शनिवार, 8 सितंबर 2012

सच में बहुत कठिन है बिटिया की माँ होना... ब्लॉग4वार्ता....संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार... दुनिया-जहान, परिवार-समाज की कोई बात ना करते हुए सीधे चलते हैं,  आज की ब्लॉग वार्ता पर.  आज आपके लिए लाए हैं, कुछ खास अंदाज़ से सजाकर इन लिंक्स के फूलों को और बनाया है एक सुन्दर सा गुलदस्ता ..........

देखना एक दिन लेके दिल की इल्तजा हम आसमां तक जायेंगे क्योंकि इत्तफाकन   वो पांवों में बैठ के, सिर के ताज बन गए हम जुबां पे रहे, बस  तोरी ये कारी ..कजरारी ....मतवारी .... अंखियाँ  झील सी ...गहरी ..... बदरा सी नीर भरी .. सावन सी भीगी ... मृग सी चंचल तू अंतर को प्रेम से भर ले व्यर्थ ही तू क्यों चिंता करता तेरे लिए तो मैं हूँ ना...

अरमानों की लाशें कितनी, ढो रहा है आदमी मायूसी के भँवर में  कहाँ खो गया है आदमी ?   परिस्थितियों के चक्रव्यूह भेदने की जद्दोजहद में ..... कभी 'वह' - लगभग हारा हुआ जीवन चक्र के अभिमन्यु  की तरह। दुःख दर्द साझा करने की बातें बातें भर रह जाती है जब शून्य हो जाती हैं संवेदनाएं किसी की पीड़ा देखकर तब आभास होता है कि पीड़ा तो व्यक्तिगत ही होती है ...

प्रेम का इतिहास,जुगराफिया फिजिक्स,केमिस्ट्री कुछ नहीं पता. जानती हूँ बस इतना कि जब वो नहीं होता तो सब बेस्वाद हो जाता है. किसी काम में मन नहीं रुचता कुछ भी अच्छा नहीं लगता।  सच में बहुत कठिन है बिटिया की माँ होना एक पतंग के मानिंद है आशाएं मेरी लाडली की... कोमल और चंचल और तुमने हर बार मुझे पुकारा क्षितिजा ...

जब की जीवन का ही पता नहीं  कौन जाने पहले तुम हमारे मन मंदिर में दूर तक समाये थे तुम्हें मेरा मन बार बार नमन करता था किसे बदलना चाहिए  आखों ही आखों में सज़ा सुना गया कोई, ख़ामोशी से अलविदा कह के हाथ छुड़ा गया कोई, मैंने भी ख़ामोशी से किया था इज़हार-ए-मोहोब्बत लगता है आप और हम -- हम उम्र हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते और मंजिल अभी दूर... है ....

नाम में क्या रखा है ? शेक्सपीयर के प्रख्यात प्रेम-कथानक की नायिका जूलियट के मुँह से रोमियो के लिए निकला यह जुमला इस क़दर मक़बूल हुआ कि आज नाम में ही धरा है सब-कुछ ऊल्लूक का निठल्ला चिंतन कभी आपको यहाँ अब अगर दिख जायेगा मत घबराइयेगा रात को भी देखता हो आँख जो थोड़ा बहुत दिन में दिख भी गया उड़ता हुआ कहीं कुछ नहीं कर सकता अब  उल्लू बदल गया है, फिर मैंने ऊंट से कहा कि रेगिस्तान की धूल का कोई ठिकाना तो होता नहीं फिर किसलिए हम दोनों यहीं पर बैठे हुए अच्छे दिनों का इंतज़ार करें. ऊंट ने कहा कि  वे फूल खिले नहीं, उस रुत  को जो ला सकें ...  

चलते -चलते देखिये आज दो कार्टून .....



 


 

आज के इतना ही फिर मुलाकात होगी अगली वार्ता में तब तक के लिए नमस्कार ..............

11 टिप्पणियाँ:

बढ़िया लिनक्स .... शामिल करने का आभार

bahut badhiya varta ...meri rachna ko shamil karane ka abhar ...

सच में पठनीय सामग्रियाँ
मेरे लिये महत्वपूर्ण लिंक्स
साधुवाद

बढिया लिंक्स
अच्छी वार्ता

बहुत सु्न्दर लिंक्स

सुन्दर प्रस्तुति संध्या जी....
मेरी रचना शामिल करने का शुक्रिया......

लिंक्स देखती हूँ अब...
आभार
सस्नेह
अनु

बहुत सु्न्दर लिंक्स..........

बहुत सुन्दर लिंक्स...
बेहतरीन वार्ता....

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