शुक्रवार, 2 मार्च 2012

तुम सृजन की छाँव में....ब्लॉग4वार्ता....संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार... कई दिनों के अन्तराल के बाद हमारे ब्लॉगर मित्र फिर से अपनी इस ब्लॉग नगरिया में लौट आये हैं, रौनक फिर से वापस आ गई है, जो भूले - भटके न लौट सके हों तो उनसे भी निवेदन है अपने घर आ जाएँ, मेहमान कुछ दिन ही शोभा देते हैं.... :))) इंदुपुरी जी भी ब्लॉग की दुनिया में वापस लौट आई हैं और आते ही एक पोस्ट लिख दी है। वह पोस्ट यहाँ है, देखते हैं कौन कौन फ़ेसबुक को तिलांजलि देकर ब्लॉग की दुनिया में लौटते हैं………अब लीजिये प्रस्तुत है आज की ब्लॉग4वार्ता, मेरी पसंद के लिंक्स के साथ... 
ये नहीं बदलते 
लोगों को कहते सुना है,इस जमाने में, दोस्ती और प्रेम,स्थायी नहीं होते, मेरा मानना है ....
एक झूठी उम्मीद
सुना था उस गांव में अब कोई नहीं है रहता | फिर भी टिमटिमाती लौ में एक साया अक्सर है दिखाई देता | किसका है वो अपना जो वहाँ गश्त है लगता ? अपने तो कहते हैं वहाँ अब कोई नहीं है रहता | वो लाठी , वो चश्मा वो ...
ज़िंदगी क्या है..
मैं तुझको आज बताता हूं, के कमी क्या है, तू मुझको आज ये बता, के ज़िंदगी क्या है.. ये ऊंच-नींच, जात-पात, ये मज़हब क्यूँ हैं, ये रंग-देश, बोल-चाल, बंटे सब क्यूँ हैं, तू-ही हर चीज़, तो फिर पाक़-ओ-गंदगी क्या है...
लाजवंती
न जाने किस बात पर आज उनसे ही उनकी ठनी हुई है जो मेरे प्राणों-पंजर पर विपदा सी बनी हुई है... उनकी आँखें इसतरह से है नम कि बरस रहे हैं मेरे भी घनघोर घन.... रूठे जो होते तो बस मना ही लेती अपने रसबतियों में उन्...
बादह-कश !
*मुरीद ये माह-जबीं मधुशाला के दर पर, एक जीवन जी गया, * *आब-ऐ-आतिश,आधी खपी बांटने में, बाकी बची खुद पी गया। * *आब-ऐ-आतिश= शराब * *फिर शाम रंगीं मीना की हुई, छूकर गुलाबी आतिश-ऐ-तर,* *मय को दर्द-ऐ-...
बीता हुआ कल हूँ
मैं आज नहीं बीता हुआ कल हूँ बीते हुए कल का एक यादगार पल हूँ कुछ खट्टा कुछ मीठा कुछ तीखा कुछ कडुआ जानता हूँ मेरे एक हिस्से को चाहोगे तुम सहेज कर रखना और एक हिस्से को चाहोगे करना ज़ुदा अपने मन से मगर रह रह कर ...
कुछ सामान था जो सफ़र में छूट गया कही
शाम के धुंधलके में उसने परिंदो को सिद्दत से देखा सभी लौट रहे थे बदलियों के पीछे से आती लाल रौशनी रातरानी से लिपट रही थी झरने के सुमधूर लय ताल के साथ कई-कई नदियाँ एक साथ बहे जा रही थी आसमान मुस्कुराते...
तुम सृजन की छाँव में.......
तुम सृजन की छाँव में, मधु-रागिनी सी आ गयी, तुम सरल किरणें लिए मेरी यामिनी में आ गयी. कमनीय काया,कनक कुंदन बदन, कोमल लता, चंपा-कली अधरें, भ्रमर काली लटों से झांकता. दो नयन स्वप्निल कमल, पलकों में जागी पंखु...
प्रणय
*प्रणय* अनगित उसकी बातों में समाया है ये संसार मेरा, निश्चल मन कि सरिता में पिघल रहा है प्रणय मेरा महक उठी है समीर शाम कि छूकर सुभग देह को उसकी थिरक रही हैं शशि की किरणे चंचल स्कंध आँचल में उसकी कुंचि...
बहुत देर हो चुकी थी
खेलते बच्चे मेरे घर के सामने करते शरारत शोर मचाते पर भोले मन के उनमें ही ईश्वर दीखता बड़े नादाँ नजर आते दिल के करीब आते जाते निगाह पड़ी पालकों पर दिखे उदास थके हारे हर दम रहते व्यस्त बच्चों के लालन...
जीवन की चाह ......
