बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ- द्वितीया...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार ... आश्विन शुक्लपक्ष प्रथमा को कलश की स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्यौहार शारदीय नवरात्र आरम्भ हो चुका है, आज द्वितीया है. माँ दुर्गा अपने सुन्दर स्वरुप में विराजमान हो चुकी हैं।
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥ 



ब्लॉग जगत की नव देवियों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज मिलते हैं, बहुत ही कम शब्दों में सब कुछ कहने का हुनर अर्थात गागर में सागर भरने वाली एक और  शख्सियत संगीता स्वरुप जी से ....

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ये मार्च 2007 से ब्लॉग जगत में हैं.  संगीताजी अपने बारे बताते हुए में कहती हैं : "कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ... मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं." इनके प्रमुख ब्लॉग हैं
 इनकी प्रथम पोस्ट:

प्रदुषण

>> Thursday, August 14, 2008

जीवन के आधार वृक्ष हैं ,
जीवन के ये अमृत हैं
फिर भी मानव ने देखो,
इसमें विष बोया है.
स्वार्थ मनुष्य का हर पल
उसके आगे आया है
अपने हाथों ही उसने
अपना गला दबाया है
काट काट कर वृक्षों को
उसने अपना लाभ कमाया है
पर अपनी ही संतानों के
सुख को स्वयं खाया है
आज जिधर देखो
प्रदुषण फ़ैल रहा है
वृक्षों के अंधाधुंध कटाव से
ये दुःख उपजा है
क्यों नहीं समय रहते
इन्सान जागा है
सच्चाई के डर से
आज मानव भागा है.
बिना वृक्षों के क्या
मानव जीवन संभव होगा
इस प्रदुषण में क्या
सांसों का लेना संभव होगा
आज अग्रसित हो रहा
मानव विनाश की ओर
इस धरती पर क्या मानव का
जीवित रहना संभव होगा?
कुछ करना है गर
काम तो ये कर डालो
पोधों को रोपो और
वृक्षों को दुलारों
आज समय रहते यदि
तुम चेत जओगे
तो आगे आने वाली नसलों को
तुम कुछ दे पाओगे
.हे मनुज!
अंत में प्रार्थना है मेरी तुमसे
वृक्षों को तुम निज संताने जानो
वृक्ष तुम्हारी सम्पत्ति,
तुम्हारी धरोहर हैं
इस सच को अब तो पहचानो.

अद्यतन पोस्ट:

अधूरा उपवन 

मन के आँगन में 
तुमने अपनी ही 
परिभाषाओं के 
खींच दिये हैं 
कंटीले तार
और फिर 
करते हो इंतज़ार 
कि , 
भर जाये आँगन 
फूलों से .

हाँ , होती है 
हरियाली 
पनपती है 
वल्लरी 
पत्ते भी सघन 
होते हैं 
पर फूल 
नहीं खिलते हैं । 

क्या तुमको 
ऐसा नहीं लगता कि
मन का उपवन 
अधूरा  रह जाता है 
और खुशियों का आकाश 
हाथ नहीं आता है ।

कल आपकी मुलाकात ब्लॉग जगत की एक  अन्य देवी से होगी, तब तक के लिए राम-राम ......... 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

हमारे यहाँ सातवाँ कब आएगा ? आखिर इतना मजबूत सीलेंडर लीक हुआ कैसे ? ब्लॉग4वार्ता ...संगीता स्वरूप

आज की  वार्ता में संगीता स्वरूप  का नमस्कार ---- एक विशेष  सूचना --

भारतीय महिला पत्रकारों की संस्था, इंडियन वीमेन प्रेस कॉर्प वाणी प्रकाशन के साथ मिलकर हिंदी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन करने जा रही है। इसके पहले अंग्रेजी में भी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसे भरपूर सराहना मिली। इसी के मद्देनजर व्यापक हिंदी पट्टी को ध्यान में रखते हुए हिंदी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है।
कहानी प्रतियोगिता की थीम है--समकालीन समाज में संबंधो की बदलती परिभाषा। कहानी की शब्द संख्या अधिकतम 3.000 हो। प्रतियोगिता में तीन कहानियों को पुरुस्कृत किया जाएगा। प्रथम पुरस्कार-11,000 रुपये,दूसरा एवं तीसरा पुरस्कार-7.000 रुपये। पुरस्कार के लिए कहानियों का चयन करेंगी देश की जानी मानी महिला कथाकारो की तीन सदस्यीय ज्यूरी चयनित करेगी। कहानी मौलिक एवं अप्रकाशित होनी चाहिए। किसी भी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानी पर विचार नहीं किया जाएगा। इसका स्पष्ट उल्लेख एक पत्र में करें। बाद में चुनिंदा कहानियों का एक संकलन वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किया जाएगा, जो अगले साल होने वाली विश्व पुस्तक मेले में धूमधाम से रिलीज होगी। यह प्रतियोगिता सभी महिला रचनाकारो के लिए खुली है सिर्फ हमारे क्लब की पदाधिकारी और मैनेजिंग कमिटि की सदस्य भाग नहीं ले सकतीं।
सभी रचनाकारो से अनुरोध है कि वे अपनी कहानी के दो टाइप प्रिंट इस पते पर भेजें--Indian Women's Press Corps, (Hindi Story Competition), 5 Windsor Place, New Delhi- 110001. कहानी के साथ आपका नाम, पता और मोबाइल न. साफ साफ लिखा होना चाहिए। साथ ही आप कहानी ईमेल पर भी भेजे। ईमेल पता है--iwpchindistory@gmail.com
कहानी सिर्फ यूनीकोड, चाणक्य और क्रुतिदेव फॉन्ट में टाइप हो- कहानी भेजने की अंतिम तारीख--15 नवंबर,2012 है। (प्रेस रिलीज)
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612929 पर संपर्क कर सकते हैं।

