गुरुवार, 5 जुलाई 2012

जब इंसान ने महसूस किया गॉड पार्टिकल बोसॉन या फर्मिऑन .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

सबों को संगीता पुरी का नमस्कार, गॉड पार्टिकल की खोज पर आज कई पोस्ट पढने मिली। प्रस्तुत है आज की वार्ता में इसी विषय की ब्लॉग पोस्ट……

गॉड पार्टिकल से अजर होने तक का विज्ञान  वैज्ञानिक उपलब्धियों के हिसाब से साल 2011 भी बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। पार्टिकल फिजिक्स, एस्ट्रोनॉमी और जीव-विज्ञान के क्षेत्र में नई खोजों ने हमें सबसे ज्यादा चौंकाया। जिनेवा स्थित सर्न लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने इस ब्रह्मांड की ईंट समझे जाने वाले हिग्स-बोसोन अथवा ‘गॉड पार्टिकल’ की एक झलक देखने का दावा किया। सर्न के ही वैज्ञानिकों एक अन्य प्रयोग में यह भी साबित करने की कोशिश की कि न्यूट्रिनो कणों की रफ्तार प्रकाश से भी ज्यादा है। यह खोज अल्बर्ट आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत के एकदम विपरीत है, जो यह कहता है कि प्रकाश से ज्यादा तेज कुछ नहीं। अगर यह खोज पूरी तरह से स्थापित हो जाती है, तो हमें फिजिक्स की किताबें फिर से लिखनी पड़ेंगी।

एक भारतीय वैज्ञानिक के नाम से बना ‘बोसॉन’ सत्येंद्रनाथ बोस की गिनती भारत के महान भौतिकशास्त्री और गणितज्ञ के रूप में की जाती है. आपने इन दिनों चर्चा में चल रहे हिग्स बोसोन के बारे में सुना होगा. सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए आठ हजार वैज्ञानिकों की टीम काम कर रही है. उसी महाप्रयोग में हिग्स बोसोन की बात कही जा रही है, जिसे गॉड पार्टिकल भी कहा गया है. दरअसल, ‘बोसोन’ नाम सत्येंद्रनाथ बोस के नाम से ही लिया गया है. यह भारत के लिए गौरव की बात है. भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस का जन्म 1 जनवरी, 1894 को कलकत्ता में हुआ था. उनकी आरंभिक शिक्षा कलकत्ता में ही हुई थी. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कलकत्ता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कालेज में दाखिला लिया.

जब इंसान ने महसूस किया गॉड पार्टिकल   मशहूर भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस ने आंइस्टीन के साथ मिलकर एक फार्मूला पेश किया, जिससे खास तरह के कणों का गुण पता चलता है। ऐसे कण बोसोन कहलाते हैं। दरअसल ब्रह्मांड की हर वस्तु तारा, ग्रह, उपग्रह व जीव जगत पदार्थ या मैटर से बना है। मैटर का निर्माण अणु-परमाणु से हुआ है। जबकि मास या द्रव्यमान वह भौतिक गुण है, जिनसे इन कणों को ठोस रुप मिलता है। अगर मास नहीं है तो कण रोशनी की रफ्तार से भगेगा, दूसरे कणों के साथ मिलकर संघनित होने की संभावना नहीं बनती। यही मास जब ग्रेविटी से गुजरता है तो भार कहा जाता है। लेकिन भार मास नहीं होता, क्योंकि ग्रेविटी कम या ज्यादा होने पर वह बदल जाता है। वहीं मास एक जैसा रहता है। 

बोसॉन या फर्मिऑन   भौतिकी का सिद्धान्त है पर समाज में हर ओर छिटका दिखायी पड़ता है। हर समय यही द्वन्द रहता है कि क्या बने, बोसॉन या फर्मिऑन। मानसिकता की गहराई हो या अनुप्राप्ति का छिछलापन, प्रचुरता की परिकल्पना हो या संसाधनों पर युद्ध, साथ साथ रह कर जूझना हो या दूसरे के सर पर पैर धरकर आगे निकलना। हर समय कोई एक पक्ष चुनना होता है हमें। हम मानवों के अन्दर का यह द्वन्द जगत की सूक्ष्मतम संरचना में भी परिलक्षित है। आईये देखें कि क्या होता है उनके परिवेश में। इस व्यवहार के क्या निष्कर्ष होते हैं और उस सिद्धान्त को किस तरह हम अपने सम्मलित भविष्य का सार्थक आकार बनाने में प्रयुक्त कर सकते हैं।

हिग्स बोसान मिल ही गया   जिनीवा में CERN के भौतिक विज्ञानीयों  ने  बुधवार 4 जुलाई 2012 को एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि उन्‍हें प्रयोग के दौरान नए कण मिले, जिसके गुणधर्म हिग्‍स बोसोन से मिलते  हैं। उन्‍होंने बताया कि वैज्ञानिक नए कणों के आंकड़ो के विश्‍लेषण में जुटे हैं। हालांकि उन्‍होंने यह भी कहा कि इन नए कणों के कई गुण हिग्‍स बोसोन सिद्धांत से मेल नहीं खाते हैं। फिर भी इसे ब्रह्मांड की उत्त्पत्ती के  रहस्‍य खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण  कदम  माना जा रहा है। 

