मंगलवार, 31 जनवरी 2012

कौन कहता है बाल विवाह अपराध है...खुशदीप

कौन कहता है बाल विवाह अपराध है. सवाल ..खुशदीप जी ने किया है. इस बात का ज़वाब शायद ललित बाबू के पास हो.. हमारे पास तो जवाब नईं है वरना  अपना लेवल आजकल थोडा बढ़ जाता . और अपन अपने खर्चे पर 'पत्रकारिता का बदलता स्वरुप और न्यू मीडिया'. राष्ट्रीय संगोष्ठी के वास्ते जो 21 मार्च 2012  को हो रही है के लिये मेल भेज देते. या इन मिसफ़िट मां-बापों को कुछ तमीज़ सिखाते जो नर्मदा जयंती पर  कोलावरी डी....झुमका गिरा रे...पे थिरकते बच्चों को चीयर अप कर रहे थे.  प्रियतम मेरे परदेस बसे.........  सपना निगम जी नौकरी चाकरी में ये स्थिति स्वाभाविक है अरुण जी को बोलता हूं ट्राय करें वापसी के वास्ते..
         जब कौव्वा  उड़ गया मालूम है तब जाकर गिलहरी बंदर का साथ हुआ और खुशियों की आई और लोगबाग खुशी खुशी हिमधारा सी बर्फ़ीली बयार मेंरवीन्द्र प्रभात कृत परिकल्पना ब्लॉग विश्लेषण-2011 (भाग-5 )  घरेलू अंगीठी तापते तापते बांच पाए. और सबने बांचा शेक्सपियर के नाटक और स्टीफेंस का बयान और ज़िन्दगी के मेले में  हुनर बांटने वाले पापला जी ने एक उपाय बांटा 


"गूगल द्वारा बंद कर दिए ब्लॉग वापस पाने के उपाय" आप भी देख आओ जी. 
      
और देख आना कि झा जी का कहत ह्वैं...?



खबर-छत्तीसी  पर कामयाब पोस्ट है अंधविश्वास के अन्धकार को मिटाएगा "अंजोर"






                                                        शोक समाचार 


विनत-श्रद्धांजलि

मैने साथ निभाया अब तुम्हारी बारी है.... ब्लाग 4 वार्ता.......संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार...प्रतिदिन लाखों विद्यार्थी आज भी बड़े भाव से गाते हैं "साथ दें तो धर्म का, चलें तो धर्म पर" कितना उदात्त और प्रेरणा से भरा है ना यह पद. इस एक पंक्ति में ही मनुष्य के कर्तव्य और ध्येय मार्ग का बोध हो जाता है. यही संस्कार उन्हें एक अच्छा इन्सान बनाते हैं, वेद कहते हैं "मनुर्भव:"। मनुष्य और पशु दोनो के जन्म लेनी की प्रक्रिया में साम्यता है। यदि मनुष्य को संस्कार न मिलें तो पशु और मनुष्य के आचरण में अंतर कर पाना कठिन है। इसलिए कहते हैं "संस्कारवानं लभते ज्ञानम्"। प्रस्तुत हैं आज की वार्ता में कुछ पोस्ट लिंक…………

गांधीजी की आकस्मिक हत्या न सिर्फ भारत को ही नहीं हिला दिया था बल्कि सम्पूर्ण विश्व इस घटना से स्तब्ध रह गया था । मानवता के पुजारी को खो कर सिर्फ हम नहीं रोये बल्कि स्वतंत्रता के और भी सेनानी रो पड़े । उनकी...  
तेरे गम को साझा किया मैने, अब तक न हिम्मत हारी है आज अभी अब दुखी हूँ मैं भी अब तुम्हारी बारी है। १ मेरे उर ने पढे हैं तेरे नैनों की की सब भाषा सागर तेरे पास है फिर भी तुम क्यों बैठे प्यासा ? म...

posted by गिरीश"मुकुल" at नुक्कड़

तो कुछ बात बने.. (Part-2)
जिसे बरसों से लहू देके, मैने सींचा है, वही इक फूल जो मुर्झाए, तो कुछ बात बने.. जो मेरे लाख बुलाने पे भी, नहीं आया, सिसक-सिसक मुझे बुलाए, तो कुछ बात बने.. जो मेरी याद पे काबिज़ है, वही शख़्स कभी, मुझे हर स...

तोहमत
कुछ न निकला दिल में दाग- ए-हसरते-दिल के सिवा हाय ! क्या-क्या तोहमतें थी आदमी के नाम पर, अब ये आलम है कि हर पत्थर से टकराता हूँ सिर मार डाला एक बुत ने बंदगी के नाम पर, कुछ इलाज उनका भी सोचा तुमने ए ! ...
वैसे तो कविता और आशा का गहरा रिश्ता है बात निराशा से शरू हो सकती है पर आशा की किरण अंत में अवश्य जगमगाती है! कविता और ख़ुशी भी पर्याय हो सकते हैं पर ऐसा क्यूँ है कि दुःख की रागिनी ही कविता में अक्सर गाती है...
मन अभिमन्यु मैंने तुम्हें हर बार रोका पृष्ठ खोल महाभारत का दृश्य दिखाया पर तुमने चक्रव्यूह से पलायन नहीं किया ... तुमने हर बार कहा बन्द दरवाज़े की घुटन न हो तो कोई रास्ते नहीं खुलते ना ही बनते हैं ! ...
बेगानी है हरी दूब भी मरुथल बियाबान के वासीफूलों से रहते अनजाने, बूंद-बूंद को जो तरसे हैं नदियों से रहते बेगाने ! स्वप्न सरीखे उनको लगते उपवन, सरवर, झरने, पंछी, जिसने मीलों रेत ही देखी बेगानी है हरी दूब भी !...
*गांधीजी की पुण्य तिथि पर प्रस्तुत हैं मम्मी की लिखी कुछ पंक्तियाँ ---* (चित्र साभार: गूगल इमेज सर्च ) बापू गांधी को टांग दीवार पर श्रद्धांजलि देने का स्वांग करते 30 जनवरी पर चलते नहीं उनकी लीक लकीर पर...
सरोगेट के केस से, बच्चे लेते सीख । पालक धोखे खा रहे, नया ट्रेंड इक दीख । नया ट्रेंड इक दीख, टाल शादी का प्रेसर । हायर जोड़ीदार, करें शादी ठेके पर । टोओबो डट कॉम, चाइना में खुब छाए । नया भिड़ाए जोड़, जान...
*अपनी इक पुरानी ग़ज़ल को झाड़-पौंछ कर फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ , उम्मीद है पसंद आएगी* खौफ का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ आज कल इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ चाहते हैं आप खुश रहना अगर, तो लीजिये, हाथ ...
खुली आँखों से जब देखा जिंदगी भुरभुरा रेत का एक टीला सा लगी जो कभी बहुत गर्म तो कभी ठंडी हो जाती कभी लहरें बहा ले जाती तो कभी तेज आंधियां अपने संग उड़ा ले जाती उस रेगिस्तान कि तरह जहां सिर्फ धसना और सिर्फ ...

मंगल उवाच।  
देखो, वह चूहा मर चुका है। उससे डरना मूर्खता है। **************** कॉकरोच मटर की फली के कीड़े जैसा ही जीव है। यूँ हाय तौबा मचाने और भागने की आवश्यकता नहीं।... 
"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!" "नमस्काऽऽर! आइये, आइये टिप्पण्यानन्द जी!" "लिख्खाड़ानन्द जी, टिप्पणी तो हम करते ही रहते हैं, पर कभी-कभी एकाध पोस्ट लिखने की भी इ. 
स्वाधीनता के 62 बरस बाद लोकतंत्र का सच क्या गणतंत्र दिवस के मौके पर कोई यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बनना भारत के ल... 
सदा श्वेत वस्त्रम, खुंसे अंग शस्त्रम, च वाहन विशालादि सत्ता सुखम ... चमचा कृपालम, विरोधस्य कालम, सुवांगी श्रुतमचैव लारम भजे... नमो भ्रष्ट पोषी, च स्विस ब...   

फिर नैनों ने चाल चली है.... (गीत)  
फिर नैनों ने चाल चली है, हो सके तो बचना. तू ना फंसना चालों में दिल तू ना फंसना... तू ना फंसना धोखे में दिल तू ना फंसना.... १. हल्की- हल्की बूंदा-बांदी, भ... 

प्रतीक्षा .....................
*प्रतीक्षा * *हम तो इंतज़ार में बैठे रहे यूँ ही ,दिन भर वो आए तो करीब मेरे ,पर बिन देखे कि मेरी आँखों में इंतज़ार के आँसू भी हैं उसने ना आने के सौ बहाने ब...   

