शनिवार, 10 नवंबर 2012

खुद की तलाश ... ब्लॉग4वार्ता ...... संगीता स्वरूप

आज की वार्ता में  संगीता स्वरूप  का नमस्कार ----
"आजकल देशभर में फैले ‘‘भ्रष्ट्राचार’’ एवं प्रशासन संचालन में ‘‘अव्यवस्था’’ रूपी दानव से लड़ने हेतु एक बड़ा माहौल चहुओर फैलता जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक आज स्वच्छ, ईमानदार और कुशल व्यवस्था चाहता है। ऐसी स्थिति लाने के लिए आम आदमी कोई भी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद 65 सालों से कुशासन और भ्रष्ट्राचार में डूबे अपने वतन को बचाने के लिए जनता सीना ताने खड़ी हो गई है। जो आवाम कल तक यह सोचकर भ्रष्टाचार को सहन करती जा रही थी कि जाने दो इससे हमें कौनसा सीधा नुकसान हो रहा है, आज सारे देश के नफा-नुकसान पर चिंतित है। >>आगे पढ़ें


मैं "के बंधन से मुक्ति ही खुद की तलाश है ...ऐसा परिभाषित करती और मुक्तसर शब्दों में बात कहती यह पंक्तियाँ है रश्मि प्रभा जी के संग्रह खुद की तलाश में लिखे अपने व्यक्तव की खुद रश्मि प्रभा जी के ही शब्दों में ...खुद की तलाश हर किसी को होती है |बचपन में हम झांकते हैं कुएँ में ,जोर से बोलते हैं ,पानी से झांकता चेहरा बोली की प्रतिध्वनी पर मुस्कराना खुद को पाने जैसा प्रयास और सकून हैं ...रश्मि जी के लिखे यह शब्द अपने लिखे का परिचय और खुद उनका परिचय देते हैं |>>>आगे पढ़ें


पर्यावरण के हाइकु
१)
गंगा-यमुना
प्रदूषण की मारी
हुई उसांसी ।...................
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पुरानी हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय खलनायक अजित अक्सर जब हीरो को पकड़ लेते तो कहते -- रॉबर्ट, इसे गैस चैंबर में डाल दो। कार्बन डाई ऑक्साइड इसे जीने नहीं देगी और ऑक्सीजन इसे मरने नहीं देगी। आजकल दिल्ली शहर ऐसा ही गैस चैंबर बना हुआ है। नवम्बर शुरू होते ही दिल्ली को ऐसी सफ़ेद चादर ने घेर लिया जैसी वो कौन थी जैसी पुरानी हिंदी संस्पेंस फिल्मों में दिखाई देती थी।<<<आगे पढ़ें


तेरे  ख्याल
तेरा जिक्र
तेरे ख्वाब
तेरी छुअन,>>>>>
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लिख रही अविराम सरिता,
नेह के संदेश .
पंक्तियों पर पंक्ति लहराती बही जाती
कि पूरा पृष्ठ भर दे  .
यह सिहरती लिपि तुम्हारे लिये ,प्रिय.
संदेश के ये सिक्त आखर .>>>>
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आई है दीपावली , कर' अनुपम शृंगार !
छत-दीवारें खिल गईं , सज गए आंगन-द्वार !!
सजे शहर भी, गांव भी , घर - गलियां- बाज़ार !
शुभ दीवाली कर रही, शुभ सपने साकार !!>>>>>आगे पढ़ें



यादें  जो जुड़ी रहती हैं हर एक के विगत जीवन से ,सबके पास होता है कुछ न कुछ याद करने को , हर एक के हिस्से में आती हैं यादें - कुछ खट्टी ,कुछ मीठी ,कुछ कसैली ,तो कुछ खुशनुमा .... इन्हीं यादों को पिरोया है ‘यादों के पाखी ‘  में ।  यादों के पाखी एक हाइकु संग्रह  है जिसको संपादित किया है श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु ’ , डॉo भावना कुँअर  और डॉo हरदीप कौर संधु जी ने ।आगे पढ़ें



 


सघन वर्षा वन  के अन्दर जैसे चुपके से उतरता है धूप का एक नन्हा टुकड़ा  और  ख़ामोशी से उसके  चप्पे-चप्पे पर  फेरने लगता है अपनी   इन्द्रधनुषी कूची  .  रेंगकर  जगाता है उनींदी पगडंडियों को और सुनहले  वर्क सा आच्छादित हो जाता है उसमें सोये ताल-तलैय्यों,जीव-जंतुओं ,फूलों , शैवालों पर .... देखती हूँ मेरे वर्तमान में ठीक वैसे ही उतर आता है मेरे अतीत का उजाला.>>>>>आगे पढ़ें


रात ढली, दिन उगा
बोलो किसको श्रम हुआ,
हवा बही सुरभि लिए
बोलो किसने दाम दिए !>>>>
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अभी अभी रूद्र के बैग में  नोटिस देखा  है बड़ी लम्बी छुट्टियाँ हैं ,नवीन जी को बताया तो 10 ओफ्फिस के काम ,लगे गिनाने .बॉस कभी भी चला आएगा , लौन्चिंग अब नहीं टालनी है  ,फिर कभी चलेंगे ,भूल गयी रूद्र के काका चाचा  जी लोग आयेंगे तुम भी तो कब से उनसब से नहीं  मिली हो शुक्र करो कहीं जा नहीं रहे वर्ना कैसे मिल पाते अपनों से , बीजी लाइफ है ,आ रहे हैं ये बड़ी बात है तुम  तयारी करो स्वागत की वगैरह वगैरह .>>>>>आगे पढ़ें


फर्क पड़ता है॰
"तुम्हारे नि:स्वार्थ शब्दों ने मेरी जिन्दगी बदल दी। "
एहसान के भार से दबी राधा ने रमेश से सिसकते हुए कहा ।
"कौन-सी बात ?"
रमेश ने अचकचाकर पूछा ।
"वही नीबू निचोड़ने वाली बात ।"
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रचनाकार: सुरेन्द्र कुमार पटेल की लघुकथा - फ़र्क पड़ता है http://www.rachanakar.org/2012/11/blog-post_699.html#ixzz2BnU4Ayre



