गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

ताऊ की नजर से : श्री पी. एन. सुब्रमनियन

प्रिय ब्लागर मित्रों, मेरी पिछले सप्ताह की पोस्ट मे श्री अरविंद मिश्र ने सबसे उम्दा टिप्पणीकारों को उनकी स्व-हस्ताक्षरित पुस्तक "एक और क्रौंच वध" की प्रति भेजने का ऐलान किया था. उसी के मद्देनजर सुश्री Zeal, सुश्री संगीता पुरी, श्री अजयकुमार झा और सुश्री मुक्ति का पुस्तक भेजने के लिये चयन किया गया है. आप तीनों से निवेदन है कि आप अपना पोस्टल एडरेस drarvind3@gmail.com या taau@taau.in पर भिजवाने की कृपा करें जिससे कि उपरोक्त पुस्तक की प्रति आपको प्रेषित की जा सके.


रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" और ताऊ


ताऊ : अरे रामप्यारे. आज तो घणा बण ठण कै जींस पहणकै..सपीकर पै बैठ्या सै.. यानि टिपटाप हो रया सै...कित जाण की तैयारी सै तेरी?

रामप्यारे : ताऊ मैं मेरे दोस्त की बारात म्ह भोपाल जारया सूं...और उत डीजे पै डांस करुंगा आज तो जमकै..

ताऊ : ठीक सै भाई रामप्यारे, तू के मेरे कहण तैं माणने आला सै? जा नाच्या भाई दोस्त की शादी म्ह डीजे पै.

रामप्यारे : ताऊ मैं भोपाल जारया सूं...तो उडे थारा कोई ब्लागर दोस्त हो तो बतादे...मैं मिलकै ज्ञान लेता आऊंगा.

ताऊ : हां भई रामप्यारे...उडे भोपाल म्ह घणे सारे ब्लागर सैं भाई. पर तू नू करिये कि पी.एन सुब्रमनियन जी तैं जरुर मिलतो आईये. और मिसेज सुब्रमनियन की तबियत का हाल चाल भी बूझता आईये..

रामप्यारे : ताऊ वो मैं बिना कहे ही बूझ ल्युंगा..पर ये सुब्रमनियन जी के बारे म्ह कुछ मन्नै भी तो बतादे....

ताऊ : अरे "प्यारे" इब तू ध्यान लगा कै सुण...मैं तन्नै बताऊं सूं....ये हैं श्री पी.एन.सुब्रमनियन

मल्हार के मालिक श्री पी.एन. सुब्रमनियन


श्री पी.एन.सुब्रमनियन का जन्म २० जनवरी १९४२ में, केरल के एक ग्रामीण ब्राह्मण परिवार में हुआ. स्नातक की पढाई के बाद भारतीय स्टेट बैंक की सेवा में भरती हो गए. वहां कार्यरत रहते हुए बैंकिंग में सी ये आई आई बी की परीक्षा पूरी की.

रामप्यारे : अच्छा ताऊ अब समझ गय ये वो ही बैंक वाले अंकल हैं?

ताऊ : अबे ओ बावलीबूच प्यारे...जब मैं बोलूं तब बीच मे ना बोल्या कर...बस चुपचाप सुनता रहा कर...और हुक्का ठंडा हो जाये तो भरता रहा कर...समझगया ना..? हां तो आगे सुन...

उसके बाद सुब्रमनियन जी शिक्षण केंद्र में प्रशिक्षक, शाखाओं में शाखा प्रबंधक, प्रशासनिक अधिकारी, बिलासपुर - रायपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में, महा प्रबंधक, बुंदेलखंड क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में अध्यक्ष, रायपुर में क्षेत्रीय प्रबंधक आदि पदों पर कार्य करते भोपाल आ पहुंचे. भोपाल प्रधान कार्यालय में कंप्यूटर एवं संचार विभाग के कर्ता धर्ता बना दिए गए. सन २००२ में ६० वर्ष की आयु होने पर यहीं से सेवा निवृत्त होकर भोपाल में ही बस गये.

