गुरुवार, 23 अगस्त 2012

ब्रेकिंग न्यूज : बहुत कठिन है डगर…ब्लॉग4वार्ता--संध्या शर्मा

संध्या शर्मा का नमस्कार...  कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर आई सीएजी की रिपोर्ट के बाद केंद्र को कठघरे में खड़ा कर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग पर अड़ी बीजेपी द्वारा संसद में बहस की पेशकश को ठुकरा दिए जाने पर सरकार ने प्रमुख विपक्षी दल पर पलटवार करते हुए बुधवार को आरोप लगाया कि बीजेपी जान-बूझकर इस मुद्दे पर बहस नहीं करना चाहती, क्योंकि इससे उसकी पोल खुल जाएगी. इधर इंटरनेट की आजादी के प्रति पूर्ण समर्थन जताते हुए अमेरिका ने भारत से अपील की है कि दक्षिणी राज्यों से पूर्वोत्तर के लोगों के बड़ी संख्या में प्रस्थान करने के कारण बने अफवाहों की जांच में सरकार मूलभूत आजादी का सम्मान करे.... इन प्रमुख्य ख़बरों के साथ आइये चलें आज की वार्ता पर.... 

कुछ तुम , कुछ मै * *कहना होता है कुछ तुम्हें* *तो कह दीया करो* *मन में छुपाकर* *कोई बात रखा ना करो* *जो होगा सही तो* *प्यार से इकरार कर लूंगी मै * *अगर नहीं तो* *ख़ुशी से स्वीकार * *कर लेना तुम* *एक-दूजे के है हम* *फिर .. मन की बातें.. .* * *आराम से बैठ कर सितारों ने महफ़िल जमाई है* * * ** *बात चली घटाओं की जहां हवाओं की आवाजाही है ..* * रुक कर पुछा बूंदों ने ,मिलेगा आशियाना यहाँ.. ले लो संग हमें भी ,आज अश्कों से रुसवाई है .. *  विश्वास आज एक अरसे के बाद हिचकिचाते कदमों से मैं तुम्हारे मंदिर की इन सीढ़ियों पर चढ़ने का उपक्रम कर रही हूँ ! नयन सूने हैं , हृदय भावशून्य है , हथेलियाँ रिक्त हैं ! हाथों में ना तो पूजा का थाल है ...

 " बहुत कठिन है डगर .......ब्लागिंग की ........" बचपन गुजरा रेलवे कालोनी में | वहां से रेल की पटरियों पर दौड़ते हुए हम लोग स्कूल जाया करते थे | कभी डरे नहीं और कभी गिरे भी नहीं | दिन बीतते गए , वर्ष बीतते गए , इंजीनियरिंग की पढ़ाई की , बिजली विभाग की... .कुछ अभी तक कुछ नहीं है मन में फिर भी मन हो रहा है कुछ करने का कुछ कहने का यह आदत है मजबूरी है या नौकरी नहीं पता बस बाहर होती रिमझिम को देख कर नहा धो कर ताजगी से खिलखिलाती घास- फूल-पत्तियों को देख कर सोच रहा ...सुन्दर-सुन्दर फूल खिले हैं...  आजकल हमारे बंगले के लान में और आस-पास खूब सारे फूल खिले हैं. बारिश के बाद चारों तरफ खूब हरियाली फैली है. (यह रहा हमारे बंगले के सामने का लान) (यह है हमारा स्विंग..खूब मस्ती होती है यहाँ)(यह रहा ममा-पापा का...

क स म क श .कंचन काया कामिनी, कलाकंद कुछ काल। कारण कामुकता कलह, कामधेनु कंकाल।। सम्भव सपने से सुलभ, सुन्दर-सा सब साल। समुचित सहयोगी सुमन, सुलझे सदा सवाल।। मन्द मन्द मुस्कान में, मस्त मदन मनुहार। मारक मुद्रा मोहिनी,...इक तबस्सुम में ये दम है ...  दिन हैं छोटे रात कम है साथ उनका दो कदम है फुर्र हो जाते हैं अपने वक़्त का कैसा सितम है तू है या एहसास तेरा या मेरे मन का वहम है दूर होने पर ये जाना आज फिर क्यों आँख नम है  ...स्‍नेह की छांव में ... आज पापा की *तिथि *मन रात से ही उन्‍हें अपने आस-पास महसूस कर रहा है ... मेरी हर बात पर स्‍नेह से *हां* कहते और मुस्‍करा देते ... बस उनकी वही चिर-परिचित मुस्‍कान है और पलकों पे *नमीं ... * कुछ मेले बचपन के ...