चलिये  चलते हैं आज की वार्ता पर ----

“उसके उड़ाये कौवे कभी डाल पर ना बैठे” : कहावत......मेरे सामने में भी अक्सर ऐसे लोग आते रहते है जो अपना काम निकलवाने के लिए अक्सर बड़ी बड़ी डींगे हांकते है, मुझे बड़े बड़े सब्ज बाग तक दिखा देते है,

बस इतना जानूँ

तुझे माँ कहूँ
या कहूँ वसुन्धरा
अतल सिन्धु
कल- कल सरिता
भोर किरन

सत्याग्रहियों का उत्साह बढ़ता गया.......8 अगस्त जनरल स्मट्स के आमंत्रण पर गांधी जी प्रिटोरिया पहुंचे। बोथा, स्मट्स और प्रोग्रेसिव पार्टी के सदस्यों ने वैलिडेशन बिल में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया जिसमें यह कहा गया था कि TARA स्वेच्छा से पंजीकरण कराने वालों और बच्चों पर लागू नहीं होगा। 21 अगस्त ट्रांसवाल की विधान सभा में स्वैच्छिक पंजीकरण वैलिडेशन बिल को हटा लिया गया

मेरे कदम......

न वो चिनार के बुत,
न शाम के साए,
एक सहज सा रस्ता,
न पिआउ, न टेक |

संवाद.........

तुम जानती हो?
कि मैं सब कुछ जानता हूं
सब कुछ?
लेकिन तुम्हारी आँखों ने तो
कभी कुछ नहीं कहा

पर भाव तो निरा निरक्षर है...

वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
                 बस थोड़े से ही अक्षर हैं
                कुछ और मैं कहना चाहूँ
             पर भाव तो निरा निरक्षर है

मलाला  युसुफजई
राख का ढेर समझा तुमने 
जहाँ  दबे पड़े थे  शोले  !
लो ,उड़ी एक चिंगारी  ,
मलाला यूसुफ़ज़ई !

आखिर इतना मजबूत सीलेंडर  लीक हुआ  कैसे ?
इसका ज़वाब तो भ्रष्टाचार की पटरानी के पास भी नहीं है .यह वाड्रा को आगे करके रंग भूमि से जो खेल खेल रहीं थीं यही इस नाटक की सूत्र धार थीं
.अपना मंद मति बालक तो इतने पासे एक साथ फैंक ही नहीं सकता .उसमें  इतनी अकल  ही नहीं है .

एक गीत -माँ ! नहीं हो तुम

माँ !नहीं हो
तुम कठिन है
मुश्किलों का हल |
अब बताओ
किसे लाऊँ
फूल ,गंगाजल |

" हमारे यहाँ सातवाँ कब आयेगा......


सातवाँ बहुत खूबसूरत है | महंगा तो अवश्य है ,परन्तु है, सब से हटकर | उसको लेने वाले भी अलग से दिखते हैं | मुझे लाइन में लग कर यह कहने में ही हीनता हो रही थी कि मेरा तो अभी तीसरा ही है | मैं शक्ल से दीन हीन तो लगता ही हूँ ,मेरे साथ मेरा सिलंडर भी शर्माते हुए जमीन में धंसा जा रहा था | सातवें और उससे अधिक वालों की लाइन एकदम अलग

अधूरी हसरतों का ताजमहल

जो तफ़सील से सुन सके
जो तफ़सील से कह सकूँ
वो बात , वो फ़लसफ़ा
एक इल्तिज़ा, एक चाहत
एक ख्वाहिश, एक जुनून

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ


मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...



हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं : आकांक्षा यादव


वर्तमान साहित्य में नारी पर पर्याप्त मात्रा में लेखन कार्य हो रहा है, पर कई बार यह लेखन एकांगी होता है। यथार्थ के धरातल पर आज भी नारी-जीवन संघर्ष की दास्तान है। नारी बहुत कुछ कहना चाहती है पर मर्यादाएं उसे रोकती हैं। कई बार ये अनकही भावनाएं डायरी के पन्नों पर उतरती हैं या साहित्य-सृजन के रूप में


नदी हुई नव-यौवना, बूढ़ा पुल बेचैन - म. न. नरहरि

ठेस;
मूरख मैं साबित हुआ, फक्कड़ मिला ख़िताब
घाटा सब मैंने भरा, ऐसे हुआ हिसाब
उम्मीद:
घिरते बादल शाम से, काले - लाल- सफ़ेद
शायद अब हो जायगा, आसमान में छेद

किताब और किनारे

वह एक किताब थी ,
किताब में एक पन्ना था ,
पन्ने में हृदय को छू लेने वाले
भीगे भीगे से, बहुत कोमल,
बहुत अंतरंग, बहुत खूबसूरत से अहसास थे ।

कम उम्र में मानसिक तनाव के कारण बढ़ रहीं शारीरिक समस्याएँ

मानसिक तनाव
इस भागती दौड़ती दुनिया में तनाव बड़ता ही जा रहा है, कुछ शारीरिक समस्याएँ वर्षों पहले कुछ उम्र के बाद होती थीं याने कि लगभग ५० वर्ष के बाद होती थीं । अब वे शारीरिक समस्याएँ तेजी से कम उम्र की अवस्था में होने लगी हैं।
सब कहते हैं कि स्वस्थ्य जीवन जीना चाहिये, सबकी इच्छा स्वस्थ्य जीवन जीने की होती है, परंतु या तो समय पास ना होने की लाचारी होती है या फ़िर आराम तलबी के कारण पसीना नहीं बहाने देने की लाचारी होती है।

कुछ अनसुलझे से पहलु

रुक ... थोडा ठहर |
ओ ... उड़ते हुए बादल |
सवालों में उलझे अनसुलझे ,

पहलुओं को सुलझा जा |

नहीं अचानक मरता कोई

नव अंकुर ने खोली पलकें
घटा मरण जिस घड़ी बीज का,
अंकुर भी तब लुप्त हुआ था
अस्तित्त्व में आया पौधा !

अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं

क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर  ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !

रहबर ने गर्दिश-ए- खाकसार बना दिया,
जैसे तूफां के झोकों से दरख्त बर्बाद हुए है !

ब्रह्मचर्य का पालन ही मनुष्य को सात्विक बनाता है ..

पिछली पोस्ट पर विषय अति संवेदनशील होने के कारण डिस्क्लेमर तो लगा दिया था लेकिन विश्वास भी था कि हमारे परिपक्व ब्लॉगर मित्र हल्के फुल्के अंदाज़ में भी विषय की गंभीरता को समझेंगे। यह देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि लगभग सभी महिला और पुरुष मित्रों ने इसे स्पोर्ट्समेन स्पिरिट में लिया।
हालाँकि, अनअपेक्षित रूप से एक पुरुष मित्र ने किसी दूसरे मित्र के कंधे पर बन्दूक रखकर लगभग हमारे चरित्र पर ही ट्रिगर दबा दिया . पता नहीं जिंदगी को इतने रूखेपन से क्यों जीते हैं लोग .

" कुछ प्यार की बातें करें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़िन्दगी के खेल में, कुछ प्यार की बातें करें।
प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।


नेह की लेकर मथानी, सिन्धु का मन्थन करें,
छोड़ कर छल-छद्म, कुछ उपकार की बातें करें।

वादियों के पीछे ही कहीं आफताब खोया है..

उदास शाम की आँख हैं नम ओस की बूँदों  से,
चलती ये सर्द हवा कितनी खामोशी से।
कितने गुमसुदा और तन्हा हैं ये दरख्त खड़े,
हैं पूछते सवाल यूँ अपनी ही गुम परछाईं से ।।

आँसू और सुगंध ...

तुम से मिली उपेक्षा से चिढ़कर
बहुत सारी बुराइयाँ आ बैठीं मुझमे
और जितनी भी अच्छाइयाँ हैं मेरे अंदर
वह सब की सब तुम्हारी हैं
बात बात में टोकना तुम्हारा
मैं झुंझला जाता था भले प्रकट नहीं करता था


आज के लिए  बस इतना ही .... अब आज्ञा दीजिये ... नमस्कार

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

जीना इसी का नाम है ...ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार......केंद्र सरकार ने गुरुवार को जनसत्याग्रहियों की मांगें मान ली हैं. इसके बाद जल, जमीन, जंगल सत्याग्रह समाप्ति की घोषणा कर दी. सरकार और जनसत्याग्रहियों के बीच कुल दस मांगों पर समझौता हुआ है. इसमें राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति पर समझौता, फास्ट ट्रैक कोर्ट पर भी समझौता हुआ है और अब भूमिहीनों को जमीन मिलेगी. इस आंदोलन के खत्म होती ही सत्याग्रहियों का दिल्ली मार्च अब समाप्त हो गया है... आइये हम चलते हैं ब्लॉग वार्ता पर..........

साँसों के सफ़र का उत्सव - भारतीय संस्कृति में उत्सव का बड़ा महत्व है उत्सव शब्द सुनते ही जहन में एक रोमांच भर जाता है , मन ख़ुशी की कल्पना से झूम उठता है और ऐसा लगता है जैसे सारा ... .ज़िन्दगी के कुछ कतरे ये भी हैं... - *जब भी मौका मिलता है कहीं न कहीं कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूँ, आजकल डायरी से ज्यादा फेसबुक सब कुछ सहेजने का काम करता है.. ऐसे ही कुछ कतरे जो अलग अलग मूड मे....रफ़्तार देनी है - गिरे -बिखरे पत्थरों को समेट,* *गंतव्य को राह देनी है -* *अँधेरा कहीं तिरोहित हो चले ,* *हर हाथों में मशाल देनी है -* *न टूट सके आघातों से ह्रदय ,* *पत्थरों की दिवार देनी है-* *भंवर सामने है,डूबने से पहले ,* *नाव को पतवार देनी है-* * ******* * **हम उजड़ने नहीं देंगे गुलशन ,* *गुलों को एतबार देंगे,* *अगर खून से रंग निखरता है ,* *तो दानवीरों की कतार देनी है-....

सबक ... - सुनो, कुचल दो उसकी जुबान ... और, दफ़्न कर दो ... उसको - और उसकी आवाज को कहीं भी ... जहां से ... गर उसकी रूह भी चिल्लाना चाहे तो चिल्लाते रह...और ज़िन्दगी रूकती नहीं !!! - क्यूँ नहीं होता वह सब- जो हम खुली आँखों सपनाते हैं क्यूँ होता है वह -जो हम नहीं चाहते हैं ... कठिन प्रश्न-पत्र की तरह होनी हमेशा आगे खड़ी होती है सोच ... आखिरी सफर - ये जानते हुए कि मैं छोड़ी जा चुकी हूँ फिर भी एक इंतज़ार है कि तुम ....खुद से अपनी गलती स्वीकार करो ताकि मैं लौट सकूँ जहाँ से मैं आई हूँ पर मैं जानती...