पुणे

महाराष्ट्र का दूसरा बड़ा शहर है ....यह महाराष्ट्र की  दो मशहूर नदियों के किनारे बसा हुआ है ...यह  पुणे  जिले का प्रशासकीय मुख्यालय भी है ..पुणे भारत का छटा बड़ा शहर है ..यहाँ अनेक मशहूर शिक्षण संस्थाने है ..इसलिए इसे पूरब का आक्सफोर्ड भी कहा जाता है ...मराठी यहाँ की मुख्य भाषा है ...>>>>आगे पढ़ें



किसी की राह देखी 
कही नजरें बिछायीं 
क्यों कहीं राह में देख 
कैसे हैं नजरें बचाईं 
सुगंध और सुमन से >>>>>
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सुप्रसिद्ध लेखक रंगकर्मी ,अभिनेता श्री गिरीश कर्नाड (जिनके लिखे नाटक तुगलक की पिछले दिनों धूम रही )को मुंबई की एक संस्था द्वारा एक साहित्य समारोह में रंगकर्म से जुड़े अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया था |लेकिन कर्नाड को अपने इस ‘’भाषण’’ में प्रसंशा के बावजूद कुछ असहमतियों जिन्होंने छोटे मोटे विवाद का रूप भी ले लिया था ,सामना करना पड़ा |>>>>>आगे पढ़ें


जिस समय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, एक आशंका सी रहती थी कि होगा कि नहीं, यदि होगा तो कितने वर्षों में। तैयारी करने वाले प्रतिभागियों में जिससे भी मिलते थे, एक उत्सुकता रहती थी, यह जानने की कि कौन कितने वर्षों से तैयारी कर रहा है? तैयारी का कुछ भाग दिल्ली में और कुछ इलाहाबाद में किया था, आपको यह तथ्य जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ लोग १० वर्षों से तैयारी कर रहे थे। एक अजब सी आशावादिता व्याप्त थी वातावरण में>>>>>आगे पढ़ें


एक बढ़ई काम करते हुए कई चीज़ों पर ध्यान नहीं देता मसलन लकड़ी चीरने की धुन, उसे चिकना बनाते समय बुरादों के लच्छों का आस-पास फ़़ूलों की तरह बिखरना, कीलें ठोकने के घीमे मद्धिम और तेज सुर,खुद अपने हाथों का फ़़ुर्तीला हर क्षण बदलता संचालन और कभी चिंतन में डूबी, कभी चुस्ती और जोश से लपकती, कभी लगन में डूबी और कभी काम के ढलान पर आख़िरी झंकार छेड़ती अपनी गति वह स्वयं नहीं देखता.>>>>आगे पढ़ें


एक घटना अमूमन सभी बाइक एवं कार चालकों के साथ घटती है, किसी मोहल्ले या सड़क से जाते वक्त किनारे बैठा कोई कुत्ता गाड़ी देख कर गुर्राते हुए हमला करने की मुद्रा बनाकर दूर तक दौड़ाता है. ऐसी हालत में फुटरेस्ट से पैर ऊपर उठाने पड़ते हैं. कहीं काट ले तो इंजेक्शन लगवाने का दर्द झेलना पड़ सकता है. कभी - कभी कार में बैठे होने पर कुत्ते दौड़ाते हैं तो बाइक सवार की तरह पैर अपने आप ही ऊपर उठ जाते हैं.>>>>आगे पढ़ें


मेरे सबसे प्यारे नीमा,
तुम्हें ख़त लिखना ...मेरे प्यारे...बेहद मुश्किल काम है...मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि मैं कहाँ हूँ, इतने छोटे और नादान हो तुम कि कैद, गिरफ़्तारी, सजा, मुकदमा, सेंसरशिप, अन्याय, दमन , आज़ादी, मुक्ति , न्याय और बराबरी जैसे शब्दों के मायने कैसे समझ पाओगे.>>>>आगे पढ़ें


यह सत्य है कि इंसान का अच्छा या बुरा, हिंसक अहिंसक होना उसकी अपनी प्रवृत्ति है। कोई जरूरी नहीं आहार के कारण ही एक समान प्रवृति दिखे। किन्तु यह प्रवृत्तियाँ भी उसकी क्रूर-अक्रूर वृत्तियोँ के कारण ही बनती है. दृश्यमान प्रतिशत भले ही कम हो फिर भी वृत्तियों का असर मनोवृति पर पडना अवश्यंभावी है।>>>आगे पढ़ें


आज की वार्ता बस इतनी ही .... फिर मिलते हैं

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

आफ़्सपो से आफ़्सपा जिंदगी के दो रंग .......... ब्लॉग4वार्ता ......... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, ....राज्योत्सव बनाम राय-पुरोत्सव  समझ नहीं आ रहा है के इस राज्योत्सव को क्या कहूं... मुझे तो ये राय-पुरोत्सव ही ज्यादा लगता है... क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य का बस एक ही मतलब है.. रायपुर.. बाकी जिलों का क्या हाल है ये मेरे बाकी मित्र बहुत अच्छे से जानते ही होंगे जो रायपुर में नहीं रहते.. कहीं और बसते हैं.... पूरा विकास.. पूरी उन्नति सिर्फ और सिर्फ रायपुर की ही हो रही है... ऐसा लगता है मानो क छत्तीसगढ़ राज्य में बस एक ही शहर है... रायपुर .... ... प्रस्तुत है आज की वार्ता ...... 

रहते थे वह परेशां मेरे बोलने के हुनर से वेदना दिल की आंखो से बरस के रह गई दिल की बात फ़िर लफ्जों में ही रह गई टूटती नही न जाने क्यों रात की खामोशी सहर की बात भी बदगुमां सी रह गई बन के बेबसी ,हर साँस धड़कन बनी तन्हा यह ज़िंदगी, तन्हा ही रह गई रहते थे वह परेशां मेरे बोलने के हुनर से खामोशी भी मेरी उन्हें चुभ के रह सपनों की पांखर टूट गई आँख खुलते ही हकीकत ज़िंदगी की ख्वाब बन के रह गई !!  संस्कारधानी जबलपुर के जाने माने वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार मोहन शशि जी और उनके परिजन आमरण अनशन पर बैठे ...  योवृद्ध 76 वर्षीय मोहन शशि जी संस्कारधानी जबलपुर के जाने माने वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार हैं . उनका पौत्र अमिय होनहार छात्र होने के साथ साथ एक अच्छा खिलाडी भी है . वह सेंट जेवियर स्कूल शांति नगर जबलपुर में विद्या अध्ययन करता है . खेल कूद में स्कूल में चयनित होने के पश्चात उसका जिलास्तर पर संभागीय खेलकूद प्रतियोगिता में चयन किया गया था . प्रबंधन द्वारा उसे एक किट की जिम्मेदारी दी गई थी और ट्रेन में नरसिहपुर जाते समय किसी के द्वारा धक्का देने के करण उसका ट्रेन दुर्घटना में पैर कट गया 

