बुधवार, 1 दिसंबर 2010

आज मैने जिन चिट्ठों को पढा .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , अत्‍धिक व्‍यस्‍तता के बावजूद मैने इन चिट्ठों को पढा , इनके लिंक के माध्‍यम से आपलोग भी इन चिट्ठों तक पहुंच पाएंगे .... 


जीवन में अकस्मात ऐसे क्षण आ जाते हैं जब पूर्वनिर्धारित कार्यों को टालना पड़ता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुया। परिणाम स्वरूप इस ब्लॉग पर पहली बार इतना लम्बा व्यवधान आया।
सबसे पहले तो आकस्मिक परिस्थितियों के कारण नवम्बर माह में छूट गए इन ब्लॉगर साथियों को दीजिए बधाई .....

खैर। नवम्बर माह में छूट गए ब्लॉगर साथियों के अवसर इस प्रकार थे।


डा.कलाम से एक मुलाक़ात....मेरी नहीं ...मेरी ममता भाभी की ........

अपनी ममता भाभी का  जिक्र मैं कई बार अपनी पोस्ट में कर चुकी हूँ...लेखन की दुनिया में वापसी उनके सतत प्रोत्साहन से ही संभव हुआ. अपने पहले ब्लॉग का नाम...उसका परिचय सब ,पहले उन्हें ही दिखाया...उनके आश्वासन पर ही मूर्त रूप दिया उसे . वे लगातार मेरा उत्साह -वर्द्धन करती रहती हैं. पहले तो नियमित टिप्पणियों के माध्यम से भी अपने विचार बताती रहती थीं. पर आजकल वे काफी व्यस्त हैं

"चरण-कमल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")........

हैं पूजनीय कोटि पद, धरा उन्हें निहारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।


चरण-कमल वो धन्य हैं,
समाज को जो दें दिशा,
वे चाँद-तारे धन्य हैं,
हरें जो कालिमा निशा,
प्रसून ये महान हैं, प्रकृति है सँवारती।
सराहनीय शूद्र हैं, पुकारती है भारती।।


बचपन की यादे - वह लहडू का सफ़र.......


समय का आभाव है बच्चे बारह महीने पढ़ते है ट्यूशन और कोचिंग हमेशा चालू रहती है इसलिए लम्बी छुट्टियों में भी घर पर ही रहकर कम्टीशन की तैयारी में जुटे रहते है बच्चे माँ बाप सहित . 

एक ज़माना हमारा था . स्कूल की छुट्टी का मतलब होता था पढ़ाई से छुट्टी . गर्मियों की छुट्टी में जब दो महीने स्कूल बंद रहते थे उस समय शायद ही कोई बच्चा अपने घर में रहता था सब नानी  के घर जरूर जाते थे . मैं तो जाता ही था . वह दिन आज याद  आ रहे है .

बेचारा मर्द… कब आयेगा हैप्पी मैन्स डे..(Happy Men’s Day)......

हमारे एक मित्र ने एक मैसेज दिया वही हिन्दी में लिख रहा हूँ।
बेचारा मर्द..
अगर औरत पर हाथ उठाये तो जालिम
औरत से पिट जाये तो बुजदिल
औरत को किसी के साथ देखकर लड़ाई करे तो ईर्श्यालू (Jealous)
चुप रहे तो बैगैरत
घर से बाहर रहे तो आवारा
घर में रहे तो नकारा

ब्लॉग जगत अब एक परिवार न हो ऐसा मोहल्ला बन गया है जहां अधिकाँश दूसरे को फूटी आँख देख नहीं सुहाते ....


चाहे हम लाख कहें पर सच्चाई यही है कि ब्लाग जगत एक परिवार ना हो कर एक मध्यम वर्गीय मोहल्ला है। जो तरह-तरह के स्वयंभू उस्तादों, गुरुओं, आलोचकों, छिद्रान्वेषियों का जमावड़ा होता जा रहा है। जहां एक दूसरे की टांग खीचने या नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता। मुस्कान की नकाब तो सबके चेहरे पर है पर बहुतों का अधिकांश समय अपने नाखूनों को तीक्ष्ण करने में जाया जाता है।


पहले ख़ुशी , फिर ग़म --हाईपरथायरायडिज्म------

परम आदरणीय डॉ. टी एस दराल जी
प्रणाम !
आशा है, श्रद्धेय पिताश्री के बिछोह के दुःख से उबरने का क्रम जारी होगा ।



