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शनिवार, 17 नवंबर 2012

नमक इश्क़ का , एक पल कुन्दन कर देना ...ब्लॉग 4 वार्ता ...संगीता स्वरूप

आज की वार्ता में संगीता स्वरूप  का नमस्कार ----

औरत की आज़ादी के मायने from उसने कहा था... by Madhavi Sharma Guleri

आज़ादी, स्वतंत्रता, फ्रीडम... कानों में इन शब्दों के पड़ते ही एक सुखद, प्यारा-सा अहसास मन को हर्षाने लगता है। ये शब्द उस अनुभूति को परिलक्षित करते हैं जो संसार के हर इंसान को प्यारी है। क्या है यह आज़ादी, क्यों है यह इतनी प्रिय हर किसी को? और आज़ादी में भी अगर हम ख़ासकर औरतों की आज़ादी की बात करें तो क्या इसके मायने बदल जाते हैं?>>>आगे


कैसा होमोसेपियंस? from कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** by रंजना [रंजू भाटिया]


अभिषेक पाटनी की लिखी यह पंक्तियाँ उनके परिचय के साथ जब पढ़ी थी तो ही वह विशेष लगी थी और जब उनका संग्रह कैसा होमोसेपियंस पढ़ा तो उत्सुक हुई यह जानने के लिए कि आखिर इसका नाम इस तरह का क्यों रखा गया ? हिंदी कविता का संग्रह और नाम वैज्ञानिक ?जो विज्ञान में रूचि रखते हैं उनके लिए यह नाम नया नहीं हो सकता है पर हिंदी कविता संग्रह के लिए यह नाम जरुर कुछ अनोखा लगता है>>>>आगे

इसका होना ही प्रेम है !!!  from SADA by सदा

कुछ शब्‍दों का भार आज
कविता पर है
वो थकी है मेरे मन के बोझ भरे शब्‍दों से
पर समझती ह‍ै मेरे मन को
तभी परत - दर - परत
खुलती जा रही है तह लग उसकी सारी हदें
उतरी है कागज़ पर बनकर>>>>>>>>>>>>>
आगे


शिक्षा - क्या और क्यों ?    from न दैन्यं न पलायनम् by noreply@blogger.com (प्रवीण पाण्डेय)


शिक्षा का नाम सुनते ही उससे संबद्ध न जाने कितने आकार आँखों के सामने घुमड़ने लगते हैं। कुछ को तो लगता होगा कि बिना शिक्षा सब निरर्थक है, कुछ को लगता होगा कि बिना लिखे पढ़े भी जीवन जिया जा सकता है।आगे


क़तारों से क़तरे उलझते रहे  from ठाले बैठे by NAVIN C. CHATURVEDI

हो पूरब की या पश्चिमी रौशनी

अँधेरों से लड़ती रही रौशनी

क़तारों से क़तरे उलझते रहे

ज़मानों को मिलती रही रौशनी>>>>>>आगे


" के.वाई.सी. ......."  from "बस यूँ ही " .......अमित by Amit Srivastava


आजकल एक फैशन आम हो चला है ," के.वाई.सी. " का ,अर्थात 'know your customer' | कभी बैंक से नोटिस  आती है और कभी गैस कंपनी से कि ,कृपया अपना के.वाई.सी. करा लें नहीं तो आपकी सेवायें बंद कर दी जायंगी | दसियों साल से अधिक से बैंक में , गैस कंपनी में निरंतरता बनी हुई है फिर भी अपनी शिनाख्त वहां कराना आवश्यक माना जा रहा है >>>>आगे


सरहद और नारी मन  from nayee udaan by उपासना सियाग

सरहद पर जब भी
युद्ध का बिगुल बजता है
मेरे हाथ प्रार्थना के लिए
जुड़ जाते हैं
दुआ के लिए भी उठ जाते हैं>>>>
आगे


अपने पूर्वजों जैसी हरकत करना भी एक कला है ---  from अंतर्मंथन by डॉ टी एस दराल

आपने बंदरों को कूदते फांदते अवश्य देखा होगा . कैसे एक मकान की छत से दूसरे मकान की छत पर या एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूद फांद करते रहते हैं . इन्हें देखकर कई बार लगता है -- काश हम भी ऐसा कर पाते. हालाँकि कहते हैं , हमारे पूर्वज भी तो बन्दर ही थे. लेकिन फिर मानव ने विकास की पथ पर अग्रसर होते हुए अपने लिए सभी सुख साधन जुटा लिए.>>>>>आगे

विक्रम और वेताल 6  from ज़रूरत by Ramakant Singh

राजन
आप ही परमपिता की संतान हो?
हो गई इति?
पूरी कर ली
मन की मुराद?
क्या मिल गया तुम्हें
वातावरण को दूषित करके?>>>>>
आगे


