प्रिय ब्लागर मित्रों, इस वार्ता मंच पर मुझे देखकर आपको आश्चर्य हो रहा होगा? असल मे शुरुआत से ही श्री ललित शर्मा का आग्रह था कि मैं उनके इस वार्ता मंच से वार्ता करूं. पर मुझे वार्ता करना सहज नही लगता और ना ही मैं इस काबिल हूं कि इस विधा के साथ न्याय कर पाऊं. अत: प्रत्येक गुरुवार को यह स्तंभ "ताऊ की नजर से" शुरु कर रहा हूं. जिसमे मैं आप में से ही किसी ब्लागर मित्र की मेरी पसंद की कुछ पोस्ट्स का जिक्र करुंगा और साथ ही कुछ एक दो छोटे से सवाल जवाब होंगे.
आशा है यह प्रयास आपको पसंद आयेगा. आईये इस स्तंभ की शुरुआत करते हैं श्री अरविंद मिश्र से
-ताऊ रामपुरिया
ताऊ की चौपाल मे आपका घणा स्वागत सै भाई. इब भाई के सुणाऊं...मैं तो कलेवा करके हुक्का पीण लागरया था और म्हारा यो राम का प्यारा "रामप्यारे उर्फ़ प्यारे" मेरे सामने लेपटोप लेके बैठग्या और घणी जिद करण लाग ग्या और नू बोल्या - ताऊ मैं तो इस ब्लाग की दुनिया म्ह नया नया सूं और तू हो लिया पुराणा पापी..तो इब तू मन्नै जरा इसके बारे मे कुछ बता. इब मैं भी लेपटोप खरीद ल्याया और ब्लागिंग शुरु करुंगा.
मैं बोल्या - भाई रामप्यारे तेरी यो बात तो घणी सुथरी सै. तो बूझ भाई प्यारे...तन्नै के बूझणा सै?
प्यारे : ताऊ नू बता अक तेरी पसंद के सै?
ताऊ : अरे...बावलीबूच रामप्यारे....मन्नै तो लाड्डू जलेबी घणै पसंद सै...खुवावैगा के?
प्यारे : अरे ताऊ...वो खाण पीण वाली पसंद नही...ब्लाग की पसंद ...यानि कुणसे ब्लाग तन्नै पसंद सै? बस उणके बारे म्ह ही बताता चल...जिसतैं मैं उनको पढ्या करूंगा...
ताऊ...अरे तो बावली बूच नू बोल ना...अक तन्नै चिट्ठो के बारे मे बूझणा सै? तो भाई मन्नै तो भतेरे चिट्ठे पसंद सैं...पर इब तू बूझले कि .... तन्नै कौण से ब्लागर के बारे म्ह बूझणा सै?
रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" : तो आज सबतैं पहले मन्नै यो अरविंद मिश्र जी के बारे मे बता जो आजकल केरल यात्रा के संस्मरण लिख रहे हैं...
ताऊ : अच्छा...अच्छा...वो अपणे बनारस आले मिसिर जी?
"प्यारे" : हां ताऊ, बिल्कुल वोये..मिसिरजी के बलाग के बारे में बता मन्नै...
तो सुण भई प्यारे.....ये हैं 52 साल के नौजवान अरविंद मिश्र जी, घणे पढे लिखे और अफ़सर आदमी सैं...पर भाई यो आदमी मन का घणाई सुथरा सै..इणकै जो बात मन म्ह रह सै वो ही बात जबान पै रहा करै सै......और आज तन्नै मैं इनकेक्वचिदन्यतोअपि..... ब्लाग की कुछ मेरी पसंद की पोस्टों के बारे मे बताऊंगा. जरा दिमाग लगा के सुण..
"प्यारे" : हां सुणा ताऊ...मैं लेपटोप पै नोट करता जाऊंगा.
तो ले करले नोट....
परिणय के वर्ष हुए आज उनतीस ना कोई खटपट हुई ना रिश्ते छत्तीस .....