अब फिर से दैनिक क्रिया क्रीड़ाओं में मन रमाएं … छोटे भाई के नाते यही निवेदन है …
शुभकामनाओं सहित
राजेन्द्र स्वर्णकार

हालाँकि मन तो नहीं था , लेकिन अनुज राजेन्द्र स्वर्णकार के विनम्र निवेदन ने समय से पहले ही लिखने पर मज़बूर कर दिया । ऐसे में और क्या लिखता , इसलिए जो काम कर रहे हैं , उसी पर लिख रहा हूँ ।

आज की कुछ खासमखास बकबक ....अरे नहीं बकर बकर कहिए........

DDA के फ़्लैट्स के लिए आवेदन पत्र की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है ...सुना है कि इस बार का सिलेबस बहुत अलग कर दिया है ..पच्चीस पेज के उस बुकलेट को समझने के लिए ..हमने पच्चीस दिन का क्रैश कोर्स ट्यूसन ..शुरू किया है ..on.first come bais....जल्दी करें ..



कौन सी है यह दुनिया
कि जिसमें इतना आराम है
ना कोई गृहस्थी की चिंता
ना ही कोई काम है

यहाँ घर की कोई कलह नहीं
ना काम को लेकर हैं झगड़े
ना महीने के राशन की फिक्र  
ना ही बिल यहाँ आते हैं तगड़े

ब्लागजगत : जबलपुर में अब एक और ब्लागर मिलन ....

इस तरह से मंजिल ए मकसद तक पहुंचे
जब सबने हमसफ़र को अपना समझा


एक समय था प्रचार प्रसार के लिए कोई साधन नहीं थे . लोगों को अपने विचार दूर दूर तक पहुँचाने के लिए अपने विचार अखबारों में प्रकाशित करने के लिए भरी मस्सकत करना पड़ती थी . संपर्क स्थापित करने के लिए संचार साधनों का अभाव था . इंटरनेट युग की शुरुआत के साथ संचार साधनों में जबरजस्त क्रांति हुई . आज हम देश और विदेशों में त्वरित गति से अपने विचार संप्रेषित कर सकते हैं पर अपने विचारों के परिपेक्ष्य में अन्य दूसरे व्यक्ति की टीप/अभिव्यक्ति जान सकते हैं .

वर्ष-२००८ में मैं कुछ ऐसे ब्लोग्स से रूबरू हुआ जिनमें विचारों की दृढ़ता स्पष्ट दिखाई दे रही थी । मुझे उन चिट्ठों की सबसे ख़ास बात जो समझ में आयी वह है पूरी साफगोई के साथ अपनी बात रखने की कला । ब्लॉग चाहे छोटा हो अथवा बड़ा , किसी भी पोस्ट ने मेरे मन-मस्तिस्क को झकझोरा, उसकी चर्चा आज मैं करने जा रहा हूँ -

घोटाले ही घोटाले ........ घोटालेबाजों की पौ-बारह !.....

भ्रष्टाचार : कठोर दंडात्मक कार्यवाही अंतिम विकल्प !

भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसके समाधान के लिए शीघ्रता  तत्परता से उपायतलाशे जाना अत्यंत आवश्यक हो गया है यदि इस समस्या पर गंभीरता पूर्वकविचार-विमर्श नहीं किया गया और समाधान के कारगर उपाय नहीं तलाशे गए तो वहदिन दूर नहीं जब त्राही माम - त्राही माम के स्वर चारों ओर गूंजने लगें। भ्रष्टाचार मेंलिप्त नेता-अफसर सारी मर्यादाओं का त्याग कर एक सूत्रीय अभियान की भांतिलगातार भ्रष्टाचार के नए नए कारनामों को अंजाम देने में मस्त हैंसही मायने मेंकहा जाए तो अब अपने देश में भ्रष्टाचारी लोगों का कोई मान-ईमान नहीं रह गया है जोदेशप्रेम  आत्म सम्मान की भावना से ओत-प्रोत हो। 

बेबस बेकसूर ब्‍लूलाइन बसें.......

क्या आपके पास एक आदर्श मित्र है ? -- श्रीकृष्ण जैसा ......

