बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

आइये "करप्शन डे" मनायें!...ब्लॉग 4 वार्ता...संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार.... इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को रॉबर्ट वाड्रा पर नया धमाका किया। केजरीवाल ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि हरियाणा सरकार ने वाड्रा की 50 फीसदी हिस्सेदारी वाली डीएलएफ की कंपनी को अस्पताल की जमीन सेज के लिए औने - पौने दामों में दे दी। केजरीवाल ने इस पूरे मामले पर हरियाणा सरकार से वाइट पेपर की मांग की है। उधर, कांग्रेस ने केजरीवाल के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इस खास खबर के साथ आइये हम चलें अपनी ब्लॉग वार्ता पर ........

ओ प्रदीप्तनयन! वक्त के उस छोर पर खड़े तुम और इस छोर पर खडी मैं फिर भी एक रिश्ता तो जरूर है कोई ना कोई कड़ी तो जरूर है हमारे बीच यूँ ही तो नहीं संवादों का आदान प्रदान होता चाहे बीच में गहन अंधकार है नहीं है कोई साधन देखने का जानने का एक दूजे को मगर फिर भी कोई तो सिरा है जो स्पंदन के सिरों को जोड़ता है वरना यूँ ही थोड़े ही सूर्योदय के साथ मिलन की दुल्हन साज श्रृंगार किये प्रतीक्षारत होती... प्रेम की सरगम कोई आँखों से दिल की बात कहता रहा , और कोई पलके मूंदे ख्वाब ही बुनता रहा ........ रहा अनजान उन आँखों की इबारत से , बस अपनी ही धुन में रहा हो कर मगन ....... कोई पुकारता रहा आँखों से , अपने गीतों से ...... और कोई सुर में ही खोया रहा ...रहोगे न ? हजार बार मन किया बेवफा कह दूं तुझे पर तेरी आँखें देखने लगती हैं मुझे एकटक....  अभी बाकी मेरा वफ़ा बेवफाई दूरियाँ नजदीकियाँ मिलन वियोग प्रेम और प्रेम भी नहीं ये तो सब जीवन का हिस्सा हैं जब तक जीवन रहेगा ये सब रहेंगी ही मगर तुम तो जीवन के बाद भी रहोगे रहोगे न ? चौरासी लाख कम नहीं होते यार मुझसे अकेले इतना चक्कर नहीं काटा जाएगा 

जनता को ही आगे आ कर अंकुश लगाना होगा - एक हैं कलमाडी। जनता की यादाश्त चाहे कितनी भी अल्पजीवी हो पर इतनी भी कमजोर नहीं है कि वह इन महानुभाव को भूला बैठी हो। वैसे इनके द्वारा संपादित कार्य ही ..का बरखा जब..... - छोटे से एक प्रदेश में एक महीने में ग्यारह बलात्कार के ज्ञात केस, परफ़ार्मेंस  देखकर समझ नहीं आता कि गर्दन नीची होनी चाहिये  या छाती चौड़ी? ताजातरीन मामले ... तमगों की चाह ... - देर-सबेर, सब दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाएगा लोग, खामों-खाँ ... सच्चाई से बचने की जुगत ढूंढ रहे हैं ? ... अब क्या कहें, अपने मिजाज उनसे मिलते नही... 

 व्यंग्य : आइये, "करप्शन डे" मनायें! - *अरे ओ दुनिया वालो! अरे कभी हम "करप्ट" लोगों के बारे में भी तो सोचो। हमारे द्वारा की जा रही समाज-सेवा के बदले कभी तो हम लोगों को याद कर लिया करो। अरे भाई!... बनाना रिपब्लिक के अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? आज की असेम्बली मे भगत तुम नकली नही असली बम्म फोड दो. - *28 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले बनाना रिपब्लिक के अमीर मैंगो मैन के की क्या ख्वाईश है? जवाब सुन लीजिये.. * "इस समय देश मे एक ऐसी क्रांति की निहायत जरूरत है ... मोक्ष क्‍या है....कैसे मिलेगा... पढि़ये व्‍यंग्‍य - *मोक्ष का द्वार *** पी के शर्मा लो, कर लो गल। हमें तो पता ही नहीं था कि देवालय और शौचालय में क्‍या अंतर होता है। ... 

 यह नेह क्यों, अनुराग क्यों? - *भावों को शब्द -**बद्ध करना कितना मुश्किल है :-( शब्द साधना एक तपस्या है . गुणी मित्र गण माफ़ करेगें इस अनाधिकार चेष्टा के लिए -* *यह नेह क्यों**,... स्वप्न...... - * * * ** ** **जागते हुए सोना* *सोते हुए जागना* *बस ऐसी ही होती है* *हमारे मन की स्थिति...! * *सूरज कब उगा ,* *किधर से उगा...* *और कब,* *किस तरफ डूब गया...!*...मनुहार - एक मोर एक मोरनी ,पहुंचे जमुना तीर पंख पसारे नाचते ,मन की हरते पीर || प्यार भरा अंदाज नया ,मन हरता चितचोर | कान्हां को पा गोपियाँ ,हुईं आत्म बिभोर || ... 

माफ़ कर दो वाड्रा जीज्जा - हा केजरीवाल, ये क्या कर डाला भाई, युगो युगो से इस धरा पर जीजाओं को सर माथे पर बैठाया जाता है। आज आपसे वाड्रा जीजा का फ़लना फ़ूलना ही न देखा गया। अरे जीज....पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की हेरा फेरी -- बार बार, लगातार ! - कॉलिज के दिनों में एक जोक बहुत सुना जाता था -- दो सहेलियां आपस में बातें कर रही थी . एक ने कहा -- ये लड़के आपस में कैसी बातें करते हैं ? दूसरी बोली --...महात्मा गांधी जी के आदर्श क्या अब बेमानी हो गए !! - जो पार्टी और उसके लोग अपने को गांधी का असली उतराधिकारी मानते हैं और गांधीजी के नाम पर अपनी राजनिति कि रोटियां सकते हैं और जिन्होंने गांधीजी के नाम..