नमक इश्क़ का  from Madhushaalaa by Madhuresh

इक बूँद इश्क़िया डाल कोई तू,
मेरे सातों समंदर जाएं रंग !!'
... कितना गहरा होता होगा इश्क का रंग, कि एक ही बूँद काफी होता है सातों समंदर रंगने के लिए !
आजकल का modern इश्क़ जाने इन एहसासों से परे क्यों लगता है ...>>>>>
आगे

चली बिहारन थोड़ी और बिहारी बनने!  from मैं घुमन्तू by Anu Singh Choudhary

मैं दिल्ली में रहनेवाले बिहारियों के उस तबके में शामिल नहीं जो साल में सिर्फ दो ही बार घर जाता है – छठ पर और होली में। मैं उन लोगों में से भी नहीं जो अपने परिजन, कुल-बिरादर, लोग-समाज, दोस्त-यार, अड़ोसी-पड़ोसियों से साल में दो-एक बार ही मिल पाते हैं। मैं उन लोगों में से भी नहीं जो छह महीने खटकर घर जाएंगे तभी जेब में इतना रुपया आएगा कि जिससे परिवार के छठव्रतियों के लिए सूती धोतियां, सूप, अर्घ्य देने के लिए केतारी, नारियल, नींबू और फल-फूल खरीदा जा सके।>>>>>आगे

तेरी धधकती आँखों का स्पर्श  from swati by swati

तेरी धधकती आँखों का स्पर्श
              इक गले की हँसली से ठीक नीचे का गड्ढा झुलसता है
              फिसलती है इक सोच तेरे कंठ मेंकुछ सांसें अटक जाती हैं, मेरी भी>>>>>
आगे

उठते-उठते उठता है तूफ़ान कोई   from ग़ज़लगंगा.dg by devendra gautam

हैवानों की बस्ती में इंसान कोई.
भूले भटके आ पहुंचा नादान कोई.
कहां गए वो कव्वे जो बतलाते थे
घर में आनेवाला है मेहमान कोई.>>>>>
आगे

रस्म बन कर रह गयी ..... from उन्नयन (UNNAYANA) by udaya veer singh

रस्म   बन    कर   रह  गयी  है
रस्म    अदायिगी   कर  रहे  हैं -
जल  रहा  हर  शख्स    अन्दर ,
दीये   ही   बाहर  जल   रहे  हैं->>>>आगे


इक पल कुंदन कर देना  from वाग्वैभव by vandana

तम हरने को एक दीप

तुम मेरे घर भी लाना

मृदुल ज्योति मंजु मनोहर

उर धीरे से धर जाना>>>>>आगे

आस्था का महापर्व - छठ   from मधुर गुंजन by ऋता शेखर मधु

कार्तिक महीना त्योहारों का महीना हे| करवा चौथ तथा पंचदिवसीय त्योहार दीपावली मनाने के बाद अब आ रहा हे आस्था का चारदिवसीय महापर्व- छठ पर्व| दीपावली के चौथे दिन से इस पर्व की शुरुआत हो जाती है|>>>>आगे

तेरी सासों में क़ैद, मेरे लम्हे  from जुदा जुदा सा, अंदाज़-ए-बयां by शबनम खान

वो लम्हे

तेरी सांसों में क़ैद

जो मेरे थे

सिर्फ मेरे,

जिनमें नहीं थी

मसरूफियत ज़माने की

रोज़ी-रोटी कमाने की>>>>>>>आगे


और अंत में ----
कार्टून:-ये तस्‍वीर है कि‍ बदलती क्‍यों नही



आज की वार्ता बस इतनी ही .... फिर मिलते हैं ...नमस्कार

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

हमारे यहाँ सातवाँ कब आएगा ? आखिर इतना मजबूत सीलेंडर लीक हुआ कैसे ? ब्लॉग4वार्ता ...संगीता स्वरूप

