शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ- चतुर्थी...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार ... नवदेवियों  में चतुर्थ देवी कुष्मांडा का तेज सूर्य रूप सा व्यापक है ..
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे। 

नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदि स्वरूपा या आदि शक्ति कहा गया है। .


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ब्लॉग जगत की आज की देवी हैं शिखा वार्ष्णेय जी ... London, United Kingdom से ब्लॉगिंग कर रही शिखा जी मार्च 2009 से ब्लॉग जगत में हैं..जानकी वल्लभ शास्त्री, साहित्य सम्मान, साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान 2010- यात्रा वृत्तान्त के लिए श्रेष्ठ लेखिका सम्मान से सम्मानित . अपने बारे में लिखते हुए कहती हैं-

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"अपने बारे में कुछ कहना कुछ लोगों के लिए बहुत आसान होता है, तो कुछ के लिए बहुत ही मुश्किल और मेरे जैसों के लिए तो नामुमकिन फिर भी अब यहाँ कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा न [:P].तो सुनिए. by qualification एक journalist हूँ moscow state university से गोल्ड मैडल के साथ T V Journalism में मास्टर्स करने के बाद कुछ समय एक टीवी चैनल में न्यूज़ प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया, हिंदी भाषा के साथ ही अंग्रेज़ी,और रूसी भाषा पर भी समान अधिकार है परन्तु खास लगाव अपनी मातृभाषा से ही है.खैर कुछ समय पत्रकारिता की और उसके बाद गृहस्थ जीवन में ऐसे रमे की सारी डिग्री और पत्रकारिता उसमें डुबा डालीं ,वो कहते हैं न की जो करो शिद्दत से करो [:D].पर लेखन के कीड़े इतनी जल्दी शांत थोड़े ही न होते हैं तो गाहे बगाहे काटते रहे .और हम उन्हें एक डायरी में बंद करते रहे.फिर पहचान हुई इन्टरनेट से. यहाँ कुछ गुणी जनों ने उकसाया तो हमारे सुप्त पड़े कीड़े फिर कुलबुलाने लगे और भगवान की दया से सराहे भी जाने लगे. और जी फिर हमने शुरू कर दी स्वतंत्र पत्रकारिता..तो अब फुर्सत की घड़ियों में लिखा हुआ कुछ,हिंदी पत्र- पत्रिकाओं में छप जाता है और इस ब्लॉग के जरिये आप सब के आशीर्वचन मिल जाते हैं.और इस तरह हमारे अंदर की पत्रकार आत्मा तृप्त हो जाती है......."

इनकी प्रथम पोस्ट:

कौन

क्यों घिर जाता है आदमी,
अनचाहे- अनजाने से घेरों में,
क्यों नही चाह कर भी निकल पता ,
इन झमेलों से ?
क्यों नही होता आगाज़ किसी अंजाम का
,क्यों हर अंजाम के लिए नहीं होता तैयार पहले से?
ख़ुद से ही शायद दूर होता है हर कोई यहाँ,
इसलिए आईने में ख़ुद को पहचानना चाहता है,
पर जो दिखाता है आईना वो तो सच नही,
तो क्या नक़ाब ही लगे होते हैं हर चेहरे पे?
यूँ तो हर कोई छेड़ देता है तरन्नुम ए ज़िंदगी,
पर सही राग बजा पाते हैं कितने लोग?
और कोंन पहचान पता है उसके स्वरों को?
पर दावा करते हैं जेसे रग -रग पहचानते हैं वे,
ये दावा भी एक मुश्किल सा हुनर है,
सीख लिया तो आसान सी हो जाती है ज़िंदगी,
जो ना सीख पाए तो आलम क्या हो?
शायद अपने और बस अपने में ही सिमट जाते हैं वे
ओर भी ना जाने कितने मुश्किल से सवाल हैं ज़हन में,
जिनका जबाब चाह भी ना ढूँड पाए हम,
शायद यूँ ही कभी मिल जाएँ अपने आप ही,
रहे सलामत तो पलके बिछाएँगे उस मोड़ पे...


अद्यतन पोस्ट: बदल रहा है हिंदी सिनेमा...

आजकल लगता है हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम समय चल रहा है।या यह कहिये की करवट ले रहा है।फिर से ऋषिकेश मुखर्जी सरीखी फ़िल्में देखने को मिल रही हैं। एक के बाद एक अच्छी फिल्म्स आ रही हैं। और ऐसे में हम जैसों के लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है क्योंकि फिल्म देखना वाकई आजकल एक अभियान हो गया है.अच्छी खासी चपत लग जाती है। तो इस बार यह चपत जम कर लगी। लगातार 3 फिल्मे आई और तीनो जबरदस्त। अनुराग बासु की बर्फी का स्वाद तो हम 2 हफ्ते पहले ही ले आये थे कुछ (बहुत) नक़ल की गई बातों और कुछ ओवर एक्टिंग को छोड़कर फिल्म अच्छी ही लगी थी। कम से कम क्लास के नाम पर फूहड़पन नहीं था,द्विअर्थी संवाद नहीं थे, हिंसक दृश्य नहीं थे। और कहानी भी अच्छी थी ।गाने कमाल के थे। "इत्ती सी हंसी, इत्ती सी ख़ुशी इत्ता सा टुकड़ा चाँद का " वाह .. बोल पर ही पैसे वसूल हो सकते हैं। रणवीर कपूर ऐसे रोल में जंचते हैं और प्रियंका चोपड़ा ने कमाल किया है। यानि नक़ल भी कायदे से की गई है तो देखने के बाद मलाल नहीं हुआ।फिर आई OMG  और दिल दिमाग एकदम ताज़ा हो गया। परेश रावल और अक्षय कुमार द्वारा निर्मित इस कॉमेडी फिल्म का निर्देशन उमेश शुक्ला ने किया है। ज़माने बाद कोई लॉजिकल फिल्म देखी. होने को कुछ काल्पनिक बातें इसमें भी हैं परन्तु 
चुस्त पटकथा और करारे संवाद इन सब को नजरअंदाज कर देने को विवश कर देते हैं। परेश रावल पूरी फिल्म को अकेले अपने कन्धों पर उठाये रहते हैं और आपका मन हर दृश्य पर तालियाँ बजाने को करता है।जिस रोचक ढंग से धर्म के नाम पर लूटपाट और अंधविश्वास की कलई इस फिल्म में खोली गई है ऐसा मैंने इससे पहले किसी फिल्म में नहीं देखा।फिल्म में परेश रावल के अलावा अक्षय कुमार मुख्य भूमिका में हैं और मिथुन चक्रवर्ती,ओम पुरी की भी छोटी छोटी भूमिकाएं है जिसमें वह फिट नजर आते हैं।प्रभु देवा और सोनाक्षी सिन्हा पर एक गीत भी फिल्माया गया है।कुल मिलाकर हास्य व्यंग्य के तड़के  साथ बढ़िया फिल्म है।