जीवन की इस रेल -पेल में ..इस भाग दौड़ में जिन्दगी जैसे ठहर -सी गई थी ... कोई पल आता तो कुछ क्षण हलचल होती .. फिर वही अँधेरी गुमनाम राहें ,तंग गलियां ... रगड़कर ..धसिटकर चलती जिन्दगी ... वैसे तो कभी भ...
कलम मेरी मोरपंख
*शब्द मेरे; कलम मेरी मोरपंख लिख देते ह्रदय के बोल .. जब बज उठता मेरे ह्रदय का शंख **शब्द मेरे ; कलम मेरी मोरपंख * *देते पन्नों में स्याही घोल .. जब जब खुलते मेरे मन के पट ,बंद **शब्द मेरे ; कलम मेरी मोरप...
श्वांसों का एहसास
इस सपनीले से मौसम की चहकती हवाएं मिट्टी से नमी चुराती ,कहीं पत्तों को एक नया आशियाना बसाने का झूठा दिलासा देती फागुनी रंगों की चांदनी बरसाते जज़्बातों को उलझा नित नवल सवालों की पिचकारी सजाती हैं कभी ज़िन्द...
पाला पडी फ़सलो मे फ़ूल नही उगा करते
लो फिर दिन ढल गया शाम हो गयी मगर बता है ए दिल आज कौन सी बात खास हो गयी क्या दिन अपने वक्त पर नही ढला या सांझ ने आने से मना किया या भोर ने रूप बदल लिया बता ना आज तुझे क्या हुआ जो दिल ढलने का तुझ पर असर ह...
अपनी अपनी जेल
अपनी अपनी जेल कोई जेलर बनता है अपनी इच्छा से जेल में वह भी आता है और कैदी को लाया जाता है उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसा लगता है ऊपर-ऊपर से, पर कैदी भी अनजाने मेंक्या इच्छा नहीं कर रहा था इसी की.... जेलर आनन्द...
यूं लिखी गई पान सिंह तोमर की पटकथा-संजय चौहान
रिकार्डधारी एथलीट से बागी और फिर डाकू बने पान सिंह तोमर की कहानी जानने के लिए करीब डेढ़ साल तक मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड, मुरैना सहित कई शहरों की खाक...
सोनिया जी की बीमारी क्या है ? 
सोनिया गांधी पूरे देश पर राज कर रही हैं। इनके बच्चे जिन्होंने राष्ट्र हित में अभी तक कोई भी योगदान नहीं दिया है वे भी भोली भाली जनता के साथ खिलवाड़ करते हैं.
उलटा लटका विकास क्रम
हम जंगलों में रहते पेड़ों पर कूदते-फाँदते - फल खाते बीमारी में जड़ी-बूटियाँढूँढ लेते जितनी आयु आसमानदेता उतनी भोग कर आसमान में चले जाते मानव बने, प्रकृति के...
छोटी सी बात 
वह एक छोटी सी बात थी जब उसने धिक्कार दिया था सारी अच्छाईयाँ, उस दिन रो पड़ी थी कुछ सुबकती रही एक कोने में और कुछ, एकटक पुराने रास्ते को घूरती रही   उन... 
तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी व कांग्रेस सरकार पर लगाये गये आरोप की जांच अब जब लोक लेखा समिति के अध्यक्ष स्वयं अजीत जोगी 
लोक लेखा समिति के सदस्य कांकेर :- पूर्व पश्चिम कारीडोर के तहत उड़ीसा व महाराष्ट्र को जोडऩे के लिए देव भोग से लेकर मानपुर तक बनाये गये 219 कि.मी. सडक़ ...  
झील में तब्दील होती वो चंचल पहाड़ी नदी (कहानी--१)
कमरा सुन्दर फूलों के गुलदस्तों से भरा हुआ था....कहीं सफ़ेद..पीले..लाल गुलाबों के गुच्छे तो कहीं नीले-बैंगनी ऑर्किड मुस्करा रहे थे..- कॉफी की तीखी गंध के स...
अथ श्री कर्ण पुराण कथा --- ललित शर्मा 
कान शरीर का महत्वपूर्ण अंग है इसके बगैर जीवन बहुत कठिन है। जो बहरा होता है वह गूंगा भी होता है। मतलब श्रवण शक्ति अकेले नहीं जाती, संग वाक शक्ति को भी ले जा...  

 अब लेते हैं आपसे विदा मिलते हैं, अगली वार्ता में, नमस्कार.....

7 टिप्पणियाँ:

बहुत बढ़िया प्रस्तुति

Gyan Darpan
..

सुन्दर प्रस्तुति .

रोचक लिंक संयोजन्।

mei bhi lout aai hun ....bhule huae ko rah bhi to dikhani jarur hei ..

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