गुरुवार, 24 मई 2012

चले आईए, दौड़े आईए, ले आए हैं शर्मा जी पेसल वार्ता

ललित शर्मा का नमस्कार,  बकरा किश्तों में हलाल हो रहा है, पैट्रोल का मूल्य फ़िर बढा दिया। जय  हो मन्नु बाबा की। जब चाहे जो करो। रुपया भी लुढकते लुढकते रसातल की ओर जा रहा है। इससे साबित होता है अर्थ शास्त्री का अर्थ शास्त्र कहीं फ़ेल हो रहा है और इसका खामियाजा राष्ट्र को भुगतना पड़ रहा है। राष्ट्र की प्रत्येक इकाई पर इनके प्रयोगों  का असर दिखाई दे रहा है। मंहगाई चरम सीमा पर  है, दाल रोटी के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। देखना है कि मंहगाई कहाँ जाकर ठहरती है। गरीबी के मारे किसान व्यापारी और आम आदमी आत्महत्या करने को मजबूर है। एक बार मंहगाई बढाने से इनका पेट नहीं भरता। इसलिए बार बार यही क्रम दोहराया जाता है। इसका सीधा अर्थ यही है कि बकरा (जनता) किश्तों में हलाल करने का उपक्रम जारी है। अब चलते हैं आज की ब्लॉग4वार्ता पर……… प्रस्तुत हैं कुछ उम्दा लिंक……

संजय भास्कर कह रहे हैं अपने आप पर कविता लिखना चाहता हूँ, लिखो भाई, एक नहीं दो चार लिखो, दो चार नहीं हजार लिखो। कम से आत्मावलोकन आवश्यक है। जो आत्मावलोकन करता है वही एक दिन सिद्ध होता है। सिद्ध बनने की राह पर पहला कदम आत्मावलोकन है। देव कुमार झा सांड और इंसान. पर पिल पड़े हैं। सांड से बच भी सकते हैं, पर इंसान से बचना कठिन ही नहीं नामुमकिन है। वह इंसान जिसे 14 मुल्कों की पुलिस ढूंढ रही हो और फ़िर भी न मिल रहा हो। तो बताओ सांड उससे बचेगा कैसे? सांड और इंसान भिड़ भी गए तो जाको रखे साइयाँ , मार सके न कोय । यह तो उपर वाले पर है किसे मारे और किसे बचाए। जेही पर किरपा राम के होई, ताहि पर किरपा करे सब कोई, जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना। एक अजीब शख्स से मुलाकात हुई है। तेरी, मेरी , अपनी, सबकी खबर रखने वाले। खबर सारी खबरीलाल जी ले आते हैं, अब अखबार की जरुरत पड़ती नहीं।

डॉक्टर अब पूर्णत: व्यावसायिक हो गए हैं, माल है तो जान बचाने की  कोशिश होगी। घर बेच कर लाओ रुपए, अब तो यह हो गया है कि आदमी गंभीर रुप से बीमार पड़ना ही नहीं चाहता। बीमार पड़ने की बजाए राम नाम सत्य हो जाए वही अच्छा है। डाक्टर की संवेदन शुन्यता ने फिर एक जान ले ली, किसी के घर पर डाका डालते ही पुलिस सक्रीय हो जाती है पर नर्सिंग होम में प्रतिदिन डाके डाले जा रहे हैं इस पर किसी की  निगाह जाती नहीं। अभी एक समाचार आया है कि महाराष्ट्र के बीड़ इलाके का एक डाक्टर कुत्तों को खिला देता था कन्या भ्रूण। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। रुपए के लिए लोग किस हद गिर जाते हैं। इसके माँ बाप को शर्म आ रही होगी कि ऐसे हैवान को क्यों जन्म दिया। ये डॉक्टर कोई दम्पत्ति कोई पगला-पगली  नहीं है। मानवता को कलंकित करने वाले कार्य ये पूरे होश-ओ-हवास में करते थे। अब देखते हैं कानून इन्हे क्या सजा देता है।

सितमगर कभी तेरा यूं देखना दिल को दहला देता है,  शायद तभी रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी गुहार रहे हैं। महेश परिमल जी यूपीए से उम्‍मीदें बाकी, हर मोर्चे पर मिली मात होने पर भी उम्मीद लगाए बैठे हैं। उम्मीद के सहारे जीता है जमाना, वो क्या जिए जिसे कोई उम्मीद ही न हो। इतने सब हवाले-घोटाले घटने के बाद यूपीए से उम्मीद लगाना बेमानी है। इनकी तो फ़ितरत है कि जब तक संडास की छत पर 4 करोड़ नहीं छिपे होते इन्हे हाजत ही नहीं आती। लूट लो इंडिया को, मिल जुलकर, दोनो हाथों से। अजीत सिंह जैसे सदा सुहागन तो हर सरकार में मंत्री बने रहते हैं। चाहे यूपीए हो या एनडीए हो। अब मैं 85 का हो चुका हूं स्वीकार करने के बाद भी नेता कूर्सी छोड़ने को तैयार नहीं। अब इन्हे कोई जबरदस्ती रिटायर करने से तो रहा। अगर जनता ने रिटायर कर दिया तो लोकसभा में जाने की बजाए पिछले दरवाजे से राज्यसभा में धमक जाएगें। मामला लस्सी और चाय की लड़ाई  जैसा ही मानिए। जाना दोनो को पेट में ही है।