आफ़्सपो से आफ़्सपा और इरोम शर्मिला जब कोई चीज़ चर्चा से बाहर होने लगे तो उसे सामान्यत: अप्रासंगिक मान लेना चाहिए। कम से कम जिनके बीच होने लगे उस गलियारे से अप्रासंगिक मान लेना चाहिए। 4 तारीख़ राजनीतिक हलकों के लिए काफ़ी कसरती दिन था। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तोरण द्वार खोलने के कैबिनेट के फ़ैसले पर सफ़ाई दे रही थी और बता रही थी कि कांग्रेस देश के लिए कितनी ज़रूरी है।जिंदगी के दो रंग. 1.धूल हर्फों से झड़े तो चमक उठे यादों के जुगनू गर्द दीवारों से झड़े तो कुछ यादें बेलि‍बास हुई... मन की कि‍ताब का जो खोला पीला पड़ा हुआ पन्‍ना कैद अश्‍कों की बारि‍श आज तो बेहि‍साब हुई.... 2.कोई तहरीर मि‍टाए तो दि‍ल में कसक होती है कोई खत कि‍सी का जलाए तो धुंआ उठता है... जालि‍म..दि‍ल वो भीगा कागज है कि जलता ही नहीं सीली सी लकड़ी हो जैसे, बस जि‍समें हर वक्‍त धुंआ उठता है....

खनकते सिक्के नारी और पुरुष को एक ही सिक्के के दो पहलू माना है पुरुष को हैड और स्त्री को टेल जाना है पुरुष के दंभ ने कब नारी का मौन स्वीकारा है उसके अहं के आगे नारी का अहं हारा है । पुरुष ने हर रिश्ते को अपने ही तराजू पर तोला है , जबकि नारी ने हर रिश्ता मिश्री सा घोला है । पुरुष अपने चारों ओर एक वृत बना घूमता रहता है उसके अंदर , नारी धुरी बन एक बूंद को भी बना देती है समंदर । दीये बेचने वाली का बेटा बाहर से किसी ने पुकारा तो देखा दीये बेचने वाली का बेटा खड़ा था , देख कर मुस्काया, दीवे नहीं लेने क्या बीबी जी ........... मैंने भी उसकी भोली मुस्कान का जवाब मुस्कान से दिया, लेने है भई, पर तेरी माँ क्यूँ नहीं आयी ..... माँ तो अस्पताल में भर्ती है बीबी जी , ओह ,मैंने कहा, और साथ में तेरा भाई है ये ................ नहीं मेरी छोटी बहन है ये ...... 

जोधपुर किला (मेहरानगढ दुर्ग)राजस्थान यात्रा- पहला भाग जोधपुर आगमन यहाँ है। पिछले लेख पर आपको नागौरी दरवाजे तक लाकर किले की एक झलक दिखाकर ईशारा सा कर दिया गया था कि अगली लेख में आपको क्या दिखाया जायेगा? तो दोस्तों आज के लेख में हम चलते है, मेहरानगढ दुर्ग की ओर........ आगे चलने से पहले आपको नागौरी दरवाजे के बारे में भी थोडा सा बता दिया जाये तो बेहतर रहेगा। ऋषिकेश से नीलकण्ठ साइकिल यात्राहम ऋषिकेश में हैं और आज हमें सौ किलोमीटर दूर दुगड्डा जाना है साइकिल से। इसके लिये हमने यमकेश्वर वाला रास्ता चुना है- पहाड वाला। दिन भर में सौ किलोमीटर साइकिल चलाना वैसे तो ज्यादा मुश्किल नहीं है लेकिन पूरा रास्ता पहाडी होने के कारण यह काम चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक दोस्त करण चौधरी का जिक्र किया था जो एमबीबीएस डॉक्टर भी है। हमारी जान-पहचान साइकिल के कारण ही हुई। करण ने तब नई साइकिल ली थी गियर वाली।

प्राचीन बंदरगाह प्राचीन बंदरगाह महर्षि महेश योगी की जन्म भूमि पाण्डुका से आगे सिरकट्टी आश्रम से पहले मगरलोड़ और मेघा की ओर जाने वाले पुल के किनारे मुझे नदी में लेट्राईट को तोड़ कर बनाई गयी कुछ संरचनाएं दिखाई थी। मैने कयास लगाया कि यह अवश्य ही बंदरगाह है। मैने नदी में उतर कर बंदरगाह का निरीक्षण किया एवं कुछ चित्र लिए। बंदरगाह की गोदियों में घूमते हुए कई तरह के विचार आ रहे थे। कौन लोग यहाँ से व्यापार करते थे? यह बंदरगाह किस समय बना? किसने बनाया? सितारे की चमक ..वैसे तो सूरज को दीपक दिखाने वाली बात है पर एक प्रयास किया है पढ़ने का--* * आज सुनिये एक ऐसे सितारे की लिखी कहानियाँ जिसकी चमक बढ़ती जा रही है .... ** (बिना सुने पोस्ट करने की अनुमति देने के लिए आभार!)* * और पढ़ने को यहाँ है ...कहानियाँ * *यहाँ आप इनकी किताब "चौराहे पर सीढ़ियाँ "लेने के लिये क्लिक कर सकते हैं* 

 कि मर जाना इकलौता सच है बयालीस साल... बयालीस साल कोई गुज़ारता है साथ-साथ। और फिर एक दिन दोनों में से कोई एक चला जाता है चुपचाप। जो रह जाता है, उसकी तन्हाई और तकलीफ़ के बारे में चाहे जितना चाह लें, कुछ भी लिखा नहीं जा सकता। सब दिखता है, फिर भी नहीं दिखता। सब समझ में आता है, फिर भी समझना नहीं चाहते हम। मृत्यु - ज़िन्दगी के इस सबसे बड़े, सबसे कठोर और इकलौते शाश्वत सत्य से क्यों फिर भी स्वीकार नहीं कर पाते हम?  सौदर्य की पीड़ासौन्दर्य के प्रति सहज आसक्ति मानवीय गुण है। लेकिन सौन्दर्य प्राप्ति के लिए बर्बरता ही हद तक जाना अमानवीय प्रवृति। इसी जगत में ऐसी कितनी ही परम्पराओं ने सिर्फ सौन्दर्य प्राप्ति के लिए जन्म लिया है, जो न सिर्फ अप्राकृतिक हैं, बल्कि नृशंस और बर्बर भी हैं। ध्यान रहे, ये सारे अमानवीय प्रयोग महिलाओं पर ही किये गए हैं। फुटबाइंडिंग या पैर बंधन परंपरा: चीनी मान्यताओं में महिलाओं के छोटे पैर ........