सारे तीज - त्यौहार एक तरफ, लोकतंत्र का त्यौहार एक तरफ ....  
आहाहा ...कैसी अनुपम छटा है | अभूतपूर्व रौनक है | सारे तीज - त्यौहार एक तरफ, लोकतंत्र का त्यौहार एक तरफ | अभी कल ही की तो बात थी जब धड़ाधड़ करके जब सरकारी... 

अब लेते हैं आपसे विदा मिलते हैं, अगली वार्ता में, नमस्कार... 

सोमवार, 30 जनवरी 2012

मुस्कुराओ, मुझे अच्छा लगेगा.... ब्लाग 4 वार्ता.......संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार...हम जीवन को अपार मुल्य की वस्तु मानते हैं। हमें जीवन का संवर्धन, पोषण एवं आदर करना चाहिए, यदि इन आस्थाओं को वास्तविक बनाना है तो हमें एक दूसरे के प्रति एवं आने वाली पीढी के प्रति कर्तव्य स्वीकारने होगें। हमारा कर्तव्य है कि पृथ्वी पर जीवन को उदात्त बनाएं और उसे आक्रमण, अपमान, अन्याय, भेदभाव बीमारी और दुरुपयोग से बचाएं। हमारा कर्तव्य है कि हम मानव-अस्तित्व के लिए आवश्यक परिस्थितियों को सुरक्षित रखें। तभी कल्याण हो सकता है। अब प्रस्तुत हैं  मेरी पसंद के कुछ ब्लॉग लिंक आशा  है कि पाठकों को पसंद आएगें।

क्षमा चाहता हूँ कि कल रात को शहीदी दिवस यानि ३० जनवरी हेतु एक कविता लिखने बैठा था और गलती से सेव करते हुए पब्लिश का बटन क्लिक कर गया था ! खैर, वेइसे तो रविवार को वक्त कम ही मिलता है लेकिन आज मेरे पास वक्त...

 जमीन से निकलनेवाले पेड-पौधो,कीडे-मकौडो की कही कोई बात नही होती कहाँ से आती है हरियाली और कहाँ कहाँ है सुंदरतम चीजे इसकी जानकारी कही कोई नही होती रोज धरती अपने जगह से थोडा थोडा खिसक रही है कही कोई च...

कोई जो मुझको समझ पाए, तो कुछ बात बने समझ के मुझको भी समझाए, तो कुछ बात बने.. यूंही कब तक, तुम्हारी हाँ में हाँ, भरता रहूं मैं, ज़रा यकीं सा भी आ जाए, तो कुछ बात बने.. मैं तन्हा रात के आलम में, तन्हा लेटा...

आज .. किस राह निकल आयी मैं . वो गुज़रे दिन और रातें वो कही - अनकही बातें कहाँ पहुँच गयी मैं. कितना रोका मैंने खुद को कि न पलट के देखूं इनको . पर.............. देखो, न अब वापस आना चाहती हूँ पर, एक गलत कद...

फेसबुक की आलोचना करने वालों सावधान हो जाओ हर चीज में अच्‍छाई और बुराई का संगम होता है बुराई अपनाने पर गम होता है अच्‍छाई का संग सदा उत्‍तम होता है अच्‍छाई का अगर ...

खिल गयी क्यारी क्यारी
वसंतागमन हो चुका, खिल गयी क्यारी क्यारी। चलने लगी बयार दोधारी। प्रकृति का अदभुत सौंदर्य देखते ही बनता है, आँखो में भी नहीं समाता। कैमरे की आँख भी उसे सहेज नहीं पाती है। इस मधुर अवसर पर जब मधुकर का गुंजन ...

मैं
*अहं की * *अभिव्यक्ति* *मैं से शुरू* *मैं से इति* *मैं बेहतर* *तू कमतर * *मैं आकाश * *तू थलचर* *मैं रसना* *मैं श्रुति* *मैं दृष्टा* *मैं श्रृष्टि * *तू आलोचक* *मैं कृति* *सब पराये* *मेरा दुर्योधन* *मैं स्वी...

सरस्वती माँ को सादर वन्दन अभिनन्दन
सरस्वती माँ को सादर वन्दन अभिनन्दन करो माँ हर ह्र्दय मे प्रेम का मधुर स्पन्दन तम का नाश कर दो अज्ञानता का ह्रास कर दो ज्ञान उजियारे से माँ जीवन उल्लसित कर दो तन मन प्रफुल्लित हो सदा नित करें तुम्हें व...

फिर से ................. 
जुस्तजू सी उभर गयी फिर से शाम भी कुछ निखर गयी फिर से तेरा पैगाम क्या मिला जालिम जैसे धड़कन ठहर गयी फिर से तेरी बातों की बात ही क्या है कोई खुशबू बिखर गयी फिर से जिंदगी! होश में भी है, या कहीं म...

है इंसा कि शिकायत कि मुझको कुछ नहीं मिला 
हर बज्म में बैठे और खुदको साबित भी कर लिया | फिर भी रही शिकायत की हमको कुछ नहीं मिला | चोखट को अपनी छोड़कर अरमान दिल में ले चले | पर इतने बड़े जहां में भी कोई अपना सा न मिला | दिल थाम कश्ती को तूफान के ...

मुझे अच्छा लगेगा
सुबह की रोशनी की तरह मुस्कुराओ सदा, जिंदगी की महफ़िल में साथ दो मेरा, मुझे अच्छा लगेगा । ना हो खफा बस खिलखिलाओं सदा, दिल में प्यार जगाओ, तुम मुझे अपना बनाओ, मुझे अच्छा लगेगा । दिल में मेरे बस भी जाओ, ...

*गोवा का नाम लेते ही बेशुमार रंगों से भरे समुद्र तटों की छवि ज़हन में उभरने लगती है। लेकिन सूरज, रेत और समंदर का मेल ही गोवा की तस्वीर मुकम्मल करने... 
उस दिन एक ठो सहकर्मी दोस कहे कि चलिए एक ठो नयका मॉडल का मोबाइल दिलवाइए , हम कहे कि तो ई में हमको काहे ले जा रहे हैं महाराज , हम तो टेक्नीकली एतना ... 

कविता चंचल मन यूं ही बैठे-बैठे मैं खुद से बात करती हूं की क्‍या सोचता रहता है ये मन क्‍या चाहता है पर जवाब नहीं मिलता। वक्‍त वेवक्‍त क्‍यों आंखों में नींद ...  

परिपाटियों को बदलने के लिए छलनी का होना भी जरूरी होता है ना ............  
आखिर कब तक सब पर दोषारोपण करूँ तालाब की हर मछली तो ख़राब नहीं ना फिर भी हर पल हर जगह जब भी मौका मिला मैंने तुम्हारी पूरी जाति को कटघरे में खड़ा किया जबकि ...   

मुनिया का बचपन  
माँ........माँ .....देखो न !! इस मोटे कालू को समझा लो .........मुझे कुछ भी कह कर बुलाते रहता है..उं..हूं....उं.... ---अपनी माँ से कहा रोते-रोते मुनिया ने... 

हम वो परिंदे हैं ! 
*उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,* *कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती !(१ )* * * *हमने मौसम की तरह,उनका इंतज़ार किया,* *पतझर के बाद भी ,बासंती-हवा नहीं आती ..

अब इतना तो मालुम ही था कि इंटरनेटसे कहीं भी कुछ भी मंगा या या भेजा जा सकता है। पर अभी तक ऐसा मौका या सुयोग नहींमिल पाया था या यूं कह लें कि हासिल करने क... 

अब लेते हैं आपसे विदा मिलते हैं, अगली वार्ता में, नमस्कार...   

रविवार, 29 जनवरी 2012

छतहार का पिन कोड और पुरवा सुहानी --- ब्लॉग4वार्ता --- ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, पढिए सप्ताहान्त की फ़टफ़टिया वार्ता…… बनन बागन में बगरो बसंत वसंत के आते ही मौसम खुशनुमा हो जाता है, गुलाबी ठंड के साथ चारों ओर रंग बिरगें फ़ूलों की भरमार हो जाती है। खेतों में फ़ूली हुई पीली सरसों की आभा निराली हो जाती है लगता है कि धरती पीत वस्त्र धारण कर इठला रही ...…ए बसंत तेरे आने से ए बसंत तेरे आने से नाच रहा है उपवन गा रहा है तन मन ए बसंत तेरे आने से । खेतों में लहराती सरसों झूम रही है अब तो मानो प्रभात में जग रही है ए बसंत तेरे आने से । चिड़िया भी चहकती है भोर में गीत गाती ह..

पुरवा सुहानी आई रे..आज माघ शुक्ल की पंचम तिथि यानी बसंत-पंचमी है, बसंत पंचमी के आते ही बसंत ऋतु का शुभारंभ हो जाता है . बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा माना जाता है क्योकि इस मौसम में रंग बिरंगे फूल खिलने से बागों में बहार आ ...माँ सरस्वती तूने दिया हैप्यार माँ स्वीकार कर आभारमाँ माता-पिता कोईनहीं बस तू ही हैआधार माँ मेरा नहीं तेराही है जो कुछ भी है घर-बारमाँ कोई न था बस तूही थी जब था बहुत लाचार माँ आशीष दे लड़तारहूँ जितना भी होअंधियार ...

