शनिवार, 27 मार्च 2010

चिट्ठा चर्चा नहीं पोस्ट-चर्चा करता हूं

मैं कहाँ कौन से, चक्रव्यूह में हूँ .. विवेक रस्तोगी जानना चाह रहें हैं अपनी कविता में और संजय भास्कर जी ने आज जो भी बात की है वो व्हाया महफ़ूज़ अली फ़र्माते हैं मैं अपना सारा दर्द देख कर तुम्हारी मुस्कान और बदमाशियां.... मैं जी उठता हूँ, जब तुम, लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में,कहती हो....... मेरे बहुत करीब आकर कि रहेंगे हम साथ हरदम...सतीष सक्सेना जी की राय है कि ब्लाग जगत से अधिक उम्मीद न रखी जाये ” ठीक ही सोच रहे हैं . मनविन्दर जी की कविता के क्या कहने आज देखिये कितनी अदभुत बात लिखी है उन्हौने ”दो सहेलियां एक देह में रहतीं हैं” उधर रानी विशाल जी ने तो कमाल कर दिया गार्गी गुप्ता भी कमतर नहीं हैं अभिव्यक्ति पर  ”न आस पड़ोस न प्रेयसी प्रेमी न अब रिश्तेदारों से अपना नाता है आधुनिक जीवन की महिमा है की अब इगो ही बीच में आता हैताउ डाट काम  पर .बुडुउ ब्लागर एसोसियेशन के लिये चिंता ज़ायज़ है महेन्द्र मिश्रा जी निरंतर कर रहे हैं  मीत जी से मै  ब्लागिंग की शुरुआत में कई बार संपर्क की कोशिश की किन्तु जानें क्यों वे मुझसे बात नहीं कर पाये किंतु बावज़ूद इसके बाकायदा उनके ब्लाग पर मुझे जाना पसंद है आप भी पाड्कास्टर मीत की प्रस्तुति का आनंद लीजिये यहां ,आज अदालत पर यह पोस्ट देखने योग्य है , नेकी कर दरिया में डालने की सलाह भी ठीक ही  है उधर ललित जी एक बडी यातना भोग रहे हैं उनकी प्रेयसी उनसे रूठी हुई है न घर में चैन न बाहर सुकून  बी एस एन एल कम्पनी ने इन के  कनैक्शन में हेराफ़ेरी कर बाधा दाल दी  है तब से बजरंग बली की पूजा-पाठ किये जा रहें हैं आज शनिवार को शायद इनकी सुनवाई हो रचनाकार ने यशवंत कोठारी जी का   लोकतंत्र की लंगोट पर प्रभाव शाली आलेखन पेश किया है . मुलायम जी की मांग देखिये संसदनामा पर नाम मुलायम है और देश को कितनी कठोरता से कांटने-बाटने का काम करते हैं  आज लड्डू बोला कि अपना दिमाग जांचिये तो ठीक है जांच लेता हूं. इन्जीनियर साहब . और अंत में मिसफ़िट पर ”स्वर साधिका तापसी नागराज़ पर लिखे आलेख को देखने का  अनुरोध है 

   झटपट 

जो अच्छा लगा वो है :- सारथी पर प्रकाशित आलेख .जी के अवधिया जी का आलेख देखिये :-” कुत्ते का भी एक दिन आता है काम की बकवास पर प्रकाशित आलेख  के सम्बन्ध में मेरी राय इतर है की बात निकलेगी दूर तलक जायेगी भगवान ,अल्लाह, प्रभू को परा-ध्वनियां ही परिभाषित कर सकतीं हैं न किसी भी व्यक्ति,धर्म,संप्रदाय,समाज़ के पास न तो वो शब्द हैं जिनसे परमआत्मा की मीमांसा की जा सके, न ही किसी में ऐसी ताकत ही है मेरे अन्तस के ब्रह्म को आप क्या कोई भी परिभाषित कैसे कर सकता है. मेरे अंतस के ब्रह्म या कहूं राम को मेरे अलावा कोई दूसरा परिभाषित करे बचकानी बात होगी चाहो तो मेरए पोर पोर को चोट करो या सलीब पे लटकाओ..........................

 

7 टिप्पणियाँ:

अच्छी चर्चा.....

धर्म के जानकार लोगों से माफी सहित ....
धर्म के बारे में लिखने ..एवं ..टिप्पणी करने बाले.. तोता-रटंत.. के बारे में यह पोस्ट ....मेरा कॉमन कमेन्ट है....
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html

बहुत सुंदर और बेहतरीन

रामराम.

-ताऊ मदारी एंड कंपनी

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