सुब्रमनियन जी को बचपन में डाक टिकट इकट्ठे करने का और पत्र मित्र बनाने का शौक भी सर पर हावी रहा. फोटोग्राफी में भी अच्छी दखल रखते हैं. पिछले २०/२५ वर्षों से पुरातत्व की और रुझान बना और इसी के कारण प्राचीन मुद्राओं को स्थल विशेष में ही खोजने और अध्ययन करने में रूचि बनी.

रामप्यारे : वाह ताऊ वाह, ये बहुत बढिया परिचय दिया आपने सुब्रमनियन जी का. अब आप अपनी पसंद की उनकी ब्लाग पोस्ट भी बताओ.

ताऊ : हां ये हुई ना बात रामप्यारे....ले इब सुण ले इनकी ब्लाग पोस्ट जो मन्नै घणी पसंद आई...सबतै पहले तो...
स्त्री सशक्तीकरण – एक पुरानी परंपरा

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नम्बूतिरी ब्राह्मणों के निवास को “मना” और कुछ जगह “इल्लम” कह कर पुकारते है. ये साधारणतया एक बड़े भूभाग पर आलीशान बने होते हैं. इसी के अन्दर सेवकों आदि के निवास की भी व्यवस्था होती थी. नाम्पूतिरी लोग भी उत्तर भारतीय पंडितों की तरह चुटैय्या धारण करते थे लेकिन इनकी चोटी पीछे न होकर माथे के ऊपर कोने में हुआ करती थी. इष्ट देव की आराधना में मन्त्र के अतिरिक्त तंत्र की प्रधानता होती है. पारिवारिक संपत्ति का उत्तराधिकारी केवल ज्येष्ठ पुत्र ही हुआ करता था और वही एक मात्र व्यक्ति विवाह करने का भी अधिकारी होता था. पत्नियों की संख्या चार तक हो सकती थी (Polygamy). परिवार के सभी सदस्य एक साथ “मना” में ही निवास करते थे.

इस व्यवस्था से संपत्ति विघटित न होकर यथावत बनी रहती थी. अब परिवार के जो दूसरे युवा हैं उन्हें इस बात की स्वतंत्रता दी गई थी कि वे चाहें तो बाहर किसी अन्य ज़ाति (क्षत्रिय अथवा शूद्र) की महिलाओं, अधिकतम चार से “सम्बन्ध” बना सकते थे. ऐसे सम्बन्ध अधिकतर अस्थायी ही होते थे. “सम्बन्ध” बनने के लिए पसंदीदा स्त्री को भेंट स्वरुप वस्त्र (केवल एक गमछे से काम चल जाता था) दिए जाने की परम्परा थी. वस्त्र स्वीकार करना “सम्बन्ध” की स्वीकारोक्ति हो जाया करती थी. जिस महिला से “सम्बन्ध” बनता था, उसके घर रहने के लिए रात में जाया करते और सुबह उठते ही वापस अपने घर “मना” आ जाते. रात अंधेरे में सम्बन्धम के लिए जाते समय अपने साथ एक लटकने वाला दीप भी ले जाते, जिसकी बनावट अलग प्रकार की होती थी और इसे “सम्बन्धम विलक्कू” के नाम से जाना जाता था.


"प्यारे" : ये तो बहुत बढिया पोस्ट की जानकारी दी ताऊ आपने....अब अगली पोस्ट के बारे में बताईये.

ताऊ : ले भई प्यारे...इब अगली पोस्ट पढले जिसमे महिलाओं के एक बहुत बडे आयोजन के बारे मे बता रहे हैं और जो शायद समूचे विश्व में अपनी तरह अनूठा और बडा आयोजन है...... विश्व में महिलाओं का विशालतम धार्मिक आयोजन