और फिर आई इंग्लिश विन्ग्लिश और सबसे आगे निकल गई। एकदम सुलझा हुआ पर बेहद जरुरी विषय.बेहद सरलता से पानी सा बहता हुआ निर्देशन और साथ बैठकर बात करती सी सहज अदाकारी।एक ऐसी फिल्म जिसे हर किसी को पूरे परिवार के साथ बैठकर देखना चाहिए। एक फिल्म जिसके किसी न किसी किरदार से आप अपने आपको जरुर सम्बंधित पायेंगे। किसी को अपनी माँ याद आती है किसी को बहन की और कोई खुद अपने आपको ही उसमें पाता है। संवाद बेहद सरल और आम रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़े होते हुए भी जैसे सीधे मन की अंदरूनी सतह तक जाते हैं और आपकी आँखें गीली कर जाते हैं। गौरी शिंदे और "पा "और "चीनी कम" जैसी लीक से हट कर फिल्मों को बनाने वाले आर बाल्की की यह फिल्म एक सेकेण्ड को भी पलक झपकाने नहीं देती। दृश्य दर दृश्य इस तरह से चलते हैं कि दर्शक पॉप कॉर्न खाना तक भूल जाएँ। श्रीदेवी ने इस फिल्म में 14 साल बाद फिर से पदार्पण किया है और मुख्य भूमिका शानदार तरीके से निभाई है.सुना है फिल्म में श्रीदेवी का चरित्र गौरी शिंदे की माँ से प्रभावित है।हालाँकि यह भी सच है कि हर टीनएजर बच्चे की माँ को उसमे अपना अक्स दिखाई देगा।
फिल्म में छोटे छोटे कई पात्र हैं और सब अपनी अलग छाप छोड़ते हैं। एक छोटी सी भूमिका अमिताभ बच्चन ने भी निभाई है जो इतनी जानदार है कि फिल्म को एक खुबसूरत रंग और दे देती है।
फिल्म का सबसे सशक्त पहलू मुझे उसके संवाद लगे।बेहद सहजता से कहे गए छोटे छोटे सरल संवाद जैसे पूरी कहानी कह जाते हैं।फिल्म की लम्बाई कम है और गति सुन्दर अत: अगर यहाँ मैंने संवादों या कहानी का जिक्र कर दिया तो आपको फिल्म देखने की जरुरत नहीं पड़ेगी। इसलिए इतना ही कहती हूँ  कि अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी है तो अगली फुर्सत में ही परिवार के साथ देख आइये।
आइटम सौंग , घटिया दृश्य , फूहड़ संवाद और मारधाड़- खून खराबे वाली फिल्मों के इस दौर में ऐसी फिल्मो का आना वास्तव में एक सकारात्मक ऊर्जा और सुकून दे जाता है.और इनकी सफलता उन निर्माता निर्देशकों के लिए एक सबक है, जिन्हें लगता है कि बिना मसालों के या हॉलीवुड टाइप के लटको झटको के, भारत में फिल्म नहीं चलती। उन्हें अब समझ लेना चाहिए भारत की जनता बेबकूफ नहीं है, उसे अच्छी चीज की कदर आज भी है।
.........

कल मिलिए ब्लॉग जगत की एक  अन्य देवी से, तब तक के लिए राम-राम ......

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ- तृतीया...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार ... नवरात्री  के तीसरे दिन  देवी मां चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है जो परम शांति की वाहक हैं.चन्द्रघंटा देवी का स्वरूप तपे हुए स्वर्ण के समान कांतिमय है. चेहरा शांत एवं सौम्य है और मुख पर सूर्यमंडल की आभा छिटक रही होती है. माता के सिर पर अर्ध चंद्रमा मंदिर के घंटे के आकार में सुशोभित हो रहा है जिसके कारण देवी का नाम चन्द्रघंटा हुआ. अपने इस रूप से माता देवगण, संतों एवं भक्त जन के मन को संतोष एवं प्रसन्न प्रदान करती हैं. मां चन्द्रघंटा अपने प्रिय वाहन सिंह पर आरूढ़ होकर अपने दस हाथों में खड्ग, तलवार, ढाल, गदा, पाश, त्रिशूल, चक्र,धनुष, भरे हुए तरकश लिए मंद मंद मुस्कुरा रही हैं. माता का अदभुत रूप है...
” या देवी सर्वभूतेषु चन्द्रघंटा रूपेण संस्थिता.
 नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:” 

http://go.idreamseo.com/~indiahal/images/stories/chandraghanta-hindi.jpg 
वैसे तो इस श्रंखला में आने वाली ब्लॉग जगत की कोई भी देवी परिचय की मोहताज नहीं हैं, फिर भी नवदेवियों के साथ उनके स्मरण का एक प्रयास है यह. ब्लॉग जगत की नव देवियों के क्रम में आज मिलते हैं संगीता पुरी जी से... 