सहारा नहीं मै साथ देने आया हूँ.. - *सहारा नहीं मै साथ देने आया हूँ.....* *तेरे गम को भुला दूँ....* *ये नहीं कह सकता* *हाँ तेरा गम बांटने आया हूँ.....* * **रिश्ते तो बहुत निभाए है तुने* *मै ... " शरीफों का जमाने में, अजी - बस हाल वो देखा कि -- शराफत छोड़ दी मैंने "....??? - * " शराफत छोड़ने का मन बना चुके" मेरे सभी मित्रों को मेरा यानी " मेंगो- मैन " का सादर नमस्कार !!* * कृपया स्वीकार करें !! नहीं करेंगे तो भी मुझे क्या ?* * .. चोर-चोर मौसेर भाई - *हरेश कुमार* * * पूरी कांग्रेस पार्टी का तो वाड्रा के बचाव के लिए उतरना समझ में आता है, क्योंकि सवाल सोनिया गांधी के दामाद का जो ठहरा लेकिन भारतीय जनता पार्... 

अब एक कार्टून 

 

चलते-चलते यहाँ भी आइये... वार्ता को देते हैं विराम नमस्कार ........

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

उधार की ज़िंदगी ... फिर एक चौराहा ...ब्लॉग 4 वार्ता --- संगीता स्वरूप

आज की वार्ता में  संगीता स्वरूप का नमस्कार ...साल 2012 के नोबल शांति पुरस्कार के लिए कांग्रेस एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी के नाम की सिफारिश की गई है। इंटरनेशनल अवेकनिंग सेंटर ने सोनिया गांधी का नाम लगातार नौंवी बार नोबल शांति पुरस्कार से संबंधित समिति की स्वीकृत सूची में शामिल करने के लिए भेजा है। संगठन ने अपने सिफारिशी पत्र सोनिया गांधी विश्व शांति की पुजारी और एक महान सामाजिक कार्यकर्ता बताते हुए उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का अनुरोध किया है। चलिये अब चलते हैं आज के लिंक्स पर ---

मुझे तलाश है उस भोर  की ,जो नव दिव्य चेतना भर दे |
निज लक्ष्य से ना हटें कभी
अटूट निश्चय पे डटें सभी
ना सत्य वचन से फिरें कभी
ना निज मूल्यों से गिरें कभी
जो गर्दन नीची कर दे

मुझे याद है प्रिय ! याद है .Я помню, любимая, помню

from स्पंदन SPANDAN by shikha varshney

कुछ दिन पहले अनिल जनविजय जी की फेस बुक दिवार पर एसेनिन सर्गेई की यह कविता  .Я помню, любимая, помню (रूसी भाषा में ) देखि. उन्हें पहले थोडा बहुत पढ़ा तो था परन्तु समय के साथ रूसी भी कुछ पीछे छूट गई. यह कविता देख फिर एक बार रूसी भाषा से अपने टूटे तारों को जोड़ने का मन हुआ.

lipa

आज लिपा* पर खिले फूल
मुझे अहसास कराते हैं
कैसे तेरे घुंघराले वालों पर
मैंने फूल बिखराए थे.

पतिता

from अन्तर्गगन by धीरेन्द्र अस्थाना

जिस्म  को बेच कर,
वह पालती उदर;
पतिता कहाती वह,
पर क्या वह पतिता ही है?

उधार की जिन्दगी... A Borrowd Life

from palash "पलाश" by "पलाश"

रेल की पटरी पर ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड रही थी, और घोष उस पटरी पर अपनी जिन्दगी की रफ्तार को खत्म करने के लिये उस पर अपनी पूरी रफ्तार से दौड रहा था, कि विघुत गति से एक हाथ अचानक आया और वो पटरी से अलग आ गया।
घोष- आपने मुझे क्यों बचाया, मै जीना नही चाहता, मुझे मरना है, आप मुझे छोड दीजिये..

और अब कैद में है

from हमसफ़र शब्द by संध्या आर्य

वर्षों तक एक ही शब्द के जिस्म में पनाह ले रखी थी
और बाहर महंगाई काट रही थी अक्षरों को
पन्नों पर स्याही बिखरने लगा था और हम थे कि
शुतुर्मुग की तरह

मैं ही नहीं तो कुछ नहीं !

from मेरी भावनायें... by रश्मि प्रभा...

मैं'   अहम् नहीं
आरंभ है
मैं से ही तुम और हम की उत्पत्ति है
मैं ही नहीं तो कुछ नहीं !
प्रेम,परिवर्तन,ईर्ष्या,हिंसा....
सबके पीछे मैं

मेरे ही सुर होंगे

अब न चुराऊँगी मैं, प्रियतम !
यह लो अपनी मुरली, प्रियतम !
रोज-रोज ना मिल पाऊँगी
जमुना तट ना आ पाऊँगी।

ठहरा हुआ शबाब जरा देखता तो चल

from My Unveil Emotions by Dr.Ashutosh Mishra "Ashu"

ठहरा हुआ शबाब जरा देखता तो चल 
    दीवाने इक गुलाब जरा देखता तो चल

रेबीज - एक मारक रोग

from जाले by noreply@blogger.com (पुरुषोत्तम पाण्डेय)

दिनेशसिंह बिष्ट, उम्र ३६ वर्ष, पेशे से अध्यापक, निवासी – ग्राम दौलतपुर जिला नैनीताल. तीन स्कूल जाने वाले बच्चे व शुभांगी पत्नी, सब कुशल मंगल था. वह गर्मियों की छुट्टियों में अपने ससुराल कोटाबाग मिलने गया तो वापसी में एक प्यारा सा देसी कुत्ते का पिल्ला भी साथ ले आया. पिल्ला आ जाने से बच्चे बहुत खुश हुए. उसके साथ खेलते थे, गोद में उठाते थे, उसे छेड़ते भी रहते थे.छेड़छाड़ से वह थोड़ा कटखना भी हो गया था. तीनों बच्चों के पैरों में उसने अपने पैने दांत चुभो दिये थे पर बच्चे तो बच्चे होते हैं, कहाँ परवाह करते हैं?

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

from ललितडॉटकॉम by ब्लॉ.ललित शर्मा
पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है

वो इक मजदूर था...

from दिल की कलम से... by दिलीप

वो इक मजदूर था...
रात भर उसके सिर पर...
नज़मों का बोझ रखता रहा...
चाँद, तारे, सागर, अंबर...
मय, साक़ी, पैमानों के झुंड...
कितना कुछ वो एक नट की तरह....

