रविवार, 10 जुलाई 2011

वे इतने बिंदास हो गए वैचारिक संडास हो गए--- ब्लॉग4वार्ता --- ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, मंदिर में मिला खजाना कौतुहल का विषय बना हुआ है। बचपन में पराग, नंदन, गुड़िया, चंदामामा इत्यादि बाल पत्रिकाओं में राजाओं के खजाने की कहानी पढा करते थे। कहानियों में खजाने के तिलस्म का वर्णन बड़ा रोचक होता था। कई कहानियाँ तो साल भर धारावाहिक के रुप में छपा करती थी। अंग्रेजी फ़ैंटम का हिन्दी संस्करण मृत्युंजय भी खजाने की खोज करता नजर आता था। कुछ वैसी ही घटना केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में घटी। किसी को अनुमान न था कि इतना बड़ा खजाना मंदिर के तहखाने में मिलेगा। समाचार मिल रहे हैं कि अन्य तहखाने में भी खजाना दबा हुआ है लेकिन उसके दरवाजे पर मृत्यु का प्रतीक चिन्ह होने के कारण तलाश बंद कर दी गयी है। अगर दो चार और मंदिरों के तहखाने की तलाशी ली जाए तो देश के सालाना बजट का इंतजाम हो सकता है। अब चलते हैं आज की ब्लॉग4वार्ता पर........।

बस यूँ ही  पर पूनम कह रही हैं कि - बू ---- बड़ा अजीब सा शब्द है लेकिन है बड़ा मजेदार ! सुनते ही नाक पर हाथ चला जाता है और मुंह भी अजीब सा बन जाता है ! यह शब्द न जाने क्यूँ मेरे ज़ेहन से निकल ही नहीं पा रहा है, साथ ही डॉ निधि टंडन की कहानी पढिए मन की आवाज़ आज , माँ और कामवाली की बहस सुनते सुनते एकदम से सब सुनाई देना बंद हो गया उनके ...मुंह चलते,होंठ हिलते दिखते रहे सुनाई कुछ नहीं पड़ रहा था थोड़ी देर बाद महरी बर्तन मांजने लगी माँ टी.वी देखने लगी 

एक कवि हैं जब वे लिखते हैं तो लिखते ही जाते हैं, जैसे ममता बनर्जी की दुरन्तो गाड़ी हो, इश्क-प्रीत-लव का प्रेत जब घुस जाए तन में,  ऐसी ही कविताएं आती है मन  में --

मन में आकर तुम ने मेरे पीर भरा जोड़ा क्यों नाता .
अपनी अनुबंधित शामों से क्यों कर तोड़ा तुमने नाता
मैं न जानूं रीत प्रीत की, तुम ने लजा लजा सिखलाई..
इक अनबोली कहन कही अरु राह प्रीत की  मुझे दिखाई
इक तो मन मेरा मस्ताना-मंद मंद तेरा  मुस्काना ..
भले दूर हो फ़िर तुमसे.. बहुत गहन है मेरा नाता..!!

प्रवीण पाण्डेय जी ने लिखा - सहना, रहना, सहते रहना जो देश पर लागू होता है, वह देह पर भी लागू होता है। एक धुँधला सा चित्र बना रहा, व्यवहारिक अनुप्रयोग के अभाव में अपूर्ण सा ही बना रहा यह सिद्धान्त। कुछ सिद्धान्त उद्घाटित होने के लिये अनुभव का आहार चाहते हैं, स्वयं पर बीतने से अनुभव का उजाला शब्दों की स्पष्टता बढ़ा देता है। यौवन तो केवल कहने और करने का समय था, संभवतः इसीलिये यह सिद्धान्त अपूर्ण सा बना रहा। सहने के अनुप्रयोग जीवन में आने शेष थे, संभवतः इसीलिये यह सिद्धान्त अपूर्ण सा बना रहा।

श्यामल सुमन जी की रचना पढिए 

ये सच कि मनमीत मिला है
दूरी फिर भी यही गिला है

कुछ न पाया देकर सब कुछ
मेरे प्यार का यही सिला है

रहता हरदम इन्तजार में
नहीं अभीतक धैर्य हिला है

ब्लॉगर डॉक्टर एवं डॉक्टर्स सम्मानित एक जुलाई को हमने अपने अस्पताल में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया . इस अवसर पर अस्पताल के चुनिन्दा १९ डॉक्टर्स को उनकी विशिष्ठ सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया प्रेरणादायी एक संस्मरण पढिए शाम ढल रही थी। पेड़ों के पीछे सूरज डूबने को था। चिड़ियों का कलरव एक सुंदर प्राकृत माहौल बनाए हुए था। उस पर चाय की चुस्की का मज़ा लेते घर के लॉन में बैठे हम मित्र गपशप कर रहे थे।

दिल की बातों के साथ सुर लहरियां निकल रही हैं नहीं मिलेगा कोई मुझसा तुम्हें ज़माने में, लगेगी एक उम्र तुम्हें, हमको भूल जाने में| है रूठना, तो तुम रूठो मगर यह याद रखो, कहीं गुजर ना जाये यह रात बस मनाने में| खुदाय बावळीबहुत पुरानी बात है एक नगर में एक मुल्ला जी रहते थे और उसी नगर के दुसरे मोहल्ले में एक सिपाही अल्लेदाद रहता था| दोनों ही बेरोजगार थे कमाई का कोई साधन नहीं, दोनों के ही घर में घोर गरीबी| 

मेट्रो में पिता - मेरे पिता जब मेट्रो में होते हैं... तो उनकी नज़रें नीची होती हैं.. एक दुनिया जो छूटती जाती है मेट्रो से.. एक मीठी आवाज़, एक गंभीर आवाज़... बताती है उन ... शहीदों को बख्श दो: 2. क्रांतिकारी - आस्था, राजनीति और कम्युनिज़्म - . उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख से क्यों ग़िला करें सारा जहाँ... शराब से पुलिस का कल्याण - * *पुलिस कल्याण एवं पुनर्वास बोर्ड ने पुलिस के आला अधिकारियों को मुफ्त में शराब दिए जाने की अनुशंसा की है. जो सिपाही सीमा की रक्षा में या आतंकवादियों से लड..

भोले बाबा के भोले भक्तों का मीनू यहाँ देखें, एक गजल पढें - वे इतने बिंदास हो गए वैचारिक संडास हो गए यह समय कई बार विचित्र किन्तु सत्य जैसा लगता है. फिल्मो में **गा**लियों का इस्तेमाल हो रहा है, यथार्थ के नाम पर साहित्य में भी गालिया और अश्लीलता खुलेआम नज़र आती है. समलैंगिकता को प्रगतिशील आचरण समझा जा रह..अकेले बंदे ने तीन हजार पोस्ट का आंकड़ा पार कर लिया। इनकी सक्रियता को हमारा सलाम।

अब वार्ता को देते हैं विराम- मिलते हैं कल नई पोस्टों के साथ - राम राम

10 टिप्पणियाँ:

सुंदर लिनक्स लिए वार्ता ....

आज के शीर्षक पे तो जान कुर्बान है ललित जी ..बहुत सुंदर ..बू !!! आने का तो सवाल ही नही हैं

सुन्दर प्रस्तुति ||
बहुत बधाई ||

उम्दा वार्ता ... आभार !

बढ़िया रही रंग बिरंगी वार्ता

बहुत शानदार चर्चा..

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