बुधवार, 1 अगस्त 2012

भाई तू जरूर आना... ब्लॉग4वार्ता....संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार...कल भाई-बहन के पवित्र स्नेह का पर्व है, रक्षा बंधन. मुझे सबसे अधिक प्रिय है यह त्यौहार. कल से ही हमारे घर इकट्ठे हो जायेंगे हमारी दोनों छोटी बहने और भाई. बहुत इंतजार रहता है हमें इस दिन का. कम से कम २ या ३ दिन सबकुछ भूलकर दिन भर होंगी बातें, खूब सारी मस्ती और अच्छा-अच्छा खाना. आप सब भी अपनी - अपनी तरह से बाँटिये इस ख़ुशी को अपने परिवार के साथ...  आप सभी को रक्षा बन्धन की अग्रिम शुभकामनायें... प्रस्तुत है,  आज की ब्लॉग वार्ता...

आन्दोलन में शामिल होने वाली भारतीय जनता को टीम अन्ना द्वारा "भीड़" कहना, बहुत ही निंदनीय और अशोभनीय है क्या हम भीड़ हैं  ... क्यों प्रीति की बेल बढ़ाई तब , क्यों विरह की आग लगाई अब , कहें कौन हुआ अपराध है कब , जब साथ रहीं हम उनके तब ? बेचैन करें ये नयन बने कारे बादर ..शब्द मूलतः अरबी भाषा के ‘मौसिम’ से बना है, जिसका अर्थ मोटे तौर पर मौसम या ऋतु निकाला जा सकता है.मानसून ..

एक साँझ सूरज ,अपनी स्वणिम किरणों को समेटे पूरव दिशा की ओर धीरे- धीरे ढलता उम्मीदों का सूर्ख रंग नभ में बिखेरे मानो कह रहा हो … “कल मैं फिर आऊँगा” चौंच में दाना दबाए,घोंसले की ओर उड़ते पंछी दूर से आती मेरे जीवन की एक साँझ ...कुछ असभ्‍य चेहरों ने लगा लिया है नक़ाब सभ्‍यता का हर चेहरे पर है चेहरा कई रूपों में मिलता है यह नक़ाब कुछ की कीमत चुकानी होती है कुछ को छीन लिया जाता है कुछ विरासत में पा लेते हैं कुछ की फितरत होती है ... जो हैं ... "खुद " को जीते हैं . मनाते हैं जश्न हरेक बात का तेरे मेरे साथ का . होते हैं मदहोश खोते हैं होश कर लेते हैं वो सब जो यूँ नहीं मुमकिनजी भर के जी लेते हैं ...

महाकालेश्‍वर के उद्भव के बारे में मान्‍यता है कि भगवान शिव के परम भक्त उज्‍जयिनी के राजा चंद्रसेन को एक बार उनके शिवगणों में प्रमुख मणिभद्र ने तेजोमय 'चिंतामणि' प्रदान की भगवान महाकाल के ये रूप आपने नहीं देखे होंगे  अनासक्त जब बाह्य वस्तु में, तब आत्मिक आनन्द है होता. अक्षय सुख वह प्राप्त है करता, स्वयं ब्रह्म में युक्त जो होता. (२१) स्पर्शजनित भोग दुःख कर्ता, आदि अंत उनका श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद...राधा से तो प्रीत पुरानी थी अगले दिन राधा दधि बेचने जब गयी नन्द के मकान के इर्द गिर्द डोलने लगी बावरी बन सबसे मोहन का पता पूछने लगी किसी ने देखा है कृष्ण लीला...

ये कहानी मैंने रचनाकार.ऑर्ग "कहानी लेखन प्रतियोगिता" के लिए लिखी है.ये मेरी पहली कहानी है इसलिए कमियां लाजमी हैं मेरी पहली कहानी... बहुत से लोगों के मत में अन्ना टीम तानाशाही कर रही है, और बाबा रामदेव के आन्दोलन में विघ्न भी उत्पन्न करती है और भारत स्वाभिमान के प्रयासों का लाभ स्वयं ले निंदा करना ज़रूरी है क्या ? ...  जीने की चाहत ना मरने की फुर्सत, गुजरेगी कैसे ज़िन्दगानी हमारी. अदावत किसी से ना कोई गिला, है बस यही एक खासियत हमारी. भला न किया तो बुरा भी ना करना खासियत हमारी...

