शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

माँ ऐसा वरदान दिजो - तुम रहो, हम रहें - ब्लॉग 4 वार्ता - शिवम् मिश्रा


प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

क्या आप ने नेत्रदान किया है ??

आज र्ल्ड साइट डे (8 अक्टूबर) की पृष्ठभूमि में इस सवाल का महत्व अपने देश के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विश्व के 3 करोड़ 70 लाख दृष्टिहीनों में से 1 करोड़ 50 लाख से अधिक भारतीय शामिल है। इस क्रम में सर्वाधिक दुखद बात यह है कि देश के इन अंधे व्यक्तियों में से ७५% का अंधापन ऐसा है, जिसका समय रहते निवारण हो सकता था। अंधेपन की इस समस्या के मुख्य कारणों को समझे बगैर इससे निपटना असंभव है। समाज के एक बड़े वर्ग में आंखों की देखभाल संबंधी अज्ञानता, जनसंख्या के अनुपात में नेत्र-चिकित्सकों का बड़े पैमाने पर अभाव, सरकारी अस्पतालों में नेत्र-चिकित्सा से संबंधित सुविधाओं की कमी और नेत्र-प्रत्यारोपण के लिए कार्निया की उपलब्धता की कमी देश में बढ़ती अंधता के कुछ प्रमुख कारण है। सरकार चिकित्सकों के अलावा गैर-सरकारी समाजसेवी संगठन भी अन्धता निवारण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। सही समय पर दी गयी जानकारी से अन्धता के शिकार वयस्कों के अलावा बच्चों में भी विभिन्न रोगों कारणों से होने वाली अंधता को रोका जा सकता है। अगर अधिक से अधिक संख्या में लोग नेत्रदान के लिए आगे आएं, तो लाखों नेत्रों को ज्योति प्रदान की जा सकती है। अगर हम समय रहते अंधेपन की समस्या पर काबू पाना चाहते हैं, तो नेत्र-चिकित्सकों को भी इस समस्या के समाधान के लिए अपने स्तर से कारगर प्रयास करने होंगे।

क्यों ना हम सभी ब्लॉगर मिल कर एक मुहीम चलाये और अपने अपने हिसाब से इस समस्या से छुटकारा पाने का प्रयास करे | आप सभी अपनी राय जरूर दे इस पहल को शुरू करने के विषय में | कृपया बताये हम क्या कर सकते है अपने अपने स्तर पर ?

क्या यह विचार अपने आप में सुखद नहीं है कि जब आप और हम इस दुनिया में नहीं होगे, फ़िर भी इस दुनिया को देख रहे होगे !!

जैसे हम जीते जी अपने वारिस के लिए कुछ ना कुछ जमा करते रहते है वैसे ही अपनी आखें अगर किसी के नाम कर जाये तो क्या हर्ज़ है ?? जाहिर सी बात है कोई भी हमसे यह तो नहीं कह रहा कि अभी निकल कर दे दो अपनी आखें !! जब हम नहीं होगे यह तब भी किसी के काम आने वाली बात है !! इसलिए आज ही अपने नेत्रदान के लिए पंजीकरण करवायें !


मैं अपना नेत्रदान सन २००० में कर चूका हूँ , आज तक बहुत लोगो को यह समझाया भी है कि इसमें कोई गलत बात नहीं है, आगे भी यही प्रयास

करता रहूगा यह आज है अपने आपसे |


नेत्रदान महादान !!

चलिए इसी भावना को अपने दिल में बसाये हुए ब्लॉग 4 वार्ता के इस मंच से अब चलते है आज की ब्लॉग वार्ता की ओर ...