कवि की आत्मा कवि की आत्मा एक कविता हूँ मैं अपने हाथों से लिखा है जिसे परमात्मा ने काव्य धर्म है जिसका..... या अनंत के कैनवास पर उसकी कूंची से खिंचा एक स्ट्रोक उत्सव कर्म है जिसका.... लहर हूँ एक महाविस... तो इश्क़ हो जाता.... उसने ता-उम्र तकल्लुफ का जो नक़ाब रखा... वो जो उठता कभी ऊपर, तो इश्क़ हो जाता.... उसकी आदत है वो पीछे नहीं देखा करती... ज़रा सा मुड़ के देखती, तो इश्क़ हो जाता... उसको जलते हुए तारे, चमकता चाँद दिखा... रात... Akanksha मुझे आप सब को यह बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मेरी कविताओं का दूसरा संकलन"अंतःप्रवाह "प्रकाशित हो गया है | अंतःप्रवाह ...

प्राचीन राजधानी रतनपुर ---- बिलासपुर से चलने की तैयारी 29 जुलाई 2012 की सुबह सप्ताहांत का रविवार लेकर आई, आसमान में बादल छाए हुए थे रिमझिम बरखा के आसार बने हुए थे। लाल चाय से सुबह हुई, स्नानाबाद से आकर बाबू साहब को फ़ोन लगाए तो पता चल..ब्रेकिंग न्यूज : यमलोक में हंगामा ! *दे*श की घटिया राजनीति और बाबाओं की नंगई तो आप हमारी नजर से काफी समय से देखते और पढ़ते आ रहे हैं, चलिए आज आपको ऐसी जगह ले चलते है, जहां जाने के बाद कोई वापस नहीं आया। अगर कोई वापस आया भी तो उसे पहचानना ...दशा 1 धरती ने सूरज से कहा तुम सदा पूरब से ही क्यों निकलते हो? बदलकर देखो अपनी दिशा? एक बार 2 भूखा कभी भूख की परिभाषा लिख पाता है? भर पेट भूख को परिभाषित कर जाता है 3 अरे नादां पैर के निचे धरती सिर के ऊपर ...

एक गज़ल -आराकशी को आप हुनर मत बनाइये - चित्र -गूगल से साभार एक गज़ल -आराकशी को आप हुनर मत बनाइये आराकशी को अपना हुनर मत बनाइये जंगल तबाह करके शहर मत बनाइये लौटेंगे शाम होते ही पंछी उड़ान से ... स्त्री की पहचान उसका पति है...? - ईश्वर ने स्त्री और पुरुष , दो खूबसूरत रचना की। सोचने के लिए बुद्धि और कल्पनाओं की उड़ान के लिए मन तो एक सा दे दिया लेकिन स्त्री को शारीरिक रूप से कमज़ोर बना ... वो भूली दांस्ता लो फिर याद आ गई . . - रेडियो श्रोता सम्मेलन ऐसा क्या कह दिया कि सब खिलखिला उठे*दे*श में रेडियो श्रोता दिवस मनाने की परम्परा शुरू करने का श्रेय छत्तीसगढ़ को है। इस नये राज्य के ...  

अब एक कार्टून ...

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आज के लिए बस इतना ही अगली वार्ता में फिर भेंट होगी
नमस्कार..........

10 टिप्पणियाँ:

कई रंग लिए वार्ता |मेरे सन्देश को यहाँ जगह देने के लिए आभार |
आशा

बढिया वार्ता संध्या जी, आभार

सुन्दर वार्ता, "वो भूली दांस्ता लो फिर याद आ गई . ." को शामिल करने के लिए आभार .

बहुत कठिन है डगर ..

चाहे जीवन का कोई भी क्षेत्र हो ...
बढिया वार्ता अच्‍छे अच्‍छे लिंक्‍स मिले ..
संध्‍या जी आपका बहुत बहुत आभार !!

बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स लिए बेहतरीन वार्ता प्रस्‍तुति ...

बहुत सार्थक लिंक्स ढूँढ लाई हैं संध्या जी आज ! बहुत प्यारी वार्ता ! मेरी रचना को आपने इस वार्ता में सम्मिलित किया, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद एवं शुक्रिया !

बहुत बेहतरीन लिंक्स है..
बढ़िया वार्ता दी
धन्यवाद....
:-)

बहुत अच्छी वार्ता संध्या जी...
व्यस्तता के चलते आने में ज़रा देर हुई....

शुक्रिया
सस्नेह
अनु

बढ़िया वार्ता .... अच्छे लिंक्स मिले

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