ललित शर्मा का नमस्कार, मित्रों एक सप्ताह की गैर हाजरी के पश्चात आज वार्ता पर पुन: उपस्थित हुआ हूँ, इस दौरान संध्या जी ने मोर्चा संभाल रखा था। इस अवधि में कई अच्छी पोस्टें आई, अब समय निकाल कर सिलसिले वार पढा जाएगा। स्वराज्य करुण जी ने एक गंभीर विषय को लेकर आलेख लिखा है। हिन्दी के सरलीकरण के नाम पर भाषा को बिगाड़ने का षड़यंत्र हो रहा है। हिन्दी वाक्य में अंग्रेजी के शब्द भी घुसेड़े जाएगें, जिन्हे अनचाहे ही लोगों को झेलना पड़ेगा। हिन्दी के सरलीकरण के नाम पर यह सही नहीं है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। हिन्गलिश के पक्षधरों ने लार्ड मैकाले को भी पीछे छोड़ दिया। मैकाले ने हमारी शिक्षा पद्धति को बदल डाला तो उसके मानस पुत्र हमारी भाषा को ही बदल डालने के फ़ेर में हैं। अब चलते हैं आज की ब्लॉग4वार्ता पर..........।
सत्ता की सांप-सीढ़ी का खेल सीबीआई जारी है, पर सुकून गायब है, क्यों कि अन्ना भाई ने एलान कर दिया है कि अब कम ही सक्रिय रहूंगा मैं इंटरनेट पर , भैया हमारे कहने से तो माने नहीं, अच्छा हुआ हकीम के कहने से मान गए। क्योंकि एक होता है बाघ और एक होता है बघेरा, जब दिन निकले तब समझो सबेरा।बाली जात्रा महोत्सव हो रहा है, रात की गीली हथेली पर सरसों जमाई जा सकती है, है ना कमाल का करिश्मा।हिंदी उर्दू के पंख उग आए हैं, परवाज सात समंदर पार है, यात्रा जारी है, हरकीरत हीर जी ने अभूतपूर्व साहित्यिक दस्तावेज’ सौंपा है, अब जाकर ही देख आईए, किसे और क्यों सौंपा है। हम तो देख आए, पर टिपियाएगें बाद में, अभी चौखट पर खड़े पवन चन्दन और वार्ता का सफ़र जारी है।
उद्घोष हो रहा है एक नई इंकलाबी चाहिए, ले आईए भाई हमे कौनो इतराज नहीं है, हमें भी एक नयी रकाबी चाहिए, टूट गयी हो हल्ले में, गदर मचा है मुहल्ले में। अब कुछ कुछ मुस्काने की बात करो तो बात बने।आहिस्ता आहिस्ता बढते हैं, एक सवाल है देश की असली संसद कौन सी? अब जवाब आप दीजिए या अन्ना भाई से लीजिए। ठंड बढ रही है सर्द रात ख्वाबों में बड़ा कहर व्यापा है, सपने बहुत डराते है, नहीं डरना चाहिए डरावने सपनों से क्योंकि ज़माना बदल गया है अब हमें भी बदलना चाहिए। संसार के खत्म होने से पहले माया पुजारियों ने विशेष धार्मिक कर्मकांड शुरू किए। अब देखते हैं संसार बचता है कि प्रलय आता है।
ब्लॉगोत्सव में टोपी, मफलर साथ लायें जी नहीं सांपला कोई हिल स्टेशन नही है, लेकिन पिछले ३-४ दिनों से बढती ठंड ने टोपी, मफलर को अनिवार्य कर दिया है। और रात के समय ७:०० बजे से १२:३० बजे तक कवि सम्मेलन में बैठना है तो जितनी एहतियात बरती जाये, मातृत्वब्लॉग जगत में आये मुझे लगभग ढाई साल हो गए है.इस समय में जो भी लिखा वो आप सभी लोगो ने सराहा.जिससे मुझे ओर लिखने की हिम्मत मिली .बीच बीच में कुछ रुकावटें भी आयी जिससे लिखना कम हुआ लेकिन लिखने का शौक ओर आपका...
इतना सा फसानाक्रिसमस का समय है. बाजारों में ओवर टाइम हो रहा है और स्कूलों में छुट्टी है .तो जाहिर है की घर में भी हमारा ओवर टाइम होने लगा है.ऐसे में कुछ लिखने का मूड बने भी तो अचानक " भूख लगी है ........या .."तू स्टुपि...हद-ए-वफ़ा क्या है आख़िर?नैना को पहली बार देखा था तो हैरान रह गई थी। कोई इतना भी ख़ूबसूरत हो सकता है? रौशन चेहरा, गोरा रंग, तीखे नक्श और चेहरे पर चमकती मुस्कान। हम पड़ोसी थे लेकिन सीढ़ियों पर आते-जाते एक-दूसरे का हाल पूछने के अलाव...घर का शौहर !
रेत के शिल्प में घरइधर हाल में गौतम चटर्जी को पढ़ने का अवसर मिला. उनकी कविताओं में जीवन के प्रति जिजीविषा, मृत्यु बोध और दर्शन की छाप जितनी गहन है, उतनी ही सरल उनकी भाषा भी है. फिलहाल एक प्रिय कविता और साथ में साल्वाडोर डा...कैसे बिछी लोकपाल पर मठ्ठा डालने की सियासी बिसातयह पहला मौका है जब सरकार ने किसी बिल को पेश करने से ज्यादा मशक्कत बिल पास न हो इस पर की। और अन्ना टीम को बात बात में पहले ही यह संकेत दे दिया गया कि अगर वाकई लोकपाल के मुद्दे में दम होगा तो आने वाले वक्त म...मेहरबानों के घर के बाहर
चलते चलते व्यंग्य चित्र
मिलते हैं ब्रेक के बाद, राम राम