आज की  वार्ता में संगीता स्वरूप  का नमस्कार ---- एक विशेष  सूचना --

भारतीय महिला पत्रकारों की संस्था, इंडियन वीमेन प्रेस कॉर्प वाणी प्रकाशन के साथ मिलकर हिंदी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन करने जा रही है। इसके पहले अंग्रेजी में भी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसे भरपूर सराहना मिली। इसी के मद्देनजर व्यापक हिंदी पट्टी को ध्यान में रखते हुए हिंदी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है।
कहानी प्रतियोगिता की थीम है--समकालीन समाज में संबंधो की बदलती परिभाषा। कहानी की शब्द संख्या अधिकतम 3.000 हो। प्रतियोगिता में तीन कहानियों को पुरुस्कृत किया जाएगा। प्रथम पुरस्कार-11,000 रुपये,दूसरा एवं तीसरा पुरस्कार-7.000 रुपये। पुरस्कार के लिए कहानियों का चयन करेंगी देश की जानी मानी महिला कथाकारो की तीन सदस्यीय ज्यूरी चयनित करेगी। कहानी मौलिक एवं अप्रकाशित होनी चाहिए। किसी भी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानी पर विचार नहीं किया जाएगा। इसका स्पष्ट उल्लेख एक पत्र में करें। बाद में चुनिंदा कहानियों का एक संकलन वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किया जाएगा, जो अगले साल होने वाली विश्व पुस्तक मेले में धूमधाम से रिलीज होगी। यह प्रतियोगिता सभी महिला रचनाकारो के लिए खुली है सिर्फ हमारे क्लब की पदाधिकारी और मैनेजिंग कमिटि की सदस्य भाग नहीं ले सकतीं।
सभी रचनाकारो से अनुरोध है कि वे अपनी कहानी के दो टाइप प्रिंट इस पते पर भेजें--Indian Women's Press Corps, (Hindi Story Competition), 5 Windsor Place, New Delhi- 110001. कहानी के साथ आपका नाम, पता और मोबाइल न. साफ साफ लिखा होना चाहिए। साथ ही आप कहानी ईमेल पर भी भेजे। ईमेल पता है--iwpchindistory@gmail.com
कहानी सिर्फ यूनीकोड, चाणक्य और क्रुतिदेव फॉन्ट में टाइप हो- कहानी भेजने की अंतिम तारीख--15 नवंबर,2012 है। (प्रेस रिलीज)
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612929 पर संपर्क कर सकते हैं।

चलिये  चलते हैं आज की वार्ता पर ----

“उसके उड़ाये कौवे कभी डाल पर ना बैठे” : कहावत......मेरे सामने में भी अक्सर ऐसे लोग आते रहते है जो अपना काम निकलवाने के लिए अक्सर बड़ी बड़ी डींगे हांकते है, मुझे बड़े बड़े सब्ज बाग तक दिखा देते है,

बस इतना जानूँ

तुझे माँ कहूँ
या कहूँ वसुन्धरा
अतल सिन्धु
कल- कल सरिता
भोर किरन

सत्याग्रहियों का उत्साह बढ़ता गया.......8 अगस्त जनरल स्मट्स के आमंत्रण पर गांधी जी प्रिटोरिया पहुंचे। बोथा, स्मट्स और प्रोग्रेसिव पार्टी के सदस्यों ने वैलिडेशन बिल में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया जिसमें यह कहा गया था कि TARA स्वेच्छा से पंजीकरण कराने वालों और बच्चों पर लागू नहीं होगा। 21 अगस्त ट्रांसवाल की विधान सभा में स्वैच्छिक पंजीकरण वैलिडेशन बिल को हटा लिया गया

मेरे कदम......

न वो चिनार के बुत,
न शाम के साए,
एक सहज सा रस्ता,
न पिआउ, न टेक |

संवाद.........

तुम जानती हो?
कि मैं सब कुछ जानता हूं
सब कुछ?
लेकिन तुम्हारी आँखों ने तो
कभी कुछ नहीं कहा

पर भाव तो निरा निरक्षर है...

वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
                 बस थोड़े से ही अक्षर हैं
                कुछ और मैं कहना चाहूँ
             पर भाव तो निरा निरक्षर है

मलाला  युसुफजई
राख का ढेर समझा तुमने 
जहाँ  दबे पड़े थे  शोले  !
लो ,उड़ी एक चिंगारी  ,
मलाला यूसुफ़ज़ई !

आखिर इतना मजबूत सीलेंडर  लीक हुआ  कैसे ?
इसका ज़वाब तो भ्रष्टाचार की पटरानी के पास भी नहीं है .यह वाड्रा को आगे करके रंग भूमि से जो खेल खेल रहीं थीं यही इस नाटक की सूत्र धार थीं
.अपना मंद मति बालक तो इतने पासे एक साथ फैंक ही नहीं सकता .उसमें  इतनी अकल  ही नहीं है .

एक गीत -माँ ! नहीं हो तुम

माँ !नहीं हो
तुम कठिन है
मुश्किलों का हल |
अब बताओ
किसे लाऊँ
फूल ,गंगाजल |

" हमारे यहाँ सातवाँ कब आयेगा......


सातवाँ बहुत खूबसूरत है | महंगा तो अवश्य है ,परन्तु है, सब से हटकर | उसको लेने वाले भी अलग से दिखते हैं | मुझे लाइन में लग कर यह कहने में ही हीनता हो रही थी कि मेरा तो अभी तीसरा ही है | मैं शक्ल से दीन हीन तो लगता ही हूँ ,मेरे साथ मेरा सिलंडर भी शर्माते हुए जमीन में धंसा जा रहा था | सातवें और उससे अधिक वालों की लाइन एकदम अलग

अधूरी हसरतों का ताजमहल

जो तफ़सील से सुन सके
जो तफ़सील से कह सकूँ
वो बात , वो फ़लसफ़ा
एक इल्तिज़ा, एक चाहत
एक ख्वाहिश, एक जुनून

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ


मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...



हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं : आकांक्षा यादव


वर्तमान साहित्य में नारी पर पर्याप्त मात्रा में लेखन कार्य हो रहा है, पर कई बार यह लेखन एकांगी होता है। यथार्थ के धरातल पर आज भी नारी-जीवन संघर्ष की दास्तान है। नारी बहुत कुछ कहना चाहती है पर मर्यादाएं उसे रोकती हैं। कई बार ये अनकही भावनाएं डायरी के पन्नों पर उतरती हैं या साहित्य-सृजन के रूप में


नदी हुई नव-यौवना, बूढ़ा पुल बेचैन - म. न. नरहरि

ठेस;
मूरख मैं साबित हुआ, फक्कड़ मिला ख़िताब
घाटा सब मैंने भरा, ऐसे हुआ हिसाब
उम्मीद:
घिरते बादल शाम से, काले - लाल- सफ़ेद
शायद अब हो जायगा, आसमान में छेद

किताब और किनारे

वह एक किताब थी ,
किताब में एक पन्ना था ,
पन्ने में हृदय को छू लेने वाले
भीगे भीगे से, बहुत कोमल,
बहुत अंतरंग, बहुत खूबसूरत से अहसास थे ।

कम उम्र में मानसिक तनाव के कारण बढ़ रहीं शारीरिक समस्याएँ

मानसिक तनाव
इस भागती दौड़ती दुनिया में तनाव बड़ता ही जा रहा है, कुछ शारीरिक समस्याएँ वर्षों पहले कुछ उम्र के बाद होती थीं याने कि लगभग ५० वर्ष के बाद होती थीं । अब वे शारीरिक समस्याएँ तेजी से कम उम्र की अवस्था में होने लगी हैं।
सब कहते हैं कि स्वस्थ्य जीवन जीना चाहिये, सबकी इच्छा स्वस्थ्य जीवन जीने की होती है, परंतु या तो समय पास ना होने की लाचारी होती है या फ़िर आराम तलबी के कारण पसीना नहीं बहाने देने की लाचारी होती है।

कुछ अनसुलझे से पहलु

रुक ... थोडा ठहर |
ओ ... उड़ते हुए बादल |
सवालों में उलझे अनसुलझे ,

पहलुओं को सुलझा जा |

नहीं अचानक मरता कोई

नव अंकुर ने खोली पलकें
घटा मरण जिस घड़ी बीज का,
अंकुर भी तब लुप्त हुआ था
अस्तित्त्व में आया पौधा !

अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं

क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर  ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !

रहबर ने गर्दिश-ए- खाकसार बना दिया,
जैसे तूफां के झोकों से दरख्त बर्बाद हुए है !

ब्रह्मचर्य का पालन ही मनुष्य को सात्विक बनाता है ..

पिछली पोस्ट पर विषय अति संवेदनशील होने के कारण डिस्क्लेमर तो लगा दिया था लेकिन विश्वास भी था कि हमारे परिपक्व ब्लॉगर मित्र हल्के फुल्के अंदाज़ में भी विषय की गंभीरता को समझेंगे। यह देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि लगभग सभी महिला और पुरुष मित्रों ने इसे स्पोर्ट्समेन स्पिरिट में लिया।
हालाँकि, अनअपेक्षित रूप से एक पुरुष मित्र ने किसी दूसरे मित्र के कंधे पर बन्दूक रखकर लगभग हमारे चरित्र पर ही ट्रिगर दबा दिया . पता नहीं जिंदगी को इतने रूखेपन से क्यों जीते हैं लोग .

" कुछ प्यार की बातें करें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़िन्दगी के खेल में, कुछ प्यार की बातें करें।
प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।


नेह की लेकर मथानी, सिन्धु का मन्थन करें,
छोड़ कर छल-छद्म, कुछ उपकार की बातें करें।

वादियों के पीछे ही कहीं आफताब खोया है..

उदास शाम की आँख हैं नम ओस की बूँदों  से,
चलती ये सर्द हवा कितनी खामोशी से।
कितने गुमसुदा और तन्हा हैं ये दरख्त खड़े,
हैं पूछते सवाल यूँ अपनी ही गुम परछाईं से ।।

आँसू और सुगंध ...