[sangita.jpg]

बोकारो, झारखंड से ब्‍लॉगिंग कर रही संगीता पुरी (http://www.blogger.com/profile/04508740964075984362) अपना परिचय देते हुए लिखती हैं कि मास्‍टर डिग्री ली है अर्थशास्‍त्र में .. पर सारा जीवन समर्पित कर दिया ज्‍योतिष को .. अपने बारे में कुछ खास नहीं बताने को अभी तक .. ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन-मनन करके उसमे से वैज्ञानिक तथ्यों को निकलने में सफ़लता पाते रहना .. बस सकारात्‍मक सोंच रखती हूं .. सकारात्‍मक काम करती हूं .. हर जगह सकारात्‍मक सोंच देखना चाहती हूं .. आकाश को छूने के सपने हैं मेरे .. और उसे हकीकत में बदलने को प्रयासरत हूं .. सफलता का इंतजार है। 7 सितंबर 2007 से वर्डप्रेस पर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष नामक ब्‍लॉग पर ज्‍योतिष में प्रवेश नामक पहली पोस्‍ट से शुरूआत करने के बाद  7 अगस्‍त 2008 को  ब्‍लॉगस्‍पॉट (www.gatyatmakjyotish.com) पर लिखना आरंभ किया , इनके पोस्‍टों में जहां ज्‍योतिष से जुडे अंधविश्‍वासों पर चोट की गयी है , वहीं दूसरी इसके वैज्ञानिक पक्ष को भी सामने लाया गया है...गत्यात्मक ज्योतिष इनका प्रमुख ब्लॉग है, साथ ही ब्लॉग 4 वार्ता के आधार स्तंभों में से एक हैं.

इनकी प्रथम पोस्ट:

ज्योतिष में प्रवेश

कोई व्यक्ति जन्म से ही मजबूत शरीर , व्यक्तित्व , धन , गुण , स्वभाव ,परिस्थितियॉ और साधन प्राप्त करता है और कोई जीवनभर यह सबप्राप्त करने के लिए आहें भरता है और कोई कई प्रकार की शारिरिक औरमानसिक विकृतियों को लेकर ही जन्म लेता है। जरा सोंचिए , इसकोकिसकाप्रभाव कहा जा सकता है ? जिसे वैज्ञानिक वर्ग सेयोग या दुर्योग कहते हैं , वह प्रकृति की एक सोंची समझी हुई चाल होती है। आज कृत्रिम उपग्रहों नेयह सिद्ध कर दिया है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में स्थित आकाशीय पिंडों से अनंतप्रकाश की किरणें का जाल बिछा होता है , और पृथ्वी पर ऐसी कोई चीजनहीं , जो इसके प्रभाव से अछूती रह जाए। फिर ग्रहों के प्रभाव से कोईअछूता कैसे रह सकता है ? समुद्र में लहरो का उतार चढ़ाव और अन्य कईप्राकृतिक घटनाएं चंद्रबल के सापेक्ष हुआ करती है।

   

मनोवैज्ञानिकों का यह कहना कि ज्योतिष पर विश्वास एक अंधविश्वास है , जो मानसिक दुर्बलता का लक्षण है , बिल्कुल गलत है। मेहनत से कामकरनेवाला व्यक्ति अकस्मात् किसी दुर्घटना का fशकार क्यों हो जाता है ? कोई छोटा बालक क्यो अनाथ हो जाता है ? कोई व्यक्ति पागलपन या किसीअसाध्य रोग से क्यों ग्रस्त हो जाता है ?

मेरे हिसाब से इन सब प्रश्नों केउत्तर किसी मनोवैज्ञानिक के पास नहीं होंगे। हजारों वर्षों से विद्वानों द्वाराअध्ययन-मनन और चिंतन के फलस्वरुप मानव मन-मस्तिष्क एवं अन्यजड़-चेतनों पर ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव के रहस्य का खुलासा होता जा रहाहै , हॉ यह सत्य अवश्य है कि पूर्णता मनुष्य की नियति में नहीं है , लेकिनपूर्णता की खोज मनुष्य के स्वभाव का अंग है , नहीं तो इतिहास आदिमकाल से एक ही करवट बैठा होता।

आज जरुरत है , धर्म , कर्मकांड औरज्योतिष का गंभीर अध्ययन-मनन करके सही तत्वों को जनता के सम्मुखलाने की। केवल पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर सारे नियमों को गलत मान लेनाबेवकूफी ही होगी। भविष्य की थोड़ी भी जानकारी देने के लिए फलितज्योतिष के सिवा दूसरी कोई विद्या सहायक नहीं हो सकती। अपने अनुसंधानको पूर्णता देने के क्रम में हमनें आप सबों से काफी दूरी बनाए रखी , परअब वह समय आ गया है कि हम अपने ज्ञान के प्रकाश को फैलाकर अपनेकर्तब्यों की इतिश्री कर सकें।


अद्यतन पोस्ट:

गत्यात्मक ज्योतिष के दिल्ली के पाठकों के लिए ख़ास मौका ----------

दिल्ली आये पंद्रह बीस दिन  हो गए  ...अब बोकारो लौटने का वक्त हो रहा है ...... आने के बाद से ही आप सबों के बहुत सारे लोगों के फ़ोन और मैसेज मिल रहे हैं --- मुझे भी आप सबसे मिलने की इच्छा है .. जिनसे नेट पर पिछले कितने वर्षों से विचारों का आदान प्रदान होता जा रहा है ... पर अलग अलग जगहों पर सबसे मिलना बहुत मुश्किल है ....... इसलिए इस सप्ताहांत में दिल्ली के सारे ब्लागरों , अपने ब्लॉग के पाठकों और फस्बुक दोस्तों से मिलने जुलने का कार्यक्रम बना रही हूँ ... इस बार मैं आप सबों का परिचय गत्यात्मक ज्योतिष के जनक अपने पिताजी से भी करवाउंगी ... गत्यात्मक ज्योतिष परंपरागत ज्योतिष से किस प्रकार भिन्न है ... और इसके द्वारा की जाने वाली सटीक भविष्यवानियों का वैज्ञानिक आधार क्या है .. इसके बारे में भी मेरे और पापाजी के द्वारा आप सबों को जानकारी दी जाएगी --- ताकि ज्योतिष के प्रति आपके दिलोदिमाग में बैठा अंध विश्वास या भ्रान्ति दूर हो ... और ज्योतिष के बारे में वैज्ञानिक सोंच विकसीत हो ... गत्यात्मक ज्योतिष के कितने पाठक , ब्लोग्गेर्स और फस्बुकिए मित्र तैयार् हैं इस कार्यक्रम के लिए ... उसी के हिसाब से शनिवार और रविवार में से कोई तिथि समय और वेन्यु तय की जाएगी ... दिल्ली में मेरा फ़ोन 918750680860 है .........