यह बात हम नहीं कह रहे हैं. गिनीज़ बुक में लिखा है कि संसार में इतना बड़ा महिलाओं द्वारा आयोजित कोई दूसरा धार्मिक अनुष्ठान नहीं है जिसमे लाखों महिलाई जाति, धर्म, ऊँच नीच के भेदभाव को भुलाकर दूर दूर से चलकर थिरुवनंथपुरम के प्राचीन आट्टूकल भगवति (देवी) मंदिर के प्रांगण में बिना किसी बुलावे या निमंत्रण के एकत्रित होती हैं. यहाँ इस मंदिर में प्रति वर्ष फ़रवरी मार्च के महीने में दस दिनों का उत्सव होता है. उत्सव भरणी /कृत्तिका नक्षत्र के दिन प्रारंभ होता है. नौवां दिन विशेष महत्त्व का रहता है जब सभी महिलाएं देवी के लिए नैवेद्य के रूप में वहीँ चूल्हे जलाकर खीर पकाती हैं. इसलिए इस ख़ास अनुष्ठान का नाम है “पोंगाला” जिसका शाब्दिक अर्थ होता है उफनने तक उबालन.


pongala


इस तरह के पोंगाला का प्रचलन तमिलनाडु में भी कई जगह है परन्तु जो बात आट्टूकल में है वह अन्यत्र नहीं. कल्पना कीजिये लाखों चूल्हे और हर चूल्हे पर एक या दो महिलाएं. कहा जाता है कि पिछली बार यह संख्या १५ लाख थी. जहाँ देखो वहां चूल्हा, सड़क के दोनों और, स्थानीय निवासियों के घरों के कम्पौंड, दफ्तरों के बाहर या कहें जहाँ जगह मिली वहीँ. लगभग मंदिर के ५ किलोमीटर की परिधि में यत्र तत्र. परन्तु कतारबद्ध. यह त्यौहार केवल महिलाओं के लिए है और पुरुष इसमें भाग नहीं ले सकते.


"प्यारे" : वाह वाह, मजा आगया इतनी दिलचस्प और उम्दा जानकारी प्राप्त करके...अब और बताईये.

ताऊ : अरे रामप्यारे...और बताईये...और बताईये..लगा राखी सै...जरा देख..हुक्का ठंडा होरया सै..जरा तमाखूं डालकै भरल्या..और सिलगा के देदे मन्नै...इब अगली पोस्ट सै...देवता यहाँ भी मदिरा माँगते हैं

"प्यारे" : ताऊ, यो के बात कही? मन्नै तो मामला किम्मै गडबड दिक्खै सै.....मदिरा यानि दारू यानि अपनी वो ही राज भातिया जी के सथ आली जगाधरी न.१...?

ताऊ : अबे बावलीबूच...प्यारे...तन्नै और किम्मै काम नही सूझता के? अबे यो तेरे उस काम आली दारू कोनी...जरा पूरी पोस्ट बांच ले उसके बाद किम्मै बोलिये....

केरल में कन्नूर या कन्ननोर से मात्र २० किलो मीटर की दूरी पर उत्तर की ओर पहाड़ी की तलहटी में एक गाँव है परस्सनिकडवु. जहाँ वालपट्नम नामक नदी के आकर्षक किनारे पर बना हुआ है एक विशाल मंदिर और जिस देवता के लिए यह समर्पित है वह हैं मुथप्पन. एक ऐसा देव जिसे भूंजी हुई सूखी मछलियों और मदिरा से संतुष्‍ट किया जा सकता है. यही यहाँ का भोग है.

कुछ वर्षों पूर्व तक यहाँ पहुँचने के लिए नदी पर नाव से जाना पड़ता था पर अब पहाड़ियों पर से सड़क बना दी गयी है जिससे आवागमन सुविधाजनक हो गया है.


"प्यारे" : ये तो बहुत जोरदार जानकारी मिली. इब आगे और सुनावो ताऊ.

ताऊ : अरे प्यारे, इब आगे तू मीनाक्षी देवी के बारे मे सुणले..बहुत जोरदार जानकारी से भरपूर पोस्ट सै यो...“अयोनिजा” गर्भ के बाहर जन्मी “मीनाक्षी”

पर्यटन के लिए दक्षिण भारत जाने वाले तमिलनाडु की सांस्कृतिक राजधानी “मदुरै”, वहाँ के सबसे बड़े आकर्षण “मीनाक्षी अम्मान मंदिर” या “मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर” के दर्शनार्थ जाते हैं. इस लेख का उद्देश्य मंदिर दर्शन तो नहीं है पर सन्दर्भवश कुछ मोटी मोटी बातों से अवगत कराना चाहूँगा.