सोलह में शादी की आजादी - देखिये साहब हमारा मुल्क रंगरंगीला परजातंतर है। इस बात को नित साबित करती खबरें हमारी मीडिया पेश करती रहती है। हालिया मामला है खाप पंचायत द्वारा लड़कियों क...  ....जीना इसी का नाम है - जीना इसी का नाम है  अँधेरे कमरे में बंद आँखों से खाते हुए ठोकरें वे चल रहे हैं और इसे जीना कहते हैं... बाहर उजाला है सुंदर रास्ते हैं ...कहे अनकहे रिश्ते - कहे अनकहे रिश्ते ..................................... जिन्दगी में तमाम कहे रिश्ते साथ चले सिर्फ नाम के लिए पिता था एक मेरी जिन्दगी में भाई था सिर्फ नाम...

अजीब शख्स था अपना बना के छोड़ गया हरेक रिश्ता सवालों के साथ जोड़ गया अजीब शख्स था, अपना बना के छोड़ गया कुछ इस तरह से नज़ारों कि बात की उसने मैं खुद को छोड़ के उसके ही साथ दौड़ गया तिश्नगी तो न बुझायी गयी दुश्मन से मगर पकड़ के हाथ समंदर के पास छोड़ गया मेरी दो बूँद से ज्यादा कि नहीं कुव्वत थी सारे बादल मेरी आँखों में क्यों निचोड़ गया  ... इंतज़ार मेरे दिल - ए - जज़्बात मेरे प्यार ( अरविन्द कुमार जी ) के लिए हर लम्हा इंतजार करता है तेरा तू आये तो , वो ठहरे तुझसे कुछ पूछने को बेचैन हर पल ये घड़ियाँ रहती हैं मेरी ऑंखें दरवाज़े पर लगी हैं , कि आयेगा तू इक दिन हक से पूछेगा मुझसे तू ठीक तो है ? .. अस्थि कलश गंगा की लहरों पर तैरते अस्थि कलश को देख सहसा मन में विचार उमड़ पड़ते हैं ....... कैसे एक भरा - पूरा इन्सान अस्थियों में बदल कर एक छोटे से कलश में समा जाता है ........... ना जाने ये किस की अस्थियाँ होंगी .... शायद...!....
  
भारत या इंडिया...? सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है। बरसों से लोगों के जेहन में यह सवाल कौंधता जरूर रहा होगा, लेकिन किसी ने अपनी जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश नहीं की और अब जब एक सामाजिक कार्यकर्ता ने ऐसी कोशिश की है, सरकार के माथे पर पसीने निकल आए हैं। सरकार के पास किसी तरह की जानकारी न.. और मैं रिश्ते बोती रही मैं तो रिश्ते बोती रही पर ये कंटक कहाँ से उगते गए.. मेरे मन स्थिति से विपरीत ये मेरे फूल से अहसासों को छलनी करते रहे और मैं रिश्ते बोती रही स्नेह का खाद डाल प्यार से सिंचित करती रही रोज़ दुलारती सवाँरती पर ये गलत फहमी के फूल ... मेरा दिल है सनकी .मेरा दिल है पागल, मेरा दिल है सनकी, करता है हरदम ही, ये दिल अपने मन की, खतरा है दिल जैसे, दोस्ती है दुश्मन की, सूरत है तुझ जैसी, इस दिल में दुल्हन की, मेरा ये पागलपन, चाहत है धड़कन की, मज़बूरी में जीना, आदत है जीवन की,...

विक्रमार्क, चुनाव, वेताल - आ गए चुनाव वेताल को पेड़ पर लटका छोड़ चल दिया विक्रमार्क बैनर और पोस्टर टांगने समदर्शी होकर क्या फर्क पड़ता है अगर कहीं पंजा कमल को दबोचता है कही हाथी दोनों ..शिक्षा का अधिकार...........? - *हरेश कुमार* एक तरफ, सरकार गरीबों को सस्ती और सुलभ शिक्षा का वादा कर रही है और दूसरी तरफ, उसे शिक्षा से वंचित करने का हर स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। ...वोट की ख़ातिर कुछ भी ? - देश के राजनैतिक नेताओं ने जिस तरह से आजकल बयान देने से पहले सोचना बंद ही कर दिया है उससे यही लगता है कि वोट पाने के लिए अब कुछ भी कह ...
चलते-चलते एक कार्टून 

   

अब इजाजत दीजिये नमस्कार .........

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

सचमुच घनचक्कर था मेघदूत ... ब्‍लॉग4वार्ता ... संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार, कल महानायक के साथ साथ लोकनायक का भी जन्‍म दिन था , डॉ पुनीत अग्रवाल जी ने इन्‍हें याद करते हुए उनके जीवन के बारे में जानकारी देते हुए एक पोस्‍ट लिखा है ।

जयप्रकाश नारायण (जन्म- 11 अक्तूबर, 1902, सिताबदियारा, (बिहार), मृत्यु- 8 अक्तूबर, 1979, पटना, बिहार) राजनीतिज्ञ और सिद्धांतवादी नेता थे। मातृभूमि के वरदपुत्र जयप्रकाश नारायण ने हमारे देश की सराहनीय सेवा की है। लोकनायक जय प्रकाश नारायण त्याग एवं बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। कहा गया है–

होनहार वीरवान के होत चीकने पात

जयप्रकाश विचार के पक्के और बुद्धि के सुलझे हुए व्यक्ति थे। जय प्रकाश जी देश के सच्चे सपूत थे। जयप्रकाश ने देश को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने का सच्चा प्रयास किया, जिसमें वह पूरी तरह से सफल रहे हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भारतीय जनमानस पर अपना अमिट छाप छोड़ी है। जयप्रकाश जी का समाजवाद का नारा आज भी गूँज रहा है। समाजवाद का सम्बन्ध न केवल उनके राजनीतिक जीवन से था, अपितु यह उनके सम्पूर्ण जीवन में समाया हुआ था।अब चलते हैं आज की वार्ता पर .....