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ- द्वितीया...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार ... आश्विन शुक्लपक्ष प्रथमा को कलश की स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्यौहार शारदीय नवरात्र आरम्भ हो चुका है, आज द्वितीया है. माँ दुर्गा अपने सुन्दर स्वरुप में विराजमान हो चुकी हैं।
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥ 



ब्लॉग जगत की नव देवियों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज मिलते हैं, बहुत ही कम शब्दों में सब कुछ कहने का हुनर अर्थात गागर में सागर भरने वाली एक और  शख्सियत संगीता स्वरुप जी से ....

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ये मार्च 2007 से ब्लॉग जगत में हैं.  संगीताजी अपने बारे बताते हुए में कहती हैं : "कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ... मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं." इनके प्रमुख ब्लॉग हैं
 इनकी प्रथम पोस्ट:

प्रदुषण

>> Thursday, August 14, 2008

जीवन के आधार वृक्ष हैं ,
जीवन के ये अमृत हैं
फिर भी मानव ने देखो,
इसमें विष बोया है.
स्वार्थ मनुष्य का हर पल
उसके आगे आया है
अपने हाथों ही उसने
अपना गला दबाया है
काट काट कर वृक्षों को
उसने अपना लाभ कमाया है
पर अपनी ही संतानों के
सुख को स्वयं खाया है
आज जिधर देखो
प्रदुषण फ़ैल रहा है
वृक्षों के अंधाधुंध कटाव से
ये दुःख उपजा है
क्यों नहीं समय रहते
इन्सान जागा है
सच्चाई के डर से
आज मानव भागा है.
बिना वृक्षों के क्या
मानव जीवन संभव होगा
इस प्रदुषण में क्या
सांसों का लेना संभव होगा
आज अग्रसित हो रहा
मानव विनाश की ओर
इस धरती पर क्या मानव का
जीवित रहना संभव होगा?
कुछ करना है गर
काम तो ये कर डालो
पोधों को रोपो और
वृक्षों को दुलारों
आज समय रहते यदि
तुम चेत जओगे
तो आगे आने वाली नसलों को
तुम कुछ दे पाओगे
.हे मनुज!
अंत में प्रार्थना है मेरी तुमसे
वृक्षों को तुम निज संताने जानो
वृक्ष तुम्हारी सम्पत्ति,
तुम्हारी धरोहर हैं
इस सच को अब तो पहचानो.

अद्यतन पोस्ट:

अधूरा उपवन 

मन के आँगन में 
तुमने अपनी ही 
परिभाषाओं के 
खींच दिये हैं 
कंटीले तार
और फिर 
करते हो इंतज़ार 
कि , 
भर जाये आँगन 
फूलों से .

हाँ , होती है 
हरियाली 
पनपती है 
वल्लरी 
पत्ते भी सघन 
होते हैं 
पर फूल 
नहीं खिलते हैं । 

क्या तुमको 
ऐसा नहीं लगता कि
मन का उपवन 
अधूरा  रह जाता है 
और खुशियों का आकाश 
हाथ नहीं आता है ।

कल आपकी मुलाकात ब्लॉग जगत की एक  अन्य देवी से होगी, तब तक के लिए राम-राम ......... 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

ब्लॉग जगत की नव देवियाँ...ब्लॉग 4 वार्ता... ललित शर्मा

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

हमारे यहाँ सातवाँ कब आएगा ? आखिर इतना मजबूत सीलेंडर लीक हुआ कैसे ? ब्लॉग4वार्ता ...संगीता स्वरूप

आज की  वार्ता में संगीता स्वरूप  का नमस्कार ---- एक विशेष  सूचना --

भारतीय महिला पत्रकारों की संस्था, इंडियन वीमेन प्रेस कॉर्प वाणी प्रकाशन के साथ मिलकर हिंदी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन करने जा रही है। इसके पहले अंग्रेजी में भी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसे भरपूर सराहना मिली। इसी के मद्देनजर व्यापक हिंदी पट्टी को ध्यान में रखते हुए हिंदी कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है।
कहानी प्रतियोगिता की थीम है--समकालीन समाज में संबंधो की बदलती परिभाषा। कहानी की शब्द संख्या अधिकतम 3.000 हो। प्रतियोगिता में तीन कहानियों को पुरुस्कृत किया जाएगा। प्रथम पुरस्कार-11,000 रुपये,दूसरा एवं तीसरा पुरस्कार-7.000 रुपये। पुरस्कार के लिए कहानियों का चयन करेंगी देश की जानी मानी महिला कथाकारो की तीन सदस्यीय ज्यूरी चयनित करेगी। कहानी मौलिक एवं अप्रकाशित होनी चाहिए। किसी भी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानी पर विचार नहीं किया जाएगा। इसका स्पष्ट उल्लेख एक पत्र में करें। बाद में चुनिंदा कहानियों का एक संकलन वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किया जाएगा, जो अगले साल होने वाली विश्व पुस्तक मेले में धूमधाम से रिलीज होगी। यह प्रतियोगिता सभी महिला रचनाकारो के लिए खुली है सिर्फ हमारे क्लब की पदाधिकारी और मैनेजिंग कमिटि की सदस्य भाग नहीं ले सकतीं।
सभी रचनाकारो से अनुरोध है कि वे अपनी कहानी के दो टाइप प्रिंट इस पते पर भेजें--Indian Women's Press Corps, (Hindi Story Competition), 5 Windsor Place, New Delhi- 110001. कहानी के साथ आपका नाम, पता और मोबाइल न. साफ साफ लिखा होना चाहिए। साथ ही आप कहानी ईमेल पर भी भेजे। ईमेल पता है--iwpchindistory@gmail.com
कहानी सिर्फ यूनीकोड, चाणक्य और क्रुतिदेव फॉन्ट में टाइप हो- कहानी भेजने की अंतिम तारीख--15 नवंबर,2012 है। (प्रेस रिलीज)
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612929 पर संपर्क कर सकते हैं।