फिर एक चौराहा - डॉ नूतन गैरोला

from अमृतरस by डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति

इम्तिहान, इम्तिहान, इम्तिहान,.. न जाने जिंदगी कितने इम्तिहान लेगी, हर बार एक नया चौराहा, हर बार खो जाने का भय , मंजिल किस डगर होगी कुछ भी तो उसे खबर नहीं ,……. ……..मंथन मंथन मंथन जाने कितना ही आत्ममंथन, हर बार पहुंची उसी जगह ज्यूँ शून्य की परिधि पर चलती हुई …………..चढ़ते, चढ़ते, चढ़ते,

तीन दिए, तेरह गिने, लिखे तिरासी नाम - डा. विष्णु विराट

from ठाले बैठे by NAVIN C. CHATURVEDI

पानी में पानी नहीं , नहीं अन्न में अन्न
मन्न मन्न जोरौ तऊ, देह न लागौ कन्न १
मोहि न भावै लीक कछु, मोहि नहीं आधार
मैं मेरी मंजिल भयौ, मैं मेरौ निरधार २

हम सयाने हो गए !

from बैसवारी baiswari by संतोष त्रिवेदी

बचपन में
आँगन से लेकर दुआर तक
दौड़ते थे साथ-साथ बड़ी बहन के,
दहलीज़ से डेहरी तक
हमारे छोटे-छोटे पाँव
लांघते थे बेखटके

ज़िन्दगी कुछ यूँ ही बसर होती है.......


तुम से शुरू और तुम पे ही आकर रुकी है मेरी हर नज़्म......तुमसे जुदा कोई बात नज़्म सी लगती नहीं ,
क्या करूँ !!
मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ..
याने
-अवसर,संभावना,खुशी....
तुम्हारे काँधे पर टिका मेरा सर

मिली है सबको ऐसी छूट

from किताबें बोलती हैं by नादिर खान

मिली है सबको ऐसी छूट
मै भी लूटूँ तू भी लूट
चमचों को तू रख ले पास
कौन करे फिर तुझसे पूछ

एक बांध सब्र का ...

from sada-srijan by सदा

दर्द की भाषा कभी पढ़ी तो नहीं मैने
बस सही है हर बार
एक नये रंग में
उसी से यह जाना है
ये दर्द जब भी होता है

सफ़ारी की बातें और अरबी रातें ---भाग 1

from अंतर्मंथन by डॉ टी एस दराल

दुबई टूर  के अंतिम चरण में आता है डेजर्ट सफ़ारी . शहर से क़रीब 60-70 किलोमीटर दूर बने हैं -सेंड ड्यून्स यानि रेत के टीले। इन टीलों पर फर्राटे से दौड़ती गाड़ी में बैठकर  अनोखा रोमांच महसूस होता है। 

खामखाँ खुद को मिटाए कोई

from आनंद by Anand Dwivedi

बेवजह अब  न  रुलाये  कोई
गर कभी अपना बनाये कोई
दिले-नादाँ को संगदिल करलूं
कैसे, मुझको  भी बताये  कोई

तस्वीर

from कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** by रंजना [रंजू 
भाटिया]

हर सुन्दर तस्वीर
जो समेटे हुए हो
अपने में
कई रंग ...
कई एहसास
और एक
"मोनालिजा सी मुस्कान "

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर

from ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र by वन्दना

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर
आह ! और वक्त भी अपने होने पर रश्क करने लगेगा उस पल ………जानती हो ना मै असहजता मे सहज होता हूँ और तुम्हारे लि्ये लफ़्ज़ों की गिरह खोल देता हूँ बि्ल्कुल तु्म्हारी लहराती बलखाती चोटी की तरह ………

टूटे तारे

from Sudhinama by Sadhana Vaid

कूड़े के ढेर के पास
दो नन्हे हाथ
कचरे से कुछ बीनते हैं !
सहसा एक कर्कश
कड़क आवाज़
उन्हें कँपा देती है !

मेहँदी का पेड़

from जिंदगी की राहें by Mukesh Kumar Sinha

पता है ?
तुमने जो लगाया था
मेहँदी का पेड़,
उसके पत्ते आज भी
लाल कर देते हैं हथेली
.

नाहक़ ही प्यार आया

from ग़ाफ़िल की अमानत by चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’

तुम्हारी एक मीठी बोल पर बेजा क़रार आया।
भली नफ़्रत ही थी तुझपर मुझे नाहक़ ही प्यार आया।।

वो सुबह ...!!!

from अनुभूति / Anubhuti... by Sriprakash Dimri
मुझे अब भी  याद है
बचपन की  वो सुबह ...
जब  ऑफिस जाने से पहले...
पिता के साथ ...
हरी दूब में....

रोज़ सुबह-शाम ..........

from जो मेरा मन कहे by यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur)

रोज़ सुबह-शाम
हर गली -हर मोहल्ले में
मची होती है
एक तेज़ हलचल
नलों में पानी आने की

आज के लिए बस इतना ही ..... मिलते हैं एक ब्रेक के बाद ...

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

कपड़ों और सूरत से नहीं होती इंसान की पहचान: ब्लाग 4 वार्ता..ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार,...दो राज्यों में चुनाव की घोषणा हो गयी.... वोट से अपने लिए सरकार चुनने का समय आ गया. इन ५ बरसों में इतने घोटाले हुए जितने ६० बरसों में नहीं हुए. महंगाई अपनी चरम सीमा पर है. गैस सिलेंडर की मनमाने काला बाजारी हो रही है. जहाँ आम आदमी को महीने में एक सिलेंडर नहीं मिल पता वहीँ इन नेताओं को महीने में ५०-६० सिलेंडर दिए जा रहे हैं.  "पुरानी बीबी मजा नहीं देती है" कह कर आधी आबादी का अपमान करने वाली पार्टी और उनके नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाना निहायत ही जरुरी है. .....प्रस्तुत है आज की वार्ता ....