वार्ता को देते हैं विराम, मिलते हैं ब्रेक के बाद ..........  राम राम 

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

गैस बचाएं दिवाली मनाएं... ब्लॉग 4 वार्ता... संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार.... कमरतोड़ महंगाई के बीच दिवाली का त्यौहार भी दरवाजे की कुण्डी खटखटा रहा है, रंगाई-पुताई से लेकर कपड़े-लत्ते की भेंट चढ़ रही है सारी तनख्वाह और बोनस। दीवाली का त्यौहार अपने साथ रौनक लेकर आता है। इसी बहाने बरसात के बाद घर की सफाई के साथ रंग रोगन भी हो जाता है। दिवाली को कुछ ही दिन रह गए हैं, बाजारों में रौनक नजर आने लगी है। कितनी भी महंगाई हो जाए, भले ही दिवाला निकल जाए पर दिवाली तो मनानी पड़ती है। अबकि दिवाली में गैस सिलेंडर की मारा-मारी चल रही है। गैस बचाएं और दिवाली मनाएं ........  प्रस्तुत हैं आज की वार्ता में मेरी पसंद के कुछ ब्लॉग लिंक्स ............
 


तेरे बाद...... - तेरे बाद बेतरतीब सी ज़िन्दगी को समेटा पहले... अपने बिखरे वजूद को करीने से लगाया .. अब इकट्ठा कर रही हूँ तेरी यादों की रद्दी, गराज में पड़े एक पुराने सीले ...तो ये है - - सुबह-सुबह आँख मलते हुए आप सैर को जाएँ वहाँ दौड़ती-भागती , चक्कर लगाती चेहरे पर ताज़ी लालिमा उगाये कोई कविता दिख जाए तो बेशक ! हैरानी की कोई बात नहीं होगी ... दोस्ती को मोहोब्बत बताते रहे... - हर आने जाने वाले को हमसफ़र बताते रहे, दोस्ती को हम मोहोब्बत बताते रहे, घोड़ों की दौड में हम बस ख्याल ही दौडाते रहे, सब खा गए पकवान सारे, हम ख्याली पुलाव पकात...


सोच नहीं पाती - भाव आतुर मुखर होने को दीखता वह सामने फिर भी शब्द नहीं मिलते अभिव्यक्ति को | कोइ बाधा या दीवार नहीं फिर भी हूँ उन्मना कहीं कोई अदृश्य रोकता कुछ कहने क...

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh8FUZ1vBtXozkXgXWqo-pIHV0GOR5X1cZr8VyISdFWHnN4eu3O7tSQdbVHc1gexGYgsRiqpsjshwbCMz_xhozLw3TmCOkXu3AUSInhpnhmSbAZcBiqeidgy39ej8KZ58auPiONk3lNgSZ7/s1600/MEGHDOOT.jpg
मेरे कालिदास... - हर बार.......... जब भी कुछ लिखने बैठती हूँ बहुत कोशिश करती हूँ तुमको ना लिखूं फिर भी आ ही जाते हो तुम कहीं ना कहीं से तुम्हारे आते ही छाने लगते है भाव... 


पंचकोसी ------ राजिम का त्रिवेणी संगम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर नगर से प्राचीन नगर एवं जमीदारी फिंगेश्वर 61 किलोमीटर पर 20058' 7.50"N 82002'48.56" E पर स्थित है। इस नगर ...


कहाँ छिपे ? - वही समय है वही मौसम है वही है तन्हाई छोड़ के मुझको यमुना के तीरे ........ कहाँ छिपे कन्हाई ? विरहाग्नि से दग्ध .... ह्रदय करे चित्कार यमुना तट पर ..... 


लादेन ने बनाया ओबामा को राष्ट्रपति ! - *मैं *अमेरिका की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता हूं, खासतौर पर उसकी विदेश और आर्थिक नीतियों का तो मैं सख्त विरोधी हूं। इसके बाद भी मैं अमेरिकियों की देश के...  


 
स्नेह लिखना..... - *** ** ** **हृदय के आँगन, नुपुर खनकते* *उनके स्वर का स्नेह लिखना-* *भरे नेत्र , आतुर झरने को* *स्मृतियों के नेह लिखना-* * **ह... 


भादवँ जातरा - क्षमा करें। प्रमाद वश यह पोस्ट अगस्त में नहीं जा सका था। बहरहाल, देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर नवम्बर में सही, लेकिन पोस्ट को तो जाना ही है। बुधवार, 15 अ...


बंगलोर, मेट्रो और साइकिल - अभी कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा कि बंगलोर मेट्रो अपने प्रमुख स्टेशनों पर साइकिलें रखेगी। इन साइकिलों का उपयोग मेट्रो में यात्रा करने वाले लोग अपने स्थान ... 


हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स की एक शाम और निदा फ़ाज़ली ... - कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता . बहुत छोटी थी मैं जब यह ग़ज़ल सुनी थी और शायद पहली यही ग़ज़ल ऐसी थी जो पसंद ... 


मौन रतनपुर - इतिहास का रास्ता भूल-भुलैया का होता है और किसी ऐसे स्थल से संबंधित इतिहास, जो सुदीर्घ अवधि तक राजसत्ता का मुख्‍य केन्द्र, प्रशासनिक मुख्‍यालय के साथ-साथ धा... 


 

कुछ कम कम सा .... - कभी कभी पूरी बरसात से , पड़ने वाली कम कम सी बूंदे इस तन और मन को अधिक शांत करती है वैसे ही ... कम बोलने वाले शब्द कम बाते ,और छोटे वाक्य जो किताब के पन्..तुम मेरे सीने की साँस हो - तुम मेरे सीने की साँस हो तुम मेरा सच्चा अहसास हो तुम ही जीवन का राग हो तुम ही मेरी हर बात हो तुम मेरे सीने की साँस हो तुम दिल में हो मेरे रवां -रवां तुम ह... .मौत के बाद है असल जीवन - मेरे घर में मेरा पसीना है लगे हर ईंट में नगीना है भले पानी टपक रहा छत से जिन्दगी लड़के सुमन जीना है मौत से प्यार करना सीख सुमन और जीवन से लड़ना सीख सुमन मौ... 
 