सुधियों के वातायन में उनतीस वर्ष पीछे लौटता हूँ -इलाहाबाद विश्विद्यालय के ताराचंद छात्रावास में था उन दिनों एक शोधार्थी ..पिता जी ने लडकी देखी और शादी तय कर दी बिना मुझसे जाने बूझे ,पूंछे पछोरे ....मैं कुछ स्पष्ट नहीं था इन मामलों में -मुझे महज फोटो दिखाई गयी -न भी दिखाई गयी होती तो भी इनकार थोड़े ही करता -माँ बाप बच्चों के दुश्मन थोड़े ही होते हैंउनतीस वर्षों के अहसास डिनर के साथ साथ
-और मैं इन बातों को कभी उतनी गंभीरता से लेता भी नहीं था -क्योंकि साधारण सा एक गवईं संस्कार का युवक था -मगर बहुत सांसारिक बातों में मेरा मन न तब लगता था और न आज ही ..आज भी मेरा एक अंतर्जगत है तब भी था ....उसे केवल खुद से ही साझा करना होता है -वही आत्म शक्ति देता है दुनियावी बातों ,रीति रिवाजों ,बिडम्बनाओं और परिस्थितियों से समंजन स्थापित करने का -मेरे जैसे अंतर्जगतीय जीवन में जीने वाले लोग पलायनवादी भी हो जाते हैं मगर तमाम असफलताओं और दुनियावी जीवन के धोखे खाने के बाद भी पलायन मैंने नहीं सीखा -और यहीं भूमिका में अवतरित होती हैं संध्या मिश्र (पहले शुक्ल ) ,मीरजापुर शहर के स्वतन्त्रता सेनानी श्री विद्यासागर शुक्ल की बेटी और मेरी १९८१ से सहचरी ..
और भई प्यारे यो ले अगली पोस्ट भी नोट करले........
जैसे अदाकारा ,शायरा वैसे ब्लागरा/चिट्ठाकारा क्यों नहीं?
तो अब यह विषय खुली चर्चा के लिए रख रहा हूँ -इस ब्लागमानस में तो नीर क्षीर निर्णय हो ही जायेगा . न जाने क्यूं मुझे ब्लागरा शब्द से अचानक ही इतना नेह क्यूं हो गया है -कई उदित और उदीयमान नारी ब्लागरों के नाम के आगे पीछे इसे जोड़कर देखने पर कुछ के साथ तो यह खूब फब भी रहा है ! शायरा शायरा सा कुछ! भले ही व्याकरण के लिहाज से यह गलत हो मगर एक काव्यमय सौन्दर्य तो इसमें निश्चित तौर पर है -विश्वास न हो तो मेरी टेक्नीक इस्तेमाल कर देख लें! अगर हम आगे किसी महिला ब्लॉगर का तआर्रुफ़ करते वक्त यह कहेगें कि लीजिये मिलिए मोहतरमा से.... ये हैं एक मशहूर ब्लागरा ......तो कितना अच्छा लगेगा! हैं ना ?
और भई राम के प्यारे ...रामप्यारे यो एक और पोस्ट पढले जरा मिसिर जी की ई मुई पी एच डी जो जो न कराये !
एक आधुनिक कहावत : किसी भी विश्वविद्यालय के परिसर में एक ढेला -पत्थर ऐसे ही उछाल फेकिये वह किसी कुत्ते को लगेगा या फिर किसी पी एच डी डिग्री धारक को ...
जाकिर :ओह हो हो हो हो .....
मैं : अब इसे भी सुन ही लीजिये -
बात अमेरिका की है ! एक घुड़दौड़ के प्रेमी रईस को उसके दोस्तों ने यह कहकर दुखी कर दिया कि उसके पास समृद्धि ,ऐश्व्यर्य सब कुछ है बस एक पी एच डी की डिग्री की कमी रह गयी है ..और बिना पी एच डी की डिग्री के यह ऐश्वर्य भी कुछ अधूरा अधूरा सा लगता है । यह सुन उस रईस को धक्का सा लगा .मगर उसने तुंरत प्रतिवाद भी किया -" मेरे घोडे को भी तो यह डिग्री नही मिली है ...कितना प्यार करता हूँ मैं उससे ! तो पहले मैं क्यों न उसी को पी एचडी दिलवाऊँ ? "
"रामप्यारे" : वाह ताऊ ...मजा आगया मिसिर जी कि पोस्ट पढके तो...इब और आगे बताओ...
ताऊ : अरे को बावलीबूच...प्यारे...तन्नै मजा तो घणा आरहा है...पर तू सारी की सारी पढकै मन्नै बताईये...और यो संभाल अगली पोस्ट....उर्वशी -पिता जी की एक कविता !
