नमस्कार, गणतंत्र दिवस मनाया गया। सरकारी कार्यक्रम हुए, झंडा फ़हराया गया। बुंदी बांटी गयी, देशभक्ति के गाने बजाए गए। नेताओं के भाषण हुए, लेकिन राशन के मुल्य में कमी की कोई बात नहीं हुई। राज्यों से लेकर दिल्ली तक सभी ने अपनी उपलब्धी के ढोल पीटे। तिरंगे को लेकर दिन भर राजनीति चलती रही। दिल्ली की परेड में ब्रह्मोस मिसाईल को पेश किया गया, सेना में शामिल करने के लिए। अब चलते हैं ब्लॉग नगरिया की सैर पर, पेश करते हैं कुछ पोस्ट लिंक ब्लॉग4वार्ता पर.....
सबसे पहले चलते हैं NEWS 36 पर जहाँ अहफ़ाज रशीद ने कहा है पत्रकार की हत्या और पत्रकारों की राजनीति हो रही है।क्या ये बात सच है कि जैसा राजा होता है प्रजा भी वैसी ही होती चली जाती है. एक पत्रकार की हत्या ने फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है. छुरा के पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या ने एक और सवाल दागा है कि पत्रकारिता क्यों और किसके लिए?
आगे कहते हैं--नई दनिया ने मृतक उमेश को अंशकालिक पत्रकार बताया है. अब मुझे कोई बताएगा कि ये अंशकालिक और पूर्णकालिक क्या होता है. आज ही बताना ज़रूरी था कि उमेश अंशकालिक पत्रकार था. अपना रक्षा धन जमा करके बिना तनख्वाह के और अपनी जान हथेली पर रखकर पत्रकारिता करने वाले अंशकालिक? कौन है पूर्णकालिक? अब तो पत्रकरों को सोचना ही पड़ेगा कि हम आखिर पत्रकारिता में आये क्यों हैं? और किसके लिए कर रहे हैं पत्रकारिता ? आगे यहाँ पर
मटुक जूली का फेविकोल जोड़ तगड़ा है। जो आज तक नहीं छूटा। लोगों ने उदाहरण भी दिए। इस पर मटुक नाथ कहते हैं - मटुक-जूली के प्रेम के टिकाऊपन का कारण ढूँढ़ने की कोशिश लोगों ने क्यों नहीं की ? अनुमान क्यों नहीं भिड़ाया ? क्या उनलोगों में विचार करने की क्षमता नहीं है ? उल्टा सीधा अनुमान भी नहीं लगा सके ! क्यों हमदोनों का नाम आते ही वे अपनी-अपनी मनोग्रंथियों में सिकुड़ गये ? यह बात तो सच है कि स्कूल-कॉलेजों में मौलिक ढंग से विचार करना नहीं सिखाया जाता। इसलिए वे विचार अगर नहीं कर पाये तो कोई आश्चर्य नहीं। विचार न सही, अगर वे प्रेम कर रहे होते तो दूसरों के प्रेम को समझने की क्षमता उनमें अपने आप आ गयी होती।
तानपुरा और जीवन के विषय में लिखा है प्रवीण पाण्डेय ने वे कहते हैं -हम सबके व्यक्तित्व में एक तानपुरा बसता है, जो एक आधार बनाता है, एक दृष्टिकोण बनाता है, घटनाओं और व्यक्तित्वों को समझने का। उत्थान-पतन, लाभ-हानि आदि द्वन्दों से भरा है हम सबका जीवन पर इन सबके बीच जो विश्राम की निर्द्वन्द स्थिति आती है, वही हमारे तानपुरे की आवृत्ति है। व्यक्तिगत सम्बन्धों में उत्पन्न कर्कशता, जीवन को उन स्वरों में ले जाने के कारण होती है, जो औरों के व्यक्तित्व के तानपुरे के साथ संयोजित नहीं हो पाते हैं।