पवन बसंतीकण कण के श्रृंगार हुए हैं मौसम के मनुहार हुए हैं मन बौराई आम्र मंजरी सपने हार सिंगार हुए हैं मुदित हुआ हर रोम रोम अंग फूले कचनार हुए हैं छूकर गुजरी पवन बसंती पुष्प पीत रतनार हुए हैं रंगों के म...हे वीणा शोभायनीशोभायनी, हे विद्या की खान मेरी भव बाधा करो, बाँह धरो अब आन माँ तुमसे क्या छुपा है तू कब थी अनजान तुम्हीं सँवारो काज सब, तुम्हीं बचाओ मान आन बान सब छाँ...बसंत एक रंग अनेक पीत वसन उल्लसित है मन बसंत आया ************************* श्रीहीन मुख गरीब का बसंत रोटी की चाह . ******************* फूली सरसों खेतों में हरियाली खिला बसंत **********************...

फेसबुक हर घडी हर पल हम लड़ा ही किये कभी इस बात को ले कभी उस बात को ले हम भिड़ा ही किये कभी नाते-रिश्तेदार कभी बच्चे हमारे कभी कभी पैसा भी तकरार के विषय थे सारे अब बदला है और नया ज़माना है अब मरा ये मेरा हर वक...अश्क गाँधी केतीरगी के दामन पर रोज उभरता है एक चेहरा,* *खामोश सी आँखे सादगी में लिपटी नजर.........* *कभी बुने थे उनने चाँद तारों व् बहारों से महकते हिंद के सपने,* * खुशहाली के ख़्वाब ,,देखे बुलंदियों के सपने...........*

वसन्त ऋतु का जन्मदिवसप्रज्वलित अंगारों की भाँति पलाश के पुष्प! पर्णविहीन सेमल के विशाल वृक्षों की फुनगियों पर खिले रक्तवर्ण सुमन! मादकता उत्पन्न करने वाली मंजरियों से सुशोभित आम्रतरु! अनेक रंग के कुसुमों से आच्छादित लता-विटपों...आज...बसंत चहुँ ओर छाया हैजब बसंत पड़ा अटा.. झूम उठी धरा ... हर तरफ दिखे बसंत की छटा बसंती बयार में .. भंवरे के गुंजन में .. गूंजती है राग बसंत ... बासंती छवि ..बसंती रूप ... जब बसो अखियन आन ...... धरा के अधरों पर .. कैसी खि...

छतहार का पिन कोड क्या है?सवाल बड़ा अहम है क्योंकि आज तक हम छतहार का पिन कोड 813221 लिखते आए हैं। लेकिन, बरौनी से छतहार के मशहूर गायक और छतहार ब्लॉग में अहम योगदान देने वाले श्री मनोज मिश्र का एक ई-मेल मुझे मिला है, जिसमें उन्होंने...ASHAAARरश्क आता है तेरे, रक्श पे अल्ला मेरे साज़ कहीं और साजि़न्दे, न नजर आया धूंधरू वक्त-ए-दरिया यहां सैलाब लिये आया है बादपां दर्द क्यूं अश्कों में सिमट आया है जूस्तजू मौत की, दहलीज तेरे ईश्क का ग़म की ताबीर क...

ईश्वर से बड़ा लेखक कौन ?? अक्सर जब दस-बारह या उस से ज्यादा किस्तों वाली कहनियाँ लिखती हूँ...तो उसके बाद...उस कहानी को लिखने की प्रक्रिया या कहें मेकिंग ऑफ द स्टोरी/नॉवेल....भी लिख डालती हूँ. इन दो किस्तों की कहानी के बाद कुछ लिखने..खिल गयी क्यारी क्यारीवसंतागमन हो चुका, खिल गयी क्यारी क्यारी। चलने लगी बयार दोधारी। प्रकृति का अदभुत सौंदर्य देखते ही बनता है, आँखो में भी नहीं समाता। कैमरे की आँख भी उसे सहेज नहीं पाती है। इस मधुर अवसर पर जब मधुकर का गुंजन .....

मिलते हैं ब्रेक के बाद , राम राम………

शनिवार, 28 जनवरी 2012

यादों की पगडंडियाँ और झूलती मीनार -- ब्लॉग4वार्ता -- ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, गणतंत्र दिवस एक बार फ़िर मन गया, लेकिन तंत्र अभी तक गण का नहीं हो पाया। कभी गण के मन के लायक काम नहीं हुआ। मंहगाई हमेशा बढते गयी। जो तंत्र में हैं उनके लिए सारी सुविधाएं एवं माल मत्ते की भरमार है। जाड़े में ठिठुरते हुए गण की अंतिम इकाई को एक गर्म कम्बल भी मिलना मुहाल है। सत्ता सदा से ही धनी लोगों के हाथों में रही है। अब सत्ता में आने पर धनी हो जाते हैं। कैसी विडम्बना है मेरे इस देश की, गरीब और भी गरीब हो रहा है, धनी के पास धन रखने की जगह  नहीं। आशा है कि कभी तो गण का तंत्र होगा। चलते हैं आज की ब्लॉग4वार्ता पर और प्रस्तुत करते हैं कुछ पोस्ट लिंक…………

अकेली लड़की से मुलाक़ात तारीख तो याद नहीं लेकिन वो जनवरी 1989 के आखिरी दिन ही थे. पल पल बदलते मौसम ने आखिरकार ठान ही लिया था कि ठण्ड को अब जाना ही होगा. ऎसी ही एक शाम चाय की चुस्कियां लेते घुमक्कड़ी के शौकीन मन में इच्छा हुई कि ब..बसंत की दो कविताएँवसंत के आने से * *चमक लौट आई है* * तुम्हारी आँखों में * *वे अधिक चंचल सी * *हो गईं लगतीं हैं * *उन में मादकता* * टपक २ पड़ रही है * *ओसे ही * *चौकन्ने हुए लग रहे हैं * *तुम्हारे...

रजत जयंती समारोह मेरे विद्यालय में रजत जयंती समारोह में बच्चों द्वारा प्रस्तुत नृत्य . इस नृत्य को मैंने तैयार करवाया था . आपको कैसा लगा देख कर अवश्य बताइयेगा.... रेखाएं कुछ कहती हैंऐसी ही है वह खूब बोलना चाहती है पर बोलती नहीं जब बोलने को कहो कह देती है कुछ नहीं कहना हाँ लेकिन उसी वक़्त उन मुरझाई आँखों से टपक जाती हैं दो बूंदें........! बिलकुल दर्पण की तरह जिसमे झलकता है उसका प्रत...

दिल्ली में गणतंत्र दिवस की अद्भुत छटाबचपन में गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए हम मूंह अँधेरे उठ जाते थे और ६-७ किलोमीटर पैदल चलकर राजपथ पहुँचते थे । बाद में ऑफिसर बन गए तो सरकार की ओर से विशिष्ठ अतिथि वाले पास मिलने लगे । लेकिन पिछले ३-४ स...सुरों के सरताज सुरेश वाडकरसुरेश वाडेकर *किसी परिचय के मुहताज नही हैं. रायपुर में एक *सुरमयी शाम *उन्होंने अपने साजिंदों के संग जोश से भरे गीतों की ऐसी महफ़िल सजाई कि *मेडिकल कालेज रायपुर *का सभागार उस दौर की संगीतमय पुरवाई में खो...

कौन सा नाम गौरवशालीहमारे देश का नाम भारत है किन्तु समस्त संसार के लोग इसे भारत नहीं बल्कि 'इण्डिया' के नाम से जानते हैं। मूलरूप से हमारे देश का नाम भारत है पर मुगलों ने इसका नाम 'हिन्दुस्तान' रख दिया और हमारा देश भारत से 'हि...किसान का मकान . एक के ऊपर एक फिर एक के ऊपर एक ईटें जमा कर उन पर मिट्टी का गारा चढ़ा कर किसान सुकूं से बैठा था ! ठीक उसी पल घने मेघ उमड़ आए, और - बारिश की बूँदें टपकने लगीं देखते ही देखते मिट्टी का गारा, ईंटों से - ...

बसंत के आने परहरियाणा में पतंग बाज़ी के रूप में ...बसंत पंचमी मनाई जाती हैं ) * *बुढ़िया दादी .दोस्त पुराने , > आँगन ,आँगन में वो छज्जे पुराने > आज नहीं हैं ....... इस पल तुम ज़िन्दा हो!…पत्तों पर कुछ बूंदें हैं... उन बूंदों में जीवन है कुछ आवाजें हैं गूँज रहीं क़दमों तले रौंदा गया जो उस सूखे पात में भी जीवन है जैसे ही यह महसूस किया हवा कानों में कह गयी- तुम अपने अलावे देख पा रही हो बूंदों...