सादर आपका

शिवम् मिश्रा
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नई ग़ज़ल/ संघर्षों का नाम बेटियाँ :- नवरात्र पर्व शुरू हो गया है. बहुत-से लोग नौ दिनों तक शक्ति की उपासना करेंगे, हमारे यहाँ लड़कियों को भी देवी का रूप माना गया है. दुर्गा, काली जैसी देवियाँ है. सरस्वती माँ जैसी ज्ञान की देवी है. गायत्री माँ है. अनेक देवियाँ है. ये सब भारत को भारत बनाती है. कुंवारी कन्याओं को देवी समझ कर पूजा भी जाता है. भोग लगाया जाता है. आज मै अपनी ग़ज़ल देवी की प्रतीक लड़कियों को समर्पित कर रहा हूँ. बेटियाँ .....इसके पहले भी मैंने एक-दो ग़ज़ले लड़कियों या बेटियों पर कही है. आज ''बेटियाँ'' शीर्षक से प्रस्तुत है कुछ शेर॥देखे, शायद कुछ जम जाये।

दास्तान-ए-टाईम खोटीकार :- पिछले कुछ दिनों से सोच रहे थे कि चाहे मजाक-मजाक में ही सही, ब्लागिंग की कृ्पा से अपण लेखक तो बन ही चुके हैं। समीर लाल जी नें व्यंग्यकार का ठप्पा भी लगा ही दिया है, तो क्यों न अब कहानीकार बनने की ओर कदम बढाया जाए. लो जी, कुछ दिन तक इसी पर विचार करते रहे और ज्यों ज्यों ये विचार मन में अपनी जडें जमाता गया, त्यों त्यों ही हमारा कहानी लिखने का इरादा मजबूत होता चला गया. सो, एक दिन इरादा बुलन्द करके हम कहानी लिखने बैठ गए, लेकिन ऊपरवाला ही जानता है कि कहानीकार बनने की चाह में हमें कितने पापड बेलने पडे, कितनी परेशानियों का सामना करना पडा. यूँ लगा कि मानो ईश्वर हमें कहानीकार बनने ही नहीं देना चाहता------.

एक बार फिर मैं पराधीन हो गई... :-
क्या हाल है गुप्ता जी, आज कल नज़र नहीं आते हैं
कौनो प्रोजेक्ट कर रहे हैं,या फोरेन का ट्रिप लगाते हैं
गुप्ता जी काफी गंभीर हुए, फिर थोडा मुस्कियाते हैं
फिर संजीदगी से घोर व्यस्तता का कारण हमें बताते हैं
अरे शर्मा जी राम कृपा से, ये शुभ दिन अब आया है
पूरा परिवार को कैनाडियन गोरमेंट ने,परीक्षा देने बुलाया है
कह दिए हैं सब बचवन से, पूरा किताब चाट जाओ
चाहे कुछ भी हो जावे, सौ में से सौ नंबर लाओ
एक बार कैनाडियन सिटिज़न जब हम बन जावेंगे
जहाँ कहोगे जैसे कहोगे, वही हम मिलने आवेंगे

माँ ऐसा वरदान दिजो :- माँ ऐसा वरदान दिजो, जो नित पाऊं कृपा तेरी |
तन मन धन सब अर्पित करूँ, चरणों मे तेरी ||

हो सबकी इच्छा पूरी ,करूँ हाथ जोड़ ये विनती |
माँ जगजननी कृपा करो, आया मै शरण तेरी ||

जबतक ग्रहों के जड चेतन पर पडनेवाले सही स्‍वरूप का ज्ञान नहीं हो ॥ दुनियाभर में अंधविश्‍वास कैसे रूके ?? :- कल दिब्‍या जी ने एक पोस्‍ट लिखा था ... इतना मुश्किल भी नहीं आपको समझना --आप तो मेरी ही तरह भावुक हैं...न्‍यूमरोलोजी पर आधारित यह पोस्‍ट पाठको को आकर्षित करने में सक्षम रहा है , पर ऐसे पोस्‍ट परंपरावादियों और आधुनिक विचार वालों के मध्‍य वाद विवाद का केन्‍द्र बन ही जाते हैं। पर ज्‍योतिष , तंत्र मंत्र , परंपरा , ईश्‍वर , आदि मामलों में बहस का कभी निर्णय न अब तक निकला है और न ही निकलेगा। सामान्‍य परिस्थिति में किसी झंझट को सुलझा पाना कमजोर पक्ष के बूते की बात ही नहीं , मजबूत पक्ष ही झंझट को सुलझा सकता है , इसलिए झंझट नहीं सुलझा करता , क्‍यूंकि इसमें मजबूत पक्ष को घाटे की गुंजाइश रहती है।