कपड़ों और सूरत से नहीं होती इंसान की पहचान - श्रीगंगानगर-एक परिचित विप्रवर को घर छोड़ गया। विप्रवर भी क्या! आज के सुदामा से कुछ बीस लगे। बुजुर्ग पतले दुबले । दांत थे भी और नहीं भी। हल्की सफ़ेद दाड़ी। ...हम सयाने हो गए ! - बचपन में आँगन से लेकर दुआर तक दौड़ते थे साथ-साथ बड़ी बहन के, दहलीज़ से डेहरी तक हमारे छोटे-छोटे पाँव लांघते थे बेखटके करते थे अठखेलियाँ खेलते थे लुका-छिप..आइये कुरीतियो और प्रदूषणकारी व्यवस्था का बहिष्कार करे - अभी गणेशोत्सव बीता है आगे नवरात्रे आने वाले है यह त्योहार जीवन मे रंग भरते है प्रेम का, उल्लास का, भेदभाव से ऊपर उठने का मौका देते है प्रकृति को नजदीक से ज..

एक झलक - चौराहे पर एक व्यक्ति जार -बेजार रो .ज़िन्दगी कुछ यूँ ही बसर होती है....... - *अपने कुछ बिखरे एहसासों को जोड़ कर ...सिलसिलेवार संजोया हैं मैंने.....मेरे दिल की खुली किताब के कुछ भीगे पन्ने समझ लीजिए.....* तुम से शुरू और तुम पे ही आकर... हाय काजल लगी मदहोश तुम्हारी आखें.. - बला का हुस्न गज़ब का शबाब नींद में है है जिस्म जैसे गुलिस्ताँ गुलाब नींद में है उसे ज़रा सा भी पढ़ लो तो शायरी आ जाए अभी ग़ज़ल की मुकम्मल किताब नींद में है ..

मैंने भी खैनी खाना शुरू किया. - *कई दिन से कोई भी पोस्ट या टीप लिखते हुए आलस सा आता है... पता नहीं क्यों. अत: कुछ लिखने की कवायद के नाम से बक बक शुरू कर रहा हूँ, मित्रजन संभाल लेंगे :)* ... अरविन्द कौन? - व्यंग्य स्वामी रामदेव कौन? प्रसिद्द योगगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता.. अन्ना है कौन? स्वामी रामदेव के द्वारा देहली लाये गए महारास्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता,, ... .वह उसकी ही अमानत है - "मेरी आँखों में अक्श था उसका, आंसू तो थे नहीं गिरते तो गिरते कैसे ? गिरा तहजीब से, बिखरा तरतीब से, --- मैंने उठाया फिर नहीं अब जमीन पर जो नमीं सी चस्पा है व..

हवा का झोंका है या तुम्हारे बदन की खुसबू ! ये पत्तियों की है सरसराहट के तुमने चुपके से कुछ कहा है ! - ..दिया गुलाब का फूल - दिया गुलाब का फूल किया इज़हार प्यार का डायरी में रखा बहुत दिन तक सहेजा एक दिन डायरी हाथ लगी नजर उस पर पड़ी फूल तो सूख गया पर सुगंध अपनी छोड़ गया अहसा...यादों की रौशनी की उजास - मौजूदगी से गहरा , मौजूदगी का अहसास है दूर जाकर, पता चले, कोई कितने पास है . सामने जो लफ्ज़ रह जाते थे, अनसुने अब अनकही बातों को भी सुनने की प्यास है... 

ओ मेरे, मुसव्विर .... - *ओ मेरे,* *मुसव्विर !* *बनाना एक आशियाना ,* *मजबूत बुनियाद से ,* *जिसमें दरवाजे,सीढियाँ हो ,* *खिड़कियाँ हो ,* *सामने खुला क्षितिज ,* *लहराते उपवन , आती भीन..एक गीत -अपना दुःख कब कहती गंगा - हर की पैड़ी हरिद्वार -चित्र गूगल से साभार भूगोल की किताबों में भले ही गंगा को नदी लिखा गया हो |दुनिया की किंवदन्तियों में भले ही इसे नदी कहा गया हो | लेकि.. .......... 

लेते है ब्रेक राम-राम ....

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

देश कैसे - - - तरक्की करे ...??? ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार , भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों गुजरात और हिमाचल प्रदेश में बुधवार को चुनावी शंखनाद हो गया निर्वाचन आयोग ने हिमाचल में एक चरण में नवम्बर महीने में और गुजरात में दो चरणों में दिसम्बर महीने में विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा की. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों की बुधवार को घोषणा होने का भाजपा एवं कांग्रेस ने स्वागत किया. भाजपा ने उम्मीद जतायी कि दोनों राज्यों में वह सत्ता बरकरार रखने में कामयाब होगी जबकि कांग्रेस ने कहा कि वह चुनाव नतीजों को लेकर ‘‘खासी आश्वस्त’’ है. जनता सोंच समझकर फैसला लेगी , ऐसी हम उम्‍मीद रखते हैं।

एक महीने की दिल्‍ली यात्रा और वहां रही व्‍यस्‍तता के कारण मैं ब्‍लॉग जगत से दूर रही। इसी मध्‍य ब्‍लॉगर ने भी नया चोला धारण कर दिया, इसमें सहज नहीं महसूस कर रही हूं अभी।  काफी दिनों बाद आप सबों के लिए कुछ लिंक्‍स लेकर आयी हूं, उम्‍मीद है आपको पसंद आएगी ...


गुस्सा कविता नहीं बन पा रहा है : सरोजकुमार मेरा गुस्सा नहीं बदल पा रहा है कविता में! कविता की नस-नस में व्याप जाए लावा कविता की धड़कनों में खड़कने लगे शंखध्वनि- तब तो बात बने हुनर ... जैसे पहले डूबी थी, वैसे ही इस बार भी डूबेगी लुटिया उनकी फिर भले चाहे ...... वो कड़क हों, ......... या मुलायम हों ? बदलते कांग्रेसी, बदलती राजनीति क्या कांग्रेस की राजनीति बदल रही है। क्या कांग्रेस यह मान चुकी है कि पारंपरिक वोट बैंक अब उसके लिये नहीं है। भ्रष्ट ज्ञान "ज्ञानी", एक ऐसा शब्द है जिससे हम-आप खुद को पढ़े लिखे समझने वाले लोग समझते हैं कि अच्छी तरह से समझते हैं, भांपते हैं।