प्रार्थना ! - *हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से |माँ,,, - माँ हर पल औलाद के खातिर दुआ करती है माँ, और माँ होने का हक ऐसे अदा करती है माँ! जिंदगी की धूप में खुद को खड़ा करती है वो, और बच्चों के लिये साया घना करती ...*मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ,नट नागर से ||* ** *तेरी ही महिमा से जग का* *होता है सूरज ज़रा आ पास आ.. - सूरज ज़रा आ पास आ जीना इसी का नाम है - जीना इसी का नाम है अँधेरे कमरे में बंद आँखों से खाते हुए ठोकरें वे चल रहे हैं और इसे जीना कहते हैं... बाहर उजाला है सुंदर रास्ते हैं वे अनजा...सोलह में शादी की आजादी - देखिये साहब हमारा मुल्क रंगरंगीला परजातंतर है। इस बात को नित साबित करती खबरें हमारी मीडिया पेश करती रहती है। हालिया मामला है खाप पंचायत द्वारा लड़कियों क...

वक़्त वक़्त की बात - *पुरानी सदी के डाइलोग: शशि कपूर: मेरे पास माँ है! इस सदी के डाइलोग: रॉबर्ट वाड्रा: मेरे पास सासू माँ है!*बहू तो आखिर बहू है - बहू तो आखिर बहू है क्या हुआ जो नहीं तुमसे,ठीक से वो बात करती क्या हुआ घर पर न टिकती,करती रहती मटरगश्ती क्या हुआ जो उसे खाना बनाने से बहुत चिढ है क्या हु...रेणुकाजी! काश! आप मेरी बहन होती -काश! रेणुका चौधरी मेरी बहन होती। उन्होंने धापूबाई बैरागी के पेट से द्वारकादासजी बैरागी के घर में जन्म लिया होता। तब वे ऐसा नहीं कहतींबेचारे बगदी लाल जी - बेचारे बगदी लाल जी ,करन चले व्यापार | महंगाई की मार का ,सह न पाए वार || है लाभ क्या न जानते ,झुझलाते पा हार | होते विचलित हानि से ,जीवन लगता भार ||

बच्चे तो बस हो जाते हैं ............... -वो कहते हैं अब के बच्चों में संवेदना नहीं पनपती प्रेम प्यार के बीज ना पल्लवित होते हैं बेहद प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं ना मान आदर सम्मान करते हैंचुहुल - ३४ - (१) एक समाजसेवी को उसके चाल-चरित्र से प्रसन्न होकर एक सिद्ध पुरुष ने एक ‘जादुई बोतल’ दी. बाद में जब समाजसेवी ने बोतल का ढक्कन खोला तो उसमें से एक ‘जिन्न’ ...आखिरी सफर - ये जानते हुए कि मैं छोड़ी जा चुकी हूँ फिर भी एक इंतज़ार है कि तुम ....खुद से अपनी गलती स्वीकार करो ताकि मैं लौट सकूँ जहाँ से मैं आई हूँ पर मैं जानती...शानदार व्यवसाय ! - लोकतंत्र में राजनीति अब शानदार व्यवसाय ! * ...

जीवन संध्या....संध्या शर्मा - सुबह से शाम चलते-चलते थक गया तन सुनते-सुनते ऊबा मन आँखें नम निर्जन आस भग्न अंतर उद्वेलित श्वास बहुत उदास कुछ निराश शब्द-शब्द रूठ रहे हैं मन प्राण छूट रहे ह...तरह तरह के डिजिटल कैमरे -*डिजिटल कैमरा* यानि कि *डिजिकैम,* साउंड, वीडियो और स्टिलफोटोग्राफ लेकर उन्हें एक इलेक्ट्रॉनिक इमेज सेंसर के माध्यम से रिकॉर्ड कर लेता है |संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक .... (कुँवर जी) -*सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक आचरण बुरा ही सही पर है इरादे नेक! खुद बोले खुद झुठलाये जो करे कह न पाए अजब चलन चला जग में चक्कर में विवेक भ्रष्टाचार ...होंठों पर तैरती मुस्कान! - हर शासकीय अवकाश के दिन सरकारी कामकाज के लिए दफ्तर पूरी तरह से बंद हों, इस बात का पता लगाना आम आदमी के लिए कोई हँसी खेल का काम तो कतई नहीं हो सकता। शासकीय ...

सचमुच घनचक्कर था मेघदूत -[image: cloudburst] नि दा फ़ाज़ली ने बादलों को उनकी आवारा सिफ़त के मद्देनज़र सिर्फ़ दीवाना क़रार देते हुए बरी कर दिया था क्योंकि वे नहीं जानते कि "किस राह ...फफूंदा मष्तिष्क शोथ (फंगल मैनिनजाइटइस )अगली किस्त . - फफूंदा मष्तिष्क शोथ (फंगल मैनिनजाइटइस )अगली किस्त . संतोष का विषय यही है की ये तमाम फफूंदा सुइयां निर्माता कम्पनी ने वापस मांग ली हैं जीमेल की छोटी पर उपयोगी नयी सुविधा -जीमेल पर अगर आप क्षेत्रीय भाषाओ और हिंदी में ज्यादा काम करते है तो आपके लिए जीमेल अब थोडा और बेहतर हो गया है . अगर आपने अपने जीमेल में हिंदी शुरू नही...थका हुआ सा एक ख्वाब..... -जाने कब से पल रहा है न जाने कब से चल रहा है..... एक ख्वाब मेरे ज़ेहन में, मेरे मन में..... एक ख्वाब जो थक गया है पलते पलते चलते चलते..... थक गया है ये म...
अब लेते हैं विराम .. मिलते हैं एक ब्रेक के बाद .....

