शनिवार, 14 जुलाई 2012

वड्डे ब्लोग्गर खाता ना बही ---------ब्लॉग4वार्ता -------- ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, फ़ेसबुक पर वंदना दूबे अवस्थी कह रही हैं - कल रात एनडीटीवी पर रवीश कुमार का प्रोग्राम देख रही थी...एक बेहद शर्मनाक घटना पर चर्चा हो रही थी कई दिग्गज नेता बैठे बहस कर रहे थे.... गुवाहाटी की इस घटना में एक बच्ची के साथ चंद शोहदे छेड़खानी कर रहे थे और राह चलते लोग मात्र दर्शक बने थे...... उम्मीद थी कि इस विषय को कोई तो उठायेगा अपने फेसबुक स्टेटस में, लेकिन अफ़सोस...यहां शायद कोई भी गम्भीर मुद्दा उठाना ही नहीं चाहता :( लगातार शर्मिंदा हूं इस घटना पर... उस लड़की की जगह पर किसी को भी अपनी बेटी नहीं दिखाई देती??  इस पर असम के डीजी का घटिया बयान आया है कि वह कोई एटीएम मशीन नहीं है…… अब चलते हैं आज की वार्ता पर्………॥

पानी गिरा कर मेह के रूप मेंपानी गिरा कर मेह के रूप में अन्न उगाते कभी अभिराम हैं ! शोभा दिखाते हमें अपनी जो ऐसी फिर विद्युत रूप कभी वे ललाम हैं ! शब्द सुना कर घन गर्जन का ध्वनि शंख की करते कभी बलभान हैं ! घनश्याम क...डॉ. बुडविग और उनके शिष्य लोथर हरनाइसेकई वर्षों पहले मैं पीपुल अगेन्स्ट कैंसर के अध्यक्ष श्री फ्रैंक व्हिवेल से साक्षात्कार करने अमेरिका गया था। उन्होंने मुझे पहली बार डॉ. बुडविग और उनके ऑयल-प्रोटी...वाह रे वड्डे ब्लोग्गर  वड्डे ब्लोगरस को देखा तो ऐसा लगा  कोई, सूखा गुलाब,  कोई, फटी हुई जुराब,  कोई, गैंडे की खाल,  कोई, म्युनिसिपल कूड़ादान,  कोई, गीत की दूकान ,  कोई, वाह वाह का मर्तबान,  कोई, फिसड्डी पहलवान,  कोई, संस्कार की मै...

खाता ना बही, जो ताऊ कहे वही सही. ज्यादातर लोगों को यह पता नही होगा कि मिस समीरा टेढी ने अपने रूतबे का इस्तेमाल करके किसी तरह एक पेट्रोल पंप अपने नाम कबाड लिया था. लोगों से सुन रखा था कि पेट्रोल पंप में बहुत कमाई है, पेट्रोल में डीजल मिला... नाइजेरियन कहानी केसवारिपब्लिक.बिज़ नाइजीरिया की प्रतिष्ठित लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. फातिमा अकिलू की एक बाल कहानी अशरफ का उड़नखटोला पिछले दिनों चकमक के अप्रैल २०१२ अंक में पढ़ी जिसका अनुवाद अरविन... मौन की भाषा आज कुछ कहना चाहती हूँ हे प्रिय ! मैं तुमसे खुलकर सुनोगे तुम मुझे या नहीं ? जानती हूँ, तुम मुझे सुनोगे जब बैठी थी मैं बागीचे में घास की बिछी हरी चादर पर तुम दूर से चलके आए थे मेरी पीठ तुम्हारी ओर थी तुम चुप...

भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष : 2बच्चों के प्रिय हीरो थे दारासिंह* - विनोद साव भारतीय सिनेमा में दारासिंह का भी एक जमाना रहा जब वर्ष 1960 से 1970 के बीच फिल्मों में उनकी मांग खूब थी। वे अखाड़े से आए हुए पहलवान थे। उन्होंने फ्री-...गुड़िया के बाल उर्फ केंडी फ्लॉसगुड़िया के बाल का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा कुछ लोग इसे बुढ़िया के बाल के नाम से भी जानते हैं अर्थात इसे दोनों नामों से जाना जाता है। क्यूंकि वो देखने में बिलकुल गुड़िया के और बुढ़िया के दोनों ही के ...इस बार मैं तुम्हे जाने नहीं दूंगाचाँद तुम्हारे चेहरे की तरह ही गोल है रात तुम्हारी आँखों में करीने से लगा काजल मोगरे के फूल हवा में खुशबू बन बहते हैं जिस दिन हँस देती ह़ो तुम मेरी किसी बात पर क्षितिज सरक कर कुछ पास आ गया था जब तुम करीब...

अपनै आप नं दारासिंह समझै है के....रुस्तम-ए-हिन्द दारासिंह के निधन का समाचार गुरुवार सुबह ही मिल गया था। टीवी एवं सोशल साइट्‌स पर दिन भर दारासिंह के निधन तथा उनसे जड़े किस्सों एवं संस्मरणों पर आधारित खबरों का बोलबाला रहा। शुक्रवार सुबह प्रि...एक कली...लरजती सी टहनी पर झूल रही है एक कली सिमटी,शरमाई सी थोड़ी चंचल भरमाई सी टिक जाती है हर एक की नज़र हाथ बढा देते हैं सब उसे पाने को पर वो नहीं खिलती इंतज़ार करती है बहार के आने का कि जब बहार आए तो कसमसा कर .'अन्ना' 'बाबा' को भी अब भगवान होने दीजियेबिलकुल अलहदा मिजाज़ की गज़ल है यह एक लंबे अरसे बाद शायद मैंने कुछ कहा है जिसमें अपने दर्द के बजाये ज़माने का दर्द है ....शुरुआत इसकी भी इश्क से ही हुए थी ...जो पहला शेर मैंने कहा था, वो था .... "आज फिर...

कम शब्दों में बात : तुम क्या हो ?यदि आप इस बात को जानना चाहते हैं तो आत्म चिंतन करें की आपके विचार क्या हैं . जिस प्रकार की इच्छा और आकांक्षाएं आपके मन में उठती रहती हैं . अवश्य ही आप वही हैं . जै राम जी की ....पुरुष आए मंगल से, स्त्री कौन देश से आईं?अक़्सर कहा जाता है कि हम सब दुनिया की भीड़ में अकेले हैं, हम अकेले आए थे और अकेले ही जाएंगे। पर इस अकेले आने-जाने के सफ़र के बीच हम अकेले नहीं रह पाते। लगभग हर इंसान देर-सवेर किसी संबंध में बंधता ही है। म..बीवी को मत आँख दिखाओ बाबाजीझूमो, नाचो, मौज मनाओ बाबाजी जीवन का आनन्द उठाओ बाबाजी ये क्या, जब देखो तब रोते रहते हो ? घड़ी दो घड़ी तो मुस्काओ बाबाजी मुझ जैसे मसखरे का चेला बन जाओ दिवस रैन दुनिया को हँसाओ बाबाजी ये सब नेत...

प्यारी फुद्कियाँयाद है गाँव के घर का वो अंगना कुछ साल ही तो गुजरे होंगे यादों की तिमिर में सब चकमक करने लगता है चढ़ती उतरती निक्कर धुल-धक्कर पसीने से भींगा बदन दूध-भात का कटोरा मैया का डाँट भरा प्यार और, और भी तो है याद...दोष तुम्हारा है, पागल लड़की!ऐ लड़की, तार-तार हुई अपनी इज्ज़त और अपने वजूद को लेकर कहां जाओगी अब? तुम तो मुंह दिखाने लायक ही नहीं बची कि लोग तुम्हारी पहचान नहीं भूलेंगे, वो चेहरे ज़रूर भूल जाएंगे जो तुम्हें सरेआम नोचते-खसोटते रहे थे।...और एक प्यास है मनमेरी आज की रचना उस ख़ास व्यक्ति के लिए जिसने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं मन में आये भावों को आज शब्दों में अभिव्यक्त कर सकूँ . "और एक प्यास है मन" ऐ चाँद तुमसे पूछूं, फिर क्यूँ उदास है मन कहने को दूर तन...