पिछली पोस्ट पर पाठकों के विचार पढ़े । कुछ ने लिखा , हमें अपने दुःख मित्रों के साथ कह लेनेचाहिए , नहीं मन व्यथित रहेगा , बोझ कम नहीं होगा। डिप्रेशन हो सकता है , आदि आदि। 


प्रश्न यह है , की क्या हमारे पास मित्र हैं भी ? जिन्हें हम मित्र कहते हैं अथवा समझते हैं क्या वोवास्तव में हमारे मित्र हैं। 'मित्रशब्द का व्यवहार बहुत ही व्यापक अर्थों में उपयोग होने केकारण ये शब्द अपनी महिमा खो चुका है। हम अपने परिचितों [acquaintancesकोआवश्यकतानुसार 'मित्रकहकर ही संबोधित करते हैं। लेकिन ये सिर्फ हमारे परिचित हैं , मित्रनहीं। संस्कार और शिष्टाचारवश हमारे आपसी सम्बन्ध मधुर होते हैं। ऑपचारिक अवसरों औरविषयों पर हमारे बीच संवाद , एक मित्रता का एहसास कराता है । लेकिन 'मित्रवतहोने और'मित्रहोने में बहुत अंतर है 


समानता का अर्थ यानी मुक्ति रुढिवादी सोच से क्योकि जेंडर ईक्वलिटी इस स्टेट ऑफ़ माइंड ........

अगर महिलाए समानता की बात करे तो उन्हे अपने अभिभावकों से इन अधिकारों के विषय मे सबसे पहले बात करनी चाहिये
१ जब आपने हमे इस लायक बना दिया { पैरो पर खड़ा कर दिया } की हम धन कमा सकते हैं तो हमारे उस कमाये हुए धन पर आप अपना अधिकार समझे और हमे अधिकार दे की हम घर खर्च मे अपनी आय को खर्च कर सके । हम विवाहित हो या अविवाहित पर हमारी आय पर आप अधिकार बनता हैं । आप की हर जरुरत को पूरा करने के लिये हम इस धन को आप पर खर्च कर सके और आप अधिकार से हम से अपनी जरुरत पर इस धन को खर्च करे को कह सके।


बजट तीन करोड़, इनाम एक हजार ........

छत्तीसगढ़ राज्य खेल महोत्सव के लिए सरकार ने तीन करोड़ का बजट मंजूर किया है। इतने बड़े बजट के बाद भी राज्य स्तर की स्पर्धाओं के लिए महज एक हजार रुपए की इनामी राशि पर खेल बिरादरी में चर्चा हो रही है कि आखिर ऐसे आयोजन से किसका भला होगा। राज्य स्तर के आयोजन की तुलना अभी से रायपुर जिले में हुए आयोजन से की जाने लगी है। रायपुर जिले के आयोजन में खिलाडिय़ों को करीब ८ लाख रुपए का नकद इनाम दिया गया था, जबकि राज्य स्तर के आयोजन में बमुश्किल पांच लाख की ही इनामी राशि बंटेगी। 


भोलू प्रतिदिन की भांति उस दिन भी अपने ईष्ट देव पर चढ़ाने के लिए फूल लेने घर से निकला था। आहाता पार कर सड़क के पास पहुंचा ही था कि उसे सड़क के इस पार काफी भीड़ दिखाई दी। उस पार फुटपाथ पर मालन बैठती है, जिससे वह फूल लेता है। उसका यह प्रतिदिन का नियम है। पर आज वह जाए तो कैसे जाए ? सड़क के किनारे की भीड़ तो रास्ता रोके खड़ी है ही ऊपर से पुलिस भी डंडा लिए लोगों को सड़क पार जाने नहीं दे रही है। भोलू ने वहां खड़े एक व्यक्ति से पूछा, “माज़रा क्या है...।” वह व्यक्ति भी थोड़ी ठिठोली करने के मूड में था, .... बोला “हमारे माई-बाप, मतलब...मेरे कहने का मंतरी जी आ रहें हैं।

अब लेती हूं विदा , मिलती हूं एक ब्रेक के बाद .....

6 टिप्पणियाँ:

संगीता दीदी ... बहुत बढ़िया वार्ता लगाई है आपने ...आभार !

बढ़िया वार्ता --आभार !

सभी लिकंस एक से बढकर एक हैं धन्यवाद
dabirnews.blogspot.com

अच्छे लिंक्स ...
इनमे से कई बिना पढ़े रह गए थे ...!

अच्छी पोस्ट,सुन्दर प्रस्तुति !

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