शनिवार, 17 अप्रैल 2010

ब्लाग-प्रहरी पर ट्रैफ़िक तेज़ी से बढ रहा है.


 सभी को गिरीश बिल्लोरे का सादर अभिवादन स्वीकार्य हो . आज़ पोस्ट चर्चा का दिन मेरा है . मिसफ़िट हूं कदाचित फ़िट हो जाये ये चर्चा . अलबेला खत्री जी का अभिनंदन एल बी ए ने  नये सदर की की अगुआई में किया  खुशी हुई.   आज़ की चर्चा चर्चा पर उठते सवाल से शुरु करना ज़रूरी है श्याम कोरी जी ने जो सवाल उठाया है उसे अनदेखा करना गलत है  उठाया वहीं रजनीश परिहार जी   की टिप्पणी भी काबिले गौर है ठीक है न दराल जी

1]मुझे तो आज तक इन चर्चाओं का गणित समझ में नहीं आया.!चिटठा चर्चा के नाम पर उन्ही गिनेचुने लोगों को दोहराया जाता है!हर जगह उन्ही ब्लोगों को उपस्थित भी पता हूँ!आखिर इन चर्चाओं में शामिल होने की शर्त क्या है?[2]पाबला जी के विचारों से सहमत।
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 हर्षिता ब्लाग पर देखिये :साधना राय की कविता देखिये . घूघूती बासूती जी का आलेख दमदार बन पडा है. देखये ज़रूर . उधर नये ब्लाग प्रेम-प्रभात के तेवर भी गज़ब हैं देखने योग्य हैं.
कभी किसी ब्लाग पर आया जाया कीजिये सिर्फ़ खुद को पढवाने का शौक एक दिन आपकी सृजन शीलता को मंद करता है सही भी है एग्रीगेटर्स ब्लाग्वाणी और चिट्ठाजगत के अलावा चर्चायें भी बहुत महत्व पूर्ण है . इस पर अंगुली उठाना गलत है . इस मिनि एग्रीगेटर्स  को अपनी क्षमता अनुसार काम करने दीजिये इसी में सबका भला है.
जब तक आप किसी को उत्साहित न करेंगें तब तक आपको कौन प्रोत्साहित करेगा जैसे विवेकरंजन श्रीवास्तव जी के  इस सटायर की दशा है कम ही लोग गये हैं इस पर कारण वही विवेकरंजन  जी की टिप्पणीयां यानि पठन पावती भाग्य वानों को मिल पातीं हैं. यदी उनका आवागमन यथा सम्भव कई जगह होता तो यह पोस्ट पढने लिंक खोजने की समस्या नहीं होती. शायद बेहतरीन आलेख इन्हीं कारणों से भी नेपथ्य में चले जाते है>,शास्त्री जी की कविता भी ठीक है . तो दिल्ली की रितु जैन की कविता काबिले तारीफ़ है 
अक्सर मेरे लब चुप से हो जातें हैं,
तुमसे से कुछ कहते-कहते,
पता नहीं क्या मजबूरी है इस दिल की,
तुम्हारी चाहत में भूल चुका है,हर अपने-बेगाने को,
न मौत का खौफ सताता है इसे,न दुनिया का,
बेचैन है,दीवाना दिल तुम्हे पाने को|
 रितु जैन भी  अन्य ब्लाग्स पर कम आतीं जातीं हैं शायद समयाभव हो किन्तु अगर उनका विचरण अन्य ब्लागों पर नियमित हो तो भी  ब्लागर्स के बीच खासी लोकप्रिय हो सकतीं हैं. वैसे उनके अवदान का अनदेखा करना गलत है. समयचक्र  पर चर्चा और निरन्तर पर महेन्द्र भाई का आलेख अच्छा है कनिष्क जी की मेहनत अब रंग दिखाने लगी है ब्लाग-प्रहरी पर ट्रैफ़िक तेज़ी से बढ रहा है. प्रमाण मै न दे सकूंगा बस एक इल्तिज़ा है देख आईये यह ब्लाग  !
चिट्ठाजगत पर चर्चा लिखते समय जो मिला ताज़ा आपके लिये पेश कर रहा हूं..... 


















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sameeksha पर ana































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10 टिप्पणियाँ:

इतने सारे लिंक---:)

इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

@ उड़नतश्‍तरी

इतने सारे हैं तो क्‍या हुआ

आपने तो उड़ कर है पहुंचना।

अब किसी को नाराज़गी नही होनी चहिये

बहुत सारे अच्छे लिंक्स के साथ..... बहुत शानदार चर्चा.....

acha he aaj ki blog varta


bandhai aap ko is ke liye



shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com

सुमन जी
ये क्या
क्यों निकाल दिये

अब तो सबकी शिकायत दूर हो गयी होगी !!

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