ये कैसे अपने कि अब तक रू-ब-रू भी न हुए, लेकिन अब तो बहुतेरे अपने जाने-पहचाने नाम, लिखे-उचारे शब्‍दों और चित्र के परोक्ष-यथार्थ से ही 'मूर्तमान' होते हैं। '.ब्‍लागजीन ...स्वलिखित रचनाओं को नियमितरूप से अपने हिन्दी ब्लॉग, ‘जाले’ में डालते हुए एक वर्ष पूरा हो गया है. इसके पीछे प्रेरणा मेरी बेटी गिरिबाला जोशी रही हैमेरे ब्लॉगिंग का एक वर्ष ...  प्यार के गहनतम क्षणों में तुम्हारे और मेरे बीच कुछ शब्द होते हैं जो एक सेतु बनाते है मुझे तुम तक और तुम्हे मुझ तक पहुँचाने के लिए फिर सेतु विलीन हो जाता सार्थक -निरर्थक ...

तू किस सोच मे डूबी है माँ ! मुझको शरण दे या मरण दे ! यही ना ! कितने युगो से निर्वासन की मार, मैं सहती रही, और.... अपने अंत तक फिर भी तेरा वंदन  तू किस सोच मे डूबी है माँ ! ... छोटी छोटी बातों से बनती हैं बड़ी खुशियाँ खुशियों का दामन थामे ही चलती है ये दुनिया वक़्त के समंदर में डूबकर कुछ नहीं मिलता डूबकर, उभरने से बनी है कई कहानियाँ नियति ... पहले बारिश की छीटें खटखटाती... तो हवा खोल दिया करती थी खिड़कियाँ... सब चाल थी तुम्हें खिड़की तक लाने की....अब ये खिड़कियाँ बंद रहती हैं ... है तड़पना मेरी मिल्कियत, तुझे छोड़ना है शराफ़त ।* * * *चाहता था की बनी रहे, दरमियाँ हमारी ये उलफ़त मेरी मिल्कियत ...

जब भी रक्षा -बंधन पास आता जाता है मन भीगा सा , भारी सा होता जाता है ...... राखी के बाज़ार में आवाजें कानो को नहीं दिल को लगती है ....... बहने कितनी प्यार से राखी लेती है , देख कर उनके लिए ख़ुशी और भाई ... भाई बहन का ये पवित्र त्यौहार पुरे भारत वर्ष में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है |बहने अपने भाई की कलाई पर राखी (रक्षा कवच )बाँधती हैं | ये कवच है भाई बहन का पवित्र बंधन ... बचपन में कहती थी,चंदा है वीर मेरा,नहीं समझती थी तब...चाँद दिखता तो रोज है, पर होता दूर है, अब समझती हूँ...कोई पास होकर भी दूर कैसे होता है, तू कभी इस चाँद सा मत होना तू जरूर आना....

एक व्यंग चित्र 

यहाँ मिलेगा खज़ाना ढूंढिए तो जरा... मुझे दीजिये इज़ाजत  मिलते हैं अगली वार्ता में तब तक के लिए  नमस्कार .....
चलते-चलते मेरी पसंद का एक गीत 

8 टिप्पणियाँ:

र्क्शाबंदाह पर शुभ कामनाएं |अच्छी लिंक्स और यह गाना |
आशा

रक्षाबंधन का पवित्र त्यौहार आ रहा है ! आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ! 'उन्मना' से मेरी माँ की रचना 'ये नयन बने कारे बादर' के चयन के लिए धन्यवाद ! सभी लिंक्स पठनीय प्रतीत होते हैं ! बिजली की कृपा रही तो आज दिन भर के लिए सुन्दर सूत्र आपने दे दिए हैं !

वाह। आज दिन भर के लिए खूब सामग्री मिल गई।

वाह ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

अच्‍छी वार्ता ..

सुंदर व्‍यंग्‍य चित्र ..

और बहुत ही मधुर गीत ..
आपका आभार संध्‍याजी !!

बहुत ही सुन्दर सूत्र..

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