विवशता की इस चिता पर इन्द्रधनुषी स्वप्न जलते
प्रणय के इतिहास मिटते बन्धनों के बंध हसते
रूप यौवन साधना का दुखद परिणति घुटन ही है
प्रेम और श्रृंगार का अभिशप्त संगम जलन ही है (2 )
सर्वगुण संपन्न होकर उर्वशी साधन बनी क्यों
संगीत की देवी न जाने विषय की प्रतिमा बनी क्यों
कोटि उर मे बस रही जो ह्रदय अपना रिक्त रखती
इन्द्र की आराधना में साधना को भ्रष्ट करती (३)
"रामप्यारे" बोला : वाह ताऊ मजा आगया अरविंद मिश्र जी को पढकै तो...इब मन्नै.....(ताऊ बात को बीच मे काटते हुये बोल पडा).....अरे ओ बावलीबूच प्यारे....तन्नै तो मजे आरे सैं...और मेरा हुक्का ठंडा पडा सै..जा जरा जाकै हुक्का भर के ल्या...
रामप्यारे : ताऊ इबी ल्याया...हुक्का भरके...फ़िर मन्नै अगले ब्लागर के बारे मे बता...
ताऊ : अरे "रामप्यारे" इब आज इतना ही घणा सै...अगले ब्लागर के बारे मे इब अगले सप्ताह बात करेंगे.....और इब तू भी रोटी राबडी और घंठी का कलेवा कर ले....और सुणिये जरा...पहले वो अरविंद मिश्र जी को फ़ोन मिला के दे मेरे को...जरा सीधी भिडंत करनी सै....
"रामप्यारे" : ले ताऊ, मिश्रजी लेण पै बाट देख रे सैं...बात करले...

ताऊ से सीधी भिडंत टैलीफ़ून पै
अरविंद मिश्र : ताऊ , सवाल सुनने में तो बहुत सहज सरल हैं लेकिन जवाब देने में में बहुत मुश्किल ..फिर भी यह कहना चाहूंगा कि एक सशक्त अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में ब्लागजगत ज्ञात और अद्यावधि अज्ञात, न जाने कितनी संभावनाओं से भरा पडा है .यह अभिव्यक्ति के आयामों को नयी ऊचाईयां देने को उद्यत है .मैं ब्लॉग जगत को आत्माभिव्यक्ति के एक नए और अब तक के एक सबसे सशक्त और निरंतर समर्थ हो रहे दुतरफा माध्यम के रूप में लेता हूँ .
ताऊ : मिश्रजी, एक छोटा और सीधा सा सवाल और है कि "ब्लाग जगत में सामंजस्य स्थापित करने के लिये आप क्या आवश्यक कदम सोचते हैं?"
अरविंद मिश्र : जहां जीवित कौमें अपने झंडे गाड़ चुकी हों वहां नियमन की बात करना थोड़ी मुश्किल है -अभी तो जगह कब्जियाने का शुरुआती कौआ रोर मचा हुआ है -जगह को लेकर छीना झपटी चल रही है -फिर नीड़ निर्माण शुरू होगा और शांति निखरेगी ....हाँ चील -बाज तो रह रह झपटते ही रहेगें क्योकि यह उनका स्वभाव है -अक्सर सामंजस्य बढ़ाने के घोषित उद्येश्य से किया गया प्रयास उलट -प्रभाव ले आता है -हम सब जो भी अपने को इस ब्लॉग -सरोकार से जुडा पाते हैं -चुपचाप अपने तई योगदान देते रहें -हाँ नए लोगों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है -उन्हें प्रेरित किया जाना चाहिए .आईये हम यथासंभव नए ब्लागरों को प्रेरित करें जो अच्छा कर रहे हों ....हाँ धर्मिक उन्मादियों को कडाई से कुचलने की भी जरूरत है ....उनका रिफार्म करते करते बहुत देर हो जायेगी ! बस और अधिक क्या ?
ताऊ : धन्यवाद मिश्रजी, आपने हमारे सवालों के सीधे और सहज उत्तर दिये. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.
हां तो प्यारे ब्लागर गणों अब अगले सप्ताह फ़िर आपमें से ही किसी एक ब्लागर से हम सीधी भिडंत करेंगे. हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा? अवश्य बतायें. अगले सप्ताह तक के लिये ताऊ और रामप्यारे की तरफ़ से रामराम.
सभी पाठको को सूचित किया जाता है कि आज की पोस्ट पर जिसकी भी टिप्पणी सार्थक और विचारोतेजक पायी जायेगी उस चयनित टिप्पणीकर्ता को आज की पोस्ट के चर्चित ब्लागर श्री अरविंद मिश्र के कहानी संकलन "एक और क्रौंच वध" की स्वयं उनके द्वारा -हस्ताक्षरित प्रति भेंट स्वरूप भेजी जायेगी.