यादों की पगडँडियाँइंटरनेट के माध्यम से भूले बिसरे बचपन के मित्र फ़िर से मिलने लगे हैं. किसी किसी से तो तीस चालिस सालों के बाद सम्पर्क हुआ है. उनसे मिलो तो कुछ अजीब सा लगता है. बचपन के साथी कुछ जाने पहचाने से पर साथ ही कु...झूलती मीनार और अलबेला खत्रीअगली सुबह अलबेला खत्री जी से बात हुई तो उन्होने बताया कि वे एक दिन पहले अहमदाबाद में ही थे। फ़िर उन्होने कहा कि अगले दिन मैं सुबह की गाड़ी से अहमदाबाद आ रहा हूँ। वहीं मुलाकात हो जाएगी। मैने कहा कि अहमबाद स्...

THE LAST JOURNEYबचपन के सनेह पिता के गेह कल की खनक न समझे कभी अनबुझे अभी भी भरमाते रहे, चाय की चुस्की बातों की खुश्की अर्थ की सुस्ती मौज न मस्ती रिश्तों से प्रेम विश्वास के नेम झनकते रहे, दादा का कुआं बीड़ी का धुआं मुंह म...साहित्य सम्‍मान हम तो दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है दरिया और मानव की अदम्‍य प्रकृत्ति के संबंध में इन शब्‍द पंक्तियों को हम गाहे-बगाहे सुनते रहे हैं और देखते रहे हैं कि, आगे बढ़ने की विशाल लक्ष्‍य को भी दरिया जैसे सह...

वार्ता को देते हैं विराम, मिलते हैं ब्रेक के बाद, राम राम

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

अमर रहे गणतंत्र हमारा : गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें

पच्चीस की रात बहुत थकान तीन से चार घंटे की नींद अल्ल सुबह पांच बजे  श्रीमति जी ने एक चाय के साथ जगा दिया नींद आंखों को सो जाने के लिये उकसा रही थी उफ़्फ़ दूसरी बार श्रीमति जी के डपटे जाने पे जागना ही तय कर लिया अब क्या बताएं पिटने या डपटे जाने के बाद जागने के अभ्यस्त हम भारतीय जाने कब जागेंगें.. दूसरों के छिद्रांणवेषण करते करते  हम खुद के आंकलन की आदत ही भूल चुके हैं. बहरहाल महाकौशल मेले की थकान और दीगर सरकारी कामकाज के साथ नैगेटिव-सोच और ध्वनियों से जूझते जूझते कल रात मन बहुत उदास था सोचा कि उन सब को गरियाऊं जो नैगेटिव है पर फ़िर मुझे वो घरेलू कुत्ता हां वही सफ़ेद वाला पामेरियन कुत्ता शैकी याद आ गया जो भौंकता तो था पर उसके साथ पीछे पीछे खिसक भी रहा था.. 
      जी मैं उसकी मानिंद नहीं होना चाहता सो बस प्रात:ईश स्मरण के साथ जागा चाय पी और निकल पड़ा कमिशनर साहब के बंगले के बाद आफ़िस में ध्वज-वंदन और फ़िर स्टेडियम में बारिश और जाड़े की जुगलबंदी के बीच मामाजी यानी मध्य-प्रदेश के मुख्य मंत्री जी की सदारत में आयोजित समारोह में पहुंचे और अपनी झांकी को पहला स्थान मिलते ही प्रसन्नता से भीग गये.. 
सच सोच को आकार देना कितना कठिन होता है.. जो आकार दे देते हैं वो जीतते है जैसे ललित शर्मा और गिरीश पंकज साहब  अरे बधाई दीजिये इन महारथियों को .
और हां मल्लिका जी को लेकर इस छब्बीस जनवरी ब्लागर जो एक भारतीय नागरिक हैं तनिक मूड मे नज़र आते हैं.. भाई प्रवीण पाण्डेय जी न दीनता न पलायन का संदेश देते गहरा प्रभाव छोड़ रहे हैं 
      कल मैं अपने एक मातहत से काम करवा रहा था उसने कई गलतिया की मूर्खता वश कुछ अंतत: वो कार्य न कर सका ... सच मूर्खता की कोई दवा नहीं होती.. 
शिइईईईईईईईईईईईई किसी से कहना कि-"शाहरूख खान बनेंगे, पाबला परिवार के पड़ोसी !?" खबर पुरानी है पर हर्ज़ क्या है  ओल्ड इज़ गोल्ड   
               भारत देश हमारा प्यारा - वाक़ई प्यारा है ..तभी तो नींद से जूझता गिरीश सशरीर आप सबको गणतंत्र दिवस की बधाई देने ब्लाग4वार्ता पर ललित बाबू का हुक़्म बज़ा रहा है...

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

चुनौतियों के चक्रव्युह में गणतंत्र .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , जाने माने साहित्यकार श्री गिरीश पंकज एवं प्रतिष्टित ब्लॉगर श्री ललित शर्मा आज शाम प्रथम चेतना साहित्य सम्मान ११ तथा प्रथम चेतना ब्लॉगर सम्मान 11 से सम्मानित किये गए. कैलाशपुरी स्थित छत्तीसगढ़ सदन में चेतना साहित्य एवं कला परिषद् तथा अभियान भारतीय के संयुक्त गरिमामय कार्यक्रम 'बसंतोत्सव १२' में प्रखर स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी पद्मश्री डा महादेव प्रसाद पाण्डेय ने उन्हें सम्मान पत्र/ शाल एवं श्रीफल देकर सम्मानित किया.

 आज गणतंत्र दिवस पर देश प्रेम से अभिभूत ब्‍लोगरों ने भी बहुत कुछ लिखा है .. उनमें से कुछ लिंक आपके लिए ....
दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका में दीपक भारतदीप .....
गणतंत्र एक शब्द है जिसका आशय लिया जाये तो मनुष्यों के एक ऐसे समूह का दृश्य सामने आता है जो उनको नियमबद्ध होकर चलने के लिये प्रेरित करता है। न चलने पर वह उनको दंड देने का अधिकार भी वही रखता है। इसी गणतंत्र को लोकतंत्र भी कहा जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में लोगों पर शासन उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही करते हैं। पहले राजशाही प्रचलन में थी। उस समय राजा के व्यक्तिगत रूप से बेहतर होने या न होने का परिणाम और दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता था। विश्व इतिहास में ऐसे अनेक राजा महाराज हुए जिन्होंने बेहतर होने की वजह से देवत्व का दर्जा पाया तो अनेक ऐसे भी हुए जिनकी तुलना राक्षसों से की जाती है। कुछ सामान्य राजा भी हुए। आधुनिक लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन माना जाता है यह अलग बात है कि वहां प्रतीक रूप से राजशाही आज भी बरकरार है।
छान्‍दसिक अनुगायन में जय कृष्‍ण राय तुषार जी ....

जब तक सूरज पवमान रहे |
जनगण मन और तिरंगे की 
आभा में हिन्दुस्तान रहे |
पर्यावरण डायजेस्‍ट में खुशाल सिंह पुरोहित जी....
भारत का पिछले १४०० वर्षो का जीवंत इतिहास स्पष्ट रूप से दर्शा रहा है कि यह देश कभी भी साम्प्रदायिक नहीं था । अतएव यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने इतिहास का पुन: आकलन करें और बढ़ रही कट्टरता के खिलाफ संघर्ष को और प्रभावी बनाएं ।
बच्‍चों का कोना में प्रभा तिवारी जी ...
छब्बीस जनवरी आयी.
पूरे भारत ने मिलकर
गणतंत्र की खुशी मनायी.
जीवन की आपाधापी में संजय कुमार चौरसिया जी ....
आप सभी ब्लोगर्स साथियों एवं देशवासियों को गणतंत्र-दिवस की बहुत बहुत बधाई एवं ढेरों शुभ-कामनाएं ! हम सब जानते हैं यह हमारा राष्ट्रिय पर्व है ! इस राष्ट्रीय पर्व को हमें पूरे जोर शोर , उत्साह के साथ मानना चाहिए ! भले ही ये पर्व एक दिन का हो , हमें एक दिन के लिए ही अपने दिलों में देशभक्ति का जज्बा भर लेना चाहिए ! विरोधी ताकतों , देश के दुश्मनों को ये अहसास दिला देना चाहिए कि , हम आज भी अपने देश के लिए मर मिटने को सदैव तैयार रहते हैं ! हम भारतीय जिस एकता - अखंडता , सभ्यता - संस्कृति के लिए पूरे विश्व में जाने जाते हैं , वो बात आज भी हमारे बीच मौजूद है !
मनता रहे 
गणतंत्र दिवस
चिर शाश्वत|

विक्रम7 में विक्रम7 ....
कैसा,यह गणतंत्र हमारा
भ्रष्टाचार , भूख  से  हारा
वंसवाद का लिये सहारा
आरक्षण के बैसाखी पर टिका हुआ यह तंत्र हमारा 
धूप छांव में तपन वर्मा जी ....
पिछले एक वर्ष में भारत बदला है। गणतंत्र दिवस आने वाला है। पर आखिर क्या हैं गणतंत्र दिवस के सही मायने? क्या आज का भारत गणतंत्र है? क्या यह वही भारत है जिसे ध्यान में  रखकर संविधान लिखा गया होगा?
रचनात्‍मक विश्‍व में अंजीव पांडेय जी ....