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

आइये "करप्शन डे" मनायें!...ब्लॉग 4 वार्ता...संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार.... इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को रॉबर्ट वाड्रा पर नया धमाका किया। केजरीवाल ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि हरियाणा सरकार ने वाड्रा की 50 फीसदी हिस्सेदारी वाली डीएलएफ की कंपनी को अस्पताल की जमीन सेज के लिए औने - पौने दामों में दे दी। केजरीवाल ने इस पूरे मामले पर हरियाणा सरकार से वाइट पेपर की मांग की है। उधर, कांग्रेस ने केजरीवाल के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इस खास खबर के साथ आइये हम चलें अपनी ब्लॉग वार्ता पर ........

ओ प्रदीप्तनयन! वक्त के उस छोर पर खड़े तुम और इस छोर पर खडी मैं फिर भी एक रिश्ता तो जरूर है कोई ना कोई कड़ी तो जरूर है हमारे बीच यूँ ही तो नहीं संवादों का आदान प्रदान होता चाहे बीच में गहन अंधकार है नहीं है कोई साधन देखने का जानने का एक दूजे को मगर फिर भी कोई तो सिरा है जो स्पंदन के सिरों को जोड़ता है वरना यूँ ही थोड़े ही सूर्योदय के साथ मिलन की दुल्हन साज श्रृंगार किये प्रतीक्षारत होती... प्रेम की सरगम कोई आँखों से दिल की बात कहता रहा , और कोई पलके मूंदे ख्वाब ही बुनता रहा ........ रहा अनजान उन आँखों की इबारत से , बस अपनी ही धुन में रहा हो कर मगन ....... कोई पुकारता रहा आँखों से , अपने गीतों से ...... और कोई सुर में ही खोया रहा ...रहोगे न ? हजार बार मन किया बेवफा कह दूं तुझे पर तेरी आँखें देखने लगती हैं मुझे एकटक....  अभी बाकी मेरा वफ़ा बेवफाई दूरियाँ नजदीकियाँ मिलन वियोग प्रेम और प्रेम भी नहीं ये तो सब जीवन का हिस्सा हैं जब तक जीवन रहेगा ये सब रहेंगी ही मगर तुम तो जीवन के बाद भी रहोगे रहोगे न ? चौरासी लाख कम नहीं होते यार मुझसे अकेले इतना चक्कर नहीं काटा जाएगा 

जनता को ही आगे आ कर अंकुश लगाना होगा - एक हैं कलमाडी। जनता की यादाश्त चाहे कितनी भी अल्पजीवी हो पर इतनी भी कमजोर नहीं है कि वह इन महानुभाव को भूला बैठी हो। वैसे इनके द्वारा संपादित कार्य ही ..का बरखा जब..... - छोटे से एक प्रदेश में एक महीने में ग्यारह बलात्कार के ज्ञात केस, परफ़ार्मेंस  देखकर समझ नहीं आता कि गर्दन नीची होनी चाहिये  या छाती चौड़ी? ताजातरीन मामले ... तमगों की चाह ... - देर-सबेर, सब दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाएगा लोग, खामों-खाँ ... सच्चाई से बचने की जुगत ढूंढ रहे हैं ? ... अब क्या कहें, अपने मिजाज उनसे मिलते नही... 

 व्यंग्य : आइये, "करप्शन डे" मनायें! - *अरे ओ दुनिया वालो! अरे कभी हम "करप्ट" लोगों के बारे में भी तो सोचो। हमारे द्वारा की जा रही समाज-सेवा के बदले कभी तो हम लोगों को याद कर लिया करो। अरे भाई!... बनाना रिपब्लिक के अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? आज की असेम्बली मे भगत तुम नकली नही असली बम्म फोड दो. - *28 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले बनाना रिपब्लिक के अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? जवाब सुन लीजिये.. * "इस समय देश मे एक ऐसी क्रांति की निहायत जरूरत है ... मोक्ष क्‍या है....कैसे मिलेगा... पढि़ये व्‍यंग्‍य - *मोक्ष का द्वार *** पी के शर्मा लो, कर लो गल। हमें तो पता ही नहीं था कि देवालय और शौचालय में क्‍या अंतर होता है। ... 

 यह नेह क्यों, अनुराग क्यों? - *भावों को शब्द -**बद्ध करना कितना मुश्किल है :-( शब्द साधना एक तपस्या है . गुणी मित्र गण माफ़ करेगें इस अनाधिकार चेष्टा के लिए -* *यह नेह क्यों**,... स्वप्न...... - * * * ** ** **जागते हुए सोना* *सोते हुए जागना* *बस ऐसी ही होती है* *हमारे मन की स्थिति...! * *सूरज कब उगा ,* *किधर से उगा...* *और कब,* *किस तरफ डूब गया...!*...मनुहार - एक मोर एक मोरनी ,पहुंचे जमुना तीर पंख पसारे नाचते ,मन की हरते पीर || प्यार भरा अंदाज नया ,मन हरता चितचोर | कान्हां को पा गोपियाँ ,हुईं आत्म बिभोर || ... 

माफ़ कर दो वाड्रा जीज्जा - हा केजरीवाल, ये क्या कर डाला भाई, युगो युगो से इस धरा पर जीजाओं को सर माथे पर बैठाया जाता है। आज आपसे वाड्रा जीजा का फ़लना फ़ूलना ही न देखा गया। अरे जीज....पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की हेरा फेरी -- बार बार, लगातार ! - कॉलिज के दिनों में एक जोक बहुत सुना जाता था -- दो सहेलियां आपस में बातें कर रही थी . एक ने कहा -- ये लड़के आपस में कैसी बातें करते हैं ? दूसरी बोली --...महात्मा गांधी जी के आदर्श क्या अब बेमानी हो गए !! - जो पार्टी और उसके लोग अपने को गांधी का असली उतराधिकारी मानते हैं और गांधीजी के नाम पर अपनी राजनिति कि रोटियां सकते हैं और जिन्होंने गांधीजी के नाम..