बाबागीरी में गलत क्या है :- अगर आप को एक राष्ट्र के नाते भारत को परिभाषित करना हो तो क्या कहेंगे? यह कि भारत दुनिया के नक्शे पर एक भौगोलिक टुकड़ा है, या यह कि एक निश्चित सीमाओं में बंधा हुआ ऐसा भूभाग, जिस पर भारत सरकार की प्रभुसत्ता स्थापित है, जिस पर भारत का संविधान और कानून लागू होता है? नहीं, इन परिभाषाओं में हर नागरिक को भावनात्मक रूप से इस ईकाई के साथ जोड़ने की जीवंत शक्ति नहीं झलकती, इनमें वह प्राणतत्व नहीं दिखता, जो किसी को भी अपने देश से प्यार करना सिखाता है, जो हृदय में देशभक्ति के बीज बोता है, जो किसी भी नागरिक के मन में देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने का जज्बा भर देता है।

सड़क मार्ग से महाराष्ट्र: लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग? :- एक बार फिर गोवा की मशहूर वास्तविक रंगीनी देखने का इरादा लिए 10 जुलाई की रात मैं पहुँच गया वापस, खारघर, नवी मुम्बई में मामाजी के घर।

11 जुलाई को था रविवार। बिटिया ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि बहुत हो गया अब! रविवार को, दो बच्चों वाला ममेरे भाई का परिवार छुट्टी के मूड में रहता है सो उनके साथ मुम्बई का एक चक्कर लगाना ही है। सबसे पहले तो मारूति वैन की वो बैटरी लाई गई जिसे गोवा जाने के पहले चार्जिंग के लिए दिया गया था। चार्ज हुई बैटरी लगाते ही उस गाड़ी का इंजन दो इग्नीशन में ही गुर्रा उठा जिसमें गड़बड़ी बता दी गई थी। गैस थी नहीं, पास के ही पेट्रोल पम्प से पेट्रोल डलवा कर, गाड़ी को धो-पोंछ कर आवश्यक तैयारी कर ली।

रूठ गया प्यार मेरा .......... :- रूठ गया
प्यार मेरा
उसे अपना
कहने का

गुनाह जो
कर बैठा

अब कैसे
मनाऊँ
कौन सा
दीप जलाऊँ
कैसे उसे
समझाऊँ

सत्तर की उम्र और नटनी से आशनाई :- गुलाबजान के एक और चाहनेवाले थे, नवाब मुज़फ्फरबेग, जो नवाब बल्लभगढ़ के नाम से मशहूर थे। बल्लभगढ़ मुक्तेसर की पूर्वी दिशा में अब एक छोटा-सा वीरान गाँव है। उस जमाने में यहाँ बड़ी रौनक थी, जिसका सबूत नवाब की विशाल गढ़ी, हवेली और बारहदरी तथा कचहरी के खण्डहर हैं, जिन पर अडूसे और धतूरे के पेड़ उग आए हैं। उन दिनों यहाँ बहुत धूम-धड़ाका रहता था। नवाब मुज़फ्फरबेग ठस्से के रईस थे। रुपया नकद इनके पास बहुत था। इलाका भी छोटा न था। असल बात यह थी, उन दिनों आज के जैसे न तो बम्बई, कलकत्ता और दिल्ली जैसे विशाल नगर थे, जहाँ देश-भर के पढ़े-लिखे लोग पेट के धन्धे के फेर में फँसकर खटमल और मच्छरों की भाँति छोटे-छोटे दरबों में रहते हैं।

