सोमवार, 7 जून 2010

सोरेन कीर्केगार्ड के अनमोल वचन ..... ब्‍लॉग 4 वार्ता .... संगीता पुरी

अपने दिल्‍ली यात्रा की वजह से पिछले कई सप्‍ताह से मैं यानि संगीता पुरी वार्ता न कर सकी ,आज हिंदी ब्‍लॉग जगत में बहुत सारे सद्विचार प्रकाशित किए गए हैं , इन्‍हें न सिर्फ पढा जाना चाहिए , वरन् अमल भी किया जाना चाहिए। निशांत मिश्र जी ने  अपने ब्‍लॉग पर 

सोरेन कीर्केगार्ड के अनमोल वचनों का पोस्‍ट लगाया है .......





वे 

डेनमार्क के दार्शनिक और रहस्यवादी थे. बीसवीं शताब्दी के चिंतकों पर उनके दर्शन का गहन प्रभाव पड़ा है. उन्होंने मानव जीवन और इसकी प्राथमिकताओं, अनुभवों, अनुभूतियों, संकल्प, और विकल्पों के क्षेत्र में बेजोड़ काम किया है. उनके प्रसिद्द वचनों को मैंने यहाँ आपके लिए अनूदित किया है:

Patience(धैर्य)और Sense(विवेक)एक दूसरे के पूरक है, मगर जहां Patience दिखाने वाला उसे जरूरत से ज्यादा दिखा रहा हो,समझ लीजिये कि उसमे Sense की कमी है! 

मन क्या है, मन आत्मा का एक अदभुत स्वरूप है जो हमारे मस्तिष्क में चलायमान अर्थात क्रियाशील है, मन ही शरीर के आंतरिक स्वरूप तथा प्रकृति रूपी बाहरी स्वरूप के बीच की कडी है, जो हमें दोनो रूपों का साक्षात बोध कराता है।

मन ही हमें प्रत्येक वस्तु के महत्व को समझाता है, इच्छाएं जागृत करता है, भ्रम पैदा करता है, लालच जाग्रत करता है, प्रायश्चित कराता है, आत्मा-परमात्मा की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है और जब आप जाने लगें तो जाने से रोकता भी है।



  • सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनो को प्यार करता है। यही हमारी प्रकृति की पहली दुरूह ग्रंथि और विरोधाभास है।- श्री अरविंद
  • सत्याग्रह की लड़ाई हमेशा दो प्रकार की होती है। एक जुल्मों के खिलाफ़ और दूसरी स्वयं की दुर्बलता के विरुद्ध।- सरदार पटेल
  • कष्ट ही तो वह प्रेरक शक्ति है जो मनुष्य को कसौटी पर परखती है और आगे बढ़ाती है।- सावरकर    
जब सत्कर्मी व्यक्ति को असह्य कष्ट हो,

तो समझना चाहिए कि

ईश्वर शीघ्र ही उस पर कृपा करने वाला है

यह बात मैंने साक्षात् अनुभव की है


-टीकमचंद वारडे


ईमानदार आदमी ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है ।


पोप
ईमानदार आदमी ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है ।


इस लेख को इसके पहले भाग से आगे बढ़ाते हैं, इस लेख के पहले भाग में मैंने लिखा था,संगत का प्रभाव पड़ता है, अगर किसी की कोई भी युवा बर्ग या कोई भी किशोर,किशोरी अपनी जिस प्रकार की संगत बनाता या बनाती है, तो उस संगत का प्रभाव उस किशोर,किशोरी या युवा बर्ग पर पड़ता ही है, अगर कोई किशोर,किशोरी या युवा वर्ग अगर साहसिक कार्य करने वाले समुदाय की संगत में आता है,तो उस पर साहसिक कार्य करने का प्रभाव तो पड़ेगा ही,अगर वोह किसी भक्ति वाले समुदाय की संगत में आयेंगे  तो उन पर भक्ति का प्रभाव तो पड़ेगा ही,जिस प्रकार की संगत यह लोग करेंगे उन पर वैसा ही प्रभाव पड़ेगा,इसके विपरीत अगर कुसंगत में पड़ेंगे तो,यह लोग अनुचित कार्य करने प्रारंभ कर देंगे, कहने का तात्पर्य है,बातो से अधिक किसी इन्सान पर उस पर उस इन्सान के आचरण का प्रभाव अधिक पड़ेगा जिसकी वोह संगत में है |


विगत कुछ दिनों से मेरा मन स्वमेव अध्यात्म की ओर बढ रहा है ... हुआ दर-असल यह है कि विगत दिनों एक नये ब्लाग आचार्य जी पर पहुंच गया ... वहां अध्यात्मिक लेख पढे .... एक टिप्पणी में स्वमेव उनके अनुशरण में जाने की इच्छा जाहिर हो गई ....

... एक-दो दिन बाद आचार्य जी का ईमेल पर संदेश आया ... जवाब भी दे दिया ... फ़िर देखा आचार्य जी ने मुझे अपने "मन मंदिर" का सदस्य बना लिया है तथा ब्लाग पर मेरा नाम दर्ज कर मुझे कृतज्ञ कर दिया है ... जानकर बेहद खुशी हुई ... तब से ही कुछ अध्यात्मिक लिखने का सोच रहा हूं ... पर क्या लिखूं, कैसे शुरु करूं .... मन में उथल-पुथल चल रही है ... पर ये तो तय है कि मेरे कदम अध्यात्म की ओर बढ रहे हैं ...