सहारा नहीं मै साथ देने आया हूँ.. - *सहारा नहीं मै साथ देने आया हूँ.....* *तेरे गम को भुला दूँ....* *ये नहीं कह सकता* *हाँ तेरा गम बांटने आया हूँ.....* * **रिश्ते तो बहुत निभाए है तुने* *मै ... " शरीफों का जमाने में, अजी - बस हाल वो देखा कि -- शराफत छोड़ दी मैंने "....??? - * " शराफत छोड़ने का मन बना चुके" मेरे सभी मित्रों को मेरा यानी " मेंगो- मैन " का सादर नमस्कार !!* * कृपया स्वीकार करें !! नहीं करेंगे तो भी मुझे क्या ?* * .. चोर-चोर मौसेर भाई - *हरेश कुमार* * * पूरी कांग्रेस पार्टी का तो वाड्रा के बचाव के लिए उतरना समझ में आता है, क्योंकि सवाल सोनिया गांधी के दामाद का जो ठहरा लेकिन भारतीय जनता पार्... 

अब एक कार्टून 

 

चलते-चलते यहाँ भी आइये... वार्ता को देते हैं विराम नमस्कार ........

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

उधार की ज़िंदगी ... फिर एक चौराहा ...ब्लॉग 4 वार्ता --- संगीता स्वरूप

आज की वार्ता में  संगीता स्वरूप का नमस्कार ...साल 2012 के नोबल शांति पुरस्कार के लिए कांग्रेस एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी के नाम की सिफारिश की गई है। इंटरनेशनल अवेकनिंग सेंटर ने सोनिया गांधी का नाम लगातार नौंवी बार नोबल शांति पुरस्कार से संबंधित समिति की स्वीकृत सूची में शामिल करने के लिए भेजा है। संगठन ने अपने सिफारिशी पत्र सोनिया गांधी विश्व शांति की पुजारी और एक महान सामाजिक कार्यकर्ता बताते हुए उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का अनुरोध किया है। चलिये अब चलते हैं आज के लिंक्स पर ---

मुझे तलाश है उस भोर  की ,जो नव दिव्य चेतना भर दे |
निज लक्ष्य से ना हटें कभी
अटूट निश्चय पे डटें सभी
ना सत्य वचन से फिरें कभी
ना निज मूल्यों से गिरें कभी
जो गर्दन नीची कर दे

मुझे याद है प्रिय ! याद है .Я помню, любимая, помню

from स्पंदन SPANDAN by shikha varshney

कुछ दिन पहले अनिल जनविजय जी की फेस बुक दिवार पर एसेनिन सर्गेई की यह कविता  .Я помню, любимая, помню (रूसी भाषा में ) देखि. उन्हें पहले थोडा बहुत पढ़ा तो था परन्तु समय के साथ रूसी भी कुछ पीछे छूट गई. यह कविता देख फिर एक बार रूसी भाषा से अपने टूटे तारों को जोड़ने का मन हुआ.

lipa

आज लिपा* पर खिले फूल
मुझे अहसास कराते हैं
कैसे तेरे घुंघराले वालों पर
मैंने फूल बिखराए थे.

पतिता

from अन्तर्गगन by धीरेन्द्र अस्थाना

जिस्म  को बेच कर,
वह पालती उदर;
पतिता कहाती वह,
पर क्या वह पतिता ही है?

उधार की जिन्दगी... A Borrowd Life

from palash "पलाश" by "पलाश"

रेल की पटरी पर ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड रही थी, और घोष उस पटरी पर अपनी जिन्दगी की रफ्तार को खत्म करने के लिये उस पर अपनी पूरी रफ्तार से दौड रहा था, कि विघुत गति से एक हाथ अचानक आया और वो पटरी से अलग आ गया।
घोष- आपने मुझे क्यों बचाया, मै जीना नही चाहता, मुझे मरना है, आप मुझे छोड दीजिये..

और अब कैद में है

from हमसफ़र शब्द by संध्या आर्य

वर्षों तक एक ही शब्द के जिस्म में पनाह ले रखी थी
और बाहर महंगाई काट रही थी अक्षरों को
पन्नों पर स्याही बिखरने लगा था और हम थे कि
शुतुर्मुग की तरह

मैं ही नहीं तो कुछ नहीं !

from मेरी भावनायें... by रश्मि प्रभा...

मैं'   अहम् नहीं
आरंभ है
मैं से ही तुम और हम की उत्पत्ति है
मैं ही नहीं तो कुछ नहीं !
प्रेम,परिवर्तन,ईर्ष्या,हिंसा....
सबके पीछे मैं

मेरे ही सुर होंगे

अब न चुराऊँगी मैं, प्रियतम !
यह लो अपनी मुरली, प्रियतम !
रोज-रोज ना मिल पाऊँगी
जमुना तट ना आ पाऊँगी।

ठहरा हुआ शबाब जरा देखता तो चल

from My Unveil Emotions by Dr.Ashutosh Mishra "Ashu"

ठहरा हुआ शबाब जरा देखता तो चल 
    दीवाने इक गुलाब जरा देखता तो चल

रेबीज - एक मारक रोग

from जाले by noreply@blogger.com (पुरुषोत्तम पाण्डेय)

दिनेशसिंह बिष्ट, उम्र ३६ वर्ष, पेशे से अध्यापक, निवासी – ग्राम दौलतपुर जिला नैनीताल. तीन स्कूल जाने वाले बच्चे व शुभांगी पत्नी, सब कुशल मंगल था. वह गर्मियों की छुट्टियों में अपने ससुराल कोटाबाग मिलने गया तो वापसी में एक प्यारा सा देसी कुत्ते का पिल्ला भी साथ ले आया. पिल्ला आ जाने से बच्चे बहुत खुश हुए. उसके साथ खेलते थे, गोद में उठाते थे, उसे छेड़ते भी रहते थे.छेड़छाड़ से वह थोड़ा कटखना भी हो गया था. तीनों बच्चों के पैरों में उसने अपने पैने दांत चुभो दिये थे पर बच्चे तो बच्चे होते हैं, कहाँ परवाह करते हैं?