मेरी जापान यात्रा : कीटाक्यूशू (Kitakyushu) का वो पहला दिन ! -जापानी समय के अनुसार दोपहर बारह बजे हम फुकुओका पहुँच चुके थे। फुकुओका से हमारा अगला पड़ाव था कीटाक्यूशू शहर (Kitakyushu City) था मैं समय की भँवर में हूँ परिस्थितियों में बँधा मैं, राह मेरी बनी कारा, श्रव्य केवल प्रतिध्वनियाँ, यदि किसी को भी पुकारा, देखना है, और कब तक, स्वयं तक फिर पहुँचता हूँ? मेहमान हैं टेम्प्रेरी कलेक्टर के रूप में श्रीगंगानगर-जब शब्दों का महत्व ही ना रहे तब खामोशी ठीक है और जब शब्दों की जरूरत ही ना हो समझने समझाने में तब होता है मौन। यादों की रौशनी की उजास मौजूदगी से गहरा , मौजूदगी का अहसास है दूर जाकर, पता चले, कोई कितने पास है . सामने जो लफ्ज़ रह जाते थे, अनसुने अब अनकही बातों को भी सुनने की प्यास है

वह उसकी ही अमानत है -"मेरी आँखों में अक्श था उसका, आंसू तो थे नहीं गिरते तो गिरते कैसे ? गिरा तहजीब से, बिखरा तरतीब से, --- मैंने उठाया फिर नहीं अब जमीन पर जो नमीं सी चस्पा है  Roshi: नारी Roshi: नारी: भोर की पौ फटते ही जो उठे .छोड़ सारे मीठे सपनो की खुमारी अलसाया तन ,नींद से बोझिल नयन पर क्या करे वो बेचारी उठते ही भागे रसोई की ओर  बेचारा! पुतला कही का! *रोज जलता है, फिर भी जिंदा है। खामोश रहता है, फिर भी चर्चाबिंदु है। इतना बेहूदा और अश्लील बयान ? कांग्रेसी कोयला मंत्री का यह कहना कि -- "औरत जब पुरानी हो जाती है तो मज़ा नहीं देती " ---बेहद दुखद और खेदजनक है ! सन्यासी का धर्म .... एक बार एक नदी के किनारे दो सन्यासी अपनी पूजा पाठ में लगे हुए थे । उन सन्यासी में से एक ने गृहस्थ जीवन के बाद सन्यास ग्रहण किया था 

खुद से विमुख खुद की जड़ें ढूँढने लगती हूँ ... -सबको आश्चर्य है शिकायत भी दबी जुबां में उपहास भी कि बड़े से बड़े हादसों के मध्य भी मैं सहज क्यूँ और कैसे रह लेती हूँ !!! देश कैसे - - - तरक्की करे "...??? जब विदेशी Status Symbol हो और स्वदेशी Cheap लगे तो देश आगे कैसे बढे... जब नहाने के बाद Deo लगाना जरुरी और भगवान के सामने सर झुकना Boring ये लगता है अनासक्त भाव की चाटुकारिता है . ये लगता है अनासक्त भाव की चाटुकारिता है . *विदुषियो ! यह भारत देश न तो नेहरु के साथ शुरु होता है और न खत्म .जो देश के इतिहास को नहीं जानते बिना फ्लैश प्लेयर के यूट्यूब विडियो कैसे देखें अगर आपने अपने कंप्यूटर में फ्लैश प्लेयर इंस्टाल नहीं किया है, या जैसा की आजकल आम है की फ्लैश प्लेयर इंस्टाल करने में समस्या है उम्र भर यूं ही... नीम के दो पेड़ों के आगे की दीवार पर फैली हुई बोगेनवेलिया की टहनियों पर खिल रहे, रानी और गुलाबी रंग के फूलों पर शाम आहिस्ता से उतर रही होगी.



बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

न जाने क्यों ...? रात भर जलता रहा है चाँद...ब्लॉग4वार्ता...संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार ...राजनीति साधू-संतों का काम नहीं है, जो राजनीति में जाता है उसकी आसक्ति राजभोग भोगने के प्रति हो जाती है. सत्ता के गलियारों में भव्यता होती है कंगाली नहीं. राजा और रंक के बीच पहले भी दूरी रही है और आज भी है, वे नदी के ऐसे दो समानान्तर किनारे हैं जो साथ होकर भी कभी नहीं मिलते...आइये अब चलते हैं आज की वार्ता पर ...

बच्चों के बापू... देश के प्यारे गाँधी बाबा, बच्चों के बापू कहलाए। सत्य-अहिंसा की नीति से, देश को आजादी दिलवाए। सूरज से चमकें बापू जी, कभी न हिम्मत हारे थे। अंग्रेजों को मार भगाया, पीछे-पीछे सारे थे। बापू का चश्मा बापू... हे बापू ! जम रही है धूल तुम्हारे चश्में पर छोड गए थे तुम इसे इस धरा पर हमने रखा था थाती समझकर प्रेरित करता था ...  शतश: प्रणाम  ओ आज़ादी के दीवानों, ओ स्वातंत्र्य युद्ध के वीरों , ओ रणचण्डी के खप्पर को भरने वाले रणवीरों ! देकर तन मन धन की आहुति जीवन यज्ञ रचाने वालों, अपने दृढ़ निश्चय के दीपक , जला पंथ दिखलाने वालों ! बने नींव के पत्थर पल क्षण , अपनी भेंट चढ़ाने वालों , विजय दुर्ग की प्राचीरों को , दृढ़ करने वाले मतवालों ...अहिंसा की सार्वभौम शक्ति - आज वैश्विक अहिंसा दिवस है, भारत के लिए यह गौरव का प्रसंग है कि विश्व को अहिंसा की इस अवधारणा का अर्पण किया। 15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने राष्ट्रपि...

अतीत के गलियारे....मुझे प्रसन्नता है किआज मैं अपनी ६०१ वी रचना आप सब के साथ सांझा कर रही हूँ | खामोशी तुम्हारी कह जाती बहुत कुछ नम होती आँखें जतातीं कुछ कुछ अनायास बंद होती आँखें ले जातीं अतीत के गलियारे में वर्षा अश्रु जल की गर्द हटाती धुंधली यादों की तस्वीरों से पन्ने खुलते डायरी के वे दिन भी क्या थे ? ......बंधक  पिंजरे के पंछी तू कितना बेबस लगता है.. जाने कैसे तू , यूँ घुट घुट के जीता है ?? कहाँ वो नीला आकाश वो अनंत विस्तार... कहाँ ये नन्हा सा पिंजरा, बेशक सोने का बना है.. जहाँ तू अपने पंख तक नहीं पसार सकता.. तकरारे वफा  तकरारे वफा वो कहता है , " मुझमे अब वो पहले जैसी कोई बात ही नहीं | मैंने कहा , " तेरे दिल में मेरे लिए अब वो , ज़ज्बात ही नहीं | वो कहता है , " मेरी कशिश में पहले जैसी खलिश ही नहीं | मैंने कहा , " तेरी चाहत में अब वो बेइंतहा तड़प ही नहीं...