गणतंत्र दिवस एक बार फिर आ गया है. स्वतंत्रता दिवस की अपनी महत्ता है और गणतंत्र दिवस की अपनी. गणतंत्र दिवस हमें संस्कारों में बांधने का दिन है. हमें अपने कर्तव्यअधिकारों का बोध कराने का दिन है. 
मौन नामक ब्‍लॉग में .....
कितनी सुहानी धरती तेरी ,
पावन तेरा गगन |
मंत्रों सी पावन धरती है,
सबका अभिनन्दन करती है,
जीवन की सांसे हैं सबमें ,
जड़ हो या चेतन .........
गौतम संदेश में बी पी गौतम जी .....
एक समूह के गहन विचार मंथन के बाद दो वर्ष ग्यारह माह और अठारह दिन में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ एवं सबसे बड़े लिखित संविधान की रचना की गयी, जिसे 26 जनवरी 195० को देश में विधिव्त लागू कर दिया गया। संविधान का मूल स्वरूप वास्तव में उत्तम ही है, क्योंकि संविधान की रचना के समय रचनाकारों के समूह के मन में जाति या धर्म नहीं थे। उन्होंने जाति-धर्म अलग रखते हुए देश के नागरिकों के लिए एक श्रेष्ठ संविधान की रचना की, तभी नागरिकों को समानता का विशेष अधिकार दिया गया, लेकिन संविधान में आये दिन होने वाले संशोधन मूल संविधान की विशेषता को लगातार कम करते जा रहे हैं।
मंथन में अभिषेक जैन जी .....

कहा जाता है की "वक्त की सबसे अच्छी बात ये है की वह बीत जाता है और शायद सबसे बुरी बात भी यही है" पर कुछ बातें या घटनाएँ ऐसी होती है जो शायद कभी नहीं बीतती क्यूंकि वह हमारे दिलों से जुडी हुई है| और दिलकी ख़ुशी और गम सब दिल में ही रहे है, और वक्त आने पर अपने आप ही उभर आते है| ऐसी ही एक ख़ुशी 15 अगस्त 1947 को हर भारत वासी को मिली जिसकी ख़ुशी वह आज भी दिल में रखे है. और उसका खुमार हर 15 अगस्त को देखने भी मिलता है| उसके साथ ही साथ नये साल की ख़ुशी के साथ- साथ एक और ख़ुशी हमे हर साल मिलती है और वो
अमित दीक्षित जी के ब्‍लॉग में .....
असफ़ल सभी प्रयास हो गए!!
राष्ट्रीय पर्वों के दिन थे !
सरकारी अवकाश हो गये !!
भ्रष्टाचार भूख भय भाषण !
भरत के अनुप्रास हो गये !! 
सरोकार में अरूण चंद्र रॉय जी .....
१.
योजनायें 
कागज़ी सलाखों में बंद
६२ वर्ष का हुआ गणतंत्र 
२. 
चुनाव
संसद 
सब महज अनुबंध 
६२ वर्ष का हुआ गणतंत्र

बारमर न्‍यूज ट्रैक में चंदन सिंह भाटी .....
बैसवारी में संतोष त्रिवेदी जी .....
हम अपने गणतंत्र के बासठ-साला ज़श्न की तैयारी में हैं. राजपथ पर बहुरंगी छटाएँ बिखरने भर से टेलीविजनीय -चकाचौंध तो पैदा की जा सकती है पर इस पर इतराने जैसी कोई बात नहीं दिखती है.तकनोलोजी के क्षेत्र में हमने बहुत उन्नति की है और आर्थिक-मोर्चे पर भी हमारा दमखम खूब दिखता है पर इतने अरसे बाद भी क्या वास्तव में जिस उद्देश्य को लेकर हमने अपना सफ़र शुरू किया था,उसे हासिल कर लिया है ? संविधान में आम आदमी को सर्वोपरि माना गया था,वह आज कहाँ खड़ा है ? ऐसे में ज़ाहिर है ,इस सफ़र को शुरू करने वाले तो ज़रूर अपने उद्देश्य में सफल हुए हैं क्योंकि तब से लेकर अब तक उन लोगों की सेहत बराबर सुधर रही है,जबकि इस तंत्र में देश और उसका गण टुकुर-टुकुर केवल उसकी ओर ताके जा रहा है !
अनुराग की दुनिया में अनुराग जी .....
भारतीय लोकतंत्र के दो पर्व बिल्कुल नजदीक आ चुके है पहला हमारा गणतंत्र दिवस और दूसरा लोकतान्त्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा पर्व विधानसभाओ के होने वाले सामान्य चुनाव.पहला इस देश की लोकतान्त्रिक व्यस्था का प्रतीक है और दूसरा इस व्यस्था को चलाने का आधार है .पर अफ़सोस ये है की वर्तमान समय में ये दोनों ही महापर्व लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए सिर्फ फर्ज अदाएगी व मजाक बनते जा रहे है. चुनाव जहा सामाजिक उद्देश्यों की पूर्तिके लिए न होकर राजनैतिक दलों द्वारा सत्तारूढ़ होकर अपने हितो को साधने का माध्यम बन गए है तो वही गणतंत्र दिवस के दिन होने वाले राष्ट्रीय कार्यक्रम भी अब रस्मो रिवाज़ बनते जा रहे है.
मेरी भी सुनो में मौसमी जी .....
कल गणतंत्र दिवस है,बहुत ही ख़ुशी का दिन ,हर भारतीय दिलों में कल के दिन ग़ज़ब का जस्बा देखने मिलता है,हर बच्चे के हाथ में तिरंगा हमारे उज्वल भविष्य को दर्शाता है..लेकिन क्या ये वाकई हो रहा है?क्या हम अपने देश का उज्वल भविष्य बनाने में योगदान दे रहे हैं?? या इसकी नीव और कमज़ोर किये जा रहे हैं....!!
यह जो सच है में कृष्‍ण नागपाल .....
हम उत्सव प्रेमी हैं। इसलिए त्योहार मनाना हमारी आदत में शुमार है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को भी त्योहारों में शामिल किया जा चुका है। त्योहारों में सिर्फ खुशी तलाशी जाती है। अपनी-अपनी तरह से मौज मजा और आनंद लूटा जाता है। आसपास कौन भूख से कराह रहा है और किसकी अर्थी उठने वाली है, इस पर माथामच्ची करना बेवकूफी माना जाता है। हिं‍दुस्तान के नेताओं ने आम जनता को सपनों के संसार में जीने का हुनर सिखा दिया है। फिर भी सचाई तो सचाई है। उसे कोई कैसे बदल सकता है!
कश्‍यप की कलम से में राजेश कश्‍यप जी ....
छह दशक पार कर चुके गौरवमयी गणतंत्र के समक्ष यत्र-तत्र-सर्वत्र समस्यांए एवं विडम्बनाएं मुंह बाए खड़ी नजर आ रही हैं। देशभक्तों ने जंग-ए-आजादी में अपनी शहादत एवं कुर्बानियां एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए दीं, जिसमें गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, बेकारी, शोषण, भेदभाव, अत्याचार आदि समस्याओं का नामोनिशान भी न हो और राम राज्य की सहज प्रतिस्थापना हो। यदि हम निष्पक्ष रूप से समीक्षा करें तो स्थिति देशभक्तों के सपनों के प्रतिकूल प्रतीत होती है। आज देश में एक से बढ़कर एक समस्या, विडम्बना और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को सहज देखा जा सकता है।
बेसब्र में संदीप पटेल जी ......
अन्यथा कलम ये ना कह दे की तुम्हारा लिखना व्यर्थ है 
और दिल ये ना कह दे की ऐसे जी रहे हो तो जीना व्यर्थ है 
देश के हालातों पर चलिए डालें एक नज़र 
इस गणतंत्र का आखिर सबपे गहरा है असर 
इस गणतंत्र में सोच रहा 
क्यूँ खुश हो करूँ राष्ट्र गुणगान 
आखिर ये गणतंत्र मना
क्या होगा भारत देश महान ??
भारत स्‍वाभिमान आंदोलन में रवि कुमार 'रवि' जी .....
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है 
भूखे नंगे बच्चो के संग
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है 
50वी सदी आये थे जब तुम
लोकतंत्र ही नारा था
मन पाए विश्राम जहां में अनिता जी ......
 राजा है इसमें न ही कोई रानी,
शहीदों के खूं से लिखी यह गयी है
हजारों की इसमें छुपी क़ुरबानी !
अंत में मेरे साथ आप सभी गुनगुनाइए ... जन गण मन अधिनायक जय हे .....