 अब इजाज़त दीजिये नमस्कार.............

सोमवार, 5 नवंबर 2012

पेसल वार्ता में कुँवर रविन्द्र .................... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार,  कवि, चित्रकार, लेखक के विचारों की उड़ान अनंन्त होती है। कला कर्म सहज नहीं होता, उसके लिए मस्तिष्क की बत्ती हमेशा जलाये रखनी पड़ती है, चाहे बिजली का बिल कितना ही आ जाये। पेट की रोटी काट कर, कष्ट सहकर भी कलाकार अपनी कला को जीवित रखता है। अभिव्यक्ति का माध्यम चाहे कुछ भी हो, चिन्तनशील मानव हर हाल में अभिव्यक्त करता है। कुछ जन्मजात कलाकार होते हैं, उनके द्वारा खींची गयी आड़ी-टेढ़ी रेखाएं भी बहुत कुछ कह जाती हैं। उनके चित्रों में समुद्र सी गहराई है तो नदियों सा अल्हडपन भी है। गाँव की माटी की सोंधी खुशबू है तो शहर की धुप भी। उनके रेखांकन अद्भुत होते हैं, लकीरें ही बहुत कुछ कह जाती हैं, ऐसे कलम एवं कूंची के धनी कुँवर रविन्द्र हैं।

कुँवर रविन्द्र ब्लॉग जगत में 2009 से है, इनकी कृतियाँ भारत की पत्र-पत्रिकाओं "साक्षात्कार, अक्षरा, वागर्थ, मधुमती, सारिका, धर्मयुग, कहानीकार, नई कहानियां, पहल, गवाह, कथानक,कथाबिम्ब, कथादेश, काव्या, कारखाना, शिराजा, हंस, सारिका टाईम्स, नवभारत टाईम्स, संडे मेल, दिनमान, आजकल, नवनीत, खनन भारती, आकलन, वर्तमान साहित्य, समकालीन जनमत, समकालीन जनगाथा, आकंठ, संबोधन, ओर, वसुंधरा, मध्यांतर, शुरूआत, असुविधा, कल के लिए,गुंजन आकल्प, अर्चना, भाषासेतु, पुरुष, कला प्रयोजन,प्रेरणा,साहित्य अमृत, उत्तर प्रदेश, सदभावना दर्पण, कृति ओर,संकेत, परिकथा जैसी साहित्यिक पत्रिकाओ के साथ देश की अनेको व्यावसायिक -अव्यावसायिक पत्र -पत्रिकाओ, पुस्तकों के मुख पृष्ठों पर अबतक लगभग १४.००० ( चौदह हजार ) रेखांकन/चित्र के साथ कविताये प्रकाशित हो चुकी हैं।

इनके चित्रों की प्रदर्शनी  रायपुर छत्तीसगढ़ - १९७९, ब्योहारी , मध्यप्रदेश - १९८३, शहडोल, मध्यप्रदेश - १९८३, विधानसभा सभागार, भोपाल - १९८५, मध्यप्रदेश कला परिषद्, भोपाल - १९८६, दंगा और दंगे के बाद, हिंदी भवन, भोपाल - १९९३, विवेकानंद सभागार, बेतुल - १९९५ एवं 28 अक्तूबर 2012 को महंत घासीदास संग्रहालय की आर्ट गैलरी संपन्न हो चुकी है। इन्हें सृजन सम्मान -१९९५, भोपाल(म.प्र.), कलारत्न -१९९८, बिहार,सृजन सम्मान- २००३, रायपुर(छ.ग.) आदि सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। मिलनसार एवं  व्यक्तित्व के स्वामी कुंवर रविन्द्र को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं। इनके ब्लॉग का नाम अमूर्त है, मेरी 4 लाइनों के साथ प्रस्तुत हैं इनकी कुछ कृतियाँ ............

 फूलों  का  दर्द  आंसुओं से निचो कर इत्र बनता है.
लाखों  में  कोई  एक हमदर्द अपना मित्र बनता है.
ग़ालिब की गजल मीरा का विरह रंगों में घोलकर 
                                         कतरा  कतरा   रंगों  से  कोई  एक चित्र बनता है. 
                                                                                 (c) तोप रायपुरी 



अब वार्ता को देते है विराम, मिलते हैं ब्रेक के बाद ........... राम राम 

रविवार, 4 नवंबर 2012

अब उठ जाओ, आठ बज गए हैं, दस हजारी वार्ता ....... ललित शर्मा

ललित शर्मा का नमस्कार, वार्ता लिखने का समय नहीं मिल पा रहा है, वार्ता दल के साथी ही सहयोग कर रहे हैं। साथियों के सहयोग से निरंतर प्रकाशित हो रही वार्ता एक मुकाम को हासिल कर चुकी है। 150823 pageviews - 838 posts, last published on Nov 3, 2012 - 362 followers के साथ वार्ता भी दस हजारी क्लब में शामिल हो चुकी है। पहले ललित डॉट कॉम दस हजारी को स्थान प्राप्त हो चुका है। समस्त वार्ता दल के सहयोगी सदस्यों एवं पाठकों को मेरी हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई। अब चलते हैं आज की वार्ता पर प्रस्तुत हैं कुछ चिट्ठों के लिंक ...........