चलिये  चलते हैं आज की वार्ता पर ----

“उसके उड़ाये कौवे कभी डाल पर ना बैठे” : कहावत......मेरे सामने में भी अक्सर ऐसे लोग आते रहते है जो अपना काम निकलवाने के लिए अक्सर बड़ी बड़ी डींगे हांकते है, मुझे बड़े बड़े सब्ज बाग तक दिखा देते है,

बस इतना जानूँ

तुझे माँ कहूँ
या कहूँ वसुन्धरा
अतल सिन्धु
कल- कल सरिता
भोर किरन

सत्याग्रहियों का उत्साह बढ़ता गया.......8 अगस्त जनरल स्मट्स के आमंत्रण पर गांधी जी प्रिटोरिया पहुंचे। बोथा, स्मट्स और प्रोग्रेसिव पार्टी के सदस्यों ने वैलिडेशन बिल में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया जिसमें यह कहा गया था कि TARA स्वेच्छा से पंजीकरण कराने वालों और बच्चों पर लागू नहीं होगा। 21 अगस्त ट्रांसवाल की विधान सभा में स्वैच्छिक पंजीकरण वैलिडेशन बिल को हटा लिया गया

मेरे कदम......

न वो चिनार के बुत,
न शाम के साए,
एक सहज सा रस्ता,
न पिआउ, न टेक |

संवाद.........

तुम जानती हो?
कि मैं सब कुछ जानता हूं
सब कुछ?
लेकिन तुम्हारी आँखों ने तो
कभी कुछ नहीं कहा

पर भाव तो निरा निरक्षर है...

वर्णमाला के बिखरे-बिखरे
                 बस थोड़े से ही अक्षर हैं
                कुछ और मैं कहना चाहूँ
             पर भाव तो निरा निरक्षर है

मलाला  युसुफजई
राख का ढेर समझा तुमने 
जहाँ  दबे पड़े थे  शोले  !
लो ,उड़ी एक चिंगारी  ,
मलाला यूसुफ़ज़ई !

आखिर इतना मजबूत सीलेंडर  लीक हुआ  कैसे ?
इसका ज़वाब तो भ्रष्टाचार की पटरानी के पास भी नहीं है .यह वाड्रा को आगे करके रंग भूमि से जो खेल खेल रहीं थीं यही इस नाटक की सूत्र धार थीं
.अपना मंद मति बालक तो इतने पासे एक साथ फैंक ही नहीं सकता .उसमें  इतनी अकल  ही नहीं है .

एक गीत -माँ ! नहीं हो तुम

माँ !नहीं हो
तुम कठिन है
मुश्किलों का हल |
अब बताओ
किसे लाऊँ
फूल ,गंगाजल |

" हमारे यहाँ सातवाँ कब आयेगा......


सातवाँ बहुत खूबसूरत है | महंगा तो अवश्य है ,परन्तु है, सब से हटकर | उसको लेने वाले भी अलग से दिखते हैं | मुझे लाइन में लग कर यह कहने में ही हीनता हो रही थी कि मेरा तो अभी तीसरा ही है | मैं शक्ल से दीन हीन तो लगता ही हूँ ,मेरे साथ मेरा सिलंडर भी शर्माते हुए जमीन में धंसा जा रहा था | सातवें और उससे अधिक वालों की लाइन एकदम अलग

अधूरी हसरतों का ताजमहल

जो तफ़सील से सुन सके
जो तफ़सील से कह सकूँ
वो बात , वो फ़लसफ़ा
एक इल्तिज़ा, एक चाहत
एक ख्वाहिश, एक जुनून

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ


मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...



हिन्दी ब्लागिंग को समृद्ध करती महिलाएं : आकांक्षा यादव


वर्तमान साहित्य में नारी पर पर्याप्त मात्रा में लेखन कार्य हो रहा है, पर कई बार यह लेखन एकांगी होता है। यथार्थ के धरातल पर आज भी नारी-जीवन संघर्ष की दास्तान है। नारी बहुत कुछ कहना चाहती है पर मर्यादाएं उसे रोकती हैं। कई बार ये अनकही भावनाएं डायरी के पन्नों पर उतरती हैं या साहित्य-सृजन के रूप में


नदी हुई नव-यौवना, बूढ़ा पुल बेचैन - म. न. नरहरि

ठेस;
मूरख मैं साबित हुआ, फक्कड़ मिला ख़िताब
घाटा सब मैंने भरा, ऐसे हुआ हिसाब
उम्मीद:
घिरते बादल शाम से, काले - लाल- सफ़ेद
शायद अब हो जायगा, आसमान में छेद

किताब और किनारे

वह एक किताब थी ,
किताब में एक पन्ना था ,
पन्ने में हृदय को छू लेने वाले
भीगे भीगे से, बहुत कोमल,
बहुत अंतरंग, बहुत खूबसूरत से अहसास थे ।