धान के बिरुओं ने पहनी हैं नवेली बालियाँ। :- धान्य से भरपूर,
खेतों में झुकी हैं डालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

क्वार का आया महीना,
हो गया निर्मल गगन,
ताप सूरज का घटा,
बहने लगी शीतल पवन,
देवपूजन के लिए,
सजने लगी हैं थालियाँ।

तुम रहो, हम रहें :- तुम रहो
हम रहें
देश रहे!
नहीं कोई क्लेश रहे!

माँ के नाम पर कारोबार शुरू :- आज से नवरात्रि का पावन पर्व प्रारम्भ हो रहा है। शहर के लगभग हर भाग में मां दुर्गा की झांकी लगाई जा रही है। एक नजरिये से देखा जाये तो यह अच्छी बात है कि लोगों में धर्म के प्रति एक प्रकार की सकारात्मकता का विकास हो रहा है। इस विकास के पीछे की सोच पर दृष्टिपात किया जाता है तो इस धार्मिकता के पीछे की असलियत सामने आती है। हमारे शहर में विगत कई वर्षों से झांकियों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही है। किसी समय में पूरे शहर में दो-तीन प्रमुख स्थानों पर मां दुर्गा की झांकी लगती थीं जिनकी संख्या आज बढ़कर अर्द्धशतक के आसपास पहुंच रही है।

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… बेस्ट के ड्राईवर का गुस्सा.. बाबा.. :- घर से आज ९.२५ पर निकल पाया तो लगा कि शायद अपनी बस आज छूट जायेगी, सोचा कि अब तो अगली बस ९.५० की ही मिलेगी, परंतु हाईवे पर पहुँचते ही अपनी तो बाँछें खिल गई, क्योंकि जबरदस्त ट्रॉफ़िक था, कोई गाड़ी अच्छे से किसी से टकरा गई थी। और तीन तीन बस ट्रॉफ़िक में फ़ँसी हुई थीं जिसमें सबसे पीछे वाली बस अपनी थी, फ़िर से ड्राईवर से मुस्कराहट का आदान प्रदान हुआ और उन्होंने आगे से ही चढ़ने का इशारा किया परंतु सभ्यता से हम बस के पीछे वाले दरवाजे से चढ़ लिये।

लो क सं घ र्ष !: नागार्जुन जन्मशती पर विशेष : भगवान बौना है :- भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से होता है।

इस्मत से "शेफ़ा" तक का सफ़र.... :-
रोज़ की तरह उस दिन भी मैंने अपने पेज का काम निपटाया और फिर रविवारीय पृष्ठ की सामग्री देखने लगी. दो-तीन आलेख एडिटिंग के लिए निकाले ही थे, की हमारे मुख्य सम्पादक, श्री श्याम सुन्दर शर्मा
जी आये, उनके साथ एक गौरांग, सुदर्शना, गंभीर सी दिखने वाली लड़की भी भीतर आई. शर्मा जी बोले-
" वंदना, ये इस्मत हैं, इस्मत जैदी, अच्छा लिखतीं हैं, इनके आलेख देख लो."
इस्मत की तरफ मैंने एक औपचारिक मुस्कान फेंकी, बदले में उसने भी हलकी सी मुस्कराहट बिखेरी. उस दिन ही हम लगभग आधे घंटे साथ रहे, और मुझे लगा, की ये तो मेरी दोस्त है!