तुम से मिली उपेक्षा से चिढ़कर
बहुत सारी बुराइयाँ आ बैठीं मुझमे
और जितनी भी अच्छाइयाँ हैं मेरे अंदर
वह सब की सब तुम्हारी हैं
बात बात में टोकना तुम्हारा
मैं झुंझला जाता था भले प्रकट नहीं करता था


आज के लिए  बस इतना ही .... अब आज्ञा दीजिये ... नमस्कार

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

उधार की ज़िंदगी ... फिर एक चौराहा ...ब्लॉग 4 वार्ता --- संगीता स्वरूप

आज की वार्ता में  संगीता स्वरूप का नमस्कार ...साल 2012 के नोबल शांति पुरस्कार के लिए कांग्रेस एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी के नाम की सिफारिश की गई है। इंटरनेशनल अवेकनिंग सेंटर ने सोनिया गांधी का नाम लगातार नौंवी बार नोबल शांति पुरस्कार से संबंधित समिति की स्वीकृत सूची में शामिल करने के लिए भेजा है। संगठन ने अपने सिफारिशी पत्र सोनिया गांधी विश्व शांति की पुजारी और एक महान सामाजिक कार्यकर्ता बताते हुए उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का अनुरोध किया है। चलिये अब चलते हैं आज के लिंक्स पर ---

मुझे तलाश है उस भोर  की ,जो नव दिव्य चेतना भर दे |
निज लक्ष्य से ना हटें कभी
अटूट निश्चय पे डटें सभी
ना सत्य वचन से फिरें कभी
ना निज मूल्यों से गिरें कभी
जो गर्दन नीची कर दे

मुझे याद है प्रिय ! याद है .Я помню, любимая, помню

from स्पंदन SPANDAN by shikha varshney

कुछ दिन पहले अनिल जनविजय जी की फेस बुक दिवार पर एसेनिन सर्गेई की यह कविता  .Я помню, любимая, помню (रूसी भाषा में ) देखि. उन्हें पहले थोडा बहुत पढ़ा तो था परन्तु समय के साथ रूसी भी कुछ पीछे छूट गई. यह कविता देख फिर एक बार रूसी भाषा से अपने टूटे तारों को जोड़ने का मन हुआ.

lipa

आज लिपा* पर खिले फूल
मुझे अहसास कराते हैं
कैसे तेरे घुंघराले वालों पर
मैंने फूल बिखराए थे.

पतिता

from अन्तर्गगन by धीरेन्द्र अस्थाना

जिस्म  को बेच कर,
वह पालती उदर;
पतिता कहाती वह,
पर क्या वह पतिता ही है?

उधार की जिन्दगी... A Borrowd Life

from palash "पलाश" by "पलाश"

रेल की पटरी पर ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड रही थी, और घोष उस पटरी पर अपनी जिन्दगी की रफ्तार को खत्म करने के लिये उस पर अपनी पूरी रफ्तार से दौड रहा था, कि विघुत गति से एक हाथ अचानक आया और वो पटरी से अलग आ गया।
घोष- आपने मुझे क्यों बचाया, मै जीना नही चाहता, मुझे मरना है, आप मुझे छोड दीजिये..

और अब कैद में है

from हमसफ़र शब्द by संध्या आर्य

वर्षों तक एक ही शब्द के जिस्म में पनाह ले रखी थी
और बाहर महंगाई काट रही थी अक्षरों को
पन्नों पर स्याही बिखरने लगा था और हम थे कि
शुतुर्मुग की तरह

मैं ही नहीं तो कुछ नहीं !

from मेरी भावनायें... by रश्मि प्रभा...

मैं'   अहम् नहीं
आरंभ है
मैं से ही तुम और हम की उत्पत्ति है
मैं ही नहीं तो कुछ नहीं !
प्रेम,परिवर्तन,ईर्ष्या,हिंसा....
सबके पीछे मैं

मेरे ही सुर होंगे

अब न चुराऊँगी मैं, प्रियतम !
यह लो अपनी मुरली, प्रियतम !
रोज-रोज ना मिल पाऊँगी
जमुना तट ना आ पाऊँगी।

ठहरा हुआ शबाब जरा देखता तो चल

from My Unveil Emotions by Dr.Ashutosh Mishra "Ashu"

ठहरा हुआ शबाब जरा देखता तो चल 
    दीवाने इक गुलाब जरा देखता तो चल

रेबीज - एक मारक रोग

from जाले by noreply@blogger.com (पुरुषोत्तम पाण्डेय)

दिनेशसिंह बिष्ट, उम्र ३६ वर्ष, पेशे से अध्यापक, निवासी – ग्राम दौलतपुर जिला नैनीताल. तीन स्कूल जाने वाले बच्चे व शुभांगी पत्नी, सब कुशल मंगल था. वह गर्मियों की छुट्टियों में अपने ससुराल कोटाबाग मिलने गया तो वापसी में एक प्यारा सा देसी कुत्ते का पिल्ला भी साथ ले आया. पिल्ला आ जाने से बच्चे बहुत खुश हुए. उसके साथ खेलते थे, गोद में उठाते थे, उसे छेड़ते भी रहते थे.छेड़छाड़ से वह थोड़ा कटखना भी हो गया था. तीनों बच्चों के पैरों में उसने अपने पैने दांत चुभो दिये थे पर बच्चे तो बच्चे होते हैं, कहाँ परवाह करते हैं?