आज का प्रश्न-307 question no-30प्रश्न-307: गाड पार्टिकल्स God Particles या ईश्वरीय कण क्या हैं? उत्तर: ‘हिग्स बोसान’ को ‘ईश्वर कण’ भी कहते हैं। इसे शुरुआती ब्रह्मांड में भारी कणों के द्रव्यमान के लिए उत्तरदायी माना जाता है। गाड पार्टिकल्स God Particles या ईश्वरीय कण हिग्स बोसॉन (Higgs boson) कण ही हैं यह एक काल्पनिक मूल कण है। जो ऊर्जा के एक ऐसे अकेले अतिसूक्ष्म बिंदु को कहते हैं, जिसका, जहाँ तक हमें पता है, आगे और कोई घटक या और कोई टुकड़ा नहीं होता। उसे और अधिक खंडित (तोड़ा) नहीं किया जा सकता। 

वर्ष के अंत तक ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य को सुलझा लिया जाएगा  वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वर्ष के अंत तक लार्ज हाइड्रान कोलाइडर (एलएचसी) में जारी प्रयोग के माध्यम से हिग्स बोसोन कण की गुत्थी सुलझाने के साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य को सुलझा लिया जा सकता है।  लार्ज हाइड्रान कोलाइडर में कई महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए इस वर्ष के अंत तक सक्रिय किया जाएगा।  बहरहाल, यूरोपीय परमाणु शोध संगठन (सर्न) के निदेशक रोल्फ डिटर हेयर ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि इस समय तक हम यह कह सकेंगे कि क्या हिग्स बोसोन कण का अस्तित्व है या नहीं।

'ॐ  ' हिग्ग्स-बोसोन भी कहे - कण-कण में भगवान्  मेरे लिए तो ये हिग्ग्स-बोसोन एक काला अक्षर भैंस बराबर के समान है ! जब जिसका कुछ ख़ास पता ही नहीं तो मेरा उस बारे में कुछ कहने का तुक ही नहीं बनता किन्तु जहां थोड़ी खुशी हुई कि इन ज्ञानियों ने कुछ ढूंढा वहीं मुझे इस बात का दुःख अधिक है कि अरबों-खरबों खर्च करने के बाद यदि हमारे ये वैज्ञानिक अब यह कहें कि कोई शक्ति है जो बिग-बैंग थ्योरी से ज़रा पहले घटित हुई और जो ब्रह्माण्ड को नियंत्रित और संचालित करती है, तो मेरे लिए इससे बड़ी हास्यास्पद बात क्या हो सकती है? पश्चिम और तथाकथित अतिज्ञानी, नास्तिक समाज का दोगलापन भी इसमें साफ़ झलकता है! यह जानने के बाद भी कि आस्तिकता के पीछे भी ठोस कारण है, और इसे हम बहुत अधिक समय तक झुठला नहीं सकते, उसे स्वीकार करने हेतु इनके द्वारा इतने ताम-झाम करने के बाद ऐसे निष्कर्ष निकाले जाते है! एक दुःख यह भी है कि हिग्ग्स बोसोन का जिक्र करते हुए ये पीटर हिग्स को तो याद रखते है, मगर हमारे वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस को भूल जाते है !
"क्या है सत्य ?"
जिस एकमात्र मूल उदगम (Source) से सब कुछ अस्तित्व में आया है, उसको ही सत्य वस्तु कहते हैं|वही जो - 'एकमेवाद्वितीयं' वस्तु है वही पूरी सृष्टि के सभी ' नाम-रूपों ' में अनुस्यूत है| उपनिषद में उस सर्वानुस्यूत सत्य के विषय में कहा गया है -
' पूरा स पक्षीभूत्वा प्राविशत '|
पूराकाल अर्थात सृष्टि के पहले वही ब्रह्म वस्तु मानो पक्षी के जैसे बन कर सभी कुछ (पूरे विश्व ब्रह्माण्ड) में प्रविष्ट हो गये थे| लौकिक रूप में जिस प्रकार बाहर से भीतर घुसा जाता है, ' सृष्टि के भीतर प्रविष्ट होने को ' उस अर्थ में नहीं समझना चाहिये|{तैत्तरीय उपनिषद में कहा गया है-

" तत-सृष्ट्वा तत एव अनुप्राविशत !
तत अनुप्रविश्य सत च त्यत अभवत |
विज्ञानम च अविज्ञानम च |
सत्यम च अनृतम च, इदम यत किम च;

तत सत्यम ! "
( तैत्तरीय उपनिषद : वल्ली :२: अनुवाक : ६) - सर्ग के आदि में परब्रह्म पुरोषत्तम (परमात्मा T माने ठाकुरदेव) ने यह विचार किया कि मैं नाना रूपों में उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ !यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात जीवों के कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करने के लिये संकल्प किया|

नमस्कार, आगामी वार्ता गिरीश बिल्लोरे लगाएगें

9 टिप्पणियाँ:

हमारी भारतीय संस्कृति जो बात बरसों पहले से कहती आ रही है "कण-कण में भगवान" वैज्ञानिक तौर पर साबित हुई... रोचक लिंक्स संकलन के लिए शुक्रिया संगीता जी

वाह... हिग्स बोसोन के बारें में एक साथ सारे लिंक्स...

बहुत अच्छी लगी ब्लागवार्ता।

बढिया वार्ता
अच्छे लिंक्स

इन कणों ने उलझा दिया है....
जटिल विषय थी पर आज की वार्ता
बहुत बढ़िया
सादर

अनु

वाह ..गज़ब.. बेहतरीन वार्ता ..

संगीता जी,बहुत सुन्दर । काश कोई ये भी बता सकता कि यह पहला कण कहाँ से आया ।
www.aapkayogeshsharma.blogspot.com

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