..............वो इक ज़िया ही नहीं :- आज इस ब्लॉग की सालगिरह के मौक़े पर एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है
इस एक साल के सफ़र में आप सब ने जो सहयोग और मान दिया
है,उस के लिये मैं बहुत बहुत शुक्रगुज़ार हूं ,ये सफ़र आप सब के सहयोग ,
मशवरों और स्नेह के बिना संभव ही नहीं था ,आप सब के द्वारा दिया
गया मान और पहचान मेरे जीवन की अमूल्य निधि है ,जिस के लिए सब से पहले
वंदना अवस्थी दुबे की शुक्रगुजार हूँ जो मुझे ब्लॉग जगत में लाईं और फिर आप सब
का बहुत बहुत शुक्रिया कि आप ने मुझे इस मंच पर स्थान दिया ,
लीजिये ग़ज़ल हाज़िर है

हर कुंवारा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति नहीं बन जाता ...........कुछ बौरा भी जाते हैं ....झा जी अगैन कहिन :- खबर :- सिमी और आर एस एस दोनों आतंकी संगठन हैं :राहुल गांधी

नज़र :- लो हमें तो पहिले ही शक था कि ..ई जो राहुल बाबा अपने पचासा में पहुंचने जा रहे हैं और अब तकले कुंवारे बैठे हैं तो इसका मतलब ..देश ये कतई न लगाए कि ..उसे फ़िर से ..एक ठो कुंवारा ..प्रधानमंत्री या मिसाईल मैन टाईप राष्ट्रपति मिलने वाला है ......अजी कभी कभी कुंवारेपने से लोगबाग बौरा भी जाते हैं ...।

आशंकाओं का जनाज़ा :- बीता सप्ताह हर हिन्दुस्तानी को फ़क्र से भर गया, वह भी तब जब वह सबसे ज्यादा आशंकित था .३० सितम्बर और ३ अक्तूबर की तारीख केवल तारीखभर नहीं बल्कि हमारी नज़र और नज़रिए का विकास है. इन दोनों ही घटनाओं को द हिन्दू के कार्टूनिस्ट केशव की नज़रों से देखना भी दिलचस्प होगा . अयोध्या फैसले के बाद उन्होंने दो पंछी बनाये जो एक पतली-सी डाली को साझा किये उड़े जा रहे हैं और राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह के बाद एक मस्त हाथी जो आशंकाओं के गुबार को पीछे छोड़ अपनी मतवाली चाल से चला जा रहा है .

हम ऊंट को ले आते हैं वो आप को देख लेगा ...... :- अभी तीन दिन पहले अहमदाबाद में बहुत बड़ा कवि सम्मेलन

था दी गुजरात एस्टेट डेवलेपर्स एसोसिएशन यानी सरल शब्दों

में बिल्डर्स एसोसिएशन का जिसमे देश भर के ख्यातनाम कवि-

कवयित्रियों ने काव्यपाठ किया । उस भव्य कवि-सम्मेलन का मंच

सञ्चालन किया था दिल्ली के गजेन्द्र सोलंकी ने ।



चूँकि मैं कद-काठी में ठीक-ठाक हूँ इसलिए मुझे प्रस्तुत करते हुए

गजेन्द्र सोलंकी ने यह कह कर बुलाया कि ये देश का सबसे लम्बा

कवि है जो खड़ा हो कर देखे तो संतरे भी निम्बू दिखाई देते हैं........

इस चुटकी पर लोगों ने ख़ूब ठहाका लगाया ।



भ्रष्टाचार के कब्ज़े में व्यवस्था : सूचना के अधिकार का खुल के प्रयोग हो :- भ्रष्टाचार एक गम्भीर समस्या है इस हेतु क्या प्रयास हों अथवा होने चाहिये इस सम्बंध में सरकारी इंतज़ाम ये हैं :- केन्द्रीय सतर्कता आयोग, भारत:- केन्द्रीय सूचना आयोग, भारतएन्टी-करप्शन ब्यूरो, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ T HE PREVENTION OF CORRUPTION ACT, 1988 किंतु कितने कारग़र हैं इस पर गौर करें तो हम पाते हैं कि आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। कारण जो भी हो राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर पर अपने ढांचे में इन व्यवस्थाओं को शुमार किया है. इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा ? वास्तव में ऐसा नहीं हुआ.