‘अनु, अब उठ जाओ, आठ बज गए हैं।’ मां की आवाज कानों में पड़ी तो अनुप्रिया तुरंत उठ बैठी। उसे याद आया आज तो उसकी ड्यूटी रामलीला मैदान में लगी है और उसे दस बजे हर हाल में पहुंचना होगा, क्‍योंकि आज धनतेरस है। खरीददारी के लिए लोगों की भीड़ इस दिन से लेकर दीपावली तक जमकर रहेगी। ऐसे में हम पुलिसवालों को अपनी तरफ से बिना किसी दिन छु‍ट्टी किए अलग अलग जगह बारह बारह घंटे ड्यूटी के लिए तैयार रहना होगा। क्‍या पुरुष और क्‍या महिला कांस्‍टेबल, सभी की खाट खड़ी रहेगी। जैसे त्‍योहार के दिन हमारे लिए बने ही न हों। हर समय खड़े रहो आम जनता की चौकसी में। लोग लोग और लोग, हर जगह लोग। उस समय जनसंख्‍या वृद्... more » 

बहुत दिनों से ब्लॉग के* हैडर* की तस्वीर को बदलने की सोच रहा था. आखिर यह तस्वीर पसंद आई और लगा दी. *श्री देवेन्द्र पाण्डेय *जी ने पसंद का चटका भी लगा दिया. लेकिन उनका कमेन्ट पढ़कर हमने इस तस्वीर को ध्यान से देखा और जो समझ आया , वह इस प्रकार है : * जिंदगी एक सफ़र है. * इन्सान राहगीर हैं. * जिंदगी के सफ़र की डगर भिन्न भिन्न हैं. * कोई राह ऊबड़ खाबड़ है तो कोई इस सड़क की तरह साफ और चिकनी सतह वाली. * कहीं काँटों भरी राह मिलती है तो कहीं फूलों भरी. * कोई राह सीधी होती है , कोई टेढ़ी मेढ़ी . * किसी राह पर हमसफ़र मिल जाते हैं , कभी अकेले ही चलना पड़ता है. *अब सवाल यह उठता है -- हम किस र... more » 

पारद विग्रहों की अद्भुतता उनकी उपयोगिता न केबल आधाय्त्मिक रूप से बल्कि भौतिक जीवन मे भी अब हम सभी बखूबी जानते हैं . और यह भी अच्छी तरहसे समझते हैं की अगर सच मे जीवन की उस अद्वतीय उचाईया की स्पर्श करना हैं तो बिना पारद के यह संभव ही नही ..अगर सिर्फ सूंठ रख कर वैद्य बने रहना हैं तो कोई बात नही ..पर जब बात परम हँस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी के शिष्य की हो तो ...तब कैसे हम सभी दूसरे नम्बर पर संतुष्ठ हो जाये . पर हर बार एक नया विग्रह ...??? ऐसा इसलिए की पहली बात तो यह हैं की यह कोई व्यवासयिकता वाली बात नही भले की कई कई के दिमाग मे यह बात आये.. इसे ऐ... more » 

२८ सालों से न्याय ........... सत्य को खोज रहा है नामालूम क्यों अब ऐसा लगनें लगा है- शायद सत्य की भी हत्या हो चुकी है या फिर वह किसी कालकोठरी में अंनजान जगह बन्दी बना दिया गया है... कहीं कोई आवाज नही उठती... कहीं कोई अकुलाहट नही होती... अब तो आँखों के आँसू भी सूख चुके हैं.... लेकिन बहुत भीतर अभी भी रह -रह कर एक टीस-सी उठती रहती है जो दुस्वप्न बन रातों को जगा देती है.. भटकती रूहें आज भी वैसे ही चीत्कार कर रही हैं.. शायद कोई उनकी की आवाज सुन ले... लेकिन शायद वे जानती नही हैं... यहाँ अधिकतर बहरे रहते हैं और जो सुन सकते हैं वो गूंगे हो चुके हैं ......................................... .... more » 

*प्रताप कुंवरी भटियानी* यह महाराजा मानसिंह जोधपुर की भार्या और देवावर ठिकाने के ठाकुर गोविन्ददास भाटी की पुत्री थी| इनका विवाह आषाढ़ सुदी 9वि.स.1889 में हुआ था| इन्होंने कुल 15 ग्रंथो की रचना कर सरस्वती के भण्डार की अभिवृद्धि की थी| उपलब्ध कृतियों की नामावली इस प्रकार है- ज्ञान सागर, ज्ञान प्रकाश, प्रताप पच्चीसी, रघुनाथ जी के कवित्त, प्रताप विनय, श्री रामचंद्र विनय, हरिजस गायन, भजन पद, हरिजस, पत्रिका आदि| यह सुशिक्षित नारी रत्न थी| महाराजा मानसिंह के निधन के बाद अहोराम प्रभु की आराधना, वंदना और पूजा में सलंग्न रहती थी| अपने पति के निधन के पश्चात इनका मानसिक संतुलन बिगड गया था| महार... more » 

आप बता सकते थे कि कार के अगले पहिये में क्या हुआ था? लेकिन कोई नहीं बता पाया इससे साबित हुआ कि लोग अंदाजा भी नहीं लगाना चाहते है। मैं आज आपको बता रहा हूँ कि कार के अगले पहिये में चालक वाली साइड में नहीं बल्कि दूसरी तरफ़ वाले पहिये में आवाज आ रही थी। जैसे ही मैंने कार रोक कर नीचे उतर कर पहिया देखने गया तो सबसे पहले मेरी नजर टायर पर नहीं गयी थी मैंने पहले तो टायर के पीछे लटकने वाली रबर को देखा कि कही यह तो टायर में रगड नहीं खा रही है। लेकिन वह टायर से काफ़ी दूरी पर थी। जैसे ही मेरी नजर टायर पर गयी तो एक बार को सिर चकरा गया क्योंकि टायर में पेंचर होने के कारण हवा बिल्कुल नहीं बची थी। क... more » 

राजमहल का दृश्य सिरपुर में उत्खनित सभी पुरा धरोहरों को एक गलियारा बना कर जोड़ने का कार्य प्रगति पर है। इसके बाद कहीं से भी रास्ता पकड़ लीजिये, आप सिरपुर की धरोहरों का दर्शन किसी से रास्ता बिना पूछे कर सकते हैं। सिरपुर में आज हमारा अंतिम दिन था, दोपहर तक हमें यहाँ से रवानगी डालनी थी। इसलिए सुबह ही तैयार होकर राजमहल परिसर के अवलोकनार्थ चल पड़े। जब सिरपुर दक्षिण कोसल के पांडूवंशियों की राजधानी थी तो राजप्रसाद भी होना अत्यावश्यक है तभी राजधानी होने का दावा पुख्ता होता है। महानदी के तट पर पूर्वाभिमुख राजप्रसाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में 2000-2001 में यह विशाल... more  