बुधवार, 25 जनवरी 2012

आखिर कब बदलोगे ??????.... ब्लाग 4 वार्ता.......संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार... एक तरफ देश में शीत लहर का कहर जारी है, वहीं दूसरी तरफ चुनावी मोर्चाबंदी शुरू हो गयी है. टिकिट की मारामारी है. लेकिन सही परीक्षा तो जनता की होनी है. किसे जिताए किसे नहीं.चुनावी वादे शुरू होंगे, जनता को बरगलाने की कोशिश की जाएगी. इस हालत में जनता को, मतदाताओं को सजग रहना होगा, कौन इसके काबिल है इसके अवलोकन के बाद ही मताधिकार का प्रयोग करना होगा.महंगाई ने देश की कमर तोड़ रखी है, समस्याएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं, ऐसे वक़्त चुनावों के माध्यम से हमें खुद का ही परीक्षण करना होगा. शहर से राज्य और राज्य से देश की स्थिति मज़बूत होती है. शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी. तभी सही मायनों में सुशासन की आशा की जा सकती है.आखिर लोकतंत्र है. आप भी ऐसा ही सोचते हैं ना... 
कुछ इन्ही विचारों से भरी और कुछ भिन्न - भिन्न विचारों और भावों से भरी चुनिन्दा लिंक्स के साथ प्रस्तुत है आज की वार्ता....       


मेरे मेज पर सजी तुम्हारी उस खुबसूरत तस्वीर ने कल मुझसे एक सवाल किया " बहुत दिन हो गए तुमने मुझसे कुछ कहा नहीं " मैं स्तब्ध ... सोचता रहा उस सवाल को ......! मुझे निरुतर देख फिर उसने कहा " बहुत दिन ...

लोथल (લોથલ) : हड़प्पा कालीन नगर -- भाग 1 --- ललित शर्मा
लोथल के प्रवेश द्वार पर विनोद गुप्ता जी और लेखक प्राथमिक पाठशाला में पढते थे तो एक पाठ *सिंधुघाटी की सभ्यता* पर था। पाठ के आलेख में *मोहन जोदड़ो* एवं *हड़प्पा*, से प्राप्त खिलौने में चक्के वाली चिड़िया, मुहर...

अपेक्षा
हूँ स्वतंत्र ,मेरा मन स्वतंत्र नहीं स्वीकार कोइ बंधन जहां चाहता वहीं पहुंचता उन्मुक्त भाव से जीता नियंत्रण ना कोइ उस पर निर्वाध गति से सोचता जब मन स्वतंत्र ना ही नियंत्रण सोच पर फिर अभिव्यक्ति पर ..

सम्वेदना ये कैसी?---(श्यामल सुमन)
सब जानते प्रभु तो है प्रार्थना ये कैसी? किस्मत की बात सच तो नित साधना ये कैसी? जितनी भी प्रार्थनाएं इक माँग-पत्र जैसा यदि फर्ज को निभाते फिर वन्दना ये कैसी? हम हैं तभी तो तुम हो रौनक तुम्हारे दर पे चढ़ते ह...

आखिर कब बदलोगे तुम ?????? 
बार बार हर बार , मैंने बात तुम्हारी मान ली तुमने सूरज को चाँद कहा मै उसमे भी तुम्हारे साथ चली तुमने जब भी चाहा तुम्हारी बाँहों में पिघल पिघल सी गयी , तुम्ही को पाकर जिवंत हुई तुम्ही को पाकर मर - म...

चांदनी कहां नहीं होगी...
मैं प्राग में नहीं हूं. न आइसलैंड की यात्रा पर. न ही मेरे साथ थोर्गियर जैसा कोई मित्र है, जो सामान्य यात्राओं को अपनी उपस्थिति से उम्मीद से ज्यादा खूबसूरत बना दे. लेकिन मैं हूं वहीं कहीं. निर्मल वर्मा के...

जानती हूँ...
बन कर मेरी छाया तुमने अनुराग से दुलराना चाहा पर उलझा सा बाबरा मन तुम्हें कहाँ समझ पाया... भूल मेरी ही है जो अपना इक जाल बनाया है तुम्हीं से खिले फूल को तुमसे ही छुपाया है..... चाहती तो हूँ कि प्रिय ! तुम्हा... 

बहुत यकीन है ...
मुझे बहुत यकीन है ....तुमपे और अपने प्यार पे भी . पर..... पता नहीं क्यूँ फिर भी.... जब कभी यह ख्याल भी मन में आ जाता है कि, तुम किसी और के साथ हो तुम किसी ...

उद्धतता !
*जनता की नजर में * *किरकिरी बनने की टीस,* *अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, * *अनुच्छेद उन्नीस,* *अंतर्मुखी, दमित-शोषित को * *सच लिखना भाने लगा था, * *भद्र,उजले वेश को अन्तर्जाल, * *यम नजर आने लगा था, * *सरकशपन 

आइये ख़त्म करे धर्म और जाति की राजनीती
एक बार फिर उत्तरप्रदेश में चुनावी बयार बहने लगी है, चुनावी महाभारत में कूदने वाले रणबांकुरे महासमर पर विजय प्राप्त करने के लिए सभी नीतियों को अपना रहे है. उन्हें इस बात की चिंता नहीं है की किस तरह क्षेत्र,... 

उनके चेहरों पर मानवीय चिंताएं क्यों नहीं दिखतीं
भाई शिव प्रसाद जोशी का आलेख - अण्णा ग्रुप का भ्रमणः काश पता होता लड़ाई किससे है जनलोकपाल आंदोलन के चार सिपहसालार जो स्वयंभू टीम अण्णा है, उसका उत्तराखंड द...  

नवाब की टोपी और गरीब की झोपड़ी से दूर है चुनावी लोकतंत्र - वोट डालने की खुशी से ज्यादा आक्रोश समाया है वोटरों में इस चुनाव ने नेताओं को साख दे दी और वोटरों को बेबसी में ढकेल दिया। याद कीजिए चुनाव से ऐन पहले राजनेता...  

स्वाभिमान जगाता एक समर्पित जन समूह--राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ--RSS  
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक राष्ट्रवादी संघ है जिसकी स्थापना १९२५ में नागपुर के डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। यह संघ निस्वार्थ रूप से देश की सेवा कर र...  

वोट मांगने की विविध शैलियां - दिनेश चन्द्र जोशी dcj_shi@rediffmail.com *0**9411382560 * जैसे गायकी की विविध शैलियां होती हैं,घराने होते हैं, वैसे ही वोट मांगने की भी विविध शैलियां और घ...  

चलिए ! मिल कर करें नेताओं का हिसाब ... - उत्तर प्रदेश में चल रहे सत्ता के संघर्ष एक छोटी सी भूमिका निभाने के लिए मैने भी अपना रुख कर दिया है यूपी की ओर। महीने भर से ज्यादा समय तक के लिए रविवार को...

आंख आ गई जबकि उम्र दिल आने की थी 
जी हज़ूर , इन आंखें आने दिनों के दौर में दुनियां कित्ती परेशान है आपको क्या मालूम आप को यह भी न मालूम होगा कि आज़ आपका यह ब्लागर भरी हुई आंख से पोस्ट लिख रहा है. खैर मुहल्ले के नये नये जवान हुए लड़के-... 

अब लेते हैं आपसे विदा मिलते हैं, अगली वार्ता में, नमस्कार...   

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

लिख रहे हैं भोर की पहली किरण... ब्लाग 4 वार्ता.......संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार...सर्वप्रथम आजादी के महानायक सुभाषचन्द्र बोस को हमारा शत-शत नमन... प्रस्तुत है मेरी पसंद के कुछ लिंक्स जिसमे से कोई ह्रदयस्पर्शी हैं, तो कुछ आंदोलित करती है, तो कोई आल्हादित कर जाती हैं, कुछ ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे कोई आमने-सामने बैठकर बात कर रहा हो.  लीजिये यह है, आज की वार्ता...

श्रद्धांजली नेता जी को ! 
जैसा कि हम सभी जानते है कि आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोष का जन्म दिवस है। २८ अप्रैल १९३९ जिस दिन वे कौंग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उससे अलग हुए थे, उस... 

साबरमती, चरखा और ट्रैफ़िक ----- ललित शर्मा
सुबह उठा, तो देखा कबूतर अकेला था। प्रेम चोपड़ा के डर से कबूतरी नहीं आई। आज नामदेव जी की वापसी थी, वापसी की टिकिट हम दोनों की साथ ही थी पर मुझे तो अभी और घुमना था। सुबह कार्यक्रम बना कि साबरमती आश्रम चला जा...

