ‘संरक्षित स्मारक’ है (जिसमें प्रवेश के लिए पाँच रुपयों का टिकिट लेना पड़ता है) और पुणे नगर परिषद् की सूची में एक ऐसा ‘दर्शनीय स्थान’ जिसे ‘पुणे दर्शन’ के बस मार्ग में शामिल किया गया है। रुमाल वर्तमान में हमारी जरुरत का सामान बन गया है। ऑफ़िस या काम पर जाने से पहले आदमी हो या औरत रुमाल साथ रखना नहीं भूलते। बच्चा भी जब स्कूल जाता है तो उसकी वर्दी पर माँ पिन से रुमाल लगाना नहीं भूलती। रुमाल का कब क्यों और कैसे अविष्कार हुआ यह बता पाना तो कठिन है। पर सुना है कि फ़्रांस के राजा की बेटी से विवाह करने वाले इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द्वितीय के मन में प्रथमत: रुमाल बनाने का विचार आया। सुनिए सीजी रेडियो में ....

आज के लिए बस इतना ही .. मिलते हैं एक ब्रेक के बाद .....

7 टिप्पणियाँ:

बहुत बढ़िया वार्ता...
आभार संगीता जी..

सादर
अनु

बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स लिये अनुपम वार्ता

आभार आपका

बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स लिये बढ़िया वार्ता...
स्थान देने के लिए आभार आपका...

अच्छी लिंक्स और सी जी रेडियो का गाना सर पर टोपी लाल ----|
बहुत अच्छा लगा यह गाना |
रूमाल का सफर भी |आशा

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