गिद्धों का तांडव *आह कोई ऐसा भाव नहीं जो दुख मेरा सहलाए * *दुविधा बाँट मेरे मन की जो सुकून थोड़ा दे जाए.* *वर्णों की माला के आंखर शब्दों में ना ढलने पायें * *मन - संताप जो हर लें मेरा, पीड़ा कुछ तो कम हो जाए.* *चार लाल हैं एक मात के, जिन्हें पेट काट कभी पाला *ये दोगलापन क्यों ? - हिन्दू बेटियों को जबरदस्ती लव जेहाद का शिकार बनाकर उनका धर्म परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बना देते हैं , जबकि हिना और बिलावल के मध्य प्रेम होने पर उन्हें ...रात भर जलता रहा है चाँद Raat bhar jalta raha hai Chand - रात भर जलता रहा है चाँद, फिर भी, उधार की रोशनी फीकी रही, फीकी रही। चाहे उम्र भर बढती रही हो उम्र, फिर भी, पल पल जिंदगी घटती रही, घटती रही। पेट भर खा...

(लघुकथा) उड़ान - एक दि‍न, कभी न खुलने वाली एक खि‍ड़की के बाहर पक्षि‍यों का एक जोड़ा आ कर बैठा. ति‍नका ति‍नका ला कर एक घोंसला बनाया उन्‍होंने, फि‍र उसमें दो अंडे दि‍ए. दो....है ना मजेदार चुटकला - इस दुनियां में भी । और second world के नाम से जानी जाने वाली इस इंटरनेट दुनियां में भी । अक्सर लोगों के धार्मिक पागलपन को देखता हूँ । काश ! यह धार्मिक चिंतन ..गाँधी जी का टूटा चश्मा जब चपरासी रामलाल जाले हटाता, धूल झाड़ता कबाड़घर के पिछले हिस्से में गाँधी जी की मूर्ति को खोजता हुआ पहुँचा तो उड़ती धूल के मारे गाँधी जी की मूर्ति को जोरो की छींक आ गई. अब छड़ी सँभाले कि चश्मा या इस बुढ़ापे में खुद को...

टिमटिमाता हुआ ... एक दिया .. जीवन की काल कोठरी में .... मन की काल कोठारी में .... कुछ प्रकाश तो था ... क्षीर्ण होती आशाओं में .... फिर भी विकीर्ण होता हुआ .. कुछ उजास तो था ...!! उठता है सतत ... जो धुंआ इस लौ से .. स्वयं की भीती से- स्वयं ही लड़ता.... प्रज्ज्वल ..कांतिमय .. बडा जि‍द्दी है कमबख्‍त इसे समझाया नही जाता .बडा जि‍द्दी है कमबख्‍त इसे समझाया नही जाता उस संगदील को यारों हमसे मगर भुलाया नही जाता फुर्सत ही नही मैं लाख पुकारू,बुलाउं या मनाउं उसको उस खुशनसीब का मगर हमें बुलाना जाया नही जाता सब तो ले गया वो मुझसे वादे,वफा..न जाने क्यों ... ?अपनी ही कुछ बंदिश में न जाने क्यों सीमित -दमित से ही रहते हैं कुछ लोग इक छोटा -सा अपना ही आकाश लिए क्यों भ्रमित-चकित रहते हैं कुछ लोग चाँद -सूरज भी पल दो पल के लिए ही रोज तो आते हैं पर यूँ ही चले जाते हैं ख़ामोश -सी स्याह रात को ओढ़े लोग अपनी जिक्र-फिक्र में ही भटक जाते हैं उफ़....

क्या करता.... ??? तेरी बातों पे ऐतबार न करता,तो क्या करता ? मरना था कई बार,जो इक बार मरता तो क्या मरता ? कहकर ख़ुदा तुझको ख़ुदा से दुश्मनी ली, ग़र यह नही करता,तो क्या करता ? मिटाकर खुद को खुद से ही ढूँढे हैं निशाँ तेरे, ग़र सज़दा नही करता,तो क्या करता ?... मुहब्बत की कारीगरी देखी  तबियत अपनी - जब हरी देखी, मुहब्बत की - - - कारीगरी देखी, उठा चाहत का -- जब पर्दा, मैंने, नमी आँखों में थी --- भरी देखी, भुला दूँ तुझको -- याद या रक्खूं, दर्द उलझन --- हालत बुरी देखी, खफा है धड़कन - सांस अटकी है, गले में हलचल ---- खुरदरी देखी, सुर्ख रातें हैं ------ दिन बुझा सा है, सुहानी शम्मा भी ------ मरी देखी ... टूटता सितारा देख रही हूँ मैं आकाश.. अविराम . ढूंढ रही है नज़र .. कि कोई तो सितारा टूटे जिससे इतने सालों बाद खुद से भी छुपाई दिल की वो मुराद मैं..मांग सकूँ. वो जो कहीं बैठा है रूठ के न जाने क्यूँ इतने बरसों से वो मान जाए , लौट आये; यह ख्वाहिश उठा रही है सर कहीं भीतर . इसीलिए ,ताकती हूँ आसमान बदलने की चाह में है उसकी नाराजगी का फरमान . ... 

 

चलते - चलते कार्टून :

कार्टून दो अक्‍टूबर का ...

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लेते हैं एक ब्रेक अगली वार्ता तक के लिए नमस्कार ..........