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

from ललितडॉटकॉम by ब्लॉ.ललित शर्मा
पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है

वो इक मजदूर था...

from दिल की कलम से... by दिलीप

वो इक मजदूर था...
रात भर उसके सिर पर...
नज़मों का बोझ रखता रहा...
चाँद, तारे, सागर, अंबर...
मय, साक़ी, पैमानों के झुंड...
कितना कुछ वो एक नट की तरह....

फिर एक चौराहा - डॉ नूतन गैरोला

from अमृतरस by डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति

इम्तिहान, इम्तिहान, इम्तिहान,.. न जाने जिंदगी कितने इम्तिहान लेगी, हर बार एक नया चौराहा, हर बार खो जाने का भय , मंजिल किस डगर होगी कुछ भी तो उसे खबर नहीं ,……. ……..मंथन मंथन मंथन जाने कितना ही आत्ममंथन, हर बार पहुंची उसी जगह ज्यूँ शून्य की परिधि पर चलती हुई …………..चढ़ते, चढ़ते, चढ़ते,

तीन दिए, तेरह गिने, लिखे तिरासी नाम - डा. विष्णु विराट

from ठाले बैठे by NAVIN C. CHATURVEDI

पानी में पानी नहीं , नहीं अन्न में अन्न
मन्न मन्न जोरौ तऊ, देह न लागौ कन्न १
मोहि न भावै लीक कछु, मोहि नहीं आधार
मैं मेरी मंजिल भयौ, मैं मेरौ निरधार २

हम सयाने हो गए !

from बैसवारी baiswari by संतोष त्रिवेदी

बचपन में
आँगन से लेकर दुआर तक
दौड़ते थे साथ-साथ बड़ी बहन के,
दहलीज़ से डेहरी तक
हमारे छोटे-छोटे पाँव
लांघते थे बेखटके

ज़िन्दगी कुछ यूँ ही बसर होती है.......


तुम से शुरू और तुम पे ही आकर रुकी है मेरी हर नज़्म......तुमसे जुदा कोई बात नज़्म सी लगती नहीं ,
क्या करूँ !!
मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ..
याने
-अवसर,संभावना,खुशी....
तुम्हारे काँधे पर टिका मेरा सर

मिली है सबको ऐसी छूट

from किताबें बोलती हैं by नादिर खान

मिली है सबको ऐसी छूट
मै भी लूटूँ तू भी लूट
चमचों को तू रख ले पास
कौन करे फिर तुझसे पूछ

एक बांध सब्र का ...

from sada-srijan by सदा

दर्द की भाषा कभी पढ़ी तो नहीं मैने
बस सही है हर बार
एक नये रंग में
उसी से यह जाना है
ये दर्द जब भी होता है

सफ़ारी की बातें और अरबी रातें ---भाग 1

from अंतर्मंथन by डॉ टी एस दराल

दुबई टूर  के अंतिम चरण में आता है डेजर्ट सफ़ारी . शहर से क़रीब 60-70 किलोमीटर दूर बने हैं -सेंड ड्यून्स यानि रेत के टीले। इन टीलों पर फर्राटे से दौड़ती गाड़ी में बैठकर  अनोखा रोमांच महसूस होता है। 

खामखाँ खुद को मिटाए कोई

from आनंद by Anand Dwivedi

बेवजह अब  न  रुलाये  कोई
गर कभी अपना बनाये कोई
दिले-नादाँ को संगदिल करलूं
कैसे, मुझको  भी बताये  कोई

तस्वीर

from कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** by रंजना [रंजू 
भाटिया]

हर सुन्दर तस्वीर
जो समेटे हुए हो
अपने में
कई रंग ...
कई एहसास
और एक
"मोनालिजा सी मुस्कान "

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर

from ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र by वन्दना

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर
आह ! और वक्त भी अपने होने पर रश्क करने लगेगा उस पल ………जानती हो ना मै असहजता मे सहज होता हूँ और तुम्हारे लि्ये लफ़्ज़ों की गिरह खोल देता हूँ बि्ल्कुल तु्म्हारी लहराती बलखाती चोटी की तरह ………

टूटे तारे

from Sudhinama by Sadhana Vaid

कूड़े के ढेर के पास
दो नन्हे हाथ
कचरे से कुछ बीनते हैं !
सहसा एक कर्कश
कड़क आवाज़
उन्हें कँपा देती है !

मेहँदी का पेड़

from जिंदगी की राहें by Mukesh Kumar Sinha

पता है ?
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़,
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली
.

नाहक़ ही प्यार आया

from ग़ाफ़िल की अमानत by चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

तुम्हारी एक मीठी बोल पर बेजा क़रार आया।
भली नफ़्रत ही थी तुझपर मुझे नाहक़ ही प्यार आया।।

वो सुबह ...!!!

from अनुभूति / Anubhuti... by Sriprakash Dimri
मुझे अब भी  याद है
बचपन की  वो सुबह ...
जब  ऑफिस जाने से पहले...
पिता के साथ ...
हरी दूब में....