मेरा मन भी अजीब है, मन का काम ही अजब-गजब करना है। जो चाहे मन वह करता है। मन छत पर सोया एक रात गिनते रहा तारे सारी रात। सप्त ॠषि से लेकर, हिरणी तक, चमकीले शुक्र से लेकर ध्रुव तारे तक, सब जगह मन विचरता रहा, ब्रह्माण्ड में गोते लगता रहा। ये मन ही है जो पल में पहुंचा देता है। अब पेट्रोल मंहगा हो गया इसलिए मन की सवारी  ही सस्ती पड़ेगी। पलक झपकते ही जहाँ चाहो वहाँ पहुंच जाओ। भाभियों की दुआ का एक लफ्ज , और वर्षों की इबादत  बड़ा सुकून देती हैं। भाभियां ही है जो वक्त पर काम आती है। होली पर पड़ी भाभियों की मार का असर अम्ब्रेला छतरी पर अब हो रहा है, कह रहे हैं शान्ति की राह पर चलना चाहता हूँ। चलो भाई किसने रोका है:) ये तो पहले सोचना था हंगामा मचाने से पहले। कुछ यूँही सकारात्मक सोचना चाहिए। उससे ही भलाई है।  ताजा समाचार है कि परिकल्‍पना सम्‍मान से पहले अन्‍नाबाबा बोल गए। अभी ही काहे बोले, पहले बोल  जाते तो क्या फ़र्क पड़ता? रायता खाना ही नहीं तो बखेर दो, किसी और के भी काम का न रहे। 

याद आता  है गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी, कितना धमाल होता था। आम के पेडों की छांव में दिन कट जाता था। जंगल जलेबी (गंगा इमली) के काटें पैरों चुभ जाते थे। टींट (केर) के कांटो से चप्पल भरे रहते थे। ना जाने क्योँ अचार खाने की इच्छा कांटों की चुभन भी न होने देती थी। छुट्टी के समय खोयी मुमताज की तलाश खास होती थी। एक जमाना था जब खत ही संदेश भेजने का मुख्य साधन था। महबूबा को भेजा प्रेम पत्र हो या वसियत का खत या अंतिम इच्छा सभी खत पर लिखी जाती थी। अब तो वसियत मोबाईल एसएमएस और ईमेल से भी मान्य होनी चाहिए। भाई इंटरनेट का जमाना है, इसका भी सार्थक उपयोग होना चाहिए। मेरी डायरी भी नेट पर लिखी जा रही है। कागजी काम कम हो गया। हार्ड की जगह साफ़्ट से ही काम चल रहा है। वो जिसकी दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ थीं वो रुपया भी नेता हो गया  हैफिर एक आम जिन्दगी को जीने वाली लक्ष्मी , औरो से खास कैसे बन गई, ये है  देहात की नारी.चलिए आज की वार्ता हुई पूरी, अब एक मुस्कान के साथ हँसना तो बनता है  यारों।

मिलते हैं ब्रेक के बाद ………… राम राम 

16 टिप्पणियाँ:

कुछ ही लिंक्स देखी हैं|गाँव की यादें ताजी हो गईं |पर अब वैसे गाँव नहीं बचे हैं |सब पर आधुनिकता का भूत सवार है |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |
आशा

badhiya warta .. gaon me hi bharat basata hai ...........

अरे भाई, ये लोग तो पागल हो गए हैं, पेट्रोल का रेट १०००/- भी ये करदे तो इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता हैं. क्योंकि ये लोग यानिकी सांसद, विधायक, मंत्री वगैहरा सभी करोड़पति, अरबपति लोग हैं. मरना तो हमें और तुम्हे ही पड़ेगा.

कृपया मेरे ये ब्लोग्स अपने अग्रीगेटर पर डाल दीजिए, धन्यवाद
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सुन्दर लिंक संयोजन्।

बहुत बढ़िया ब्लॉग वार्ता,....ललित जी,.,,

MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

सुंदर लिंको का समावेश ..

रोचक ढंग से लिखी गयी वार्ता ..

आभार आपका ललित जी !!

"आपने ठीक कहा है पेट्रोल के बढ़ते मूल्य सीधे आम जनता के जीवन पर असर डालते हैं, पहले पेट्रोल की कीमत बढ़ा दी जाती है, शेष वस्तुएं खुद-बखुद महंगी हो जाती है, मतलब बकरा (जनता) किश्तों में हलाल करने का उपक्रम जारी है."

बढ़िया अंदाज़ में लिखी वार्ता और सुन्दर लिंक संयोजन के लिए आभार ललित जी...

खूबसूरत लिंक संयोजन

ललित जी
आप के स्नेह के लिए दिल से आभार !

सुंदर लिंक्स
अच्छी वार्ता

रोचक सूत्र है, पढ़ते हैं जाकर..

खुद इतना घूमते हो और दूसरों का जिक्र भी नहीं ????

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