आगे लिखते हैं -- आप माने न माने, आपका जीवन समाज के तानपुरे को बल देता है और उससे प्रभावित भी होता है। आपका हलचलविहीन जीवन भले ही आपको भला न लगे पर वह हर समय उस तानपुरे का सृजन कर रहा होता है जिसकी आवृत्ति पर आने वाली पीढ़ियाँ सुर मिलायेंगी। हमारे पूर्वज जिनका नाम इतिहास की पुस्तकों में नहीं है, हमारे वयोवृद्ध जो उत्पादकता के मानकों पर शून्य हैं, वे जनसामान्य जिनका जीवन विशेष की श्रेणी में नहीं आता है, सबने वह आधार निर्माण किये हैं जिस पर हम अपने उत्थानों के स्वर सजाते रहते हैं।
अशोक बजाज ग्राम चौपाल पर लिखते हैं --किसी भी नागरिक को अपने देश के किसी भी भू-भाग में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की स्वतंत्रता है। स्वतंत्र भारत का ध्वज तिरंगा है और इसे भारतीय गणतंत्र के किसी भी भू-भाग में फहराया जा सकता है यह विडंबना ही है कि भारत एक मात्र देश है जहॉं पर राष्ट्रीय पर्व के दिन ध्वज फहराने को लेकर विवाद उत्पन्न हो रहा है। विवाद उत्पन्न करने वाले लोग यह तर्क दे रहें हैं कि तिरंगा अगर फहराया गया तो कश्मीर में शांति भंग हो जायेगी। जिस तिरंगे की आन-बान और शान के लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी तथा अनेक वीर सपूत हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटक गये ।
अलबेला खत्री कहते हैं --ये देख कर आज मन लज्जित हैएक ईमानदार प्रशासक यशवंत सोनावणे को ज़िन्दा जलाने वालों को रोकने वाला कोई नहीं............ लेकिन अपने ही मुल्क़ में तिरंगा यात्रा रोकने वालों के लिए पूरा तन्त्र सज्जित है--दिनेश राय द्विवेदी जी कहते हैं जनशिक्षण और जनसंगठन के कामों में तेजी लानी होगी आज से 61 वर्ष पूर्व दुनिया का सब से बड़ा लिखित संविधान अर्थात हमारे भारत का संविधान लागू हुआ। इसे भारत की संविधान सभा ने निर्मित किया। संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के तीन मंत्रियों के प्रतिनिधि मंडल,.
आशा जी लिख रही हैं वह एक बादल आवारा वह एक बादल आवारा इतने विशाल नीलाम्व्बर में इधर उधर भटकता फिरता साथ पवन का जब पाता | नहीं विश्वास टिक कर रहने में एक जगह बंधक रहने में करता रहता स्वतंत्र विचरण उसका यह अलबेलापन भटकाव और दीवानापन स्थिर् मन रहन.26 जनवरी विशेष...गणतंत्र का ये कैसा उत्सव...खुशदीपपिछले पांच दिनों में गणतंत्र के सफ़र के कुछ पहलुओं को आप तक पहुंचाने की कोशिश की...इस तरह की पोस्ट पर तात्कालिक सफ़लता बेशक न मिले लेकिन इनका महत्व कालजयी रहता है...नेट के ज़रिए अतीत में झांकने वालों को क...
पद्मावलि » जय हिंद गणतंत्र दिवस पर ब्लॉग परिवार को मंगल कामनाएँ ! एक बहुत बड़ा पेड़ था जिसपर हज़ारों पक्षी रोज़ अपना बसेरा करते थे. किसी दिन उस पेड़ में आग लग गयी…तथापि पक्षियों ने उसी पेड़ पर रहते हुए जल मरने का निर्णय लिय…. भीमसेन जोशी, मन्नाडे और बसन्त बहार भारतीय शास्त्रीय संगीत परम्परा की मूर्धन्य मनीषी पण्डित भीमसेन जोशी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण किस्सा विख्यात पाश्र्व गायक मन्नाडे ने टिप्पणीकार से एक अन्तरंग बातचीत में बताया था जो फिल्म बसन्त बहार से जुड़ा है..