रोज़ सुबह-शाम ..........

from जो मेरा मन कहे by यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur)

रोज़ सुबह-शाम
हर गली -हर मोहल्ले में
मची होती है
एक तेज़ हलचल
नलों में पानी आने की

आज के लिए बस इतना ही ..... मिलते हैं एक ब्रेक के बाद ...

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

व्यस्तता नहीं , अर्थपूर्ण व्यस्तता आवश्यक है .... ब्लॉग 4 वार्ता ... संगीता स्वरूप


आज की वार्ता में  संगीता स्वरूप का नमस्कार ..... वार्ता4 ब्लॉग   पर मेरी पहली वार्ता ........ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह प्राईवेट कंपनियों  को प्राकृतिक संसाधन देने के लिए नीलामी की प्रक्रिया ही अपनाएं । अब प्रक्रिया कोई भी हो  घोटाला तो होना ही है .... चलिये घोटालों के बीच ही हम चलते हैं आज की वार्ता पर --


सब कुछ गूगलमय ---
रात लगभग आधी बीत ही चुकी। लेकिन बात कुछ ऐसी है कि 'रह न जाए बात आधी।' घड़ी का काँटा १२ के डिजिट को विजिट कर  उस पार की यात्रा पर निकल गया। अब तो डेट भी बिना लेट किए करवट बदल ली। २७ की अठ्ठाइस हो चुकी। लेकिन बात तो आज ही  की है; आज ही की  शाम की है.....ये शाम कुछ अजीब थी....
आज शाम एक ताना सुनने को मिला कि मैं बहुत 'कर्री' और लगभग  'गद्द नुमा कवितायें' लिखने लग पड़ा हूँ।

रचना जब विध्वंसक हो
जब चुप्पी इतनी क़ातिल है,
लब खोलेंगे तब क्या होगा ?


जब छूछे नैन बरसते हैं,
भर आएँगे तब क्या होगा ?

व्यस्तता नहीं, अर्थपूर्ण व्यस्तता आवश्यक है
यूँ तो आजकल हर कोई व्यस्त है । जीवन की गति से तालमेल बनाये रखने को आतुर । जीवन से भी अधिक तेज़ी से दौड़ने को बाध्य । आपाधापी इतनी कि  हम यह विचार करना भी भूल ही गए  कि जितना व्यस्त हैं , इस व्यस्तता के चलते जितना लस्त-पस्त हैं, उसकी आवश्यकता है भी या नहीं।

ख्वाब तुम पलो  पलो
तन्हा कदम उठते नहीं
साथ तुम चलो चलो
नींद आ रही मुझे
ख्वाब तुम पलो पलो


कमला बाई की कहानी उसकी जुबानी
नागपुर से ट्रेन में सवार हुआ, आरक्षण था नहीं, इसलिए रायपुर तक का जनरल बोगी का ही सफ़र लिखा था। फिर अधिक  दूरी भी नहीं है, सिर्फ 5 घंटे का सफ़र यूँ ही कट जाता है। बड़ी मशक्कत के बाद बोगी में घुसने मिला, शर्मा जी ने बालकनी में सीट देख ली थी, चलने की जगह पर भी लोगों का सामान रखा हुआ था।

राधा को ही क्यों चलना पड़ता है, हर युग में अंगारों में !
राष्ट्र-संपदा  की लूट-खसौट,
बंदर बांट लुंठक-बटमारों में,
नग्न घूमता वतनपरस्त, 
डाकू-लुटेरे बड़ी-बड़ी कारों में !

ज़रूरी नहीं कि हर सीने का दर्द दिल का दौरा ही हो
सीने का दर्द कई कारणों से हो सकता है लेकिन इसे हमेशा दिल के दौरे से जोड़ कर देखा जाता है। लोगों में दिल के दौरे का खौफ इस कदर समाया हुआ है कि जरा सा छाती में खिंचाव, दर्द या जलन की शिकायत हुई नहीं कि दौड़ पड़े निकट के डॉक्टर के पास। तुरंत ईसीजी और खून की कई जाँचें तत्काल करा ली जाती हैं पर नतीजा कुछ नहीं निकलता। इसके बाद भी संतोष नहीं हुआ तो पास के किसी नर्सिंग होम या छोटे अस्पताल में जाकर भर्ती हो गए और वहाँ के आईसीयू में चार-पाँच दिन गुजारने के बाद तसल्ली मिली।

साधना शब्‍दों की ... !!!
साधना शब्‍दों की
तुम्‍हारे शब्‍दों को जब भी मैं अपनी
झोली में लेती वे तुम्‍हारी खुश्‍बू से
मुझे पहले ही सम्‍मोहित कर लेते
तुम्‍हारे कहे का अर्थ
मैं पूछती जब भी चुपके से


‘रेणु’ से ‘दलित’ तक
एक था ‘रेणु’ और दूसरा था ‘दलित’ | दोनों का सम्बंध जमीन से था | रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिम्गना गाँव में हुआ | दलित का जन्म छत्तीसगढ़ के अर्जुंदा टिकरी गाँव में हुआ | दोनों ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े | रेणु कथाकार र्हा और दलित कवि |

बाहरी (लघु कथा)

गरीबा समुद्र के किनारे बैठा देख रहा था, कि लोग बारी-बारी से गणेश जी की विभिन्न आकर की प्रतिमाएँ लाते और उन्हें समुद्र मैं विसर्जित करके नाचते-गाते वहाँ से  चले जाते. गरीबा बहुत देर तक यह सब देखता रहा.