कम उम्र में मानसिक तनाव के कारण बढ़ रहीं शारीरिक समस्याएँ

मानसिक तनाव
इस भागती दौड़ती दुनिया में तनाव बड़ता ही जा रहा है, कुछ शारीरिक समस्याएँ वर्षों पहले कुछ उम्र के बाद होती थीं याने कि लगभग ५० वर्ष के बाद होती थीं । अब वे शारीरिक समस्याएँ तेजी से कम उम्र की अवस्था में होने लगी हैं।
सब कहते हैं कि स्वस्थ्य जीवन जीना चाहिये, सबकी इच्छा स्वस्थ्य जीवन जीने की होती है, परंतु या तो समय पास ना होने की लाचारी होती है या फ़िर आराम तलबी के कारण पसीना नहीं बहाने देने की लाचारी होती है।

कुछ अनसुलझे से पहलु

रुक ... थोडा ठहर |
ओ ... उड़ते हुए बादल |
सवालों में उलझे अनसुलझे ,

पहलुओं को सुलझा जा |

नहीं अचानक मरता कोई

नव अंकुर ने खोली पलकें
घटा मरण जिस घड़ी बीज का,
अंकुर भी तब लुप्त हुआ था
अस्तित्त्व में आया पौधा !

अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं

क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर  ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !

रहबर ने गर्दिश-ए- खाकसार बना दिया,
जैसे तूफां के झोकों से दरख्त बर्बाद हुए है !

ब्रह्मचर्य का पालन ही मनुष्य को सात्विक बनाता है ..

पिछली पोस्ट पर विषय अति संवेदनशील होने के कारण डिस्क्लेमर तो लगा दिया था लेकिन विश्वास भी था कि हमारे परिपक्व ब्लॉगर मित्र हल्के फुल्के अंदाज़ में भी विषय की गंभीरता को समझेंगे। यह देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि लगभग सभी महिला और पुरुष मित्रों ने इसे स्पोर्ट्समेन स्पिरिट में लिया।
हालाँकि, अनअपेक्षित रूप से एक पुरुष मित्र ने किसी दूसरे मित्र के कंधे पर बन्दूक रखकर लगभग हमारे चरित्र पर ही ट्रिगर दबा दिया . पता नहीं जिंदगी को इतने रूखेपन से क्यों जीते हैं लोग .

" कुछ प्यार की बातें करें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़िन्दगी के खेल में, कुछ प्यार की बातें करें।
प्यार का मौसम है, आओ प्यार की बातें करें।।


नेह की लेकर मथानी, सिन्धु का मन्थन करें,
छोड़ कर छल-छद्म, कुछ उपकार की बातें करें।

वादियों के पीछे ही कहीं आफताब खोया है..

उदास शाम की आँख हैं नम ओस की बूँदों  से,
चलती ये सर्द हवा कितनी खामोशी से।
कितने गुमसुदा और तन्हा हैं ये दरख्त खड़े,
हैं पूछते सवाल यूँ अपनी ही गुम परछाईं से ।।

आँसू और सुगंध ...

तुम से मिली उपेक्षा से चिढ़कर
बहुत सारी बुराइयाँ आ बैठीं मुझमे
और जितनी भी अच्छाइयाँ हैं मेरे अंदर
वह सब की सब तुम्हारी हैं
बात बात में टोकना तुम्हारा
मैं झुंझला जाता था भले प्रकट नहीं करता था


आज के लिए  बस इतना ही .... अब आज्ञा दीजिये ... नमस्कार

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

जीना इसी का नाम है ...ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार......केंद्र सरकार ने गुरुवार को जनसत्याग्रहियों की मांगें मान ली हैं. इसके बाद जल, जमीन, जंगल सत्याग्रह समाप्ति की घोषणा कर दी. सरकार और जनसत्याग्रहियों के बीच कुल दस मांगों पर समझौता हुआ है. इसमें राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति पर समझौता, फास्ट ट्रैक कोर्ट पर भी समझौता हुआ है और अब भूमिहीनों को जमीन मिलेगी. इस आंदोलन के खत्म होती ही सत्याग्रहियों का दिल्ली मार्च अब समाप्त हो गया है... आइये हम चलते हैं ब्लॉग वार्ता पर..........

साँसों के सफ़र का उत्सव - भारतीय संस्कृति में उत्सव का बड़ा महत्व है उत्सव शब्द सुनते ही जहन में एक रोमांच भर जाता है , मन ख़ुशी की कल्पना से झूम उठता है और ऐसा लगता है जैसे सारा ... .ज़िन्दगी के कुछ कतरे ये भी हैं... - *जब भी मौका मिलता है कहीं न कहीं कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूँ, आजकल डायरी से ज्यादा फेसबुक सब कुछ सहेजने का काम करता है.. ऐसे ही कुछ कतरे जो अलग अलग मूड मे....रफ़्तार देनी है - गिरे -बिखरे पत्थरों को समेट,* *गंतव्य को राह देनी है -* *अँधेरा कहीं तिरोहित हो चले ,* *हर हाथों में मशाल देनी है -* *न टूट सके आघातों से ह्रदय ,* *पत्थरों की दिवार देनी है-* *भंवर सामने है,डूबने से पहले ,* *नाव को पतवार देनी है-* * ******* * **हम उजड़ने नहीं देंगे गुलशन ,* *गुलों को एतबार देंगे,* *अगर खून से रंग निखरता है ,* *तो दानवीरों की कतार देनी है-....

सबक ... - सुनो, कुचल दो उसकी जुबान ... और, दफ़्न कर दो ... उसको - और उसकी आवाज को कहीं भी ... जहां से ... गर उसकी रूह भी चिल्लाना चाहे तो चिल्लाते रह...और ज़िन्दगी रूकती नहीं !!! - क्यूँ नहीं होता वह सब- जो हम खुली आँखों सपनाते हैं क्यूँ होता है वह -जो हम नहीं चाहते हैं ... कठिन प्रश्न-पत्र की तरह होनी हमेशा आगे खड़ी होती है सोच ... आखिरी सफर - ये जानते हुए कि मैं छोड़ी जा चुकी हूँ फिर भी एक इंतज़ार है कि तुम ....खुद से अपनी गलती स्वीकार करो ताकि मैं लौट सकूँ जहाँ से मैं आई हूँ पर मैं जानती...