वार्ता को देते हैं विराम, मिलते हैं ब्रेक के बाद राम राम

14 टिप्पणियाँ:

दिन भर में क्‍या पढा जाए, यह तय करने में बडी मदद मिलती है इस ब्‍लसॅग से। हमारे लिए की गई आपकी मेहनत को सलाम।

लिंकों के मानसून का स्‍वागत है ललित भाई

बैरागी भैया सच कहे है
ये लेख अच्छा लगा-"अपनै आप नं दारासिंह समझै है के...."

ढेर सारे पठनीय लिंको से युक्‍त वार्ता ..

बहुत आभार ललित जी !!

सुप्रभात... रोचक लिंक्स से भरी बेहतरीन वार्ता के लिए आभार ललित जी...

अच्छी वार्ता ललित जी...
लिंक्स की पोटली अब खोलते हैं...
शुक्रिया
अनु

सुन्दर लिंक्स से सजी मनमोहक वार्ता के लिए शुक्रिया ! 'उन्मना' से मेरी माँ की रचना 'पानी गिरा मेह के रूप में' के चयन के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

बहुत बढ़िया लिंक्स का संयोजन ललित जी

आपने वंदना जी, अपने फेसबुक पर गुवाहाटी काण्ड की भर्त्सना से अपनी चर्चा शुरू की, बहुत अच्छा लगा..
ऐसी घटनाओं का खंडन होना ही चाहिए..
कुछ नज़रें ऐसी भी हैं, जिनके लिए यह घृणित कृत्य है ही नहीं, यह तो चाशनी में डूबी हुई मात्र एक ख़बर है, और जिसकी औक़ात बस एक चटखारे भर की है...
भारत एक महान देश है, जहाँ तकरीबन २० भाषाओं में, सैकड़ों अख़बार प्रतिदिन लाखों (शायद करोड़ों हो ) की तादाद में प्रतियां छपतीं हैं...और हर अख़बार का हर कोना, हत्या, लूट, राहजनी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, अपहरण से ही भरा होता है...सिर्फ़ एक दिन का कोई भी अख़बार कोई भी उठा ले तस्वीर मिल जायेगी...भारत की इस छवि के लिए कौन जिम्मेदार है ?
और क्या यह छवि कभी बदलेगी ??
हम जैसे लोग, जो बाहर रहते हैं, कई बार सोचते हैं, कि वापस आकार हमने जो भी सीखा है, अपने छोटे तरीके से ही समाज में योगदान दें...लेकिन हर बार ऐसी घटनाएं हमारे कदम रोक देतीं हैं...लगता है, वहाँ ऐसे भय में रहने से लाख बेहतर है, यहाँ के शांत-सुखद वातावरण में रहना...रोज़ सुबह अपनी बच्ची का मुँह देखती हूँ और भगवान् को धन्यवाद देती हूँ, कि वो सुरक्षित है | कम से कम यहाँ आए दिन ये सब तो नहीं देखना पड़ता है..
बहुत अच्छे लिंक्स मिले यहाँ..
धन्यवाद

रोचक और पठनीय वार्ता..

कुछ ग़लती हो गई है..कृपया पढ़ें :

आपने, वन्दना जी की अपने फेसबुक पर गुवाहाटी काण्ड की भर्त्सना से अपनी चर्चा शुरू की, बहुत अच्छा लगा..

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