कैसे  मुमकिन  है  कि  हम तुम,
साथ  में  जिंदा  रहें,
साथ  खेले मुस्कुराएं,
हम  कदम  हम  दम  रहें,






जिंदा है रहना मुझको जो,
फिर तुझे मरना ही  है,
लाशों पे रख के कदम,
आगे मुझे बढ़ना ही है,

कल मैं कोई पोस्ट नहीं लिख पाया। मैं ब्लॉग लेखन को अपनी आदत में शामिल नहीं कर पाया हूँ। मेरी आदत दैनिक अखबार के काम के हिसाब से ढली है। उसे बदलने में वक्त लगेगा, फिर मैं पूरी तरह से कार्य मुक्त नहीं हुआ हूँ। शायद फिर कहीं काम करूँ।

अखबार में हमारे काम का तरीका अगली सुबह के पाठक को ध्यान में रख कर बनता है। नेट पर या टीवी पर उसी वक्त का पाठक होता है। हर क्षण पर नज़र रखने की एक मशीनरी होती है। मुझे एक साल टीवी में काम करने का मौका भी मिला। वहाँ के काम में अजब सी मस्ती और रचनात्मकता होती है, पर कोई नहीं जानता कि उसने क्या किया। 


नहीं मील का पत्‍थर पथ में ,
समझूं कितना चलना बाकी।
अकेलेपन की छाया सघन 
मेरी पीडा और एकाकी मन।







मेरे बचपन का बिहार अर्थात गर्मी की छुट्टियों वाला बिहार, पके आम, घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान, बंसवारी, बगीचों, अनथक धमा-चौकड़ी वाला बिहार, गांव के साप्ताहिक बाजार वाला बिहार, गांव के सुन्दर मंदिर वाला बिहार। अब पीछे छूटता जा रहा है। मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा हूं और उसकी मुझे पकडऩे में कोई रुचि नहीं है। वह शायद चाहता है कि मेरे जैसी थोड़ी समझ वाले लोग बाहर रहें, ताकि उसका कारोबार निर्विघ्न चलता रहे। बदलते बिहार में चिन्ताएं दूसरी दिशा में मुडऩे लगी हैं। 

मुझे पता था कि आप शीर्षक देख कर यही कहने वाले हैं कि क्या यार, जुम्मा जुम्मा दो रोज़ हुये नहीं नेट पर लिखते हुये और तू हम धुरंधरों को बतायेगा ये दांव-पेच कि नेट पर कैसे लिखना होगा। लेकिन बात तो सुनिये ---हमें हर एक की बात सुन तो लेनी ही चाहिये --मानना ना मानना तो आप के हाथ में है।
तो सुनिये मुझे आज सुबह ही विचार आया है कि मुझे इंटरनेट लेखन के ऊपर थोड़ा बहुत लिखना चाहिये। कारण? ---दरअसल यह विषय मेरे दिल के करीब है। कुछ अरसा पहले जर्मनी की स्टेट ब्राडकॉस्टिंग (Deutsche welle) से विशेषज्ञ आये.. और दिल्ली में मुझे उन से एक महीने की इसी वेब-राइटिंग पर ट्रेनिंग लेने का अवसर मिला। बहुत कुछ सीखने का मौका मिला और अब मैं उन सब अनुभवों को आप के साथ बांटने के लिये तैयार हूं।

ब्लाग के क्षेत्र में आज कई प्रतिभाऐं मौजूद हैं। संभवतः यदि ब्लाग जैसा माध्यम न होता तो वे गुमनाम ही रह जाती परंतु अपने हुनर को तराशने के लिये उन्हें यह एक अच्छा विकल्प मिला है। और इस माध्यम से उनकी प्रतिभा पूरी दुनिया के सामने महज एक क्लिक के द्वारा प्रस्तुत हो जाती है। परंतु यदि काम का दाम न मिले तो कई प्रतिभायें वक्त से पहले ही दम तोड़ देती हैं। इसके अलावा उत्साहवर्धन के लिये भी पैसा जरुरी है। तो इसके लिये ब्लाग पर विज्ञापनों को दिखा कर आनलाइन रेवन्यू कमाया जा सकता है। 



“चढ गया ऊपर रे…अटरिया पे…अटरिया पे लौटन कबूतर रे"…
“गुटर-गुटर…गुटर-गुटर"…
“ओह्हो!…दुबे जी आप"..
“जी तनेजा जी…मैं"…
“कहिए!…कैसे याद किया?”..
“ये मैं क्या सुन रहा हूँ?”…
“क्या?”..
“यही कि आपने हमेशा के लिए ब्लॉग्गिंग तो तिलांजलि दे बूढ़े बरगद के नीचे अपना सारा जीवन बिताने का निर्णय लिया है?”
टेलीफोन डायरेक्टरी में जगह बनाना आसान होता है...


किसी के दिल में जगह बनाना बहुत मुश्किल...

सोचा   मैंने एक दिन , इस जगत में सैर करूँ 



अपनी कल्पना की  लहरों पर धीरे धीरे  तैर चलूँ 

तभी विचार आया मन में ,कल्पना से उपर उठूँ

खुद चलते चलते   इस  धरती पर पग रखूं  |


जब धरा पग मैंने पृथ्वी पर 

एहसास हुआ ऐसा 

ज़िन्दगी के चार दिन औ  

फिर भी जीवन है कैसा ?


13 टिप्पणियाँ:

आपका चुनिन्दा संकलन !

बहुत अच्छी वार्ता |चुनी गई रचना पड़ने में बहुत अच्छा लगा
आशा

बढिया वार्ता एवं बेहतरीन लिंक

स्वागत है संगीता जी

अच्छी चर्चा के लिए आभार...अच्छे लिंक्स मिले

बेहद उम्दा चर्चा .......आभार !

varta bhaut acchi hai ............................

अच्छी और विस्तृत वार्ता।

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