सोलह में शादी की आजादी - देखिये साहब हमारा मुल्क रंगरंगीला परजातंतर है। इस बात को नित साबित करती खबरें हमारी मीडिया पेश करती रहती है। हालिया मामला है खाप पंचायत द्वारा लड़कियों क...  ....जीना इसी का नाम है - जीना इसी का नाम है  अँधेरे कमरे में बंद आँखों से खाते हुए ठोकरें वे चल रहे हैं और इसे जीना कहते हैं... बाहर उजाला है सुंदर रास्ते हैं ...कहे अनकहे रिश्ते - कहे अनकहे रिश्ते ..................................... जिन्दगी में तमाम कहे रिश्ते साथ चले सिर्फ नाम के लिए पिता था एक मेरी जिन्दगी में भाई था सिर्फ नाम...

अजीब शख्स था अपना बना के छोड़ गया हरेक रिश्ता सवालों के साथ जोड़ गया अजीब शख्स था, अपना बना के छोड़ गया कुछ इस तरह से नज़ारों कि बात की उसने मैं खुद को छोड़ के उसके ही साथ दौड़ गया तिश्नगी तो न बुझायी गयी दुश्मन से मगर पकड़ के हाथ समंदर के पास छोड़ गया मेरी दो बूँद से ज्यादा कि नहीं कुव्वत थी सारे बादल मेरी आँखों में क्यों निचोड़ गया  ... इंतज़ार मेरे दिल - ए - जज़्बात मेरे प्यार ( अरविन्द कुमार जी ) के लिए हर लम्हा इंतजार करता है तेरा तू आये तो , वो ठहरे तुझसे कुछ पूछने को बेचैन हर पल ये घड़ियाँ रहती हैं मेरी ऑंखें दरवाज़े पर लगी हैं , कि आयेगा तू इक दिन हक से पूछेगा मुझसे तू ठीक तो है ? .. अस्थि कलश गंगा की लहरों पर तैरते अस्थि कलश को देख सहसा मन में विचार उमड़ पड़ते हैं ....... कैसे एक भरा - पूरा इन्सान अस्थियों में बदल कर एक छोटे से कलश में समा जाता है ........... ना जाने ये किस की अस्थियाँ होंगी .... शायद...!....
  
भारत या इंडिया...? सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है। बरसों से लोगों के जेहन में यह सवाल कौंधता जरूर रहा होगा, लेकिन किसी ने अपनी जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश नहीं की और अब जब एक सामाजिक कार्यकर्ता ने ऐसी कोशिश की है, सरकार के माथे पर पसीने निकल आए हैं। सरकार के पास किसी तरह की जानकारी न.. और मैं रिश्ते बोती रही मैं तो रिश्ते बोती रही पर ये कंटक कहाँ से उगते गए.. मेरे मन स्थिति से विपरीत ये मेरे फूल से अहसासों को छलनी करते रहे और मैं रिश्ते बोती रही स्नेह का खाद डाल प्यार से सिंचित करती रही रोज़ दुलारती सवाँरती पर ये गलत फहमी के फूल ... मेरा दिल है सनकी .मेरा दिल है पागल, मेरा दिल है सनकी, करता है हरदम ही, ये दिल अपने मन की, खतरा है दिल जैसे, दोस्ती है दुश्मन की, सूरत है तुझ जैसी, इस दिल में दुल्हन की, मेरा ये पागलपन, चाहत है धड़कन की, मज़बूरी में जीना, आदत है जीवन की,...

विक्रमार्क, चुनाव, वेताल - आ गए चुनाव वेताल को पेड़ पर लटका छोड़ चल दिया विक्रमार्क बैनर और पोस्टर टांगने समदर्शी होकर क्या फर्क पड़ता है अगर कहीं पंजा कमल को दबोचता है कही हाथी दोनों ..शिक्षा का अधिकार...........? - *हरेश कुमार* एक तरफ, सरकार गरीबों को सस्ती और सुलभ शिक्षा का वादा कर रही है और दूसरी तरफ, उसे शिक्षा से वंचित करने का हर स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। ...वोट की ख़ातिर कुछ भी ? - देश के राजनैतिक नेताओं ने जिस तरह से आजकल बयान देने से पहले सोचना बंद ही कर दिया है उससे यही लगता है कि वोट पाने के लिए अब कुछ भी कह ...
चलते-चलते एक कार्टून 

   

अब इजाजत दीजिये नमस्कार .........

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

सचमुच घनचक्कर था मेघदूत ... ब्‍लॉग4वार्ता ... संगीता पुरी

आप सबों को संगीता पुरी का नमस्‍कार, कल महानायक के साथ साथ लोकनायक का भी जन्‍म दिन था , डॉ पुनीत अग्रवाल जी ने इन्‍हें याद करते हुए उनके जीवन के बारे में जानकारी देते हुए एक पोस्‍ट लिखा है ।

जयप्रकाश नारायण (जन्म- 11 अक्तूबर, 1902, सिताबदियारा, (बिहार), मृत्यु- 8 अक्तूबर, 1979, पटना, बिहार) राजनीतिज्ञ और सिद्धांतवादी नेता थे। मातृभूमि के वरदपुत्र जयप्रकाश नारायण ने हमारे देश की सराहनीय सेवा की है। लोकनायक जय प्रकाश नारायण त्याग एवं बलिदान की प्रतिमूर्ति थे। कहा गया है–

होनहार वीरवान के होत चीकने पात

जयप्रकाश विचार के पक्के और बुद्धि के सुलझे हुए व्यक्ति थे। जय प्रकाश जी देश के सच्चे सपूत थे। जयप्रकाश ने देश को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने का सच्चा प्रयास किया, जिसमें वह पूरी तरह से सफल रहे हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भारतीय जनमानस पर अपना अमिट छाप छोड़ी है। जयप्रकाश जी का समाजवाद का नारा आज भी गूँज रहा है। समाजवाद का सम्बन्ध न केवल उनके राजनीतिक जीवन से था, अपितु यह उनके सम्पूर्ण जीवन में समाया हुआ था।अब चलते हैं आज की वार्ता पर .....