बरसात के बाद शिशिर के आगमन से पहले

बरसात के बाद
जब मौसम करवट लेता है
शिशिर के आगमन से पहले
और बरसात के बाद की अवस्था
मौसम की अंगडाई का दर्शन ही तो होती है


"स्वास्थ्यवर्धक के नाम पर लूट!"

आदरणीय स्वामी जी!
   आपकी बात मानकर मैं स्थानीय पतंजलि क्रयकेन्द्र पर गया तो वहाँ 5 अनाजों से निर्मित स्वास्थ्यवर्धक आटे का दाम पचास रुपये किलो था।...

विचलन

चारों और घना अन्धकार
मन होता विचलित फँस कर
इस माया जाल में
विचार आते भिन्न भिन्न
कभी शांत उदधि की तरंगों से


" १९ जुलाई से २८ सितम्बर तक ....

वर्ष में १२ माह होते हैं परन्तु हमारे यहाँ तीन माहों में ही हम सब के जन्म दिन हो जाते हैं | पार्टियां करो तो लोग कहते हैं , यार इनके यहाँ तो रोज ही जन्म दिन होता है | जब बच्चे छोटे थे तब दोनों का जन्म दिन हमलोग अक्सर किसी एक की ही तिथि पर मना लिया करते थे | पर उस दशा में दोनों में गिफ्ट के लिए बहुत लड़ाई होती थी |

बेहतर

वेदना संवेदना है
क्रोध है और कामना है
मोह है और भावना है
मद है कुछ अवमानना है
प्रेम है सद्भावना है
इनके चलते मै सिरफ
इन्सान हूँ यह मानना है ।

आंच-120 : चांद और ढिबरी
दीपिका जी के ब्लॉग ‘एक कली दो पत्तियां’ पर पोस्ट की गई कविताएं पढ़ते हुए मैंने महसूस किया है कि कविता के प्रति दीपिका जी की प्रतिबद्धता असंदिग्ध है और उनकी लेखनी से जो निकलता है वह दिल और दिमाग के बीच कशमकश पैदा करता है

एकताल
केलो-कूल पर कला की कलदार चमक रही है। यह आदिम कूंची की चित्रकारी के नमूनों, कोसा और कत्थक के लिए जाना गया है। यहां रायगढ़ जिले की छत्तीसगढ़-उड़ीसा सीमा से लगा गांव है- एकताल

परिंदे ऐसे आते हैं
आज सुबह जब आंख खुली
रात की आलस धुली
मैंने पाया
मैं चिड़िया बन गया हूँ

सूर्य  पुत्र
एक समय की बात है जब बेल्ला कूला नदी से कुछ ही दूरी पर रहने वाली युवती अपने ही कबीले के नवयुवकों की ओर से आने वाले सारे विवाह प्रस्तावों को ठुकरा रही थी क्योंकि वह स्वयं सूर्य से विवाह करने की इच्छुक थी , अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसने अपना गांव छोड़ा और सूर्य की खोज में चल पड़ी

हीरोइन  नहीं थी वो
हिरोइन नहीं थी वो,
हिरोइन नहीं थी वो,
और न ही किसी मॉडल एजेंसी की मॉडल
फिर भी,
जाने कैसा आकर्षण था उसमे
जो भी देखता, बस, देखता रह जाता,


अपनी कहानी, आपके साथ
ये वक्त भी कट जाएगा और वक्त की तरह। बस इंतजार है हमें अपनी किस्मत का।
तो क्या? हम कोई लेखक हैं जो लिख कर रखते हैं। अपनी तो अदा ही निराली है, बस एक नजर देखा और लिख डाला सब कुछ।
इतने दिनों बात उनसे हमारी मुलाकात हुई। कब देखत-देखते सुबह से शाम हो गई ये पता ही ना चला।

रेखा जोशी की लघुकथा - एक कप चाय और सौगंध बाप की

शर्मा जी ने हाल ही में सरकारी नौकरी का कार्यभार संभाला था,अपनी प्रभावशाली लेखन शैली के कारण वह बहुत जल्दी अपने ऑफ़िस में प्रसिद्ध हो गए।

आज के लिए इतना ही ..... मिलते हैं एक ब्रेक  के बाद

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