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

from ललितडॉटकॉम by ब्लॉ.ललित शर्मा
पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है

वो इक मजदूर था...

from दिल की कलम से... by दिलीप

वो इक मजदूर था...
रात भर उसके सिर पर...
नज़मों का बोझ रखता रहा...
चाँद, तारे, सागर, अंबर...
मय, साक़ी, पैमानों के झुंड...
कितना कुछ वो एक नट की तरह....

फिर एक चौराहा - डॉ नूतन गैरोला

from अमृतरस by डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति

इम्तिहान, इम्तिहान, इम्तिहान,.. न जाने जिंदगी कितने इम्तिहान लेगी, हर बार एक नया चौराहा, हर बार खो जाने का भय , मंजिल किस डगर होगी कुछ भी तो उसे खबर नहीं ,……. ……..मंथन मंथन मंथन जाने कितना ही आत्ममंथन, हर बार पहुंची उसी जगह ज्यूँ शून्य की परिधि पर चलती हुई …………..चढ़ते, चढ़ते, चढ़ते,

तीन दिए, तेरह गिने, लिखे तिरासी नाम - डा. विष्णु विराट

from ठाले बैठे by NAVIN C. CHATURVEDI

पानी में पानी नहीं , नहीं अन्न में अन्न
मन्न मन्न जोरौ तऊ, देह न लागौ कन्न १
मोहि न भावै लीक कछु, मोहि नहीं आधार
मैं मेरी मंजिल भयौ, मैं मेरौ निरधार २

हम सयाने हो गए !

from बैसवारी baiswari by संतोष त्रिवेदी

बचपन में
आँगन से लेकर दुआर तक
दौड़ते थे साथ-साथ बड़ी बहन के,
दहलीज़ से डेहरी तक
हमारे छोटे-छोटे पाँव
लांघते थे बेखटके

ज़िन्दगी कुछ यूँ ही बसर होती है.......


तुम से शुरू और तुम पे ही आकर रुकी है मेरी हर नज़्म......तुमसे जुदा कोई बात नज़्म सी लगती नहीं ,
क्या करूँ !!
मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ..
याने
-अवसर,संभावना,खुशी....
तुम्हारे काँधे पर टिका मेरा सर

मिली है सबको ऐसी छूट

from किताबें बोलती हैं by नादिर खान

मिली है सबको ऐसी छूट
मै भी लूटूँ तू भी लूट
चमचों को तू रख ले पास
कौन करे फिर तुझसे पूछ

एक बांध सब्र का ...

from sada-srijan by सदा

दर्द की भाषा कभी पढ़ी तो नहीं मैने
बस सही है हर बार
एक नये रंग में
उसी से यह जाना है
ये दर्द जब भी होता है

सफ़ारी की बातें और अरबी रातें ---भाग 1

from अंतर्मंथन by डॉ टी एस दराल

दुबई टूर  के अंतिम चरण में आता है डेजर्ट सफ़ारी . शहर से क़रीब 60-70 किलोमीटर दूर बने हैं -सेंड ड्यून्स यानि रेत के टीले। इन टीलों पर फर्राटे से दौड़ती गाड़ी में बैठकर  अनोखा रोमांच महसूस होता है। 

खामखाँ खुद को मिटाए कोई

from आनंद by Anand Dwivedi

बेवजह अब  न  रुलाये  कोई
गर कभी अपना बनाये कोई
दिले-नादाँ को संगदिल करलूं
कैसे, मुझको  भी बताये  कोई

तस्वीर

from कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** by रंजना [रंजू 
भाटिया]

हर सुन्दर तस्वीर
जो समेटे हुए हो
अपने में
कई रंग ...
कई एहसास
और एक
"मोनालिजा सी मुस्कान "

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर

from ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र by वन्दना

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर
आह ! और वक्त भी अपने होने पर रश्क करने लगेगा उस पल ………जानती हो ना मै असहजता मे सहज होता हूँ और तुम्हारे लि्ये लफ़्ज़ों की गिरह खोल देता हूँ बि्ल्कुल तु्म्हारी लहराती बलखाती चोटी की तरह ………

टूटे तारे

from Sudhinama by Sadhana Vaid

कूड़े के ढेर के पास
दो नन्हे हाथ
कचरे से कुछ बीनते हैं !
सहसा एक कर्कश
कड़क आवाज़
उन्हें कँपा देती है !

मेहँदी का पेड़

from जिंदगी की राहें by Mukesh Kumar Sinha

पता है ?
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़,
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली
.

नाहक़ ही प्यार आया

from ग़ाफ़िल की अमानत by चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

तुम्हारी एक मीठी बोल पर बेजा क़रार आया।
भली नफ़्रत ही थी तुझपर मुझे नाहक़ ही प्यार आया।।

वो सुबह ...!!!

from अनुभूति / Anubhuti... by Sriprakash Dimri
मुझे अब भी  याद है
बचपन की  वो सुबह ...
जब  ऑफिस जाने से पहले...
पिता के साथ ...
हरी दूब में....

रोज़ सुबह-शाम ..........

from जो मेरा मन कहे by यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur)

रोज़ सुबह-शाम
हर गली -हर मोहल्ले में
मची होती है
एक तेज़ हलचल
नलों में पानी आने की

आज के लिए बस इतना ही ..... मिलते हैं एक ब्रेक के बाद ...

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