( 'पूर्णस्य पूर्णमादाय ' कहने से तात्पर्य यह है की यदि तुम स्वयं इस सत्य की अनुभूति कर सको कि वही ' पूर्ण ' तुम्हारे साथ साथ इस विश्व ब्रह्माण्ड के कण कण में भी प्रविष्ट है तो फिर उस ' पूर्ण ' के बाहर शेष बचा क्या ? इसी को कहा गया - ' पूर्णमेवावशिष्यते '.... ! 'करवा चौथ' के मंगल पावनपर्व पर हार्दिक शुभकामनायें ....) [image: http://festivals.iloveindia.com/karwa-chauth/pics/karwa-chauth-puja.jpg]खूब तुलना हो रही थी अपने चाँद से ऊपर वाले चाँद की, सबकी बातें सुनकर खुद को सँवारने की खातिर ऊपर वाला चाँद कल रात से अभी तक नहा रहा है पूरा निखर के आएगा रात को लेकिन उसे क्या पता कि कि... more » 
 
वार्ता को देते हैं विराम, मिलते हैं छोटे से ब्रेक के बाद .... राम राम  




शनिवार, 3 नवंबर 2012

चलो अपनी कुटिया जगमगाएँ .... ब्लॉग4 वार्ता ---- संगीता स्वरूप


आज की वार्ता में   संगीता स्वरूप   का नमस्कार ..... आइये  चलते हैं आज के लिंक्स पर -----

स्टेट्स अपडेट्स के दौर में पारिवारिक संवादहीनता-----तकनीक ने जीवन को जितना सरल किया है उतना ही उलझाया भी है। यंत्रवत हो चले  जीवन से संवेदनाएं कुछ यूं गुम हुई हैं कि हम अपने मन की कहने और अपनों के मन की सुनने के बजाय मात्र एक आभासी उपस्थिति दर्ज करवाने के आदी हो रहे हैं। आपाधपी भरे आज के जीवन में यूँ  तो सभी की दिनचर्या व्यस्त है ही ।  अ

हिमांचल प्रदेश : बंदर हैं धूमल के दुश्मन नंबर 1---हिमांचल प्रदेश में मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की कुर्सी बंदरों की वजह से जा सकती है। सप्ताह भर हिमांचल प्रदेश के कई शहरों की खाक छानने के बाद मुझे लगता है कि इस बार यहां हो रहे विधान सभा चुनाव में बीजेपी की सरकार को सबसे बड़ी चुनौती लगभग पांच लाख बंदरों से मिल रही है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये बंदर किसी चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकते हैं ? चलिए मैं बताता हूं कि इन बंदरों से हिमांचल प्रदेश को कितना नुकसान हो रहा है।

बहारें फिर से आयेगीं----शाम हुई हम धीरे-धीरे /चले नदी के तीरे-तीरे /आसमान के माथे देखो /कितनी गहरी पड़ीं लकीरें

चलो अपनी कुटिया जगमगायें-----------सतर्कता सप्ताह चल रहा था, समापन के समय विशिष्ट अतिथि बुलाये जाते हैं जो अधिकारियों और कर्मचारियों की बड़ी बैठक को सम्बोधित करते हैं, सब ध्यानमग्न हो सुनते हैं। यथासंभव उस बैठक में उपस्थित रहना होता है, कि कहीं ऐसा न हो कि अनुपस्थिति का अर्थ सतर्कता की अवहेलना के रूप में ले लिया जाये।

ऐसे चरण धरो दीवाली---- भीतर बाहर हो उजियाली/ ऐसे चरण / धरो दीवाली। / बिम्ब हुए जो मैले मैले / जितने भी सम्बन्ध कसैले / बनें बताशों की ज्यों थाली

ज़िन्दगी भर मुसर्रतों की तलाश में भटकता रहा ---- ज़िन्दगी भर / मुसर्रतों की तलाश में / भटकता रहा / मुसर्रतें तो मिली नहीं / ग़मों से / दोस्ती ज़रूर हो गयी

करवा चौथ ----    आज मैंने मांगी है / सलामती की दुआ / तुम्हारे लिए नहीं / उन करोड़ों के लिए / जिनके लिए तुम्हारा हर दिन / करवा चौथ है

बा और बापू की दृढ़ता-----बा के बारे में गांधी जी लिखते हैं, “… उनमें एक गुण बहुत बड़े परिमाण में है, जो दूसरी कितनी ही हिन्दू-स्त्रियों में थोड़ी-बहुत मात्रा में पाया जाता है। मन से हो या बेमन से, जान में हो या अनजान में, मेरे पीछे-पीछे चलने में उन्होंने अपने जीवन की सार्थकता मानी है और स्वच्छ जीवन बिताने के मेरे प्रयत्न में उन्होंने कभी बाधा नहीं डाली।”

औसत लोग-----  जो होते हैं / औसत / उनका कुछ भी नहीं / न धरती, न आसमान, / न  हवा न पानी / न होते हैं वे वोट ही

नागार्जुन एवं राजमहल ............... ललित शर्मा----------सिरपुर में उत्खनित सभी पुरा धरोहरों को एक गलियारा बना कर जोड़ने का कार्य प्रगति पर है। इसके बाद कहीं से भी रास्ता पकड़ लीजिये, आप सिरपुर की धरोहरों का दर्शन किसी से रास्ता बिना पूछे कर सकते हैं। सिरपुर में आज हमारा अंतिम दिन था, दोपहर तक हमें यहाँ से रवानगी डालनी थी।

कभी नाकाम न होवोगे.....!!!मिलन की आरजू करना... / सफ़र की जुस्तजू करना.... / जो तुम मायूस हो जाओ  / तो मुझ से गुफ्तगू करना....

हित-चिन्तक बन कर हमें, लूट रही सरकार - सत्यनारायण सिंह

ठेस-टीस

मुँह पर ताला, मन व्यथित, नयनन अँसुअन धार

हित-चिन्तक बन कर हमें, लूट रही सरकार

अल्फाज हो खुदा के .   कदम   हलचल मचाते  हैं / जब     अपने    बुलाते  हैं / नसीहत   भूल    जाती  है , / घर    काँटों    के  जाते  हैं -

तेरी याद  ----गिरी असमान से / फंसी टहनियों पर  / फिसल कर न जाने  / कहाँ गिर पड़ी है

मुस्कुराहट का रंग   ----मुस्कुराहटों की उंगली थामे / दर्द को मिश्री सा घोलकर पी लिया / थोड़ा खिलखिला दोगे अगर / तो ख़्वाबों के मेरे कारवां पर / खुशियाँ बरस ही पड़ेंगी / ताज़ादम हो के चलना अच्छा लगेगा न ..