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

विक्रम वेताल और अंधेर नगरी चौपट राजा...ब्लॉग 4 वार्ता---ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, यु पी ए सरकार ने महंगाई की सभी  पार कर दी। आम मध्यमवर्गीय के गले में फांसी का फंदा डालना बस बचा है। सारी योजनायें गरीब और अमीर को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं। शोषण सिर्फ मध्यमवर्ग का होता है। सीधे की लुगाई सब की भौजाई। यही हाल मध्यमवर्ग का है, जो भी आता है इसके पिछवाड़े पर हंटर जड़ जाता है। आज का समाचार है कि खुले बाजार में 7 वां सिलेंडर 1073 रूपये का मिलेगा। नंगाई की हद हो गयी है। मध्यमवर्ग भी ऐसा है कि दिन भर दाल रोटी के चक्कर में उलझा रहता है, अपनी बात उठाने तक की उसे फुर्सत नहीं हैं। मूल्य वृद्धि का पुरजोर विरोध होना चाहिए। जब तक यह मध्यमवर्ग सोया रहेगा इसका भला नहीं होना है। जागो सोने वालों जागो ........अब चलते हैं आज की  वार्ता पर, प्रस्तुत हैं कुछ उम्दा चिट्ठों के लिंक्स  ....

नौटंकी ... - अब इनसे तो 'उदय', कोई नंगा ही जीत सकता है शंका है हमें, कहीं 'खुदा' भी न हार गया हो इनसे ? ... दो-चार दांव-पेंच सीखने में हर्ज ही क्या है 'उदय' सुनत.मानसिक रूप से दिवालिया ..? - मार्च के अंत तक अगर आपने चौथा सिलंडर लिया तो आपको 1200 रूपए तक देने पड़ सकते हैं ! तेल कम्पनियाँ मनमाना रेट तय कर रही हैं ! कांगेस शासित राज्य अपने प्रदेश ... ..नमस्कार को टाटा खाया, नूडल को आंटा !! - " अज़ब - गज़ब " नमस्कार को टाटा खाया, नूडल को आंटा !! अंग्रेजी के चक्कर में हुआ बडा ही घाटा !! बोलो धत्त तेरे की !! माताजी को मम्मी खा ...

प्राकृतिक संसाधन आवंटन या नीलामी ? - देश के प्राकृतिक संसाधनों को किस तरह से उपयोग में लाया जाये इस बात पर देश के नेता एकमत नहीं हैं और जिस तरह से केंद्र सरकार ने २जी विवाद के... शरीर का जायज़ा लेती बेहद की प्रोद्योगिकीय दखल - *शरीर का जायज़ा लेती बेहद की प्रोद्योगिकीय दखल * * * *उसके फ्रिज में स्टूल(मल /टट्टी ) का एक साम्पिल रखा हुआ है जिसे लेब को जांच के लिए जल्दी से जल्दी ...चर्खी हुई चाकरी - *चर्खी हुई चाकरी* *श्यामनारायण मिश्र* ** *छूटे खेत खाद* *सावन के मेह* *चर्खी हुई चाकरी निचुड़ी गन्ने जैसी देह।* ** *लापरवाही वाले लमहे* *ओसारे की ख...

उरई में बर्तन व्यवसायी की दुकान से मिले ताम्र युगीन पिंड व उपकरण - * देश के प्रागैतिहासिक काल के मानचित्र में उरई का नाम अंकित* भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटैक) के उरई चैप्टर की ओर से बुंदेलखंड संग्रहालय के सभागार में उरई ... अतीत से जुदा या जुड़ा वर्तमान ...फिर भविष्य भी ? - अतीत से जुदा या जुड़ा वर्तमान ...फिर भविष्य भी ? by Suman Mishra on Monday, 20 August 2012 at 13:42 · *आज श्री प्रतुल मिश्र जी ने एक विचार दिया....."सूछम चिं... मेहनत और हिम्मत से विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है . - इससे पहले कि हम आपको यह बताएं कि दुबई से हमने क्या सीखा, थोड़ी और मस्ती हो जाये . इनडोर एक्वेरियम में नाव की सवारी करने से पहले हमने पूजा अर्चना करना सह... 

तब होगा भगत सिंह का सच्‍चा सम्‍मान पाकिस्तान ने बड़े समय बाद एक अच्छा काम किया है। शहीदे आजम भगत सिंह को हमारे देश में आदर्श की तरह पूजा जाता है और पाकिस्तान का आवाम भी उनको उतनी ही इज्जत देता है। वहां भी उनको अंग्रेजों के शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाला नायक माना जाता है। शहीद भगत सिंह... विक्रम वेताल 5  राजन मैं मरकर भी समझता हूँ और ये अपनी जानें ये हरसिंगार के फूल और झिलमिल करती रोशनी ये तेज, ये प्रदीप्ति वर्ष में एक बार ही? हर बरस पोंछ दी जाती हैं मूर्तियां पुरे बरस धूल ज़मने के लिये? जन्मदिन पर ही? धो देते हैं पखेरुओं के बीट अगले साल तक भू... अंधी नगरी चौपट राजा रख ले बासी फेंक दे ताज़ा. अंधी नगरी चौपट राजा. वो देखो लब चाट रहा है खून मिला है ताज़ा-ताज़ा. फटे बांस के बोल सुनाये कोई राग न कोई बाजा. अंदर-अंदर सुलग रही है इक चिंगारी, आ! भड़का जा. बूढा बरगद बोल रहा है धूप कड़ी है छावं में आ जा. जाने किस हिकमत से खुलेगा अपनी किस्मत का दरवाज़ा. हम और उनके शीशमहल में? पैदल से पिट जाये राजा? वक़्त से पहले हो जाता है वक़्त की करवट का अंदाज़ा...

मेरा आलस , आपका प्रेम और यह 100 - *इन पोस्टों के लिए सबसे ज्यादा पेज देखे गए* सृजन मानव जीवन का स्वभाव है . मानव ही नहीं प्रकृति के कण - कण में सृजन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है . एक ...बेमेल विवाह ……एक त्रासदी - बेमेल विवाह ………एक त्रासदी जो समाज को अभिशापित करती रही स्त्री भोग्या है……इसी को इंगित करती रही यूँ तो सदियों से समाज में बेमेल विवाह होते आये जो हमारे ...क्षितिज की ओर.... - (On World Elders day) सोचा नहीं था ज़िंदगी में कभी यह दिन भी आयेगा, जिन्हें समझा था अपना, वह पराया नज़र आयेगा. नहीं था... 