यह मंदिर है तो बहुत ही पुराना जिसका उल्लेख ७ वीं सदी के तमिल साहित्य में मिलता है परंतु वर्तमान में दिखने वाला निर्माण लगभग १६३० का है जिसे नायक राजाओं ने प्रारंभ किया था. समझा जाता है कि पुराने मंदिर को मुसलमान आक्रमणकारी “मलिक कफूर” ने सन १३१० में ध्वस्त करवा दिया था. वर्तमान मंदिर ४५ एकड़ में फैला हुआ अपने १२ गोपुरमों (बुर्ज जैसा निर्माण) के साथ शहर के केंद्र में स्थित है. दक्षिण दिशा वाला गोपुर सबसे ऊँचा है जिसकी ऊँचाई १७० फीट है.


"प्यारे" : वाह ताऊ , बहुत लाजवाब पोस्ट है. यानि ज्ञान और जानकारी से भरपूर...इब आगे कुणसी पोस्ट के बारे म्ह बतारे हो?

ताऊ : अरे प्यारे, ले इब तू यो एक प्रेम आलेख पढले...जिसतैं तेरी बुद्धि भी थोडी निर्मल और पवित्र होज्येगी...विश्व का प्राचीनतम उत्कीर्ण प्रेम लेख

उदयगिरी की गुफाएं मेरे लिए महत्वपूर्ण थी. यहाँ इतिहास प्रसिद्ध (दूसरी सदी ईसापूर्व} कलिंगराज खरवेळ का शिलालेख विद्यमान था. मेरे मन में उसे देखने की लालसा थी. सीढियों से होकर पहाडी पर चढ़ना था. परिवार की महिलाओं में ऊपर आकर गुफाओं को देखने की रूचि नहीं थी. लिफ्ट होता तो कोई बात होती. वे सब दूसरी दिशा में चल पड़े. मैं अपने पुत्र, भतीजे और भतीजी को साथ लेकर अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्य की ओर निकल पड़ा.

ऊपर जाकर जितने भी दर्शनीय गुफाएं आदि थी, देखा. कलिंगराज खरवेळ का शिलालेख भी दिख गया. फिर बायीं ओर चल पड़े. सामने एक शेर के मुंह के आकर में तराशी गई गुफा दिखी. उसके सामने एक आयताकार मंच भी दिख रहा था. मुझे ऐसा लगा जैसे यह चिरपरिचित जगह है. मस्तिष्क में एक दूसरी गुफा का चित्र साकार हो रहा था. रामगढ पहाडियों की सीताबेंगरा और जोगीमढा गुफाएं जो सरगुजा जिले (छत्तीसगढ़) में हैं. दोनों में समानताएं थीं. अब हम उडीसा से छत्तीसगढ़ की ओर रुख कर रहे हैं.


रामप्यारे : ताऊ सुब्रमनियन जी का ब्लाग तो जानकारी खजाना निकला. इब तो मैं इनकी और भी पोस्ट नियमित पढूंगा...और थारै लिये इब हुक्का भर के ल्याता हूं......फ़िर मन्नै अगले ब्लागर के बारे मे बताणा...

ताऊ : अरे "रामप्यारे" इब आज इतना ही घणा सै...अगले ब्लागर के बारे मे इब अगले सप्ताह बात करेंगे.....और इब तू भी रोटी राबडी और घंठी का कलेवा कर ले....और सुणिये जरा...पहले वो सुब्रमनियन जी को फ़ोन मिला के दे मेरे को...जरा सीधी भिडंत करनी सै....

"रामप्यारे" : ले ताऊ, सुब्रमनियन जी लेण पै बाट देख रे सैं...बात करले...


ताऊ से सीधी भिडंत टैलीफ़ून पै

ताऊ : हैल्लो...सुब्रमनियन जी रामराम....मैं ताऊ रामपुरिया सपीक रया हूं.... आप मन्नै एक बात बतावो कि "ब्लागजगत के बारे में आपका क्या सोचणा हैं?"

