शनिवार, 16 जुलाई 2011

उसके शाम की कहाँ होती है भोर -- ब्लॉग4वार्ता -- ललित शर्मा

नमस्कार, गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया गया, जितने भी गुरु हैं सभी ने अपना ठिकाना पकड़ लिया, चेलों को दर्शन देना है। नहीं तो उनका उद्धार कैसे होगा? दान-दक्षिणा का समय है, नुकसान नहीं उठाना है। ताऊ महाराज धॄतराष्ट्र  भी हिमालय की तपस्या से लौट आए हैं। मिस. समीरा टेढी ने आखिर ढूंढ ही लिया। कई महीनों से गायब थे। ब्लॉग जगत उनके हास्य व्यंग्य से वंचित था। ताऊ कह रहें कि कार्यभार रामप्यारे को सौंप गए थे, क्या आपको याद है रामप्यारे ने भी उनकी अनुपस्थिति में शक्ल नहीं दिखाई। अब ताऊ ही जाने कितना कार्यभार रामप्यारे को दिया था।



उनकी गलियों से आना-जाना है तो भीचो मुट्ठी और गाओ मियां की तोड़ी ये तो होता ही है कि सोलहवां साल भी सबके जीवन में आता है। फ़िर पीठ पर लद जाते हैं बेताल, बार-बार पूछते हैं सवाल, आखिर कब तक? सवालों का अंत नहीं जीवन में। गुरु आपकी बलिहारी से शंका समाधान होता है। भले ही जनता की सुरक्षा में सरकार नाकाम हो जाए, पर गुरु मार्ग दर्शन को उपस्थित हो ही जाते हैं।आज देसी घी के दिये जलाने का दिन है क्योंकि नदी के उस पार कृष्ण लीला का आयोजन है, बारिश से तरबतर  होकर श्रवण करना पड़ेगा।
वो कह रहे हैं नशा छोड़ो, योग्य गुरु की तलाश करो, अगर नहीं मिले तो यहाँ सम्पर्क करो, नि:संदेह समाधान हो जाएगा। यादों की बरसात सांझ होते ही चली आई, दो मिनट में शहर के सारे गढ्ढे लबालब भर गए, टैफ़िक जाम और मुंबई धमाकों का दर्द उभर आया, ये जीना भी कोई जीना है लल्लू , गुरु तो रहे नहीं, बड़े गुरुजी रह गए, चल पड़े शिरडी की ओर, वहीं धूनी रमा रहे हैं। आश्रम की  देहरी पर दीप कौन जलाए? उसके शाम की कहाँ होती है भोर, यायवर का क्या पता, कहीं छत्‍तीसगढ़ी गज़ल सुन रहे होगें। कु्छ कहो तो चढ बैठेगें- क्यों मैंने ये दुनिया बनाई है? क्योंकि मैं झूठ नहीं.बोलती.....।
सात कैलाश हैं हिमालय में कहाँ कहाँ जाओगे? पढिए कविता जी की कविता। गजब है भाई तीन बीबियाँ प्यारी न्यारी - वो बीबी तो प्रेम मूर्ति है स्नेह छलकता पीयूष घट सात जो संग फेरे लेती है सात जन्म प्यारा बंधन जब भी मिलो तुम्ही पिय मेरे एकादशी प्रद.बस्तरिहा मैजिक में..आदमी को आदमी बनाने वाला सूत्र मिला है, परन्तु इधर कुछ अलग सा है, यह तुम क्या कहते हो हाँ तुम ही बताओं बार बार मुझ से तुम यह क्या कहते हो ...... कहते हो इमानदार बनो कहते हो सीधे सज्जन बनो कहते हो भ्रष्टाचार से बचो, गलती स्वीकार कर के पत्नी को मना कर घर ले आइए  पत्नी अपनी माँ के यहाँ जून की छुट्टी में राजी-खुशी से गई थी।अब जीवन भर के लिए रुक गई है।
वार्ता को देते हैं विराम, मिलते हैं एक ब्रेक के बाद, राम राम -------

14 टिप्पणियाँ:

बढ़िया वार्ता ||

बोलो ब्लॉगगुरु ललितानंद महाराज की जय...

जय हिंद...

छोटी पोस्‍ट में ढेर सारे लिंक्स .. बहुत बढिया वार्ता !!

बेहद रोचक वार्ता....

वाह..बहुत खूब...रोचक सामग्रीयुक्त रोचक लिंक्स....

इस नये तेवर में निश्चित रूप से मेहनत ज्यादा करनी पड़ती होगी ?

बहुत सुंदर चर्चा, बहुत सारे लिंक्स मिले, शुभकामनाएं.

रामराम.

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