क्या फिर में कोटा में पैदा हो गयानया जन्म देने वाले एक बच्चे ने लेबर रूम में पैदा होते ही नर्स से पूंछा नाश्ते में क्या हे ? नर्स ने कहा कचोरी और पकोड़ी ..... बच्चा उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़् ....... इस जनम में फिर से कोटा में पैदा होग...बंगलौर यात्रा और दो दो ब्लोगर्स मीट की रिपोर्ट :- देवसबसे पहले मेरे मित्रों... सभी देशवासिओं को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएं..... बाकी सब भला-बुरा अलग अलग हैं.... अपने लिए तो आज का दिन छुट्टी का दिन है और दिन भर घर पर बैठे बैठे कुछ अपनी सुनाने का दिन...
गणतंत्र दिवस पर सूरज से हुई कुछ बातचीत आज राजेन्द्र जी की पोस्ट पढ़ छत पर गई तो देखा ...सूरज धुंध की चादर ओढ़े बादलों की ओट में है ....मुझ से रहा न गया ...खूब छेड़ा- छाडी हुई ...आरोप-प्रत्यारोप लगे ....शायरों पर छींटा- कशी हुई ....कुछ मासूम से जवा..."हेप्पी रिपब्लिक डे"प*रेड ग्राउंड से वापस आते हुए मैंने उसे देखा... सड़क किनारे सिर झुकाए बैठा था. निकट ही बड़ी सी गठरी रखी थी. मैं बगल में बैठ गया, धीरे से कंधे पे हाथ रखा तो उसने चौंक कर सिर उठाया.... यह क्या...? मैंने कहा...
एक और तमाचा...सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा .....हर जगह आज यही पंक्तियाँ बजती सुनाई दे रही हैं. हर कोई देश भक्ति की भावना से लवरेज दिखाई पड़ता है, अंतर्जाल तिरंगों से भरा पडा है ,.राजपथ से ऐतिहासिक लाल किले तक आठ...मिले शायद कभी ?कई देर बाद लगता है कुछ दूरी तक किसी के साथ चलते हुए हम कितना जुड़ गए थे उससे आज जब चल रहे है अकेले तब याद आया है वो वक़्त जब हम चले थे साथ लिए हाथ मैं हाथ बनाये थे हमने कई नए रास्ते कितने ही बोये ...
ऐंटरटेन रिव्यू : माटी की सौंधी महक मितान-420छत्तीसगढ़ी फिल्मों में परंपरा और संस्कृति को लेकर बुद्धिजीवी हमेशा सवाल उठाते रहे हैं। खासकर पत्रकार तो हर कांफ्रेंस में ‘संस्कृति-परंपरा’ वाला एक प्रश्न दागकर डायरेक्टर का कान ऐंठ ही देते हैं। डायरेक्टर भ...आज़ाद हिंदुस्तान में तिरंगे का अपमान!आज 62वें गणतंत्र पर सारे देश ने जो तस्वीरें देखीं उसने हिंदुस्तान को पानी-पानी कर दिया है. 62वें गणतंत्र दिवस पर हम सभी एक बार फिर स्वतंत्रता का अर्थ तो सिखा दो इनको भीजी यशवंत सोनवाने को व्यवस्था ने मारा है *आत्म केंद्रित सोच स्वार्थ और आतंक का साम्राज्य है.चारों ओर छा चुका है अब तो वो सब घट रहा है जो इस जनतंत्र में कभी नहीं घटना था. कभी चुनाव के दौरान अधिकारी/कर्मचा...
चलते चलते एक व्यंग्य चित्र
वार्ता को देते हैं विराम मिलते हैं ब्रेक के बाद, आप सबों को गणतंत्र दिवस की बहुत बधाई और शुभकामनाएं..









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