पी.एन सुब्रमनियन : हिंदी ब्लागजगत का भविष्य तो उज्जवल ही होगा. हाँ आपस में टांग खिंचाई के लिए इसका प्रयोग चिंता का विषय बनता जा रहा है.

ताऊ : आप कुछ उपाय बतायेंगे?

पी.एन सुब्रमनियन : पर यहां सुनेगा कौन? आपके पान वाले की भाषा में : "कृपया यहां ज्ञान ना बांटे, यहां सभी ज्ञानी हैं."

ताऊ : धन्यवाद सुब्रमनियन जी, आपने हमारे सवालों के सीधे और सहज उत्तर दिये. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

हां तो प्यारे ब्लागर गणों अब अगले सप्ताह फ़िर आपमें से ही किसी एक ब्लागर से हम सीधी भिडंत करेंगे. हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा? अवश्य बतायें. अगले सप्ताह तक के लिये ताऊ और रामप्यारे की तरफ़ से रामराम.

16 टिप्पणियाँ:

बहुत ही आकर्षक पोस्ट
धन्यवाद
आप सभी मेरी आज की पोस्ट पर सादर आमंत्रित है |

http://techtouchindia.blogspot.com

हैं श्री पी.एन.सुब्रमनियन जी का परिचय देने के लिए बहुत आभार ..

ताउ
मन्ने एक पाडकास्ट रिकार्ड करा देओ

सुब्रमनियन जी से मिलवाने का बहुत आभार रामप्यारे...ताऊ को भी धन्यवाद कह ही देना.

श्री पी.एन.सुब्रमनियन-को नहीं जानत है प्रभु ..नाम तिहारो .मेरे प्रिय ब्लॉग लेखक ! बहुत आभार ताऊ साब ! और हाँ मुझे पते वाले ईमेल का इंतजार है !

चयन तो नहीं हुआ मगर अगर एड्रेस भेजने से काम चलता हो तो मैं भी ट्राई मारुँ क्या अरविन्द जी की किताब के लिए.

बहुत ही आकर्षक पोस्ट

निर्विवाद और बेहतरीन लेखक हैं श्री पी एन सुब्रमनियन !अग्रजों में से एक मैं उनका नमन करता हूँ !

रामप्यारे और ताऊ जी को राम राम
आपके माध्यम से श्री पी एन सुब्रमण्यम जी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। बहुत ही अच्छी वार्ता रही आपकी।

पी एन सुब्रमण्यम जी को मेरी तरफ़ से-जय जोहार

आपका बहुत बहुत आभार .. बहुत ही रोचक ढंग से पी एन सुब्रह्मण्‍यम जी पाठकों को जानकारी प्रदान करते हैं .. मल्‍हार का तो जबाब नहीं !!

@ Tau ji--

"Hello hello...zeal sapeek ree hun....can you hear me?...okay okay....your voice is sugary and melodious....oops--i mean graceful and appealing !....Congrats ! for the wonderful post !.."

It's indeed a pleasure knowing P N Subramanyam ji. His posts are informative and interesting both. The Naambodhiri culture and women's festival is something new to me. Will look forward for his upcoming posts. Regards to Subyamanyam ji.

@ Arvind ji--

Sir, Thanks for liking my comment....I am feeling honoured.

सुब्रमण्यम जी से यह मुलाकात स्मरणीय रहेगी.वे सभी के प्रिय ब्लॉगर हैं और प्यारे ने उनसे बहुत ही अच्छा इंटरव्यू लिया .
उनके ब्लॉग मल्हार की हर पोस्ट ही अपने आप में नायाब है.उनका यात्रा वृतांत बहुत ज्ञान वर्धक होता है.
उनके लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ और ताउ जी का आभार.


[सोच रही हूँ इतना प्रभावी अस्सिस्टेंट ' प्यारे ' कहीं धीरे धीरे ताउ का सिंहासन ना हथिया ले.!]

श्री पी.एन.सुब्रमनियन का परिचय वह भी बहुत ही रोचक तरीके से करवाने के लिए आभार !!

श्री सुब्रमणियम जी के तो हम भी प्रशंसक हैं.....आपके जरिए उनके बारे में इतने विस्तार से जानने का मौका मिला.....
धन्यवाद्!!

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