समीर जी क्यों मेरे गुरुदेव हैं...खुशदीप :- चाटुकारिता, प्रशंसा या दिल से किया गया सम्मान...ये सब हैं तो एक जैसे ही लेकिन इनमें फ़र्क ज़मीन-आसमान का है...फिर महीन लकीर कैसे खिंची जाए...कोई अपने फायदे के लिए चाटुकारिता कर रहा है तो दूसरा कोई ये समझ सकता है कि वाकई ये दिल से बोल रहा है...और अगर कोई वाकई दिल से किसी का सम्मान कर रहा है तो ये समझा जा सकता है कि अपना उल्लू सीधा कर रहा है....चाटुकारिता रूतबे या पैसे में अपने से बड़े की ही की जा सकती है...लेकिन दिल से सम्मान किसी का भी किया जा सकता है...ये उम्र, पैसा, रुतबा नहीं देखता...


लीजिये साहब फिर मौका मिल गया मुझे अपनी डफली आप बजाने का ....

एक रि पोस्ट :- देवी पूजा के नियम :- द का अर्थ है-जो स्थिर है और ग का अर्थ है- जिसमें गति है। उ का अर्थ है स्थिर और गतिमान के बीच का संतुलन और अ का अर्थ है अजन्मे ईश्वर की शक्ति। यानी दुर्गा का अर्थ हुआ, परमात्मा की वह शक्ति, जो स्थिर और गतिमान है, लेकिन संतुलित भी है। किसी भी प्रकार की साधना के लिए शक्ति का होना जरूरी है और शक्ति की साधना का पथ अत्यंत गूढ़ और रहस्यपूर्ण है। हम नवरात्र में व्रत इसलिए करते हैं, ताकि अपने भीतर की शक्ति, संयम और नियम से सुरक्षित हो सकें, उसका अनावश्यक अपव्यय न हो।

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आज की ब्लॉग वार्ता बस यहीं तक ....... अगली बार फिर मिलता हूँ एक और ब्लॉग वार्ता के साथ तब तक के लिए ......
जय हिंद !!

16 टिप्पणियाँ:

सुंदर वार्ता के लिए आभार शिवम जी।

नेत्र दान दिवस पर शुभकामनाएँ..अच्छी चर्चा

या देवी सर्व भूतेषु सर्व रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||

-नव-रात्रि पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं-

शुभप्रभात शुभम !
बढ़िया सामग्री पढवाने के लिए आभार !

जब आप और हम इस दुनिया में नहीं होगे, फ़िर भी इस दुनिया को देख रहे होगे !!

सत्यम -शिवम्-सुन्दरम --- सुन्दर वार्ता .....आभार शिवम् जी।

वार्ता तो सुंदर लिंक के साथ है ही पर जो सुंदर से सुंदरतम है वह इसके शुरु में दिया गया संदेश। बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

फ़ुरसत में …बूट पॉलिश!, करते देखिए, “मनोज” पर, मनोज कुमार को!

ताऊ पहेली ९५ का जवाब -- आप भी जानिए
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_9974.html

भारत प्रश्न मंच कि पहेली का जवाब
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_8440.html

हां ये हुई न बात ..नाम के साथ ट्रेलर भी ..यही तो मैं कह रहा था शिवम भाई कि ..प्रयोग होते रहने चाहिए ..खुद के लिए भी और ..पाठको के लिए भी

बहुत ही अच्छी वार्ता रही.. धन्यवाद..

मेरे ब्लॉग पर इस बार सुनहरी यादें ....

बहुत सुन्दर वार्ता…………अच्छे लिंक्स्।

आप सब का बहुत बहुत आभार !

बढ़िया पोस्ट , आभार .

कृपया सुझाव दें - -
" किताबों का डिजिटलाइजेशन "

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