खोह, वीराने और सन्नाटे    ----जिंदगी की खोह में चलते हुए वर्षों बीत चुके हैं, कभी इस नीरव से वातावरण में उत्सव आते हैं तो कभी दुख आते हैं और कभी नीरवता होती है जो कहीं खत्म होती नजर नहीं आती। कहीं दूर से थोड़ी सी रोशनी दिखते ही लपककर उसे रोशनी की और बढ़ता हूँ, परंतु वह रोशनी पता नहीं अपने तीव्र वेग से फ़िर पीछे कहीं चली जाती है।

किशोर डायरी के पन्ने     ------बाल्यवस्था से  युवावस्था तक पहुंचने की एक कड़ी है । किशोर अपनी अलग पहचान बनाने  की कोशिश इसी अवस्था से शूरू करते हैं ।उनमें शारीरिक -मानसिक परिवर्तन परिलक्षित होने लगते हैं ।उलझन में फंसे ,दुविधा में पड़े किशोरे अपने माँ -बाप से प्रथम सहयोग ,मार्गदर्शन व् प्यार की उम्मीद करते हैं 

उफ़................. उधर अपनी सरकार मंहगाई वाली . / इधर पास आने लगी  है दिवाली .

तान---    कान्हा, कब से खामोश है तुम्हारी बांसुरी, / कोई मीठी तान छेड़ो ना, / वन-उपवन,नदी-तालाब छोड़ो, / अब बस्तियों में आओ ना.

क्षणिकाएँ ...  क्षणों की लहरों ने तो  / विभीषिकाओं का पाठ पढ़ाया है / पर मैंने भी हर लहर के लिए / डांड तोड़ कर डोंगा बनाया है

बैठे रहे तस्सवुर-ए-जाना किये हुए .....एक कहानी----यादों में एक ख़ास बात होती है...वो खट्टी-मीठी तार से जुडी होती है...एक याद को याद करो तो दूसरी ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाती, मानो कहती हो, मुझे भी याद करो, मुझे भी याद करो...मेघा के साथ भी यही हो रहा था...आज उसने फिर एक फैसला लिया है, पिछले दो हफ्ते से उसके पास दो ऑफर आ चुके दो कम्पनियों से, एक दवाइयों की कंपनी में सी.ई.ओ. की पोजीशन के लिए और दूसरी मीडिया कंपनी से वाईस प्रेसिडेंट के लिए..

बेदर्द शाम हो जाए---

हवाएं सर्द जहाँ बेदर्द शाम हो जाए
मेरी वो शाम तुम्हारे ही नाम हो जाए

एक दिन का देवता ..   कल वर्ष भर के  / सारे सुप्त सुख  / लौट आये थे
एक दिन में, / आल्हादित हुआ  / था मन अपने इस

कटु सत्य-----   मैं कोई ज्योतिषी या भविष्यवक्ता नहीं हूँ, पर इतना जानता हूँ कि यदि कोई अनाड़ी तैराक किसी गहरी नदी के भंवर में नहाने लगे तो अवश्य ही डूबेगा. 

मैं इंदिरा गाँधी के आपद्काल का प्रत्यक्षदर्शी और भुक्तभोगी रहा हूँ. उस काल में अनेक विचारकों व सभ्य नागरिकों ने उसकी तारीफ़ में यह भी कहा था कि “यह अनुशासन पर्व है.” ऐसे नारे भी जगह ज

रहम-ओ-करम --   आजकल ............... /मुझे लफ़्ज़ों की ज़रुरत कम पड़ने लगी है / क्यूंकि स्पर्शों की नयी दुनिया जगने लगी है

गुलाब की तरह थे करवा चौथ पर पतियों के चेहरे-----श्रीगंगानगर-दोस्त की मैडम 24 घंटे में से कुछ घंटे ही बिना मेकअप के रहती है। सजी संवरी गुड़िया सी लगभग हरसमय। दोस्त घर में हो या ना हो, उसने तो बनी ठनी रहना है। बीस सालों में आज तक दोस्त को ये नहीं पता कि वो अधिक सुंदर कैसे दिखती है। मेक अप के या बिना मेक अप के

उन महान बेनामी टिप्पणीकारों को शत शत नमन-----    अब बात उन बेनामी टिप्पणीकारों की 

जो अपनी बेनामी टिप्पणी से ब्लॉग लिखने वालों के दिलों दिमाग को विचलित करते हैं |
व अपनी टिप्पणी के माध्यम से ये सलाह दे डालते है कि आपको तो लिखना ही नहीं आता | आपको अपना ब्लॉग बंद कर देना चाहिए |
ऐसा आपके साथ भी हुआ होगा | मेरे साथ भी ऐसा हुआ है |

क्‍या करें क्‍या न करें 3 , 4 और 5 नवंबर 2012 को ??-मेष लग्नवालों के लिए 3 , 4 और 5 नवंबर 2012 के कार्यक्रमों में भाई.बहन , बंधु बांधव सहयोगी बनेंगे , इनकी मदद लेने की कोशिश करें!  कुछ झंझट उपस्थित हो सकते हैं , पर घबराए नहीं , प्रभाव की मजबूत स्थिति से उन्हें दूर किया जा सकता है


अब आज्ञा दीजिये ----- नमस्कार

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

मेरा पति मेरा देवता है .. करवा चौथ की शुभकामनाएं .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी .

संगीता पुरी का नमस्कार,  एक अरसे से परंपरा के तौर पर मनाया जाने वाला पर्व 'करवा चौथ' पर आधुनिकता का पूरा रंग चढ गया है , पूजा का सामान, करवा, मेहंदी की कोन और सूखे मेवे का डिब्बे वाली थाली की कीमत 800 रुपये से 4,500 रुपये तक है। 4,500 रुपये वाली डिजाइनर थाली के साथ बिंदी, चूड़ी, काजल, आलता तथा सोहनपापड़ी का डिब्बा भी है। करवा चौथ के दिन चांद को छलनी से देखने की परंपरा है। अब यह छलनी भी डिजाइनर हो चुकी है। जरी गोटे से सजी इस छलनी की कीमत भी 120 रुपये से हजारों में हैं।  यह एक दिन ही काम आती है, लेकिन नवविवाहित महिलाएं बहुत चाव से ऐसी छलनी खरीदती हैं। ब्‍लॉग जगत में करवा चौथ को लेकर बहुत लेख लिखे गए हैं , इन चित्रों में क्लिक कर ढूंढिए कि किसने क्‍या लिखा है .....













और अंत में एक सुंदर गीत भी .....

मिलते हैं अगले दिन एक ब्रेक के बाद ....

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