शब्द चित्र-NH -30 से
posted by ब्लॉ.ललित शर्मा at NH-30 

बहुत यकीन है ...
मुझे बहुत यकीन है ....तुमपे और अपने प्यार पे भी . पर..... पता नहीं क्यूँ फिर भी.... जब कभी यह ख्याल भी मन में आ जाता है कि, तुम किसी और के साथ हो तुम किसी और के पास हो तो........ कुछ दरक सा जाता है दिल कसम...

तुम्हीं कहो मैं क्या लिखूँ..
 *तुम्हीं कहो मैं क्या लिखूँ* कुछ आस लिखूँ विश्वास लिखूँ या जीवन का परिहास लिखूँ भीगी सी वो रात लिखूँ या आँखों की बरसात लिखूँ तुम्हीं कहो मैं क्या लिखूँ तुम्हें दूर कहूँ या पास कहूँ प्यारा एक अहसास लि...

श्रद्धांजली नेता जी को !
 जैसा कि हम सभी जानते है कि आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोष का जन्म दिवस है। २८ अप्रैल १९३९ जिस दिन वे कौंग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उससे अलग हुए थे, उससे पहले के उनके कार्यों और उपलब्धियों और साथ ही इस...

"लोग समझते हैं मैं कवि हूँ"
मैं तो शब्दों के पीछे दौड़ता-भागता हूँ जैसे कोई बच्चा दौड़ता है रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे. करता हूँ इन्तजार फूलों की डालियों पर उसके बैठने का, फिर करता हूँ सहज दिखने का सजग प्रयास. धीरे-धीरे चपल...

पूर्णता , अपूर्णता 
कोई व्यक्ति कोई जगह कोई प्रश्न कोई हल .... पूर्ण है क्या ? किसी चित्रकार के चित्र में क्या सारी रेखाएं सही होती हैं ? क्या संस्कारों का एक ही परिणाम होता है ? जो तुम सोच रहे वही हर परिवेश की पृष्ठभूम...

बदल गया है विजय चौक का चरित्र
विजय चौक वैसे तो देश में सैकड़ो होंगे लेकिन देश का सबसे प्रतिष्ठित विजय चौक है संसद भवन के साथ राष्ट्रपति भवन के सामने उत्तरी और दक्षिणी ब्लाक के ठीक सामने जहाँ से शुरू

दीवाना राधे का..... 
*आज मेरी बिटिया ने फिर मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उसके स्‍कूल में रविवार को वार्षिक उत्‍सव का कार्यक्रम था। पिछले साल अपनी कक्षा में प्रथम आने के लिए उसे प्रमाण पत्र और मैडल मिला। जब वो स्‍टेज पर पुर...

प्रेम सरोवर
* ** **मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े़ में*** *** **तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है*** * ** **न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ*** * ** **ज़बान खुश्क है आवाज़ रुकती जाती है ।*** 

रामटेक-गोटेगांव, ब्राडगेज रेल लाइन को लेकर समवेत गुहार :
सिवनी। जिले के पंच परमेश्वरों की आवाज रामटेक गोटेगांव रेल लाइन के लिये बजट प्रावधान कराने के लिये देश की महापंचायत लोकसभा तक पहुचना शुरू हो गयी हैं।इस अभियान के दूसरे दौर में सिवनी विधायक नीता पटे...

कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में 
*स*मस्त सम्माननीय सुधि मित्रों को सादर नमस्कार... पिछले पंद्रह दिनों से अत्यधिक व्यस्तता ने ब्लॉग पठन - पाठन से दूर कर रखा था. अब जल्द ही नियमितता स्थापित कर लूंगा. *इस दरमियान आप सभी से मिले स्नेह के लिए...

जिंदगी
१. हैं कुछ सवाल मन में, रहते हैं उमड़ते – घुमड़ते कभी – कभी छलक आते हैं आंसू बनकर आँखों के कोरों पर और कभी पसीने की बूंदो में चमक उठते हैं मेरी पेशानी पर.. २. क्षितिज पर जमीन-आसमां क्यूँ मिलते नहीं हैं

वह और हम 
वह और हम जब परमात्मा हमारे द्वार पर खड़ा होता है हम नजरें झुकाए भीतर उसे पत्र लिख रहे होते हैं भोर की पहली किरण के साथ हर सुबह जब वह हमें जगाने आता है करवट बदल कर हम मुँह ढक के सो जाते हैंजब किसी के अधरों स...

सभी के दिलों में हमेशा अमर रहेंगे महानायक - नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
 जिन लोगों ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वस्व यहाँ तक कि प्राण तक न्यौछावर कर दिया,नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उन महान सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों में से एक हैं जिनके बलिदान का इस देश में सही आ...

" वो महकते रहें,हम बहकते रहें ...."
* * *उनकी पसंद,* खुशबू, सबेरे के अखबार की, पहली बरसात की, पिसी मेहंदी की, जले दूध की, भीगे कोहरे की, तिल के पुए की, भीगी सड़क की, सावन की रात की, और नींबू के अचार की, *मेरी पसंद, * खुशबू, उनके साथ की, उन...

हमारे शहरों के रेल मार्ग सुन्दर क्यों नहीं हो सकते ?
अमेरिका की मशहूर टी वी होस्ट ओपरा विनफ्रे की आगरा यात्रा और इस शहर की साफ़ सफाई और रख रखाव पर उनकी प्रतिक्रिया ने आगरा शहर के अधिकारियों और ज़िम्मेदार संस्थाओं को चेताया हो या नहीं कम से कम मुझे तो बहुत विचल...

देव प्रकाश चौधरी को एनएफआई नेशनल मीडिया फेलोशिप
नुक्‍कड़ ब्‍लॉग समूह की महा बधाई युवा पत्रकार देव प्रकाश चौधरी को नेशनल फाउंडेशन ऑफ इंडिया की ओर से 17वें नेशनल मीडिया फैलोशिप का अवार्ड दिया गया है। मूलत: चित्रकार लेकिन पेशे से पत्रकार देव प्रकाश बीएजी, ...

Roshi: त्रासदी
त्रासदी: सुबह पेपर में पड़ाएक युवक ने की आत्महत्या दो दिन से था पेट खाली पोस्त्मर्तम रिपोर्ट ने यह बताया गरीबी का था आलम की पूरा परिवार समां जाता ...  

गुमान ... - हम न जाने कब, धीरे धीरे चट्टान से रेत के कण हो गए खबर न हुई ! चलो अच्छा ही हुआ हमें चट्टान होने का जो गुमान था टूट गया ! शायद अब हम टूटेंगे नहीं, ...  

नवाब की टोपी और गरीब की झोपड़ी से दूर है चुनावी लोकतंत्र - वोट डालने की खुशी से ज्यादा आक्रोश समाया है वोटरों में इस चुनाव ने नेताओं को साख दे दी और वोटरों को बेबसी में ढकेल दिया। याद कीजिए चुनाव से ऐन पहले राजनेता...  

कैसा रहेगा आपके लिए 23 और 24 जनवरी 2012 ?? - मेष लग्नवालों के लिए 23 और 24 जनवरी को बुद्धि ज्ञान के मामलों के लिए महत्वपूर्ण होंगे , संतान पक्ष के मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं। किसी स...  

कृष्ण लीला .........भाग 34 
कान्हा की वर्षगांठ का दिन था आया नन्द बाबा ने खूब उत्सव था मनाया गोप ग्वालों ने नन्द बाबा संग किया विचार यहाँ उपद्रव लगा है बढ़ने नित्य नया हुआ है उत्प...  

आज मदर्स डे नहीं है, फिर भी....  
*यही एक तस्वीर मिली जिसमे आपने मुझे पकड़ा हुआ है...* माँ, पता नहीं क्यूँ आज आपकी बहुत याद आ रही है, मुझे पता है आपसे मिलकर भी आपसे कुछ नहीं बोलूँगा...  

माटी भी मोक्ष पा जाती है ...!!  
कोमल और कठोर ... स्वप्न और यथार्थ ... दो पहलू जीवन के ... दो किनारे सरिता के ...!! कभी कोमल स्वप्न ... कठोर यथार्थ ... कभी कठोर स्वप्न ... कोमल यथार्थ ..... 

तुम आई हो - बहुत अन्धकार में  हाथ को न सूझे जहा हाथ  प्यार मेरा उसको थामता है  दबी हुई रुलाई  हंसी में बदल भौचक हो जायेजैसे  इस अकेले अँधेरे  में  तुम आई हो  ... 

मिलते हैं अगली वार्ता में, नमस्कार...  