छत पर अटके ख्याल.... - लन्दन का मौसम आजकल अजीब सा है या फिर मेरे ही मन की परछाई पड़ गई है उसपर.यूँ ग्रीष्म के बाद पतझड़ आने का असर भी हो सकता है.पत्ते गिरना अभी शुरू नहीं हुए ह... हम देख न सके,,, - *हम देख न सके,,,* *रोज पढते रहे अखबार हम देख न सके, आप कब हो गए सरकार हम देख न सके,! हमने तो आपको अपने करीब देखा था, बीच में कांच की दीवार हम देख न सके,! ...टूटता सितारा - देख रही हूँ मैं आकाश.. अविराम . ढूंढ रही है नज़र .. कि कोई तो सितारा टूटे जिससे इतने सालों बाद खुद से भी छुपाई दिल की वो मुराद मैं..मांग सकूँ. वो जो कहीं....

चलते - चलते  कार्टून ...

 

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अब लेते हैं विराम राम - राम......   

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

देश की आर्थिक नीति और क्या थे वादे...?.... ब्लॉग4वार्ता....संध्या शर्मा

 संध्या शर्मा का नमस्कार ....अब, मुफ्त में होगी फोन पर बात? टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने आज कहा कि सरकार आने वाले सालों में वॉयस कॉल फ्री करने पर विचार कर रही है... कितना ध्यान रखती है न हमारी सरकार अपनी जनता का... :)) लीजिये प्रस्तुत हैं आज की वार्ता कुछ चयनित लिंक्स के साथ...  

रंगभेद की पहली सीख - एदुआर्दो गालेआनो (जन्म उरुग्वे,1940- ) अभी के सबसे पढ़े जाने वाले लातिनी अमेरिकी लेखकों में शुमार किये जाते हैं। लेखन और व्यापक जनसरोकारों के संवाद के अपने अ..जागीर ... - हमने तो सुना था, कि - सिर्फ ..... सरकार उनकी है ? पर, यहाँ तो - सारा मुल्क ... उनके ... बाप की - जागीर हमको लग रहा है ?? .ज़रूरत है गांधी के स्त्रीविमर्श को समझने की - *-****डॉ. शरद सिंह*** *इसमें कोई दो मत नहीं कि महात्मा गांधी के विचार कालजयी हैं। दुख तो तब होता है कि गांधी के देश में कोई डी आई जी पद का अधिकारी कहता ...कहते हैं यहाँ ज्ञान मिलता है - दक्षिण के छोटे कस्बों, गाँव खेड़ों के हिन्दुओं का मंदिर जाकर देवी/देवताओं का दर्शन करना साधारणतया उनके दैनिक दिन चर्या का एक हिस्सा होता है. वहीँ शहरों या...

महबूब की बेवफाई - मैं सार्वजनिक उपक्रमों का पक्षधर हूँ। मेरी धारणा है कि ये हम सामान्य लोगों को निजी क्षेत्र की मनमानियों और शोषण से बचाते हैं। यह भी जानता हूँ ‘सरकारी’... यही रोज़गार बचा है मेरे पास - मेरे कंधे पर शाम की छतरी से टूट कर दफ़अतन गिरा एक लम्हा था। एक चादर थी, चाँद के नूर की और उसकी याद का एक टुकड़ा था। मैं उलटता रहा इंतज़ार की रेतघड़ी। ...देश की आर्थिक नीति - देश में आर्थिक सुधारों के जनक और आज के पीएम मनमोहन सिंह के अनुसार देश के लिए जो आर्थिक नीतियां बनाये जाने की आवश्यकता है उन्हें बनाने में वे... 

देखी होगी तुमने....... - देखी होगी तुमने........ मेरी सोती-जागती कल्पनाओं से, जन्म लेती हुई कविताओं को,प्रसव वेदना से मुक्त होते हुये, सुनी होगी........ उनकी पहली किलकारी, मेरी ... अंत - अंत sSj पहले से ही हताश हवा के चेहरे पर उड़ने लगी हैं हवाईयां. जीवन के अंत का आभास जो दिला रहे हैं उसके अनवरत बढते नाखून बचपन में सुना करती थी चूहों के लगात... क्या थे वादे ..... - * ** * * ** ** ** ** **क्या थे वादे , क्या निभाया * *क्या निभाना शेष है * *स्मृतियों का लोप होना ,* *विध्वंश का सन्देश ... 

विध्‍नविनाशक के भक्‍तों को बचाएं विध्‍न से... - दस दिनों तक उत्साह और उमंग का पर्याय रहे गणपति बप्पा की विदाई हो गई। विदाई भी पूरे जोशोखरोश के साथ हुई। जगह जगह जुलूस और झांकियां निकाली गईं और अगले बरस ...हम वीर भगत सिंह को शत शत शीश झुकाते हैं - लानत भेजो नेताओं को जो अपनी तोंद बढ़ाते हैं हर हालत में देखो इनको अपनी मौज बनाते हैं नालायकी की हद है देखो अपने शहीदों को बिसराते हैं अखबार के पहले पेज ... रूपये तो पेड़ों पर ही लगते हैं सरदार जी ! - चिल्हर संकट के कारण पैसा तो बाज़ार से कब का गायब हो चुका है . अब तो रूपए का जमाना है .इसलिए सरदार जी को कहना ही था तो कहते कि रूपए पेड़ पर नहीं लगते ,लेकिन ... 

एकांत-रुदन... - ज़िन्दगी में दोस्तों का होना कितना ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी... कोई फोर्मलिटी वाले दोस्त नहीं, दोस्त ऐसे जिन्हें दोस्ती की बातें पता हो... मोनाली की भाषा ... उस थाली में क्‍या था....? - *कीमती लोग कीमती भोग*** एक थाली पर कितना खर्चा है..आजकल इसकी बड़ी चर्चा है। पता नहीं क्‍यों ताकते हैं लोग दूसरे की थाली में....क्‍या क्‍या भरा थाली में... सांझ - ये सांझ .... बीतेगी कैसे... तुम ही कहो न. उस शाम , तुम्हारे बिछड़ने के उस पल से मेरी सुरमई आँखों में तैरती लाली तेरी आँखों में ठहर गयी है लाख जतन कर... 

चलते - चलते एक कार्टून 

आज के लिए बस इतना ही नमस्कार....

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