प्रार्थना ! - *हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से |माँ,,, - माँ हर पल औलाद के खातिर दुआ करती है माँ, और माँ होने का हक ऐसे अदा करती है माँ! जिंदगी की धूप में खुद को खड़ा करती है वो, और बच्चों के लिये साया घना करती ...*मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ,नट नागर से ||* ** *तेरी ही महिमा से जग का* *होता है सूरज ज़रा आ पास आ.. - सूरज ज़रा आ पास आ जीना इसी का नाम है - जीना इसी का नाम है अँधेरे कमरे में बंद आँखों से खाते हुए ठोकरें वे चल रहे हैं और इसे जीना कहते हैं... बाहर उजाला है सुंदर रास्ते हैं वे अनजा...सोलह में शादी की आजादी - देखिये साहब हमारा मुल्क रंगरंगीला परजातंतर है। इस बात को नित साबित करती खबरें हमारी मीडिया पेश करती रहती है। हालिया मामला है खाप पंचायत द्वारा लड़कियों क...

वक़्त वक़्त की बात - *पुरानी सदी के डाइलोग: शशि कपूर: मेरे पास माँ है! इस सदी के डाइलोग: रॉबर्ट वाड्रा: मेरे पास सासू माँ है!*बहू तो आखिर बहू है - बहू तो आखिर बहू है क्या हुआ जो नहीं तुमसे,ठीक से वो बात करती क्या हुआ घर पर न टिकती,करती रहती मटरगश्ती क्या हुआ जो उसे खाना बनाने से बहुत चिढ है क्या हु...रेणुकाजी! काश! आप मेरी बहन होती -काश! रेणुका चौधरी मेरी बहन होती। उन्होंने धापूबाई बैरागी के पेट से द्वारकादासजी बैरागी के घर में जन्म लिया होता। तब वे ऐसा नहीं कहतींबेचारे बगदी लाल जी - बेचारे बगदी लाल जी ,करन चले व्यापार | महंगाई की मार का ,सह न पाए वार || है लाभ क्या न जानते ,झुझलाते पा हार | होते विचलित हानि से ,जीवन लगता भार ||

बच्चे तो बस हो जाते हैं ............... -वो कहते हैं अब के बच्चों में संवेदना नहीं पनपती प्रेम प्यार के बीज ना पल्लवित होते हैं बेहद प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं ना मान आदर सम्मान करते हैंचुहुल - ३४ - (१) एक समाजसेवी को उसके चाल-चरित्र से प्रसन्न होकर एक सिद्ध पुरुष ने एक ‘जादुई बोतल’ दी. बाद में जब समाजसेवी ने बोतल का ढक्कन खोला तो उसमें से एक ‘जिन्न’ ...आखिरी सफर - ये जानते हुए कि मैं छोड़ी जा चुकी हूँ फिर भी एक इंतज़ार है कि तुम ....खुद से अपनी गलती स्वीकार करो ताकि मैं लौट सकूँ जहाँ से मैं आई हूँ पर मैं जानती...शानदार व्यवसाय ! - लोकतंत्र में राजनीति अब शानदार व्यवसाय ! * ...

जीवन संध्या....संध्या शर्मा - सुबह से शाम चलते-चलते थक गया तन सुनते-सुनते ऊबा मन आँखें नम निर्जन आस भग्न अंतर उद्वेलित श्वास बहुत उदास कुछ निराश शब्द-शब्द रूठ रहे हैं मन प्राण छूट रहे ह...तरह तरह के डिजिटल कैमरे -*डिजिटल कैमरा* यानि कि *डिजिकैम,* साउंड, वीडियो और स्टिलफोटोग्राफ लेकर उन्हें एक इलेक्ट्रॉनिक इमेज सेंसर के माध्यम से रिकॉर्ड कर लेता है |संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक .... (कुँवर जी) -*सौ संस्कारों के ऊपर भारी मजबूरी एक आचरण बुरा ही सही पर है इरादे नेक! खुद बोले खुद झुठलाये जो करे कह न पाए अजब चलन चला जग में चक्कर में विवेक भ्रष्टाचार ...होंठों पर तैरती मुस्कान! - हर शासकीय अवकाश के दिन सरकारी कामकाज के लिए दफ्तर पूरी तरह से बंद हों, इस बात का पता लगाना आम आदमी के लिए कोई हँसी खेल का काम तो कतई नहीं हो सकता। शासकीय ...

सचमुच घनचक्कर था मेघदूत -[image: cloudburst] नि दा फ़ाज़ली ने बादलों को उनकी आवारा सिफ़त के मद्देनज़र सिर्फ़ दीवाना क़रार देते हुए बरी कर दिया था क्योंकि वे नहीं जानते कि "किस राह ...फफूंदा मष्तिष्क शोथ (फंगल मैनिनजाइटइस )अगली किस्त . - फफूंदा मष्तिष्क शोथ (फंगल मैनिनजाइटइस )अगली किस्त . संतोष का विषय यही है की ये तमाम फफूंदा सुइयां निर्माता कम्पनी ने वापस मांग ली हैं जीमेल की छोटी पर उपयोगी नयी सुविधा -जीमेल पर अगर आप क्षेत्रीय भाषाओ और हिंदी में ज्यादा काम करते है तो आपके लिए जीमेल अब थोडा और बेहतर हो गया है . अगर आपने अपने जीमेल में हिंदी शुरू नही...थका हुआ सा एक ख्वाब..... -जाने कब से पल रहा है न जाने कब से चल रहा है..... एक ख्वाब मेरे ज़ेहन में, मेरे मन में..... एक ख्वाब जो थक गया है पलते पलते चलते चलते..... थक गया है ये म...
अब लेते हैं विराम .. मिलते हैं एक ब्रेक के बाद .....

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