सोमवार, 23 जनवरी 2012

इस अंजुमन में हम मेहमां ही अच्छे -- ब्लॉग4वार्ता -- ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, चिकित्सा के नाम पर ठगी करना कोई नया काम नहीं  है। जिस बीमारी का कोई ईलाज नहीं उसकी हजारों दवाएं और नुश्खे  मिल जाएगें। अगर बीमारी का कारगर ईलाज मिल गया तो एक ही दवाई से ठीक हो जाती है। छत्तीसगढ के दुर्ग शहर में रहने वाले ईस्माईल मोहम्मद द्वारा शुगर के ईलाज की दवाई दी जाती थी और इसका इतना अधिक प्रचार प्रसार हो गया था कि लोग दूर-दूर से दवाईयाँ लेने आते थे। यह दवाई की कीमत भी वसूल करता था। कुल मिलाकर धंधा अच्छा चल रहा था,लेकिन दवाई लेने वालों की शुगर कम होने की बजाए बढ जाती थी। जिसके कारण कईयों को अकाल मौत का सामना करना पड़ा। मैं स्वयं इसकी दवाई का परीक्षण कर चुका हूं। प्रशासन की निगाह अब इसकी कारगुजारियों पर पड़ी है। बस सलाह यही है कि नीमहकीमों से बच कर रहे तो जीवन बच सकता है। अब चलते हैं आज की वार्ता पर, ………

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गयादेवानंद की पुस्तक 'रोमांसिग विथ लाइफ' तो पूरी तरह पढ़ी नहीं, ... पुस्तकें इतनी महंगी हो गई हैं कि पढ़ने के थोड़ा-बहुत शेष रह गए मोह के बाद भी पसंद की सारी पुस्तकों को खरीद पाना संभव नहीं। कोई अच्छा पुस्तक...वोट मांगने की विविध शैलियांजैसे गायकी की विविध शैलियां होती हैं,घराने होते हैं, वैसे ही वोट मांगने की भी विविध शैलियां और घराने होते हैं। चुनावी मौसम में इन शैलियों की अदायग...इस अंजुमन में हम मेहमां ही अच्छेदर्द की पराकाष्ठा क्या होती होगी, ये पिछली रात जान गई थी। घुटनों में पेट दबाए बिस्तर पर पड़े हुए दर्द के एपिसेंटर को समझने की पूरी रात की कोशिश नाकाम गई। पीठ था या पेट, पैर या कमर, या दर्द से फटता सिर, अबत...

प्रयोगवादप्रयोग शब्द का सामान्य अर्थ है, 'नई दिशा में अन्वेषण का प्रयास'। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रयोग निरंतर चलते रहते हैं। काव्य के क्षेत्र में भी परवर्ती युग की प्रतिक्रिया स्वरूप या नवीन युग-सापेक्ष चेतन...रविवार!रविवार अर्थात इतवार सभी का प्यारा दिन होता है, स्कूल की छुट्टी, आफिस की छुट्टी, काम-धंधे की छुट्टी! रविवार याने कि मौज मनाने का दिन, नियम-बंधन से परे होकर मनमाफिक समय बिताने का दिन या फिर लम्बी तान कर सोने...चवन्नी चैप इन तोक्योचवन्नी चैप के सोल प्रॉपराइटर और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट होल्डर भाई अजय ब्रह्मात्मज हाल ही में तोक्यो नमूदार हुए । मौक़ा था हॉलिवुड की मशहूर मकड़ी मानव शृंखला में एक और फ़िल्म की प्री-लॉन्च सेरेमनी का जो...

मेरी दो विपरीत रचनाएँइस तरह हाड तोड़ सर्दी ने * *कर दिए थे सारे उत्साह ठंडे * *जमने लगे थे सम्बन्ध * *परन्तु फिर भी श्न्वास की ऊष्मा * *उर्जावान बनाये हुए थी उन्हें * *नही तो शीत ने कहाँ कसर छोड...सूखे से बर्बाद हुआ अंकोरवाट पहले कहा गया था कि जिस शहर अंकोरवाट में दुनिया का सबसे बड़े मंदिर अंकोरवाट है, उस शहर का विनाश लंबी चली लड़ाईयों व जमीन के सही संतुलन न बनाए रखने ( अंधाधुंध दुरुपयोग ) के कारण हुआ। मगर अब नए शोध में कहा...महान -कृतिअभी पढ़ी कुछ रचनाकारों की आत्म-कथा तो ये रहस्य पाया कि वे सब रात के सन्नाटे में लिखते थे इसी तरह अपनी महान -कृति गढ़ते थे अब तो मैंने भी ठान लिया चाहे जो हो जाए मैं भी रात जगूँगी शायद एकाध महान रचना त...

बिगर परमान के मनुष्य आत्मा समानअनुभागिय अधिकारी दौरा म रिहीस। पटवारी अउ आर आई अपन-अपन दुघरा गे रिहीस। सरपंच ह अपन सारी के बिहाव म सरपंचीन दूनो अपन ससुरार म बइठे हे। गांव म कोनो हस्ताक्षर वाला सियान नइये अइसन बखत म आत्माराम ल मरना आगे। ...शब्द और लिखना ...........अब ये ही जीवन हैं लिखना उगना हैं एक विचार का , उगाना हैं ,शब्दों का और इन दोनों के मेल से अपने आप को छिलने जैसा हैं कि भीत...वह और हमवह और हम जब परमात्मा हमारे द्वार पर खड़ा होता है हम नजरें झुकाए भीतर उसे पत्र लिख रहे होते हैं भोर की पहली किरण के साथ हर सुबह जब वह हमें जगाने आता है करवट बदल कर हम मुँह ढक के सो जाते हैंजब किसी के अधरों स...

एक ठिठुरता वक्तव्ययह पूरा सप्ताह बड़े कष्ट में बीता। ठण्ड ने परेशान कर दिया। आयु के पैंसठवें वर्ष में चल रहा हूँ किन्तु याद नहीं आता कि ऐसी ठण्ड कभी भोगी-भुगती हो। मुमकिन है, आयुवार्धक्य और इसी कारण, शरीर की कम होती प्रतिरोध...लालसाएं अनगिनअनगिन लालसाएं अनगिन यात्राओं की न कोई पर्वत छूटे न जंगल न दरिया न पठार न बियाबान छूटे न सागर न रेत न तलछट न कोई...प्रवृतिआज यूँ ही छत पर डाल दिए थे कुछ बाजरे के दाने उन्हें देख बहुत से कबूतर आ गए थे खाने . खत्म हो गए दाने तो टुकुर टुकुर लगे ताकने मैंने डाल दिए फिर ढेर से दाने कुछ दाने खा कर बाकी छोड़ कर कबूतर उ...

'कविताएं अगर होती परियां'पिछले कुछ दिनों से रेडियोनामा पर ना तो शुभ्रा जी आ रही थीं और ना ही 'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' वाले स्‍तंभ की अगली कडियां। नया साल शुरू होते ही शुभ्रा जी ने दो अनमोल प्रस्‍तुतियां रेडियोनामा के लिए तै..रसोई में कुत्ता आया फिल्मों के कई गीतों में 'खस्ता' टाइप के बोल सुनाई दे जाते हैं जैसे किसी एक गाने में यह पंक्ति है - तम्बाकू नहीं है कैसे कटेगी सारी रात, बुढ़िया रोये..। प्रश्न यह है कि ऐसा साहित्यिक कृतियों में भी होता होग...ढाई बाई चार फुट की चौकीढाई बाई चार फुटकी चौकी जिसके चारों तरफलगे हैं हर कोनों पर उठेलकड़ी के मुठ्ठों से जुड़ी अलमुनियम के रॉडकी रेलिंग एक बच्चे के रात में सोतेसमय बिस्तर से गिरतेरहने की चिंता का परिणाम सुरक्षित पलंग। ...

नम निगाहें लिए...... मुस्कुराती रहीनम निगाहें लिए...... मुस्कुराती रही. इक सदा अनसुनी.... याद आती रही. अब कहाँ जाऊं ....अपनी खताएँ लिए, पहले सब गलतियाँ... माँ छिपाती रही. बिगड़े मौसम में भी लहरों पर बढ़ चली, कश्ती तूफ़ान को..... आजमाती रही....तिरंगा कहाँ छूट गयाइस आशा में कि फिर हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति का समुद्र हिलोरें लेगा। आप सब को २६ जनवरी की ढेरों शुभकामनाएं। जय हिंद। चार-पांच दिनों बाद फिर एक बार तिरंगे की पूछ होगी। एक बंधी-बधाई परम्परा की जैसे खान...वज्र विश्वास..मज़बूत विश्वास की जड़ किसी तूफ़ान बहाव से नहीं हिलती विश्वास पानी में उठता बुलबुला नहीं जो मिट जाये एक पल में ही विश्वास सिद्धांतों से अडिग हैं जो नहीं बदलते किसी भी प्रयोग से....

वार्ता को देते हैं विराम,  मिलते हैं अगली वार्ता में, तब तक पढिए -फ़ेसबुकिया कबूतरी की गुड मार्निंग
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एक चटका इधर भी हो जाए

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